कुछ नौजवान भिखारियों का लैपटॉप साल भर में ही ख़राब हो गया तो वे परेशान हो गए उनका बिज़नस सीधे-सीधे प्रभावित होने लगा तो पंहुचे उसे ठीक कराने लेकिन लैपटॉप मिस्त्री ने लैपटॉप ठीक करने से इसलिए इनकार कर रहा था क्योंकि लैपटॉप देखने से ही लग रहा था कि उसका हार्डवेयर हार्ड न रह कर बहुत ज्यादा मुलायम हो गया है जिससे उसपर मिस्त्री का दिमाग अकल-less हो गया वो लिहाजा वो काम ही नहीं कर रहा था। मिस्त्री ने नाराज हो कर मजाक में पूछा "… लैपटॉप से कुश्ती लड़ते हो क्या … ?" भिखारियों ने जवाब दिया "…इसके साथ हम नहीं रास्ते ही कुश्ती लड़ते है …" मिस्त्री ने फिर आश्चर्य से पूछा "…ये कैसे संभव है … " भिखारियों ने जवाब दिया "…उत्तर प्रदेश सरकार ने कृत्रिम सडकें उखड़वा कर प्राकृतिक सड़कें बनवा दीं है …" मिस्त्री ने जवाब दिया "…फिर तो ये लैपटॉप भी कृत्रिम न रह कर अपनी प्राकृतिक अवस्था में लगभग जा ही चुके हैं …" भिखारियों को पता नहीं फिर भी क्यों लगा रहा था कि उनके साथ नाइंसाफी नहीं हुई लिहाजा वो किसी भी तरह अपना लैपटॉप ठीक कराने के मूड में थे। एक भिखारी ने मिस्त्री कहा "…इसे ठीक कराने में कितना खर्चा आएगा …?" मिस्त्री ने कहा "…मुलायम हो चुके हार्डवेयर को ठीक कर पाना तो करीब-करीब नामुमकिन है …" भिखारीयों ने गिडगिडाते हुए मिस्त्री से कहा "…आप किसी भी तरह इसे ठीक करें नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी …" मिस्त्री भी कोई कम खिलाड़ी नहीं था बोला "…इसे ठीक करने के लिए इसे कंपनी भेजना पड़ेगा …" भिखारियों ने पूछा "…कितना समय लगेगा …?" मिस्त्री बोला "… कम से कम तीन महीना तो लग ही जाएगा …" भिखारियों को लगा कि ये बहुत ज्यादा समय है फिर उन्होंने मिन्नत करते हुए मिस्त्री से पूछा "…थोड़ा जल्दी नहीं हो पाएगा …" मिस्त्री ने कड़े हो कर जवाब दिया "…टोपोरी छाप सेकुलर पॉलिटिक्स समझ रखा है क्या जब चाहो धडाक से समर्थन दे दो - जब चाहो धडाक से समर्थन वापस ले लो …लैपटॉप है कोई बच्चों का खेल नहीं …" भिखारी बेचारे शांत हो गए फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने मिस्त्री से पूछा "…वैसे कितना खर्चा आएगा…?" मिस्त्री ने जवाब दिया "…एक लैपटॉप की बनवाई पड़ेगी करीब 12 हजार रूपए …" भिखारियों के तो होश ही उड़ गए बनवाई सुन के, उन्होंने कहा "…ये तो बहुत ज्यादा है …" मिस्त्री ने जवाब देते हुए कहा "…कीमत डॉलर के हिसाब से रूपए में है… वैसे असल खर्चा तो 4 हजार ही है…" भिखारियों ने मन मार के अपनी सहमति देते हुए जिज्ञासावश पूछा "…बनवाई डॉलर के हिसाब से क्यों…?" मिस्त्री ने उत्तर देते हुए कहा "…कंपनी अमेरिका की है इसलिए…" उसमे से ज्यादातर भिखारी पढ़े-लिखे थे एक ने मिस्त्री से पूछा "…इसका डेटा गायब तो नहीं होगा…?" मिस्त्री ने कहा "…क्यों डेटा गायब भी हो जाए तो तुम लोगों को क्या फर्क पड़ता है …" भिखारी ने कहा "…हम भिखारी भले हैं लेकिन पूरा डेटा भी रखते हैं चाहे वो आय से कम संपत्ति हो या आय से ज्यादा …!" मिस्त्री ये सुन कर बहुत प्रभावित हुआ लेकिन जिज्ञासावश पूछा "…कोई भी फाइल डिलीट मतलब गायब नहीं करते …?" भिखारियों ने शान से एक सुर में कहा "…आप लैपटॉप ठीक करवाकर एक - एक डेटा चेक कर सकते हैं …" ये सुन कर शायद किसी टूटती उम्मीदों के कारण मिस्त्री बहुत भावुक हो गया था …मेरे भी आखों से आंसू आखिर छलक ही पड़े।
आनंद का जुगाड़ मने Pleasure Technology जैसे Talking Crows Sitting on Buffalo's Back
Sunday, 25 August 2013
Wednesday, 21 August 2013
बिना प्याज का चोखा अब छछूंदर भी खाने से इनकार करते फिर रहे है बड़ी उम्मीद पाले बैठे थे खांटी भाई कांग्रेसी लोग कि कम से कम छछूंदर तो उनका चोखा खा ही लेंगे लिहाजा भारतीय वोटरों की क्या औकात कि उनको वोट न दें ! खैर चोखा अपनी जगह, प्याज अपनी जगह के बजाय दूसरे की जगह, अब भला कोई ये तो बताए किस पाजी ने ये अफवाह उड़ा दी कि छछून्दरों की दुनियां में रूपया नहीं महगा डॉलर चलता है तो फिर ये क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि भारतीय वोटरों को डॉलर की ही लत लग जाए। खांटी भाई कांग्रेसियों की दुनियां है लिहाजा हर प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा चाहे मौन से आबरू बेचकर या बकलोल बबुआ की बकलोलई से। अलम्बरदारी करना मजबूरी है तो लाल किले की प्राचीर पर चढ़ना भी जरूरी है तो वहां से भी चोखा चमकाने से बाज नहीं आए, अलम्बरदारी में भूल गए कि लाल किले और तिरंगे की भी एक मर्यादा होती है कम से कुछ तो लिहाज करना चाहिए था। खैर बुढौती में दुनियां ज्यादा दिखाई देती है भले दुनियांदारी में पैजामे का नाडा ही खुला जा रहा हो। मैंने खांटी भाई कांग्रेसी से पूछा तो कहने लगे "…देखिये वो बड़े अर्थशास्त्री हैं …" मैंने गुस्से में सवाल दागा "…तो इसका क्या मतलब अपनी तरह सभी के पैजामे का नाडा खोलावएंगे …? " खांटी भाई बोले मुझे शांत करते हुए बोले "…आपका गुस्सा जायज है…" मैंने कहा "…तो अब डॉलर के बाद प्याज को भी क्यों सेने लगे ?... लंगोटी भी नहीं सूख रही …?" खांटी भाई बोले "…मौसम की मार के आगे हम क्या कर सकते हैं…?" मैंने कड़े आवाज में कहा "…हाँ सही बात है जिनके पास डॉलर की छतरी नहीं है वो कर ही क्या सकते हैं…!" खांटी भाई बोले "…इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था…" मैंने पलटकर उनसे पूछा "… इसीलिए बोफर्स की तर्ज पर 20 अगस्त वाह! वैसे आपके बकलोल युवराज ने 'रूपया घटाओ' का नारा दिया है क्या … ?" खांटी भाई तमतमा कर बोले "… वो बकलोल नहीं हैं …" मैंने भी तमतमा कर पूछा "…तो फिर क्या हैं वो 'डॉलर' हैं, 'रूपया' हैं क्या हैं…? अपनी पहचान बताने में उनको शर्म …" खांटी भाई ने बीच में बात काटते हुए कहा "…पूरी दुनियां में मंदी है तो भारत पर भी प्रभाव पड़ेगा ही … " मैंने कहा "…अमेरिका और यूरोप तो आराम से चोखा में प्याज डाल के खा रहे हैं … फिर भारत को भी कायदे से खाना चाहिए … " खांटी भाई बोले "… सरकार उपाय कर रही है … " मैंने गुस्से से उनपर सवाल दागा "… पिछले 9 साल से आप और आपके तीनमूर्ति अपने पैजामे का नाडा नहीं बांध सकी …!" खांटी भाई थोड़ा कंफ्यूज हो गए बोले "…देखिये पैजामे का नाडा बांधना और उपाय करना दोनों अलग-अलग चीजें हैं …!" मैंने उनसे टिपण्णी करते हुए पूछा "…क्यों आप लोग वाजपेयी जी का भी एहसान भी नहीं मानेंगे … ?" उन्होंने पलट कर मुझसे पूछा "…किस बात का … " मैंने कहा "…उन्ही की बदौलत नाडा न बांध पाने के बावजूद आपका पैजामा अभी तक सरका नहीं … चोरी और सीना जोरी भी शान से करते रहे…" खांटी भाई ने कहा "…प्याज इतना बेरहम उन्हीं के बदौलत है…" मैंने पलटकर सवाल किया "…तो क्या इसीलिए आप खांटी भाई लोग हराम का वोट खरीदने के चक्कर में हैं…?" खांटी भाई थोड़ा उखड गए बोले "…आप लोगों को तो भारत की तरक्की देखी नहीं जाती …" मैंने पूछा "…खांटी भाई कांग्रेसी लोगों की तरक्की ही भारत की तरक्की है शायद …" खांटी भाई बोले "…आप देखिये खुशहाली बढी है …" मैंने सवाल दागा "…फिर छछून्दरों को भी क्या परेशानी हो गई भले-चंगे थे वो…?" खांटी भाई झल्लाते हुए बोले "…घबरईये नहीं सरकार उपाय कर रही है…" मैंने भी झल्लाते हुए कहा "…अपने पैजामे का नाडा तो बांध ही नहीं पा रहे हैं चले हैं उपाय करने…जो अपनी इज्जत ही नहीं बचा पा रहा उसका हर प्रयास दूसरों की इज्जत और जान के लिए खतरा ही होता है …" खांटी भाई कुछ बोले बगैर उठकर कहीं चले गए, मुझे लगा जल्दी से जल्दी वहां से फुट लेने में ही भलाई है …
Wednesday, 14 August 2013
शोर सबसे अधिक चोर ही मचाते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह समय-समय पर दिग्विजय सिंह शोर मचाते रहते हैं। इसके पीछे उन चोरों की क्या मानसिकता रहती है ये हर किसी को पता है कि कोई उनपर शक न करे और ध्यान भटकाया जा सके। अभी बहुत दिन नहीं बीते छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सली हमले के एक सप्ताह बाद ही दिग्विजय सिंह ने अपनी जाँच रिपोर्ट जारी करते हुए धमतरी के भरी सभा में हमले के पीछे भाजपा को दोषी ठहराने का प्रयास किया था। जब एनआईए की रिपोर्ट उस हमले के पीछे कांग्रेसी ही निकले थे। याद कीजिये उसके करीब 1 महीने के बाद दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था कि आरएसएस बम बनाना सिखाती है उसके बाद उनका बयान कि बीजेपी दंगे करवाना चाहती है और आश्चर्यजनक रूप से पहले मेरठ में फिर कुछ दिनों बाद ईद के दिन जम्मू के किश्तवाड़ में हिन्दू विरोधी दंगे भड़क उठते हैं। क्या आपको "चोर का शोर" सुनाई दे रहा है ? क्या ये आश्चर्यजनक नहीं है कि बकलोल युवराज सहित अन्य टोपोरी छाप सेकुलर भयानक रूप से शांत हैं मेरठ और किश्तवाड़ दंगों पर ?? ऐसा ही ध्यान भटकाऊ शोर दिग्विजय सिंह ने 26/11 के बाद वीरगति प्राप्त पुलिस ऑफिसर हेमंत करकरे के सन्दर्भ में भी मचाया था। बटाला हाउस मुठभेंड़ पर भी दिग्विजय सिंह ने भयानक शोर मचाया था अन्य और भी ऐसे ही कांड हैं जिन पर दिग्विजय सिंह चोर की भांति शोर मचाते रहे हैं। उनका इंटेलिजेंस मोसाद और सीआईए से भी तेज काम करता है जो आधिकारिक जांच रिपोर्ट से भी काफी पहले आ जाती है। अभी हाल ही में बोधगया सीरियल एलपीजी गैस ब्लास्ट पर भी उनकी रिपोर्ट जांच एजेंसियों की रिपोर्ट से काफी पहले आ गयी और उन्होंने घोषित कर डाला कि उसमे गुजरात का हाथ है। उसकी आधिकारिक जाँच का हस्र हुआ किसी को पता नहीं। वैसे भी वो आश्चर्यजनक रूप से सभी कांडों पर वो शोर नहीं मचाते जैसे उन्होंने कभी भी शोर मचाते हुए नहीं कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को ट्रेनिंग आरएसएस दे रही है, वहां पर चल रहे बम विस्फोटों के पीछे भी आरएसएस का हाथ है, मिस्र में बड़े पैमाने पर वहां की जनता इस्लाम के ही खिलाफ होती जा रही है उसके पीछे भी आरएसएस और बीजेपी का हाथ है, पाकिस्तान द्वारा सीमा पर किये जा रहे युद्धविराम का बार-बार उल्लंघन के पीछे आरएसएस का हाथ है या चीन की बेहूदगी के पीछे भी उन्हें आरएसएस का हाथ नहीं दिखता। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से लगभग हर हिन्दू विरोधी दंगों के पीछे महीनो पहले उन्हें वो जानकारी पता नहीं किस दिव्य ज्ञान से मिल जाती है जिसकी भनक आईबी और एलआईयू को भी नहीं लगती। ये बहुत गम्भ्रीर विषय है इसकी न्यायिक जाँच होनी चाहिए कि वो हर दंगों या विस्फोट से पहले चोरों की तरह शोर क्यों मचाना शुरू कर देते हैं ?? क्या शोर से उनकी ये मंशा नहीं जाहिर नहीं होती कि किसी भी प्रकार से चाहते हैं कि लोग दंगों के पीछे की सच्चाई न जान सकें जैसा कि किश्तवाड़ दंगों के सन्दर्भ में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है जिसकी भूमिका वो महीनो पहले से बनाते चले आ रहे थे ! वैसे भी जब कभी इनके भौकने का शोर सुनाई देने लगे तब समझ लीजिये कि जल्दी ही जरूर कोई न कोई भयानक दंगा या हिन्दू विरोधी कांड होने वाला है और जांच एजेंसियों को इनके और इनकी पार्टी के खिलाफ जाँच शुरू कर देनी चाहिए। मेरा पूरा विश्वास है चौंकाने वाले तथ्य जाँच एजेंसियों को मिलेंगे …
Saturday, 10 August 2013
चूहे के बिल में हाथ डाल कर चूहा खोजने वालों के लिए खुशखबरी का ये मतलब बिलकुल नहीं कि चूहा मिल ही गया, खुशखबरी का मतलब ये है कि खुद चूहा बिल्ली की सवारी करता फिर रहा है। लेकिन मजाल क्या कि बिल्ली उस पर झपट्टा मार कर हज करने चल दे। वैसे भले ही इस्लाम में सब्सिडी (हराम) के पैसे हज करना गुनाह हो लेकिन फिर भी …पैसा तो पैसा है चाहे किसी घोटाला छाप डकैती से आवे या हराम से। इधर 65 वर्षों से जिस तरह कांग्रेस ने देश में उल्टी गंगा बहा रखी है, ऐसा नजारा देख कर आश्चर्य नहीं होता उलटे नगाड़ा बजाने वाले बहुत मिल जाते हैं। खांटी भाईयों के जीजा जी भले ही बिल्ली की सवारी सीना तान के कर लें लेकिन बिल्ली तो बिल्ली है। लेकिन लोग-बाग बताते हैं बिल्ली शाकाहारी है लिहाजा क्लीन चिट मिल गयी मैंने इस पर एक खांटी भाई से पूछा तो कहने लगे "…कांग्रेस ने ही स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी …" इस पर मैंने उनसे पूछा "…अच्छा तो बताएये कि स्वतंत्रता की लड़ाई में कितने कांग्रेसियों को फांसी हुई …?" उन्होंने उत्तर देते हुए कहा "…ठीक है फांसी भले न हुई हो जेल तो हुई ही …" मैंने कहा "…अधिकांश खांटी भाई लोग तो जेल कसाब और अफजल गोरु की तरह बिरयानी खाने ही जाते थे …" इस पर उन्होंने कड़ाई से जवाब दिया "… आपका ये आरोप झूठा है… " मैंने कहा "…जी नहीं झूठा बिल्कुल ही नहीं है उसी परंपरा का ही निर्वहन आज भी आप लोग हर स्तर पर जेल के अन्दर और जेल के बाहर भी कर रहे है …" उन्होंने आश्चर्य से पूछा "…क्या मतलब है आपका … ?" मैंने कहा "…आपके जीजा जी को नोटों की बिरयानी कौन खिला रहा है …?" गुस्से में उखड़ते हुए उन्होंने मुझसे पूछा "… आपका मतलब कि हमारी पार्टी ऐसा कर रही है …?" मैंने उनसे कहा "…आपके हिसाब से आजादी की लड़ाई तो भाजपा ने लड़ी नहीं सो बिरयानी तो वो खिला नहीं सकते …!" खांटी भाई ने मुझसे पूछा "…आपका मतलब जेल में सबको बिरयानी मिलती है …?" मैंने कहा "…सबको तो नहीं लेकिन कुछ ख़ास किस्म के लोगों को तो मिलती ही है अन्दर भी बहार भी…" खांटी भाई बोले "…आपके कहने का मतलब मै समझा नहीं …" मैंने उनको समझाते हुए कहा "…वैसे खाद्य सुरक्षा बिल तो उन्ही लोगों के लिए है जो आपकी दृष्टि में भूखे हैं…" खांटी भाई बोले "… हाँ बिलकुल उन्ही लोगों के लिए है …" मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "…आपके जीजा जी की कंपनी का अकाउंट भी भूखा था उसमे केवल 6000 रुपये थे जो केवल साल भर में ही बढ़कर 53 करोड़ हो गए…" खांटी भाई बोले "…इससे क्या साबित होता है …?" मैंने उनको उत्तर देते हुए कहा "…क्यों फ़ूड सिक्युरिटी बिल के पास होने से पहले उसका प्रोटोटाइप नहीं है ये …?" खांटी भाई बोले "…आप लोग जिस राजनीति से प्रेरित हैं वो सबको पता है …" मैंने कड़े हो कर उनसे पूछा "…जेल के भीतर सरकारी दामाद लोगों को और जेल के बाहर अपने दामादों को बिरयानी खिलाना ये कौन सी राजनीतिक प्रेरणा है …?" खांटी भाई बोले "…हम लोगों ने हमेशा स्वस्थ राजनीति की है …" मैंने उनसे पूछा "…अब तो देश स्वतंत्र है लिहाजा देश का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए घोटाला छाप डकैती तो अब आतंकवाद की श्रेणी में रखा ही नहीं जाएगा …?" खांटी भाई ने बड़े आत्मविश्वास से उत्तर देते हुए कहा "…घोटाले और आतंकवाद में जमीन आसमान का अंतर है और हमारी सरकार पूरी संजीदा है इसपर …" मैंने भी उसी टोन में उत्तर देते हुए कहा "...हाँ भले ही भ्रष्टाचार के काले धन से आतंकवाद प्रायोजित किया जाता रहा हो ..." खांटी भाई कुछ बोल नहीं रहे थे तो मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "…आपकी सरकार संजीदा है संभवतः इसीलिए बिल्ली भी शाकाहारी बन कर घूम रही है …!" मैंने उनको धन्यवाद कहा और नमस्कार कर के विदा लिया।
Thursday, 8 August 2013
अभी कुछ दिनों पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने बिलकुल सही कहा कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) ने देश का कबाड़ा कर दिया। आरएसएस सरसंघ चालक माननीय मोहन भगवत ने उनका समर्थन भी किया। माननीय उच्चतम न्यायलय ने 4 जुलाई, 2013 को महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय के विषय में अपना निर्णय देते हुए चिंता जताई थी कि पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ने के पश्चात भी नैतिक व्यवहार में पतन क्यों होता जा रहा है ? इसका सीधा कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी )। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण हम भारतीयों की मानसिकता कितनी गिरेगी , किस स्तर तक हम मूर्ख बनेंगे इसका अनुमान लगा पाना कम से कम अब तो उतना कठिन नहीं लगता। मूर्खता का आलम ये है कि इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण संस्कारों की तो बात छोड़ दीजिये सामान्य अनुभूतियों पर भी जबरदस्त खतरा है। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले इस स्तर तक मूर्ख हो चुके हैं कि अब कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज के स्नातक पठ्यक्रम में 50 अंकों का "लव कोर्स" चलाया जाएगा। "मूर्ख ही दुष्ट होता है" क्योंकि मूर्खता के कारण "उद्देश्य की प्रक्रिया" उसे समझ में ही नहीं आती जिसके कारण वो उद्देश्य के निमित्त उटपटांग और खतरनाक दुष्टता करता है। अगर मूर्ख बनने की यही रफ़्तार रही तो निश्चित रूप से वो दिन दूर नहीं जब जूता-मोजा पहनने, कपड़े खोलना - पहनना आदि भी कोर्स के रूप में पढाया जाएगा। क्या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफ़ेसर ये बताएँगे को पशु बिना म्लेच्छपना के प्रेम के सन्दर्भ में म्लेच्छों से कहीं अधिक बुद्धिमान कैसे हैं? आखिर ये मूर्ख मलेच्छ प्रोफ़ेसर साबित क्या करना चाहते हैं ? क्या वो सभी को अपने जैसा ही मूर्ख और मलेच्छ बनाना चाहते हैं ?
लगभग 4 वर्ष पूर्व नई दिल्ली स्थित "राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसन्धान केंद्र" ने भाषा और बुद्धिमत्ता पर एक प्रयोग किया, उन्होंने कुछ छात्रों को लिया और एमआरआई मशीन में लिटा कर पहले उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पढ़ने को कहा गया तो ये पाया गया कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी ) पढ़ने के दौरान मस्तिष्क के मात्र बाएं भाग का बहुत थोड़ा सा भाग ही सक्रिय था लेकिन जब उन्हें देवभाषा हिंदी पढ़ने को कहा गया तो परिणाम चौकाने वाले थे पूरा का पूरा मस्तिष्क 100 प्रतिशत तक सक्रिय हो गया। यह प्रयोग सामान रूप से सभी प्रतिभागियों किया गया और सामान परिणाम थे। परिणाम के अर्थ ये बिलकुल स्पष्ट हो गया कि हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोल कर अपने मस्तिष्क का 10 प्रतिशत से भी बहुत कम उपयोग कर पाते हैं अर्थात इस बोली में हम निरे मूर्ख हैं जिसका दुश्प्रभाव आज भारत के प्रत्येक क्षेत्र में दिख रहा है हर ओर गिरावट ही गिरावट दिख रही है जिसका परिणाम है अपराध, निकृष्टता, संस्कारों का भयानक लोप, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि। उपरोक्त प्रयोग से ये सिद्ध होता है कि मातृभाषा में किसी भी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता 100 प्रतिशत तक होती है इसीलिए हर विकसित देश अपनी मातृभाषा में ही विकसित हुआ है न कि म्लेच्छ बोली में। वैसे भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) अंतर्राष्ट्रीय बोली नहीं है ये मात्र 12 देशों में बोली जाती है वो भी उनमे जो म्लेच्छों के पराधीन थे स्वयं "संयुक्त राष्ट्र संघ" भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में काम नहीं करता। "संयुक्त राष्ट्र संघ" की आधिकारिक भाषा फ्रेंच है। और तो और पूरे ब्रिटेन में भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोली जाती।
जीवन-संघर्ष में जहाँ हमें आगे निकलने के कुछ अतिरिक्त मानसिक क्षमता की महती आवश्यकता होती है हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति मनोग्रस्त बन कर मूर्ख बन्दर की भांति अमेरिका और अन्य विकसित देशों का नक़ल कर रहे हैं। हमारी लगभग सभी व्यासायिक शिक्षा म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में है ये तो ऐसा ही है किसी का पैर काट दीजिये और कहिये कि ओलम्पिक के रेस में स्वर्ण पदक जीत कर दिखाए। अभी कुछ वर्ष पहले "संयुक्त राष्ट्र संघ" ने अपने एक रिपोर्ट में कहा था भारत के 97 प्रतिशत से अधिक प्रोफेशनल नकारा हैं किसी काम लायक नहीं हैं आईआईएम, एम्स, आईआईटी जैसी संस्थाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं। मुंबई के डब्बा वाले और धोबियों के प्रदाई तंत्र का प्रबंधन इतना विकसित है कि हार्वर्ड और कैम्ब्रिज के लोग उस पर शोध के लिए आते हैं। उन डब्बा वाले और धोबी जिनकी अधिकतम शिक्षा कक्षा 7 है, आईआईएम के म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफेसरों से भी कहीं अधिक बुद्धिमान और सशक्त हैं। ये जादू है मातृभाषा का और यह तब तक ही है जब तक वो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) से मुक्त हैं जिस दिन उन्हें म्लेच्छ बोली सिखा दी जाएगी ये जादू समाप्त हो जाएगा। अक्सर समाचार पत्रों में ये पढ़ने को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है। वैसे भी जब तक इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रकोप नहीं था तब तक तो कुछ वैज्ञानिक पैदा भी हुए लेकिन जैसे-जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ा है भारत से वैज्ञानिक तो विलुप्त ही हो चुके हैं 125 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में एक भी नोबेल पुरस्कार का न आना ये सिद्ध करता है इस म्लेच्छ बोली से हम भारतीय बिलकुल मूर्ख बन चुके हैं हमारे पास बुद्धि बची ही नहीं है। जबकि हर वर्ष हजारों लोगों को स्वर्ण पदक रेवड़ी की भांति बांटी जाती है ये ठीक वैसा ही है जैसे एक मूर्ख दुसरे मूर्ख के मूर्खता की परीक्षा ले रहा होता है।वैसे भी जो हमारा परीक्षा लेने का तंत्र है उससे किसी भी स्तर पर किसी के बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली ही नहीं जा सकती। भारतीय उद्योग जगत को यदि सबसे आगे निकलना है तो निश्चित रूप से उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का त्याग कर पूर्ण पूर्ण बुद्धिमत्तायुक्त सेवा पर ध्यान देना चाहिए।
भारत की ब्यूरोक्रेसी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की दीवानी है परिणाम किसी भी सफल नीति का न बन पाना। राष्ट्रीय हाहाकार की इस स्थिति को रुपये की गिरते स्तर को देख कर एक अँधा भी सरलता से अनुमान लगा सकता है कि देश म्लेच्छ बोली बोलने वाले मूर्खों के हाथ में है। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है "भारत सर्वदा युद्ध का मैदान जीतता है किन्तु टेबल पर हार जाता है" बिलकुल सटीक कहावत है इसके पीछे कारण ये है कि युद्ध वो लड़ते हैं जो मातृभाषा (देवभाषा) बोलते हैं किन्तु टेबल पर म्लेच्छ बोली बोलने वाली मूर्ख ब्यूरोक्रेसी बैठती है जो सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं करती। धर्म के दस लक्षण हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं उनका पालन सिर्फ बुद्धिमान और वीर ही कर सकते हैं मूर्ख नहीं, मूर्ख मात्र अपराधी हो सकता है अनाचारी हो सकता है दुराचारी हो सकता है या भ्रष्टाचारी हो सकता है। धर्म से दूर होने का सबसे महत्वपूर्ण कारणों में ये म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) भी है कारण मूर्खता ।
भाषा और बुद्धिमत्ता पर गंभीर कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ जिनके कार्य को "होर्फ लिग्विस्टिक हाइपोथिसिस" के नाम से जाना जाता है, में कहा है कि मातृभाषा ही हमें परिवेश को समझने और अनुभूति करने हेतु मंच का निर्माण करती है और मातृभाषा ही हमारे सोचने के तरीके को निर्धारित करती है जिसका सीधा सम्बन्ध बुद्धिमत्ता से होता है। लेकिन जब हम उसमे किसी विदेशी भाषा को जबरदस्ती घुसाने का प्रयास करते हैं तो वो मंच बुरी तरह प्रभावित होता है जिससे परिवेश के प्रति समझ और अनुभव करने की प्रवृत्ति नष्ट होने लगती है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप उसका अनुवाद कितनी तेजी से कर लेते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मातृभाषा का जबदस्त पक्ष लेते हुए कहा कि 14 वर्षों तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे उनके सीखने की प्रवृत्ति पूरी तरह 100 प्रतिशत सक्रिय रहे। मातृभाषा माँ होती है जिसका कोई विकल्प नहीं, जैसे माँ अपने प्यार और स्नेह से बच्चों को सशक्त और वीर बनाती है वैसे ही मातृभाषा भी व्यक्ति उत्तरोत्तर मानसिक रूप से सशक्त और बुद्धिमान बनाती है। यही कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण गीतकारों को गीत नहीं मिल रहा है, कहानीकारों को कहानी नहीं मिल रही, संगीतकारों को संगीत नहीं मिल रही। स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि एक वेश्या और संस्कारित नारी अंतर करना भी कठिन होता जा रहा है सन्नी लीओन का उदहारण सबके सामने है इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिन्हें प्रचंड उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्रख्यात रूसी सिद्धांतकार गेंन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है" में लिखा है "साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते उनकी परिवर्तनकारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत (म्लेछ्पना) या विदेशी बोली हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खड़ी करती है। संसाधनों का उपयोग सीधे-सीधे बुद्धिमत्ता का प्रश्न होता है ठीक वैसे ही जैसे बन्दर के हाथ में तलवार। हम जितने अधिक बुद्धिमान होंगे उतना बेहतर तरीके और मौलिकता से हम संसाधनों का उपयोग करेंगे। आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना के कारण भारत में संसाधनों की क्या स्थिति है बिलकुल सपष्ट है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में मनोवौज्ञानिक तथ्य तो और भी भयानक हैं "किसी भी सन्दर्भ में बिना तार्किक आलोचना के आधार के दूसरे संस्कृति की अत्यंत प्रशंसा तथा अनुपालन तथा एक संस्कृति को , अवास्तविक, रूढ़िबद्ध और विदेशी गुणवत्ता का बताया जाता है "(गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) मानसिक बीमारी है जिसे "चिंता विकृति" में वर्गीकृत किया जाता है। "डिक्शनरी ऑफ़ साइकोलॉजी" ये भी बताती है कि अनावश्यक रूप से या प्रभाव ज़माने के लिए भी म्लेच्छ्पना या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रदर्शन करना मानसिक बीमारी (चिंता विकृति) है। इस चिंता विकृति के कारण व्यक्ति की बुद्धिमत्ता लगभग समाप्त हो जाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है, कई प्रकार की शारीरिक बीमारिओं के घर कर जाने सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि जैसे - जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ रहा है बीमारियाँ भी बढ़ रही है मजे की बात ये कि म्लेच्छ बोली वाले चिकित्सक भी भयानक रूप से इसकी चपेट में हैं। कोई भी म्लेच्छ बोली वाला चिकित्सक न तो शारीरिक रूप से स्वस्थ है और न ही मानसिक रूप से।
ये हमारा परम सौभाग्य है हमारे पास संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा है जो मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि विकास के लिए भी सर्वोत्तम तो है ही साथ ही हर स्तर चाहे वो मानवीय हो या यांत्रिक, पर अतिउपयोगी है किन्तु मूर्खता के कारण हमारा ध्यान उस पर जा ही नहीं रहा। वहीं नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स के नेतृत्व में 1895 से ही के गहन शोध के उपरांत अमेरिका ने अपने युवा पीढी को संस्कृत में पारंगत बनाने की ठान ली है संस्कृत अब नासा की आधिकारिक भाषा ही बनने नहीं जा रही बल्कि बड़े पैमाने पर संस्कृत माध्यम में स्कूल भी खोलने जा रहा है। पता नहीं ये सौभाग्य भारत में कब आएगा।
सन्देश और अर्थ बिलकुल स्पष्ट है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना (अंग्रेजियत) का प्रदर्शन करे वो न सिर्फ मूर्ख है बल्कि मानसिक रोगी भी है जिसके अपराधिक और विनाशकारी होने सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है।
लगभग 4 वर्ष पूर्व नई दिल्ली स्थित "राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसन्धान केंद्र" ने भाषा और बुद्धिमत्ता पर एक प्रयोग किया, उन्होंने कुछ छात्रों को लिया और एमआरआई मशीन में लिटा कर पहले उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पढ़ने को कहा गया तो ये पाया गया कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी ) पढ़ने के दौरान मस्तिष्क के मात्र बाएं भाग का बहुत थोड़ा सा भाग ही सक्रिय था लेकिन जब उन्हें देवभाषा हिंदी पढ़ने को कहा गया तो परिणाम चौकाने वाले थे पूरा का पूरा मस्तिष्क 100 प्रतिशत तक सक्रिय हो गया। यह प्रयोग सामान रूप से सभी प्रतिभागियों किया गया और सामान परिणाम थे। परिणाम के अर्थ ये बिलकुल स्पष्ट हो गया कि हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोल कर अपने मस्तिष्क का 10 प्रतिशत से भी बहुत कम उपयोग कर पाते हैं अर्थात इस बोली में हम निरे मूर्ख हैं जिसका दुश्प्रभाव आज भारत के प्रत्येक क्षेत्र में दिख रहा है हर ओर गिरावट ही गिरावट दिख रही है जिसका परिणाम है अपराध, निकृष्टता, संस्कारों का भयानक लोप, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि। उपरोक्त प्रयोग से ये सिद्ध होता है कि मातृभाषा में किसी भी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता 100 प्रतिशत तक होती है इसीलिए हर विकसित देश अपनी मातृभाषा में ही विकसित हुआ है न कि म्लेच्छ बोली में। वैसे भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) अंतर्राष्ट्रीय बोली नहीं है ये मात्र 12 देशों में बोली जाती है वो भी उनमे जो म्लेच्छों के पराधीन थे स्वयं "संयुक्त राष्ट्र संघ" भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में काम नहीं करता। "संयुक्त राष्ट्र संघ" की आधिकारिक भाषा फ्रेंच है। और तो और पूरे ब्रिटेन में भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोली जाती।
जीवन-संघर्ष में जहाँ हमें आगे निकलने के कुछ अतिरिक्त मानसिक क्षमता की महती आवश्यकता होती है हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति मनोग्रस्त बन कर मूर्ख बन्दर की भांति अमेरिका और अन्य विकसित देशों का नक़ल कर रहे हैं। हमारी लगभग सभी व्यासायिक शिक्षा म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में है ये तो ऐसा ही है किसी का पैर काट दीजिये और कहिये कि ओलम्पिक के रेस में स्वर्ण पदक जीत कर दिखाए। अभी कुछ वर्ष पहले "संयुक्त राष्ट्र संघ" ने अपने एक रिपोर्ट में कहा था भारत के 97 प्रतिशत से अधिक प्रोफेशनल नकारा हैं किसी काम लायक नहीं हैं आईआईएम, एम्स, आईआईटी जैसी संस्थाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं। मुंबई के डब्बा वाले और धोबियों के प्रदाई तंत्र का प्रबंधन इतना विकसित है कि हार्वर्ड और कैम्ब्रिज के लोग उस पर शोध के लिए आते हैं। उन डब्बा वाले और धोबी जिनकी अधिकतम शिक्षा कक्षा 7 है, आईआईएम के म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफेसरों से भी कहीं अधिक बुद्धिमान और सशक्त हैं। ये जादू है मातृभाषा का और यह तब तक ही है जब तक वो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) से मुक्त हैं जिस दिन उन्हें म्लेच्छ बोली सिखा दी जाएगी ये जादू समाप्त हो जाएगा। अक्सर समाचार पत्रों में ये पढ़ने को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है। वैसे भी जब तक इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रकोप नहीं था तब तक तो कुछ वैज्ञानिक पैदा भी हुए लेकिन जैसे-जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ा है भारत से वैज्ञानिक तो विलुप्त ही हो चुके हैं 125 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में एक भी नोबेल पुरस्कार का न आना ये सिद्ध करता है इस म्लेच्छ बोली से हम भारतीय बिलकुल मूर्ख बन चुके हैं हमारे पास बुद्धि बची ही नहीं है। जबकि हर वर्ष हजारों लोगों को स्वर्ण पदक रेवड़ी की भांति बांटी जाती है ये ठीक वैसा ही है जैसे एक मूर्ख दुसरे मूर्ख के मूर्खता की परीक्षा ले रहा होता है।वैसे भी जो हमारा परीक्षा लेने का तंत्र है उससे किसी भी स्तर पर किसी के बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली ही नहीं जा सकती। भारतीय उद्योग जगत को यदि सबसे आगे निकलना है तो निश्चित रूप से उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का त्याग कर पूर्ण पूर्ण बुद्धिमत्तायुक्त सेवा पर ध्यान देना चाहिए।
भारत की ब्यूरोक्रेसी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की दीवानी है परिणाम किसी भी सफल नीति का न बन पाना। राष्ट्रीय हाहाकार की इस स्थिति को रुपये की गिरते स्तर को देख कर एक अँधा भी सरलता से अनुमान लगा सकता है कि देश म्लेच्छ बोली बोलने वाले मूर्खों के हाथ में है। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है "भारत सर्वदा युद्ध का मैदान जीतता है किन्तु टेबल पर हार जाता है" बिलकुल सटीक कहावत है इसके पीछे कारण ये है कि युद्ध वो लड़ते हैं जो मातृभाषा (देवभाषा) बोलते हैं किन्तु टेबल पर म्लेच्छ बोली बोलने वाली मूर्ख ब्यूरोक्रेसी बैठती है जो सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं करती। धर्म के दस लक्षण हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं उनका पालन सिर्फ बुद्धिमान और वीर ही कर सकते हैं मूर्ख नहीं, मूर्ख मात्र अपराधी हो सकता है अनाचारी हो सकता है दुराचारी हो सकता है या भ्रष्टाचारी हो सकता है। धर्म से दूर होने का सबसे महत्वपूर्ण कारणों में ये म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) भी है कारण मूर्खता ।
भाषा और बुद्धिमत्ता पर गंभीर कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ जिनके कार्य को "होर्फ लिग्विस्टिक हाइपोथिसिस" के नाम से जाना जाता है, में कहा है कि मातृभाषा ही हमें परिवेश को समझने और अनुभूति करने हेतु मंच का निर्माण करती है और मातृभाषा ही हमारे सोचने के तरीके को निर्धारित करती है जिसका सीधा सम्बन्ध बुद्धिमत्ता से होता है। लेकिन जब हम उसमे किसी विदेशी भाषा को जबरदस्ती घुसाने का प्रयास करते हैं तो वो मंच बुरी तरह प्रभावित होता है जिससे परिवेश के प्रति समझ और अनुभव करने की प्रवृत्ति नष्ट होने लगती है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप उसका अनुवाद कितनी तेजी से कर लेते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मातृभाषा का जबदस्त पक्ष लेते हुए कहा कि 14 वर्षों तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे उनके सीखने की प्रवृत्ति पूरी तरह 100 प्रतिशत सक्रिय रहे। मातृभाषा माँ होती है जिसका कोई विकल्प नहीं, जैसे माँ अपने प्यार और स्नेह से बच्चों को सशक्त और वीर बनाती है वैसे ही मातृभाषा भी व्यक्ति उत्तरोत्तर मानसिक रूप से सशक्त और बुद्धिमान बनाती है। यही कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण गीतकारों को गीत नहीं मिल रहा है, कहानीकारों को कहानी नहीं मिल रही, संगीतकारों को संगीत नहीं मिल रही। स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि एक वेश्या और संस्कारित नारी अंतर करना भी कठिन होता जा रहा है सन्नी लीओन का उदहारण सबके सामने है इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिन्हें प्रचंड उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्रख्यात रूसी सिद्धांतकार गेंन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है" में लिखा है "साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते उनकी परिवर्तनकारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत (म्लेछ्पना) या विदेशी बोली हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खड़ी करती है। संसाधनों का उपयोग सीधे-सीधे बुद्धिमत्ता का प्रश्न होता है ठीक वैसे ही जैसे बन्दर के हाथ में तलवार। हम जितने अधिक बुद्धिमान होंगे उतना बेहतर तरीके और मौलिकता से हम संसाधनों का उपयोग करेंगे। आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना के कारण भारत में संसाधनों की क्या स्थिति है बिलकुल सपष्ट है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में मनोवौज्ञानिक तथ्य तो और भी भयानक हैं "किसी भी सन्दर्भ में बिना तार्किक आलोचना के आधार के दूसरे संस्कृति की अत्यंत प्रशंसा तथा अनुपालन तथा एक संस्कृति को , अवास्तविक, रूढ़िबद्ध और विदेशी गुणवत्ता का बताया जाता है "(गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) मानसिक बीमारी है जिसे "चिंता विकृति" में वर्गीकृत किया जाता है। "डिक्शनरी ऑफ़ साइकोलॉजी" ये भी बताती है कि अनावश्यक रूप से या प्रभाव ज़माने के लिए भी म्लेच्छ्पना या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रदर्शन करना मानसिक बीमारी (चिंता विकृति) है। इस चिंता विकृति के कारण व्यक्ति की बुद्धिमत्ता लगभग समाप्त हो जाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है, कई प्रकार की शारीरिक बीमारिओं के घर कर जाने सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि जैसे - जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ रहा है बीमारियाँ भी बढ़ रही है मजे की बात ये कि म्लेच्छ बोली वाले चिकित्सक भी भयानक रूप से इसकी चपेट में हैं। कोई भी म्लेच्छ बोली वाला चिकित्सक न तो शारीरिक रूप से स्वस्थ है और न ही मानसिक रूप से।
ये हमारा परम सौभाग्य है हमारे पास संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा है जो मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि विकास के लिए भी सर्वोत्तम तो है ही साथ ही हर स्तर चाहे वो मानवीय हो या यांत्रिक, पर अतिउपयोगी है किन्तु मूर्खता के कारण हमारा ध्यान उस पर जा ही नहीं रहा। वहीं नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स के नेतृत्व में 1895 से ही के गहन शोध के उपरांत अमेरिका ने अपने युवा पीढी को संस्कृत में पारंगत बनाने की ठान ली है संस्कृत अब नासा की आधिकारिक भाषा ही बनने नहीं जा रही बल्कि बड़े पैमाने पर संस्कृत माध्यम में स्कूल भी खोलने जा रहा है। पता नहीं ये सौभाग्य भारत में कब आएगा।
सन्देश और अर्थ बिलकुल स्पष्ट है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना (अंग्रेजियत) का प्रदर्शन करे वो न सिर्फ मूर्ख है बल्कि मानसिक रोगी भी है जिसके अपराधिक और विनाशकारी होने सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है।
Saturday, 3 August 2013
इटैलियन सरोगेट मदर
कांग्रेस के सन्दर्भ में ही कांग्रेस की इटैलियन सरोगेट मदर ने निलंबित आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल का पक्ष लेते हुए दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को पत्र लिखा है जो सबको पता है। क्या लिखा है पता नहीं लेकिन लिखा है जरूर। आखों पर पट्टी बांध कर हाथी को छू कर उसे को परिभाषित करने वाले खांटी भाई कांग्रेसियों ने धर्मनिरपेक्षता का बुर्का मुलायम सिंह यादव एंड कंपनी से छीनने की पूरी - पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इटैलियन सरोगेट मदर के बिना ऐसा करना यदि संभव हो जाए तो क़यामत नहीं आ जाएगी ? लिहाजा दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को पीछे से गुदराना बहुत जरूरी था। दुर्दांत अंडरएचिएवर अर्थशास्त्री के पास अगर इतनी बुद्धि और संवेदनशीलता होती तो विश्वास कीजिये तीन चौथाई खांटी भाई कांग्रेसी लोग मय मुलायम सिंह एंड कंपनी निश्चित रूप से जेल में होते। खैर ये तो यूपी की राजनीति ऐसी है कि कुछ कहने या लिखने का भी मन नहीं करता लेकिन फिर भी लोग बताते हैं दुर्गा शक्ति के निलंबन से एक तीर से दो निशाने साधे गए। नरेन्द्र भाटी साहब को प्रियदर्शिनी बना के सामने खड़ा कर दिया गया है और भीतर से बुर्का - बुर्काव्वल का गन्दा खेल चल रहा है। मामला तो सीधा सा यही है कि रघुराज प्रताप सिंह को तोते ने क्लीन चिट दे दी वो रमजान के महीने में तो दिवंगत डीएसपी जियाउल हक विधवा जिनको अपने दिवंगत पति की कीमत लगाने और उसे इनकैश कराने की ही फिकर हमेशा से रही है, ने जब नाराजगी का नाटक खेला है तो उसपर कुछ न कुछ तो करना ही था। आखिर धर्मनिरपेक्षता का बुर्का ही खतरे में पड़ गया था। खनन माफियागिरी का मुद्दा उठा कर एक तरह से मुलायम सिंह एंड कंपनी खुद को कांग्रेसी बुर्के में ही दिखाना चाहती है लेकिन इटैलियन सरोगेट मदर को ये बर्दाश्त नहीं लिहाजा उन्होंने ने अपने दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को ही लहका दिया। लेकिन मजा देखिये मुलायम सिंह के लोग भी भी कम नहीं हैं तोता को काबू में करके इटैलियन सरोगेट मदर के पीछे खेमका जी का डंडा लेकर पड़ गए। पता नहीं केजरीवाल किस कोने में बैठ स्टील के गिलास में कांग्रेस का दूध पी कर पहलवानी की प्रेक्टिस कर रहे हैं। कोई मुझे बता रहा था कि दरअसल उनके काग्रेसी दूध के गिलास में एक साथ कई मक्खियां पड़ गईं तो वो कांग्रेसी दूध की सफाई झाड़ू से कर रहे थे। खैर इस उघटापैंची और बुर्का-बुर्काव्वल के छीना-झपटी के खेल को बहुत दूर तक कैसे लेकर जाया जाए इसकी चिंता जितनी कांग्रेस को है उससे कही ज्यादा चिंता मुलायम सिंह एंड कंपनी को है क्यों कि उनकी दृष्टि में मीडिया वाले अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं बार-बार यूपी में बीजेपी को नंबर एक पर दिखा दे रहे हैं। इसी बीच उनके ही लोग जब दुर्गा शक्ति नागपाल के मुद्दे पर अपने मुँह अपना अंगूठा डालते दिखे तो तो खुद मुलायम सिंह को अपना स्टैंड लेना ही पड़ा इससे क्या फर्क पड़ता है कि इटैलियन सरोगेट मदर अपने दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को लहकाती हैं या खुद उनका बेटा हिंडन नदी में डुबकी लगाने इसलिए इनकार कर दे कि वो बहुत मनहूस क्षेत्र है।
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