जलन का नाती जब अपनी औकात मे आता है तो यकीन मानिए अच्छे-अच्छे अंडरअचिएवर की भी पगड़ी तेल लेने चली जाती है। फिर वही पगड़ी तेल मे अंगरेजी धुन पर नाचते अपने बेइज्जती का गुणगान करती है अजी लानत है ऐसी हरकट्टों पर। लेकिन उनके समूह के ही लोग बाग बताते हैं कि जमाना खराब है नाती अपनी बेइज्जती को दूसरों की बेइज्जती समझने की हमेशा होशियारी करता है। नतीजा पेड़ पर उल्टा लटकने की शर्त पर अपना कुल कपड़ा फाड़-फूड़ के बुर्का खोजने चल देता हैं। जमाना खराब है ही तो मने अपने कौन बढ़िया हैं? बड़े बुजुर्ग भी इस नाती का गोड़ धोते नजर आते हैं जैसे इस उम्मीद मे कि नाती का पनाती कुछ तो उल्टी करबे करेगा। जय हो जलन महराज अपने तो लुटिया डुबाए ही ऐसा दमड़नोची खनदान छोड़ गए कि जनता जब उल्टी करती है तो उसकी पसलियाँ ही बाहर आ जाती हैं। इसपर उन जलन का नाती कहता फिरता है कि ये तो देश के जीन मे है पता नहीं नाती कहना क्या चाहता है अपने बुजुर्गों की तरह जीन कहना चाहता है, जिन्न कहना चाहता है कि जिन्ना कहना चाहता है कुछ भी पता नहीं चलता। इन्ही के समूह के एक बुजुर्गवार बता रहे थे कि बड़े बड़े सीताराम को भी यहाँ तीताराम बन कर घूम-घूम के चक्करघिरनी खेलना पड़ता है जिससे तीताराम को आगे चल कर तोताराम मे बदलने मे कोई परेशनी न हो। ये सब सहर्ष प्रक्रिया होनी चाहिए नहीं तो वही हश्र होता है जो कभी धोती फाड़ के रुमाल कर दिया जाता है। वैसे जिन्न लोगों की इज्जत बच जाती है तो ऐसे लोग बाग सीनाजोरी करते हुए सीने पर ताल थूककर हीरा पदक (Diamond Medal) धारण करके घूमते हैं। ऐसे ही एक तीताराम तोताराम मे धर्मांतरित हो कर अपनी इज्जत बचा चुके हमारे सामने बक-बक करते हुए कह रहे थे कि अपना देश गोरे लोगों का नहीं है इसलिए जो काला है इसी देश मे है कहीं और नहीं। बड़ा हुरपेटने पर उन्होने अपनी मीठी जुबान को कष्ट देते हुए कहा कि देश का काला देश के बाहर कैसे जा सकता है ? ये सुन के मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्यों कि मुझे पता है कि निःशब्द तोताराम की तोतागिरी से ज्यादा कुछ नहीं है लिहाजा लानत भेजने के लिए सिर्फ इतना ही कहना जरूरी था कि जैसे कोई भी ऐरा-गैरा इस देश का पहला दूसरा तीसरा या चौथा प्रधानमंत्री बन सकता है तो ठीक उसी तरह इस देश का काला बाहर भी जा सकता है भले इस देश की आम जनता आम आदमी अपनी पसलियों की उल्टी करता फिरे। एक अन्य समूह के किसी ने नाती को नहीं पुचकारा को उसकी अम्मा को को बहुत बुरा लगा था उनके समूह लोग बताना शुरू कर दिये थे कि कानून को अपना काम करने के बजाय दूसरों का काम ही ज्यादा करना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे सीबीआई करती है और कर के दिखने की कोशिश भी कर रही है। नाती को भरोसा है कि कुछ न कुछ तो होगा लेकिन उनके ही समूह के एक और तोताराम बता रहे थे कि जमाना ऐसा है कि अगर बाहर हुए तो बाहर नहीं भीतर हो सकते हैं इसलिए परिक्रमा करना बहुत जरूरी है भले ही पेट साफ हो या न हो, कब्जियत किसे नहीं है प्रधानमंत्री की कुर्सी के पेट मे कब्जा जमाए बैठे क्या उस कुर्सी के लिए ही कब्जियत नहीं हैं बल्कि देश के लिए भी बहुत बड़े कब्ज बन चुके है जिसका स्थाई निस्तारण बहुत जरूरी है ...
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