Tuesday, 19 November 2013

चंदा या निवेश ?

17 नवम्बर को अन्ना द्वरा केजरीवाल को लिखी तीनों प्रश्नो का उत्तर मे उन्होने गोलमोल ही सफाई दी है जिसे तार्किक उत्तर बिलकुल ही नहीं माना जा सकता जैसे जनलोकपाल का संदर्भ राष्ट्रीय संदर्भ मे है जबकि वो सिर्फ दिल्ली का चुनाव लड़ रहे हैं इसके उन्होने महाराष्ट्र और उत्तराखंड के लोकायुक्त बिल का हवाला दिया है फिर वो अपने बैनर जो दिल्ली मे लगा रखे हैं उनपर जनलोकपाल का जिक्र कैसे है ? अन्ना के नाम का दुरपयोग हर जगह दिल्ली मे देखा जा सकता है फिर कैसे केजरीवाल सफेद झूठ बोल रहे हैं यहाँ तक कि जनलोकपाल के साथ भी अन्ना का नाम जोड़ा गया।

चिट्ठी के कोष के उपयोग जवाब केजरीवाल ने इतना कहा कि जस्टिस  संतोष की भांति किसी सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करा लें, इस निमित्त सारी आवश्यक जानकारी वो स्वयं उपलब्ध कराएंगे। पता नहीं उस जमा राशि की फ़ाइल बनी भी है या नहीं यदि बनी भी होगी तो मिलने की क्या गारंटी है।वैसेभी अगर सबकुछ ठीक - ठाक होता तो एक - एक पैसे का पूरा हिसाब केजरीवाल अन्ना को उसी समय दे दिये होते जो उन्होने नहीं किया। वैसे अन्ना के पूर्व ब्लॉगर राजू पारुलकर के एक बहुत बड़ा खुलासा ये किया कि एक बार अन्ना से केजरीवाल की सारे सदस्यों के बीच इकट्ठा हुए फंड के बटवारे को लेकर बहुत तीखी नोकझोंक हुई थी जिसे कजरीवाल ने रिकॉर्ड कर के अपने पास रख लिया और उसी सीडी आधार पर केजरीवाल अन्ना को ब्लैकमेल कर रहे हैं। यही कारण है कि केजरीवाल के मुद्दे पर अन्ना को यू टर्न लेना पड़ जाता है जैसा आज सुबह रालेगण सिद्धि मे हुआ। ये केजरीवाल की असलियत है।

वैसे 14 नवंबर के बाद से ही "आम आदमी पार्टी" के संदर्भ मे तेजी से घटित हुए घटनाक्रम से पूरी पार्टी सन्न तो है ही सकते मे भी है। एक तो पहले से ही पार्टी मोदी की लोकप्रियता के कारण गंभीर चुनावी परेशानी का सामना कर रही थी और अब कोढ़ मे खाज बन कर ये मुद्दा आ गया। "आप" की परेशानी सिर्फ यही नहीं है कि चुनाव जीतना वैसे भी उनके लिए पहले ही बहुत कठिन था लेकिन अबतो करीब - करीब असंभव सा हो गया है।

अभी कुछ दिन पहले ही पार्टी फंडिंग पर न्यायालय के आदेश पर जांच चल रही है जिससे "आप" के कार्यकर्ता खार खाए हुए है। पार्टी अगर नहीं जीती तो केजरीवाल बहुत बड़े धर्मसंकट मे फंस जाएंगे ऐसा पार्टी के पदाधिकारी भी मानते हैं। इस हालिया घटनाक्रम  से पार्टी चंदा देने वाले भी बहुत ज्यादा चिंतित हैं उन्हें उनका पैसा डूबता हुआ साफ नजर आ रहा है। सवाल ये उठता है कि चंदा देने वालों ने क्या "आप" को चंदा चंदा समझ के दिया या पार्टी मे "निवेश" किया? एक व्यक्ति जिनहोने "आप" को बड़ी राशि चंदे के रूप मे दिया है, बता रहे थे कि केजरीवाल उनकी टीम ने उन्हें धोखे मे रखा ..सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल और उनकी टीम ने चंदा लेने से क्या वादा किया था ? आखिर बड़ी राशि चंदे के तौर पर देने वाले "रिटर्न" की उम्मीद क्यों कर रहे हैं?

अरविंद केजरीवाल चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं उनके लिए इस समय उनके गुरु अन्ना हज़ारे आदि का कोई मतलब नहीं है उनके कार्यकर्ता भी पता नहीं किस उम्मीद मे हैं जाहिर सी बात है इतनी उम्मीद आदमी तभी करता है जब उसका बहुत कुछ दांव पर लगा हो खास कर पैसा। अतः ये जानना बहुत आवश्यक है कि केजरीवाल ने "चंदा" लिया या "निवेश" के लिए "आम आदमी पार्टी" के बॉन्ड जारी किये ???

  

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