Saturday, 30 November 2013

पाँच प्रश्न और "आप"की पंचलकड़ी *

केजरीवाल एंड कंपनी और उनके "आप" के "पाप के भंडाफोड़" की शुरुआत उसी दिन से शुरू हो गई थी जब उन्होने पिछले महीने 23 अक्टूबर को डॉ राघवेंद्र कुमार ( https://www.facebook.com/Dr.Raghvendra.Kumar ) द्वारा पूछे गए 5 बेहद मौलिक, आसान किन्तु महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने से वो भागने लगे, उन पांचों प्रश्नो को डॉ राघवेंद्र कुमार ने उनकी वैबसाइट पर लोड पर तो किया ही था साथ ही "आम आदमी पार्टी" फ़ेसबुक अकाउंट पर भी शेयर किया था लेकिन उनके "आप" के फ़ेसबुक अकाउंट उन प्रश्नों को अनटैग कर दिया फिर भी उन सभी प्रश्नो को इस लिंक https://www.facebook.com/AamAadmiParty/posts/424336560999443?ef=notif&notif_t=like पर अभी भी देखा जा सकता है। उन पाँच प्रश्नो के कारण "आम आदमी पार्टी" मे खलबली सी मच गई थी। डॉ राघवेंद्र के वो पाँच प्रश्न ऐसे थे कि उसे फॉलो करने वालों को स्पष्ट लगने लगा कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है फिर उसके बाद जिस प्रकार से लोग "आप" की हकीकत जानने के लिए आतुर हुए उसका नतीजा आज सबके सामने है। हालाँकि केजरीवाल एंड कंपनी ने अपने वेबबसाइट से उन सभी प्रश्नो को स्थिति बहुत ज्यादा खराब होने पर कुछ दिनो बाद डिलीट कर दिया, लेकिन नाम के मेनशन होने के कारण और उनके अब भी होने से ये साफ पता चलता है कि केजरीवाल से कुछ पूछा गया था। उसे इस लिंक पर देखा जा सकता है http://www.aamaadmiparty.org/page/PolKhol ।

इस घटना बाद तो जैसे प्रश्न पूछने का सिलसिला ही चल पड़ा खुद "आम आदमी पार्टी" के वैबसाइट पर बहुत से लोग सवाल पूछने लगे। मध्य प्रदेश और बिहार भाजपा ने भी राहुल गांधी और काँग्रेस से पाँच सवाल उसी तर्ज पर पूछ डाले और तो और उन प्रश्नो के प्रभाव को देखते हुए टीवी चैनल भी टीआरपी बढ़ाने के लिए 5 सवाल पूछने लगे। IBN 7 पर शाम के शाम के सामय प्रसारित होने वाला  "बड़ा सवाल", कार्यक्रम इसका प्रमाण है। उन प्रश्नो के तेजी से वाइरल हो जाने का प्रभाव के कारण केजरीवाल एण्ड कंपनी की लोकप्रियता मे तेजी से गिरावट आई जिसके चलते कंपनी को साफ-साफ लगने लगा कि बचा-खुचा वोट बैंक भी बचाना बहुत जरूरी है लिहाजा वो बरेली तौकीर रजा से समर्थन तक मांगने जा पहुंचे।

अभी 27 नवंबर को एबीपी न्यूज़ और आजतक चैनल पर दिखाए गए ओपेनियन पोल के मुताबिक केजरीवाल की लोकप्रियता अच्छी ख़ासी घटी। एबीपी न्यूज़ का सर्वेक्षण 14 नवंबर तक का है तबतक अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और सीडी नहीं आई थी जिसे न्यूज़ एंकर नेहा ने कई बार ज़ोर देकर दोहराया। ABP न्यूज़ का "ओपेनियन पोल" डॉ कुमार के पाँच प्रश्नो के जबरदस्त प्रभाव की पुष्टि करता है, वहीं आजतक चैनल द्वारा भाजपा को 40 सीटें देना भी इस तथ्य को प्रमाणित करता है हालांकि उसका सर्वेक्षण 24 नवंबर तक का है।

भाजपा की लोकप्रियता मे वृद्धि के लिए भाजपा के लोगों ने जितनी मेहनत की है वो अपने आप मे सराहनीय है निःसन्देह उससे दिल्ली मे भाजपा की राह बहुत आसान हो गई है। नरेंद्र भाई मोदी के जादू का तो कहना ही क्या सारा देश ही उसका कायल है। लेकिन "आप" की ईंट से ईंट बजाने की शुरुआत जो डॉ राघवेंद्र ने की वो अद्भुत, अनोखा है और अतिप्रभावशाली है। रही सही कसर अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और स्टिंग ऑपरेशन और सामूहिक सोशल मीडिया कैम्पेन ने पूरी कर दी। अब तो कहा ये भी जा रहा है की "आप" का दिल्ली विधान सभा चुनाव मे खाता खुलना भी मुश्किल लग रहा है। राष्ट्र के मुख्य धारा के तीन - तीन मीडिया समूह "आप" के पक्ष मे होने के बावजूद सोशल मीडिया के समूहिक कुशल प्रबंधन ने "आप" को खत्म ही कर दिया। सोशल मीडिया का यदि बेहतर, सटीक और पूरी मानसिक क्षमता से प्रयोग हो तो बाजी रातों - रात पलटी जा सकती है चाहे वो राजनीति हो, कॉर्पोरेट हो या कोई और क्षेत्र।

 डॉ राघवेंद्र कुमार की अतिउन्नत  मनोवैज्ञानिक पद्धति परंपरागत मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा (Traditional Psychology & Psychiatry) से इतना अधिक विकसित और उन्नत है कि किसी भी मानसिकता को इतना सशक्त किया जा सकता है कि व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है, बड़े से बड़े उद्देश्य को भी आसानी से प्राप्त कर सकता है। डॉ राघवेंद्र कुमार के 5 प्रश्न, अन्ना के दोनों पत्र व सीडी, स्टिंग ऑपरेशन और सोशल मीडिया के समूह ने "आप" का अंतिम संस्कार कर ही दिया।

* नोट- पंचलकड़ी पूर्वाञ्चल मे व्यक्ति के अंतिम संस्कार की सबसे अंतिम क्रिया होती है।    
    

Wednesday, 27 November 2013

"आप" के वजूद का मतलब

दिल्ली विधान सभा चुनाव मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए मुझे आश्चर्य होगा। जिस प्रकार से "आप" की पोल खुली है वो न सिर्फ अपने आप मे अनोखा है बल्कि भारतीय राजनीति का एक दुखदायी पक्ष इसलिए भी है कुछ अतिमहत्वाकांक्षी लोगों का समूह ईमानदारी के नाम पर बड़ी आसानी से लोगों की आँखों मे सारे आम धूल झोंकता हुआ चला जाता है और फिर फिर धीरे - धीरे जब उनकी पोल - पट्टी खुलती है तो लोग न सिर्फ सन्न रह जाते हैं बल्कि खुद को बेबस भी पाते हैं।  क्योंकि एक ऐसी पार्टी जो चुनाव लड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर लोगों को  न सिर्फ लोगों को धोखे मे रखने मे सफल रहती है बल्कि उसका किसी भी मुद्दे पर कोई विजन भी जनता के समक्ष नहीं आता। इतने आरोप तो चुनाव से पहले किसी भी भ्रष्ट पार्टी पर भी कभी नहीं लगे जितने आप पर अभी लग चुके हैं।

अस्सी के दशक के बेहद ईमानदार वी॰ पी॰ सिंह के दौर को याद कीजिये जिसकी उपज लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा आदि जैसे लोग हैं जिनका वास्तविक भ्रष्ट स्वरूप सबके सामने है। विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी भी प्रकार से और किसी भी प्रकार से अरविंद केजरीवाल से कम ईमानदार नहीं थे लेकिन जनता दल बनने से पहले और बाद मे भी उस व्यक्ति पर किसी भी भ्रष्टाचार, अनाचार या किसी हेर-फेर के आरोप कभी नहीं लगे। उस व्यक्ति ने पार्टी का टूटना स्वीकार किया लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी विश्वनाथ प्रताप सिंह की ईमादारी के आगे कहाँ खड़ी होती है जिसके खिलाफ सारे आम झूठ तक बोलने का आरोप है। विश्वनाथ प्रताप सिंह पर उनके गुरु राजीव गांधी ने भी कभी भी उनके उनपर कोई आरोप नहीं लगा पाए उल्टे केजरीवाल के गुरु "अन्ना" ने ही केजरीवाल को "लालची" तक कह डाला है। विश्वनाथ प्रताप सिंह की बेहद ईमानदार राजनीति ने देश की क्या दुर्गति की सभी लोगों के पता है उसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है।

जिस प्रकार से लोगों ने प्रयोग के तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को आजमाया था उसी तर्ज पर केजरीवाल भी लोगों से खुद को आजमाने की अपील कर रहे हैं। याद कीजिये किस प्रकार मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने कश्मीर के आतंकवादियों से मिलकर खुद अपनी बेटी महबूबा मुफ़्ती के अपहरण का नाटक खेला और बदले मे दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ा गया, बेहद ईमानदार विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार दिल्ली के जमा मस्जिद के ईमाम की गोडधरिया करते थे ईमानदार केजरीवाल उससे भी आगे बढ़ कर तौकीर रजा तक की गोडधरिया तक करते हैं, बटाला हाउस इनकाउंटर, मुस्लिम आरक्षण की वकालत आदि तो है ही दिल्ली के जनमानस मे। आतंकवादियों, नक्सलियों और कश्मीर पर ईमानदार केजरीवाल एंड कंपनी का स्टैंड किसी से छिपा नहीं है।

एक बहुत बड़ा और अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि दुर्भाग्य से यदि केजरीवाल दिल्ली का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाते है तो क्या "आम आदमी पार्टी" को वो खत्म कर देंगे ? यदि नहीं तो उनके वेबसाइट के अनुसार 10,000 कर्मचारियों का 20,000 रुपये मासिक के हिसाब से हर महीने वेतन के लिए 20 करोड़ रुपये मासिक कम से कम कहाँ से लाकर देंगे ? इसके लिए वो कौन सा रास्ता अपनाएँगे जो ईमानदारी का ही होगा? ये प्रश्न दिल्ली के लोगों के सामने तो है ही साथ ही "आप" के कर्मचारियों को सोचना चाहिए कि "आप" का होना ही अपने आपमे बहुत बड़ा भ्रष्टाचार नहीं है ?    

Monday, 25 November 2013

स्टिंग सीडी, बहुत बड़ी गंदगी को छोटी गंदगी से ढकने की कोशिश

केजरीवाल कितना बड़ा फर्जीवाड़ा कर सकते हैं इसे समझने के लिए दिमाग को थोड़ा उलटा करना पड़ता है फिर "आप" की गंदी और फर्जी दुनियाँ का वास्तविक स्वरूप और कायदे से दिखने लगता है। इतने बड़े - बड़े खुलासे होने के बावजूद कुछ खास मीडिया चैनलों पर उसका खबर न बनना अपने आप मे बहुत आश्चर्यजनक तो लग ही रहा है साथ ही उन खास चैनलों के महत्वपूर्ण पत्रकारों द्वारा केजरीवाल और "आप" का निहायत ही बेहूदे तरीके से बचाव करना भी खटक रहा है। इससे मुझे लगा कि इसकी भी थोड़ी छान-बीन करनी चाहिए वैसे तो ये पहले से ही विदित है कि मुख्य धारा के तीन बड़े मीडिया समूह केजरीवाल और "आप" के समर्थन मे हैं उसमे से एक तो पूरी तरह से है।  अभी तक किसी भी मीडिया समूह ने इस तथ्य को प्रकाश मे लाने जहमत नहीं उठाई है कि वास्तव मे केजरीवाल और "आप" के पीछे का वो वास्तविक सच क्या है कि अन्ना को अचानक केजरीवाल को चिट्ठी लिख कर उनसे पूछ - ताछ करनी पड़ी। सभी मीडिया समूहों ने अपना रंग ठीक उसी अंदाज मे बादल लिया जिस अंदाज मे केजरीवाल एंड कम्पनी चाहती थी।

जरा याद कीजिये 17 नवंबर की तारीख जब अन्ना ने दूसरी बार अरविंद केजरीवाल को पत्र लिख कर उनसे चंदे का हिसाब मांगा था जिससे पूरी की पूरी "आप" और केजरीवाल भड़क गए थे और केजरीवाल को सफाई देना पड़ी थी प्रेस कान्फ्रेंस कर के । वैसे अन्ना उनकी सफाई से थोड़ा भी संतुष्ट नहीं थे फिर उनसे जबरदस्ती केजरीवाल के समर्थन मे बयान दिलवाया गया था जो दूसरे दिन सुबह आया था। खैर ये सब याद दिलाना इसलिए आवश्यक है कि एक तो थोड़ी याद ताजा हो जाए दूसरे इन घटनाक्रमों के सामयिकी के संदर्भ मे मानसिकता के लिए पृष्ठभूमि तैयार हो जाए। अन्ना ने दो चिट्ठियाँ केजरीवाल को लिखीं थे दूसरी "पाकिस्तान के इस्लामिस्ट" से हो रहे फंडिंग के बारे मे थी जो बेहद गंभीर मामला हो सकता था खास राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ मे लेकिन ये खबर किसी भी मीडिया पर बिल्कुल ही नहीं चली और इसे दबा दिया गया। आप ये तय मानिए यदि अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और सीडी नहीं आई होती तो स्टिंग ऑपरेशन का ये खुलासा बिल्कुल ही नहीं होता।

एक बात तो तय है कि अन्ना केजरीवाल और "आप" के लिए किसी प्राधिकरण से कम नहीं हैं लिहाजा उनका समर्थन और विरोध "आप" के लिए बहुत मायने रखता है। जब दूसरे दिन 19 नवम्बर को अन्ना ने वो सीडी जारी की जो सीधे - सीधे केजरीवाल एंड कंपनी पर सीधा हमला था और केजरीवाल एंड कम्पनी उससे बहुत आहत भी थी। दरअसल उस सीडी ने केजरीवाल एंड कंपनी की पोल सिरे से खोल के रख दी थी जो "आप" और केजरीवाल के लिए बहुत बड़ा झटका था "आम आदमी पार्टी" के सारे के सारे पदाधिकारी सकते मे थे। ऊपर कोढ़ मे खाज ये कि "आप" के वेतनभोगी कर्मचारियों ने अन्ना खिलाफ सोशल मीडिया पर ऐसा मोर्चा खोला और ऐसी भद्दगी की कि अन्ना से समझौते और वापसी की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं। इस नई मुसीबत का ठोस उपाय करना बहुत जरूरी था।

केजरीवाल और उनकी टीम ने कांटे को कांटे से निकालने का प्रयास किया। सूत्रों से ऐसी खबर मिली है कि इस स्टिंग ऑपरेशन की सीडी काँग्रेस ने खुद "आप" के खास पदाधिकारियों के सहयोग से ही बनवाई थी जिसका प्रमाण है अनुरंजन झा और डॉ कुमार विश्वास के बेहद करीबी रिश्ते जिसे खुद डॉक्टर साहब ने इसे स्वीकार भी किया है और अब जरा ध्यान दीजिये डॉ कुमार विश्वास के प्रति इस सीडी मे बहुत "सॉफ्ट स्टिंग" है। जिसे बड़ी आसानी से खुद उनके द्वारा ही मैनेज कर लिया गया और खुलासे के बाद केवल उन्होने ही टीवी पर बयान दिया, बाकी किसी ने भी नहीं। केजरीवाल सहित "आप" का कोई भी पदाधिकारी स्टिंग सीडी मे कहीं भी नहीं है। ये कहा जा रहा है कि ये ऑपरेशन नवंबर के पहले सप्ताह मे किया गया था। कुछ सूत्रों का ये भी कहना है कि उम्मीदवारों को काबू मे रखने के लिए उनकी सीडी बनवाई गई थी और सभी के खिलाफ ऐसे सुबूत हैं केजरीवाल के बयानों का जरा विश्लेषण कीजिये तो पता चल जाएगा। ये ठीक वही चाल है जैसा कि अन्ना के पूर्व ब्लॉगर राजू पारुलकर ने खुलासा किया था कि केजरीवाल के पास अन्ना के साथ नोकझोंक की सीडी है जिससे वो अन्ना को ब्लैकमेल करते हैं। लेकिन अन्ना के खुलासे की मजबूरी मे इस स्टिंग ऑपरेशन की सीडी को सार्वजनिक करना पड़ा।

अन्ना के के दोनों पत्र और सीडी बाद जिस तरह से "आप" के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा था उसे ढंकने के लिए उससे बहुत छोटे खतरे या यूं कहे कि "आप" की गंदगी को देश के सामने प्रस्तुत कर दिया गया ठीक दूसरे ही दिन ताकि नुकसान ज्यादा न हो मीडिया तो केजरीवाल और "आप" के पक्ष मे है ही इसी आधार पर इसे विरोधियों की चाल बताकर सहानुभूति बटोरी जाएगी। आप देखिये मीडिया मे वही हो रहा है और अन्ना का मुद्दा बिलकुल नेपथ्य मे है। आज तक किसी भी ऐसे मामले मे किसी भी सीडी का रॉ फुटेज नहीं मांगा गया था चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो ऐसा पहली बार एक सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया गया। फिर अनुरंजन झा से भी चुनाव आयोग ने तो रॉ फुटेज मांगा नहीं था उन्होने स्वेच्छा से दिया था क्यों ? यदि स्वेच्छा से चुनाव आयोग को दे सकते हैं तो उसी स्वेच्छा से "आप" को भी तो दे सकते थे ! ये सब सोची समझी चाल के तहत अन्ना वाले मुद्दे को दबाने के लिए किया गया खास कर पाकिस्तान से हो रहे फंडिंग के मामले को।

स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के संदर्भ मे हुए दोनों प्रेस कांफ्रेंसों मे अरविंद केजरीवाल की अनुपस्थित रहना अपने आप मे बहुत रहस्यमयी था, आखिर उनकी पार्टी पर इतना बड़ा खतरा था और उनका ही नदारद रहना आश्चर्यजनक था। उस प्रेस कान्फ्रेंस मे काँग्रेस के दो सांसदों के भाईयों का उपस्थित रहना इस शक को विश्वास मे बादल देता है। दरअसल केजरीवाल सोची समझी चाल के तहत प्रेस कान्फ्रेंस मे नहीं आए थे उसके पीछे कारण ये था कि कहीं अन्ना के दोनों पत्रों और सीडी का मामला कहीं फिर से न उछल जाए और और सारे डैमेज कंट्रोल पर सिरे से पानी फिर जाए।

लेकिन "आप" के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र बता रहे हैं कि ये चाल भी कहीं न कहीं से उल्टी पड़ती दिखाई दे रही है क्योंकि केजरीवाल के बारे मे कुछ और खुलासे अन्य माध्यमों से भी हो रहे हैं। जैसेकि वो कमिश्नर थे ही नहीं आदि आदि। इस सीडी मे कुछ - कुछ जगहों कठोर मुद्दों के आ जाने के कारण भी मुश्किलें बढ़ गईं हैं लेकिन ये तो तय है कि सीडी मे जो कुछ भी है वो बिलकुल सत्य है जिसे काँग्रेस के कुछ लोग, अनुरंजन झा और केजरीवाल ने शायद हलके मे लिया था। संभावना ये भी जताई जा रही है कि चुनाव के बाद अनुरंजन झा के खिलाफ मामले को वापस ले लिया जाएगा।
फर्जी का फर्ज, मर्जी का मर्ज फिर ...

मैंने उसी दिन, जिस दिन स्टिंग ऑपरेशन पर "आप" का पहला प्रेस कान्फ्रेंस हुआ था, कह दिया था चुनाव आयोग इस तरह के निर्णय कर ही नहीं सकता फिर भी उससे इस तरह के निर्णय की मांग करना जनता की आँखों मे धूल नहीं बल्कि मिर्ची झोंकने के समान था। वैसे उस प्रेस कान्फ्रेंस मे "काँग्रेस पार्टी" के दो सांसदों के भाई भी उपस्थित थे वो वहाँ पर किस लिए थे और क्या कर रहे थे ? ये एक ऐसा विदित रहस्य है जिस पर आसानी ये उम्मीद की जा सकती थी कि चुनाव आयोग का फैसला क्या होगा वो भी 48 घंटे के अंदर। "आम आदमी पार्टी" की उम्मीद के मुताबिक "आप" के पक्ष मे चुनाव आयोग ने अपना फैसला सुना दिया ये तो किसी को भी बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। वैसे भी जब चुनाव आयोग ने "आप" के उम्मीदवारों का पर्चा खारिज ही नहीं किया तो फिर किस आधार पर वो फैसला सुना सकता है? जहां तक मेरी जानकारी है चुनाव आयोग न्यायाधिकरण संस्था है ही नहीं तो फिर उससे किसी निर्णय की मांग किस आधार पर किया गया ?

ध्यान दीजिये "आप" की ओर से कहा जा रहा है कि स्टिंग ऑपरेशन फर्जी है। ये बयान ही अपने आपमे फर्जी है क्योंकि ऑपरेशन तो हुआ ही है उसका विडियो भी सारे आम उपलब्ध है और उसे दिल्ली के ही नहीं बल्कि पूरे देश के करोड़ों लोगों ने देखा। तो करोड़ों लोगों का देखना भी फर्जी है क्या ? फर्जी कामों के लिए "आप" वैसे भी मशहूर हो चुकी है योगेंद्र यादव के नेतृत्व मे काँग्रेस के सहयोग से ही "आप" के पक्ष मे  मशहूर फर्जी ओपेनियन पोल हो चुका है जिसकी पोल बड़ी आसानी से खुल गई, केजरीवाल कभी रेवेन्यू कमिश्नर थे ही नहीं फिर भी वो फर्जी बयान देते रहते हैं कि कि वो आईआरएस कमिश्नर थे और करोड़ों कमा सकते थे, लेकिन वो अपनी श्रीमती जी के ईमानदार कामों पर कोई बयान जारी नहीं करते, केजरीवाल जी फर्जी कमिश्नर होते हुए भी एक एनजीओ मे मे काम करते हुए 25000 रुपये मासिक का वेतन उठाया इस पर उनका कोई बयान नहीं आया। और भी बहुत कुछ है जिसपर उनको कुछ न कुछ तो कहना ही चाहिए फर्जी ही सही, साथ ही इस विषय पर भी कि तीन जगहों से मतदाता कैसे हैं ? क्या ये स्टिंग भी फर्जी ऑपरेशन है ?

परसों के नाच-गाने के समारोह मे "आप" के कर्मचारियों के बीच उनका उत्साहवर्धन करने के लिए डॉ कुमार विश्वास ने अपने कर्मचारियों को ये विश्वास दिलाते हुए कहा कि वो "आप" के "सांडक्य" हैं और उसी की भूमिका निभाते हैं पता नहीं वो किसको या किस वर्ग को ये विश्वास दिला रहे थे साथ ही उनका ये कथन कि वो पौरुषहीन नहीं हैं। खैर ये कितना फर्ज से जुड़ा मामला है ये पता नहीं चल पाया लेकिन ये जरूर पता चला कि "आप" मे "सांडक्यों" की पोस्ट भी है जिसके लिए अवसादी और मनोग्रस्त कविताओं का पाठ भी करना जरूरी है कम से कम इतनी योग्यता तो होनी ही चाहिए इस पद के लिए।     

Sunday, 24 November 2013

"आप" का कल्पना से भी परे का खर्च

कल "आम आदमी पार्टी" के एक कर्मचारी संतोष कोहली ने आत्महत्या कर लिया। पुलिस को कोई आत्महंता-पत्रावली नहीं मिली इसलिए लगता है कि अपने निजी कारणों से उसने ऐसा किया होगा। उधर कोई आत्महत्या कर रहा है और इधर जंतर - मंतर पर नाच गाना चल रहा है वैसे नाचने - गाने मे कोई बुराई नहीं है खास कर उस समय जब पिछले महीने 21 अक्टूबर की तारीख जब डॉ राघवेंद्र कुमार ने केजरीवाल से 5 प्रश्न पूछे थे और तब केजरीवाल जवाब देने से भागने लगे थे उसके बाद अन्ना का खुलासा और फिर स्टिंग ऑपरेशन ने पूरी की पूरी पोल खोल के रख दी हो। इस स्थिति मे मतदाताओं को लुभाने के लिए नाच - गाना करना एक अच्छा उपाय हो सकता है ऐसा निष्कर्ष डॉ कुमार विश्वास और फर्जी ओपेनियन रखने वाले योगेन्द्र यादव जैसे लोग जिस समूह मे हों उसी समूह का का हो सकता है। हालांकि जिस प्रकार की भीड़ जंतर - मंतर पर दिख रही थी वो अपने आप मे प्रशंसनीय है सभी "आप" के कर्मचारी (नकली कार्यकर्ता) अपने गणवेश मे थे सभी अन्ना की नकल करते हुए टोपी ओढ़े हुए थे। किसी की आत्महत्या के समय ऐसे समारोह का आयोजन काफी हिम्मत का काम है। वैसे भीड़ को देखते हुए मुझे ये समझ मे नहीं आ रहा था कि इतने कर्मचारियों को 20,000/- प्रति माह (कम से कम) के हिसाब से वेतन कैसे दिया जाता होगा ? मेरे हिसाब से कल जंतर - मंतर पर कम से कम 5000 लोग तो रहे ही होंगे तो सवाल ये उठता है कि इतने लोगों को का वेतन एक महीने का हुआ 100000000/- रुपया हर महीने कम से कम। वैसे मैंने कल "आप" के पूरे कर्मचारियों को एक साथ देखा यदि सब के सब रहे हों तो।

ये आंकड़ा पूरी तरह ठोस, अपरिहार्य न्यूनतम है जो खर्च करना ही करना है बाकी विज्ञापन का खर्च, गाड़ी, तेल, खाना-पीना और भी बहुत से खर्चे अलग से। सारे खर्चे अगर जोड़ लिए जाएँ तो इतना खर्च तो सपा-बसपा-काँग्रेस भी नहीं करतीं।  "आप" की वैबसाइट पर केवल 20 करोड़ का आंकड़ा है इतने मे तो "आप" के कर्मचारियों का वेतन भी नहीं हो पाएगा। स्टिंग ऑपरेशन मे एक बात खुल कर आई है कि टीवी और अन्य माध्यमों का विज्ञापन बहुत महंगा है। "आप" के कुछ लोगों के माध्यम से ये पता चला कि मुख्यधारा के तीन टीवी चैनल "आप" के पक्ष मे हैं उनमे से दो तो आंशिक रूप से हैं किन्तु एक तो पूरी तरह से "आप" के पक्ष मे है। उस मीडिया हाऊस के "आप" के पक्ष मे होने का आलम ये है कि उसके पत्रकार सारे आम "आम आदमी पार्टी" का प्रचार करते हैं। उनके लेख तो केजरीवाल और "आप" के पक्ष मे तो होते ही हैं उनका फ़ेसबुक अकाउंट भी ऐसा है कि लगता है कि वो भी "आप" के कर्मचारी हैं। अब मुख्य धारा की तीन - तीन चैनलो को मैनेज करने का भरी-भरकम खर्च ? ये खर्च इतना बड़ा है कि इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि रात मे 12 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रति 10 सेकंड के विज्ञापन का खर्च कम से कम 1000/- रुपया है अधिकतम 22000/- रुपया प्रति 10 सेकंड है। अरबों - खरबों का हिसाब - किताब है सिर्फ विज्ञापन का खर्च। यहाँ तो मामला प्रत्यक्ष विज्ञापन का नहीं बल्कि उससे से भी बढ़ कर है पूरी की पूरी मीडिया हाउस ही "आप" के प्रचार मे अपने हिसाब से लगी हुई है। खर्चे का अनुमान लगा लीजिये।

बहुत बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतना खर्च जिसमे कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन ही 10 करोड़ रूपाया प्रति माह है, विज्ञापन का खर्च भी करोड़ों मे है ही, पूरी की पूरी मीडिया हाउस केजरीवाल और "आप" के प्रचार मे लगी हुई है साथ मे दो मीडिया हाउस भी सहयोग कर रहे हैं अरबों - खरबों का खेल है ये ? आखिर इतना फ़ंड आ कहाँ से रहा है ? 

Saturday, 23 November 2013

स्टिंग सीडी का सटीक सही समय

अब तो सारी पोल-पट्टी "आम आदमी पार्टी" की सिरे से खुल ही चुकी है उनका सड़ा तंत्र सबके सामाने बजबजाती गंदी नाली की तरह सबके सामने आ चुका है तो "आप" वाले घोर आपत्ति कर रहे हैं इस सीडी के आने की सामयिकी पर, उन लोगों को घोर ऐतराज है कि चुनाव के ही समय ये सीडी क्यों आई ? इससे स्टिंग ऑपरेशन करने वाले की मंशा पर "आप" वालों को संदेह है। तार्किक आधार पर संदेह करना कहीं से भी गलत नहीं है संदेह से ही विश्वास करने का आधार बनाता है। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले अनुरंजन झा की मंशा पर ठीक संदेह के आधार पर विशवास करते हुए ये क्यों न कहा जाए कि ठीक इसी समय इस सीडी को आना बहुत जरूरी था ?

अमेरिका मे एक लोकोक्ति है "यदि आप किसी की सच्चाई जानना चाहते हैं तो उसे चुनाव मे खड़ा कर दीजिये" ठीक यही बात "आम आदमी पार्टी" पर भी अक्षरशः लागू होती है। एक स्वस्थ लोकतन्त्र और समाज के लिए ये बहुत आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों की आप कभी भी पोल खोलें या न खोलें चुनाव के समय उसकी पोल जरूर खोलनी चाहिए, उसके काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा यदि है तो ठीक उसी समय जरूर समाज के सामने लाना चाहिए ये सामान्य और जिम्मेदार नागरिक का न सिर्फ धर्म है बल्कि कर्तव्य भी है क्योंकि लोकतान्त्रिक समाज मे चुनाव का समय बेहद संक्रामण का समय होता है जिसके माध्यम से गलत और गंदे लोगों से समाज को बचाया जाना बहुत आवश्यक होता है। अतः मुझे "आम आदमी पार्टी" के खिलाफ इस स्टिंग ऑपरेशन के सामयिकी के संदर्भ मे अनुरंजन झा की प्रशंसा करने मे तनिक भी कोई संकोच नहीं है। मेरा उनसे तथा उन सभी से ये अनुरोध है कि यदि कुछ और भी सच्चाई "आप" के बारे मे है तो निश्चित रूप से समाज के समक्ष ले कर आएँ। क्योंकि वोट करते समय कुछ भी अंधेरे मे नहीं रहना चाहिए।

वैसे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के आने के बाद "आप" के कर्मचारियों (नकली कार्यकर्ता ) की हालत उस बंदरिया की भांति हो चुकी है जिसका बच्चा मर गया होता है और वो उस बच्चे की लाश को तब तक अपने सीने से चिपकाए घूमती रहती है जब तक उसके लाश से भयानक बदबू नहीं आने लगती, अब ये देखने वाली बात होगी "आप" के कर्मचारियों को "आम आदमी पार्टी" के लाश की दुर्गंध कब तक उनके नाक मे पहुँचती है। वैसे तो "आप" के बहुत से कर्मचारियों ने अपना नया रोजगार खोजने का प्रयास बहुत तेज कर दिया है लेकिन अचानक ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी बढ़ जाने के कारण पारिश्रमिक पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है।

वैसे केजरीवाल ने अपना पूरा प्रयास किया "आम आदमी पार्टी" को एक कॉर्पोरेट की तरह चलाने का, इसीलिए उन्होने चुनाव जीतने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जो कहीं भी नैतिक नहीं थे, उन्होने सारी मर्यादा को बिलकुल ताक पर रख दिया जो कहीं से भी उचित नहीं था,  जो भारतीय राजनीति के इतिहास मे ये बिलकुल अपने तरह का अनूठा प्रयास है, किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को "वेतन" देने का निकृष्टतम मामला है। इसीलिए जिन्होने "आप" को चंदे के रूप मे बड़ी राशि दी है वो सकते मे हैं।  

Friday, 22 November 2013

"आप" का अपना पाप छिपाने की असफल कोशिश

कल शाम के स्टिंग आपरेशन की सीडी आने के बाद जिसमे "आप" के 9 उम्मीदवारों के वास्तविक स्वरूप के दर्शन हुए हैं , पर "आम आदमी पार्टी" ने आज प्रेस कान्फ्रेंस किया जिसमे उन्होने अपने उम्मीदवारों को सफ़ेद बिलकुल पाक-साफ बता कर जनता को सारे शाम बेवफ़ूफ बनाने का प्रयास किया गया वैसे जनता के आँखों मे तो धूल "आप" द्वारा बहुत पहले से झोंका जा रहा था। वैसे अपने ही जाच करके अपने फैसला सुना दिया ठीक वैसे ही जैसे शीला दीक्षित, कलमाड़ी, पावन बनसल आदि को ईमानदार ठहराते हुए क्लीन चिट प्रदान करती है। ध्यान दें -
1- काँग्रेस की मदद से अपने पक्ष मे फर्जी ओपीनियन पोल करवाने वाले योगेन्द्र यादव ने इस बात ज़ोर दिया की सीडी मे संदर्भ के साथ संवाद नहीं है लिहाजा संदर्भ बदला गया है ...ध्यान दीजिये उनके पास सीडी की मूल कॉपी नहीं है फिर भी वो संदर्भ बदलने आरोप किस आधार पर लगा रहे हैं ? जबकि पूरा ऑपरेशन देखने पर ऐसा कहीं भी नहीं लगता। एक विषय पर फ्रेम बदलने का जो आधार वो बता रहे हैं  रहा है वो बिलकुल कहीं भी पूरे ऑपरेशन मे है ही नहीं। योगेन्द्र यादव का झूठ यहीं पर पकड़ मे आ जाता है...

2 - योगेंद्र यादव ने शाजिया इल्मी के पी॰ए॰ सिद्धार्थ के ऊपर कोई टिप्पणी नहीं की जबकि पैसे को मैनेज करने का सारा रास्ता वही बता रहा था, बाद मे प्रशांत भूषण ने कहा वो पत्रकार उनकी मर्जी से आया था। इसका कोई मतलब ही नहीं था ये बिलकुल संदर्भित तथ्य है जिसे शाजिया के पी॰ए॰ को रेफर किया था ठीक पैसे के लेन-देन के संदर्भ मे

3- योगेन्द्र यादव तो लगता है सुप्रीम जज से भी महान हैं उन्होने बड़ी बचकानी टिप्पणी की ये ऑपरेशन प्रायोजित है क्यों भाई इस ऑपरेशन को कोई प्रायोजित क्यों नहीं कर सकता ? ये ठीक वैसा ही प्रश्न है कोई केजरीवाल ये पूछे कि "आप" 2013 के ही दिल्ली विधान सभा चुनाव मे ही क्यों खड़े हैं? इसका उत्तर यादव जी दें सकते हैं तो दे...

4- यादव जी को इस बात पर भी घोर आपत्ति है कि इस समय इस सीडी को नहीं आना चाहिए क्योंकि ये चुनाव का समय है क्यों चुनाव का समय है इसे वो चाल बताते हैं इसलिए उन्हें सारे कुकर्म करने की छूट मिल जाती है क्या ? और उनका काला और कच्चा चिट्ठा चुनाव के समय क्यों नहीं आना चाहिए ?? हालांकि ये सीडी उनके कुकर्मों से ज्यादा उस "आप" के गंदे और भ्रष्ट तंत्र पर है जिस पर पूरी की पूरी "आम आदमी खड़ी" है और जिसका कोई भी अपवाद नहीं है केजरीवाल भी नहीं। वैसे कहा तो ये भी जा रहा है कि पूरे के पूरे 70 लोगों के काले कारनामो की सीडी है यहाँ प्रश्न "आप" के पूरे के पूरे गंदे तंत्र का है...

5- योगेन्द्र यादव ने ये दावा किया कि भारत के इतिहास मे "आप" पहली पार्टी है जो ऐसा करती है वैसा करती है लेकिन स्टिंग ऑपरेशन मे शाजिया साफ - साफ कार्यकर्ताओं को "वेतन" सैलरी की बात कर रही हैं ...यादव जी आप बिलकुल सही हैं भारत मे "आप" ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जहां कार्यकर्ताओं को मोटी तनख्वाह मिलती है ...इसीलिए 3 दिन पहले ही मुझे शक हुआ था तभी मैंने अपने आर्टिकल का शीर्षक दिया था "चंदा या निवेश"। वेतन वाले मुद्दे पर किसी ने भी कोई सफाई नहीं दी है ...इसका मतलब सारी भीड़ भाड़े पर आती है "आप" के कार्यक्रमों मे ...

6 - आपराधिक मानहानि मामला दायर करने जा रहे रही है "आप" क्या भद्दा मज़ाक है दिल्ली की जनता के साथ ...आखिर इसमे ऐसा क्या है जिससे ये साबित होता है जिसने ये स्टिंग ऑपरेशन किया वो अपराधी है ...?
या तो "आप" जनता को खड़े - खड़े बेवकूफ़ बनाना चाहती है जैसा कि पहले से करती आ रही है या फिर अन्ना के आरोप के बाद बचा हुआ अपना "अस्थिपंजर" मजबूती से दिखाना चाहती है इस उम्मीद मे कि लोग डर जाएंगे ...वैसे भी आज तक किसी भी स्टिंग ऑपरेशन किसी प्रकार के आपराधिक मानहानि का मुक़द्दमा हुआ ही नहीं ...क्यों इसका कोई आधार ही नहीं बन सकता ..मुझे तो लगता है  कहीं उल्टे मुक़द्दमा करने वाले ही जेल मे न चले जाएँ ....

7- योगेन्द्र यादव चुनाव आयोग से मांग करेंगे कि 48 घंटे मे जांच कर के बताएं कि वो आरोप सही हैं या नहीं ध्यान देन ये बहुत शातिर बयान है जिसके तहत चुनाव आयोग के अधिकार के बाहर के विषय को तथ्य बनाने की कोशिश की जा रही है उन्हें ये पता है कि चुनाव आयोग इस पर कुछ नहीं करेगा करने का अधिकार भी नहीं है।

8 - योगेंद्र यादव जी ने फरमाया कि 1 घंटे की सीडी पर वो करवाही नहीं कर सकते ...यदि समय महत्वपूर्ण है तो बंगरू लक्ष्मण की सीडी की सीडी शायद 5 मिनट की थी तो उनको 4 साल की जेल हो सकती है तो एक घंटे की सीडी 48 साल की सजा क्यों नहीं होनी चाहिए ?

... आदि आदि

आज के प्रेस कान्फ्रेंस से ये स्पष्ट है कि "आप" के सभी लोगों ये पता है कि स्टिंग ऑपरेशन की सीडी बिल्कुल सही है यदि ऐसा नहीं होता तो अनिरुद्ध झा उसे चुनाव आयोग को नहीं सौंपते, इस प्रेस कांन्फ्रेंस से माध्यम से उन्होने अपने "आप" के पापों को छुपा कर जनता की आँखों मे धूल झोंकने की निहायत ही असफल कोशिश की है .....

Thursday, 21 November 2013

केजरीवाल की क्रेडेबिलिटी क्राइसिस

कल जब से अन्ना की सीडी मीडिया मे चल रही है केजरीवाल और उनकी "आम आदमी पार्टी" संदेह बहुत अधिक गहरा गया है। वैसे भी अरविंद केजरवाल एंड कंपनी की  अलगाव मानसिकता किसी से छिपी नहीं है उनके परम सहयोगी प्रशांत भूषण कई बार खुले तौर कश्मीर को पाकिस्तान को सौंप देने की खुली वकालत कर चुके हैं और समय समय पर करते रहे हैं, केजरीवाल अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर कई बार "आइ लव माइ पाकिस्तान" तक लिख चुके हैं, केजरीवाल जी को अफजल गुरु को फांसी दिये जाने मे देश की बदनामी दिखती ही है उन्हे अहजल गुरु और भगत सिंह के कोई अंतर नहीं दिखाता, बटाला हाऊस इनकाउंटर को फर्जी बताने वाले केजरीवाल और उनके " "आम आदमी पार्टी"  को पाकिस्तान के इस्लामिस्ट से ऑनलाइन चंदा मिलने का तथ्य प्रकाश में जब से आया है राष्ट्रीय स्टार संदेह बहुत अधिक बढ़ गया है। वैसे भी केजरीवाल को पाकिस्तान से चंदा मिलने का क्या कारण और आधार है ? भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के दोनों छोटे भाई पाकिस्तान मे है एक पाकिस्तान का शिक्षा मंत्री है तथा दूसरा टीवी एंकर है इसी से आसानी समझा जा सकता है कि केजरीवाल और "आम आदमी पार्टी" को पाकिस्तान के इस्लामिस्ट से चंदा कैसे मिल रहा है और और चंदे का क्या और कितना महत्व है साथ ही उसका मकसद भी बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।

अन्ना की सीडी मिलने के बाद केजरीवाल और उनके "आप" का वास्तविक स्वरूप जिस प्रकार से जनता के सामने आया है उनकी विश्वसनीयता समाप्त ही हो चुकी है कुछ लोग जो न सिर्फ "आम आदमी पार्टी" पदाधिकारी थे लेकिन इस घटनाक्रम के बाद अब नहीं है, का साफ - साफ कहना है "सुरेश कलमाड़ी, कनीमोझी, मनमोहन सिंह, ए राजा, लालू यादव आदि और अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी मे क्या अंतर है ? अन्ना ने तो केजरीवाल की कलई ही खोल के रख दी है ...उन्होने ने नौकरी के दौरान क्या किया इससे मुझे कोई मतलब नहीं था लेकिन अब शक होता है ...केजरीवाल तो अभी कोई चुनाव नहीं जीते हैं किसी भी पद पर नहीं है फिर भी ऐसे आरोप तो समान्यतः शुरू मे किसी भी नेता पर नहीं लगे ... वी पी सिंह पर भी नहीं लगे थे ... लेकिन चंदा हड़पने की सच्चाई ने आत्मा को हिला के रख दिया ...मेरा स्पष्ट मानना है कि अन्ना कभी भी झूठ नहीं बोल सकते, किसी के बहकावे मे नहीं आ सकते, कोई भी उनको भड़का नहीं सकता ..." एक और पूर्व "आप" कार्यकर्ता का स्पष्ट कहना था कि "केजरीवाल जब केजरीवाल तौकीर रजा से मिलने बरेली गए तभी मन खिन्न हो गया था, उस सामय तो जैसे तैसे तर्क - कुतर्क से मन को समझा लिया, लेकिन अब तो शक यकीन मे बदल गया है" आगे जोड़ते हुए वो कहते हैं "अभी चुनाव से पहले ही केजरीवाल को चंदा दिखा घोटाला करने के लिए उन्होने कर लिया, आगे क्या - क्या करेंगे लोग हमसे पूछते हैं देने के लिए हमारे पास कोई उत्तर नहीं है और तो और बहुत से वोटर तो गारंटी तक की मांग करने लगे है हमारे पास देने को उत्तर नहीं है गारंटी कहाँ से देंगे मुंह छिपाने तक की नौबत है हमारे लिए" ये पूछने पर कि वो व्यक्तिगत तौर पर "आम आदमी पार्टी" को वोट देंगे उन लोगों का स्पष्ट उत्तर नहीं मे था, उन सभी पूर्व "आप" कार्यकर्ताओं को काफी अफसोस भी है कि ठीक 2 दिन पहले तक वो केजरीवाल के कट्टर समर्थक हुआ करते थे।
  

Wednesday, 20 November 2013

अन्ना और वास्तविक "आप"

अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार अन्ना के मुद्दे पर अपना स्वरूप दिखाया है उससे उनकी "आम आदमी पार्टी" के कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी सहमत ही नहीं हैं बल्कि बहुत ज्यादा खिन्न भी हैं। जो खिन्न हैं उनका स्पष्ट मानना है कि केजरीवाल को कड़ा रुख अपनाने के बजाय के विनम्रता से पेश आना चाहिए था और अन्ना पर भद्दे प्रत्यारोपण से बचना चाहिए था। ऐसा न करके उन्होने इतना बड़ा नुकसान कर दिया जिसकी भरपाई संभव नहीं, इसके साथ - साथ उन्होने अपने सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को भी अन्ना को आड़े हाथों लेने का आदेश दे डाला। जिसे सोशल मीडिया पर उनके कार्यकर्ताओं द्वारा अन्ना पर किए जा रहे भद्दी से भद्दी  टिप्पणिया आसानी से देखी जा सकती हैं। वैसे अब तो ये तय माना जा रहा है दिल्ली मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए तो बड़ी बात होगी।

अरविंद केजरीवाल के रूख से जो "आप" के पदाधिकारी सहमत नहीं हैं वो दरअसल बहुत ज्यादा केजरीवाल से डरे और सहमे भी हुए हैं कोई भी बहुत ज्यादा खुल कर बोलने को तैयार नहीं है सिवाय केजरीवाल के आदेशों का आँख बंद करके पालन करने के। केजरीवाल का ये तानाशाही स्वरूप "आम आदमी पार्टी" के बहुत से बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं को कहीं से भी रास नहीं आ रहा है। उसमे से बहुत सारे तो केजरीवाल के इस रूप से परिचित ही नहीं थे वो पहली बार इस स्वरूप के देख कर न सिर्फ अचंभित हैं बल्कि बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हैं। आगे वो इस विषय पर या असहमति के किसी अन्य मुद्दे पर क्या स्टैंड लेते हैं देखने वाली बात होगी।

एक बात तो अकाट्य रूप से सत्य है कि अरविंद केजरीवाल के जो भी सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप है वो सिर्फ और सिर्फ अन्ना हज़ारे के कारण से है लिहाजा अन्ना हज़ारे का सन्दर्भ केजरीवाल और "आप" के लिए किसी प्राधिकरण (Authority) से कम नहीं। अतः यदि अन्ना हज़ारे कोई स्पष्टीकरण चाहते हैं तो उल्टे उनपर प्रत्यारोपण करना किसी घृष्टता से कम नहीं है। वैसे भी केजरीवाल ने वो सारे हथकंडे चुनाव जीतने के निमित्त अपनाए जो उन्हे किसी भी कीमत पर नहीं अपनाने चाहिए थे चाहे वो फर्जी ओपिनियन पोल का मामला हो जिसे उनके ही पदाधिकारी योगेन्द्र यादव ने कराया, कामिटमेंट के बावजूद अन्ना के नाम का दुरपयोग करना, जनलोकपाल के संदर्भ मे दिल्ली की जनता से झूठे वादे करना, सुरक्षा और बंगला न लेने का हथकंडा अपनाना (दिल्ली के विधायकों को सुरक्षा और बंगला नहीं मिलता), भ्रष्ट लोगों को बड़े पैमाने पर पार्टी का उम्मेदवार बनाना या फिर वोट बैंक गंदी राजनीति करने के निमित्त तौकीर रजा से मुलाक़ात करना। केजरीवाल हर उस हथकंडे को अपनाया जिसके कारण राजनीति मे गंदगी बढ़ती ही है और बढ़ती गई। वैसे कुमार विश्वास ये स्वीकार कर चुके है आंदोलन मे जमा हुए 2 करोड़ रुपए थे जिसे दिल्ली विधान सभा चुनाव मे खर्च कर दिया गया है फिर केजरीवाल किस मुंह से ये सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं सारा पैसा आंदोलन मे ही खर्च हो गया था ?

केजरीवाल और उनके कुछ सहयोगियों द्वारा अन्ना पर ये दोषारोपण करना कि उनको बहकाया गया है फुसलाया गया है केजरीवाल एंड कंपनी की बेहद ओछी मानसिकता को ही दर्शाता है। जो आदमी पिछले लगभग 35 साल से निरंतर समाजसेवा कर रहा है, समाज को बादल रहा है, ईमानदारी कि ऐसी प्रतिमूर्ति कि उसके स्टैंड से सरकारें तक हिल जाएँ उस व्यक्ति को कोई बहका सकता है, फुसला सकता है, गलत सूचना दे सकता है ? 

Tuesday, 19 November 2013

चंदा या निवेश ?

17 नवम्बर को अन्ना द्वरा केजरीवाल को लिखी तीनों प्रश्नो का उत्तर मे उन्होने गोलमोल ही सफाई दी है जिसे तार्किक उत्तर बिलकुल ही नहीं माना जा सकता जैसे जनलोकपाल का संदर्भ राष्ट्रीय संदर्भ मे है जबकि वो सिर्फ दिल्ली का चुनाव लड़ रहे हैं इसके उन्होने महाराष्ट्र और उत्तराखंड के लोकायुक्त बिल का हवाला दिया है फिर वो अपने बैनर जो दिल्ली मे लगा रखे हैं उनपर जनलोकपाल का जिक्र कैसे है ? अन्ना के नाम का दुरपयोग हर जगह दिल्ली मे देखा जा सकता है फिर कैसे केजरीवाल सफेद झूठ बोल रहे हैं यहाँ तक कि जनलोकपाल के साथ भी अन्ना का नाम जोड़ा गया।

चिट्ठी के कोष के उपयोग जवाब केजरीवाल ने इतना कहा कि जस्टिस  संतोष की भांति किसी सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करा लें, इस निमित्त सारी आवश्यक जानकारी वो स्वयं उपलब्ध कराएंगे। पता नहीं उस जमा राशि की फ़ाइल बनी भी है या नहीं यदि बनी भी होगी तो मिलने की क्या गारंटी है।वैसेभी अगर सबकुछ ठीक - ठाक होता तो एक - एक पैसे का पूरा हिसाब केजरीवाल अन्ना को उसी समय दे दिये होते जो उन्होने नहीं किया। वैसे अन्ना के पूर्व ब्लॉगर राजू पारुलकर के एक बहुत बड़ा खुलासा ये किया कि एक बार अन्ना से केजरीवाल की सारे सदस्यों के बीच इकट्ठा हुए फंड के बटवारे को लेकर बहुत तीखी नोकझोंक हुई थी जिसे कजरीवाल ने रिकॉर्ड कर के अपने पास रख लिया और उसी सीडी आधार पर केजरीवाल अन्ना को ब्लैकमेल कर रहे हैं। यही कारण है कि केजरीवाल के मुद्दे पर अन्ना को यू टर्न लेना पड़ जाता है जैसा आज सुबह रालेगण सिद्धि मे हुआ। ये केजरीवाल की असलियत है।

वैसे 14 नवंबर के बाद से ही "आम आदमी पार्टी" के संदर्भ मे तेजी से घटित हुए घटनाक्रम से पूरी पार्टी सन्न तो है ही सकते मे भी है। एक तो पहले से ही पार्टी मोदी की लोकप्रियता के कारण गंभीर चुनावी परेशानी का सामना कर रही थी और अब कोढ़ मे खाज बन कर ये मुद्दा आ गया। "आप" की परेशानी सिर्फ यही नहीं है कि चुनाव जीतना वैसे भी उनके लिए पहले ही बहुत कठिन था लेकिन अबतो करीब - करीब असंभव सा हो गया है।

अभी कुछ दिन पहले ही पार्टी फंडिंग पर न्यायालय के आदेश पर जांच चल रही है जिससे "आप" के कार्यकर्ता खार खाए हुए है। पार्टी अगर नहीं जीती तो केजरीवाल बहुत बड़े धर्मसंकट मे फंस जाएंगे ऐसा पार्टी के पदाधिकारी भी मानते हैं। इस हालिया घटनाक्रम  से पार्टी चंदा देने वाले भी बहुत ज्यादा चिंतित हैं उन्हें उनका पैसा डूबता हुआ साफ नजर आ रहा है। सवाल ये उठता है कि चंदा देने वालों ने क्या "आप" को चंदा चंदा समझ के दिया या पार्टी मे "निवेश" किया? एक व्यक्ति जिनहोने "आप" को बड़ी राशि चंदे के रूप मे दिया है, बता रहे थे कि केजरीवाल उनकी टीम ने उन्हें धोखे मे रखा ..सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल और उनकी टीम ने चंदा लेने से क्या वादा किया था ? आखिर बड़ी राशि चंदे के तौर पर देने वाले "रिटर्न" की उम्मीद क्यों कर रहे हैं?

अरविंद केजरीवाल चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं उनके लिए इस समय उनके गुरु अन्ना हज़ारे आदि का कोई मतलब नहीं है उनके कार्यकर्ता भी पता नहीं किस उम्मीद मे हैं जाहिर सी बात है इतनी उम्मीद आदमी तभी करता है जब उसका बहुत कुछ दांव पर लगा हो खास कर पैसा। अतः ये जानना बहुत आवश्यक है कि केजरीवाल ने "चंदा" लिया या "निवेश" के लिए "आम आदमी पार्टी" के बॉन्ड जारी किये ???

  

Monday, 18 November 2013

मोदी की लोकप्रियता और "आप" का भ्रष्ट आचरण

दिल्ली विधान सभा चुनाव बड़ा दिलचस्प होता जा रहा है। कई मायानों मे ये इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है यहाँ चुनाव प्रचार कोई अपना कर रहा है लेकिन हो किसी और का रहा है। "आम आदमी पार्टी" के बेहद महत्वपूर्ण पदाधिकारी सकते मे हैं उनको कोई रास्ता नहीं मिल रहा जिससे इस गंभीर समस्या से मुक्ति पा सकें। वो बता रहे थे कि जहां भी भी वो जा रहे हैं घरों के लोग खुल कर मोदी के पक्ष मे बोल रहे हैं लिहाजा "आप" के पदाधिकारियों को वोटरों को समझाने मे काफी दिक्कत हो रही है। एक दिन "आप" की टीम प्रचार मे निकली और लगभग 178 घरों मे संपर्क किया जिसमे से 158 घरों के लोगों ने मोदी के पक्ष मे खुल कर बोला तब लोगों को समझाने के लिए "आप" के कार्यकर्ताओं को कहना पड़ता है मोदी को आप लोकसभा मे वोट कीजिएगा लेकिन विधानसभा मे "आम आदमी पार्टी" को वोट कीजिये। जब लोग बवाल को टालने के लिए सहमति दे दे रहे हैं तो लोगो की उस बनावटी सहमति को "आप" के सामान्य कार्यकर्ता तो अपना वोट मान कर बम-बम हैं लेकिन पदाधिकारियों के चेहरे से हवाईयां उडी हुई हैं। अब तक के चुनावी इतिहास मे ये पहली बार देखा जा रहा है कि लोग किसी खास नेता के लिए लोग विरोध तक कर रहे हैं नहीं तो इसके पहले लोग प्रत्याशी का मन रखने के लिए हाँ हाँ कह देते थे लेकिन वोट अपनी मर्जी से करते थे। ये पहली बार है कि "आम आदमी पार्टी" मोदी के समर्थन मे विरोध झेल रही है। यही कारण है कि केजरीवाल को रोड शो के लिए निकालना पड़ा लेकिन वो भी सफल नहीं है ये भी नई चिंता का विषय है "आम आदमी पार्टी" के लिए। एक दिन तो हद ही गई जब लोगों ने केजरीवाल का सरे आम मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। नुक्कड़ सभाएं भी कम ही की जा रही हैं इस डर से कि कहीं लोग प्रश्न पूछ कर मज़ाक उड़ाना न शुरू कर दें। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से "आम आदमी पार्टी" के कार्यकर्ताओं ने बदतमीजी की है उसका भी दिल्लीवासियों मे बहुत गुस्सा है।

वही पदाधिकारी बता रहे थे कि नई समस्या ये भी है करीब - करीब सारे कार्यकर्ता नौजवान हैं लिहाजा अतिउत्साह मे गलत और सही का भी भान नहीं रहता जिससे सामान्य तौर पर नई - नई मुसीबतें अक्सर खड़ी होती रहती हैं जिसे नियंत्रित करना भी काफी मुश्किल है। वैसे समस्याएँ ऐसी हैं जिस पर पार्टी के पदाधिकारियों को काफी माथापच्ची करने के बाद भी समाधान निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। वैसे पदाधिकारियों को महिला कार्यकर्ताओं को लेकर भी खासे चिंतित हैं बड़ी संख्या मे मिलती शिकायतों के बाद महिला कार्यकर्ताओं को या तो उनके घर वाले प्रचार मे जाने से रोक रहे हैं या फिर वो खुद डर के मारे चुनाव प्रचार मे जाने से कतरा रही है। अचानक महिला कार्यकर्ताओं की संख्या कम हो जाने से जवान पुरुष कार्यकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम हो गई है।

 ये अवधारणा की लड़ाई नहीं बल्कि बेहद निम्न कोटि की व्यावहारिक परेशानी है ..जो "आचरण का भ्रष्टाचार" है जो वास्तव मे बहुत खतरनाक है ....