Monday, 18 November 2013

मोदी की लोकप्रियता और "आप" का भ्रष्ट आचरण

दिल्ली विधान सभा चुनाव बड़ा दिलचस्प होता जा रहा है। कई मायानों मे ये इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है यहाँ चुनाव प्रचार कोई अपना कर रहा है लेकिन हो किसी और का रहा है। "आम आदमी पार्टी" के बेहद महत्वपूर्ण पदाधिकारी सकते मे हैं उनको कोई रास्ता नहीं मिल रहा जिससे इस गंभीर समस्या से मुक्ति पा सकें। वो बता रहे थे कि जहां भी भी वो जा रहे हैं घरों के लोग खुल कर मोदी के पक्ष मे बोल रहे हैं लिहाजा "आप" के पदाधिकारियों को वोटरों को समझाने मे काफी दिक्कत हो रही है। एक दिन "आप" की टीम प्रचार मे निकली और लगभग 178 घरों मे संपर्क किया जिसमे से 158 घरों के लोगों ने मोदी के पक्ष मे खुल कर बोला तब लोगों को समझाने के लिए "आप" के कार्यकर्ताओं को कहना पड़ता है मोदी को आप लोकसभा मे वोट कीजिएगा लेकिन विधानसभा मे "आम आदमी पार्टी" को वोट कीजिये। जब लोग बवाल को टालने के लिए सहमति दे दे रहे हैं तो लोगो की उस बनावटी सहमति को "आप" के सामान्य कार्यकर्ता तो अपना वोट मान कर बम-बम हैं लेकिन पदाधिकारियों के चेहरे से हवाईयां उडी हुई हैं। अब तक के चुनावी इतिहास मे ये पहली बार देखा जा रहा है कि लोग किसी खास नेता के लिए लोग विरोध तक कर रहे हैं नहीं तो इसके पहले लोग प्रत्याशी का मन रखने के लिए हाँ हाँ कह देते थे लेकिन वोट अपनी मर्जी से करते थे। ये पहली बार है कि "आम आदमी पार्टी" मोदी के समर्थन मे विरोध झेल रही है। यही कारण है कि केजरीवाल को रोड शो के लिए निकालना पड़ा लेकिन वो भी सफल नहीं है ये भी नई चिंता का विषय है "आम आदमी पार्टी" के लिए। एक दिन तो हद ही गई जब लोगों ने केजरीवाल का सरे आम मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। नुक्कड़ सभाएं भी कम ही की जा रही हैं इस डर से कि कहीं लोग प्रश्न पूछ कर मज़ाक उड़ाना न शुरू कर दें। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से "आम आदमी पार्टी" के कार्यकर्ताओं ने बदतमीजी की है उसका भी दिल्लीवासियों मे बहुत गुस्सा है।

वही पदाधिकारी बता रहे थे कि नई समस्या ये भी है करीब - करीब सारे कार्यकर्ता नौजवान हैं लिहाजा अतिउत्साह मे गलत और सही का भी भान नहीं रहता जिससे सामान्य तौर पर नई - नई मुसीबतें अक्सर खड़ी होती रहती हैं जिसे नियंत्रित करना भी काफी मुश्किल है। वैसे समस्याएँ ऐसी हैं जिस पर पार्टी के पदाधिकारियों को काफी माथापच्ची करने के बाद भी समाधान निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। वैसे पदाधिकारियों को महिला कार्यकर्ताओं को लेकर भी खासे चिंतित हैं बड़ी संख्या मे मिलती शिकायतों के बाद महिला कार्यकर्ताओं को या तो उनके घर वाले प्रचार मे जाने से रोक रहे हैं या फिर वो खुद डर के मारे चुनाव प्रचार मे जाने से कतरा रही है। अचानक महिला कार्यकर्ताओं की संख्या कम हो जाने से जवान पुरुष कार्यकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम हो गई है।

 ये अवधारणा की लड़ाई नहीं बल्कि बेहद निम्न कोटि की व्यावहारिक परेशानी है ..जो "आचरण का भ्रष्टाचार" है जो वास्तव मे बहुत खतरनाक है .... 

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