पता नहीं कैसे इस भीषण उमस भरी गर्मी में भी टोपोरियत के सेक्युलर उस्ताद टोपी ओढ़ के खुद रजाईदार बुर्के में छुपा कर कायदे आजम के ज़माने की खटिया पर बैठ कर ओठंग लेते हैं, लोग बाग बताते हैं कि नए-नए टोपोरी बने नितीश बाबू पाकिस्तान केवल टोपी और बुर्के की दीक्षा लेने ही नहीं गए थे बल्कि कायदे आजम की खटिया भी उठा लाए थे। उनके पाकिस्तानी चाहूकारों ने बड़े लगन से कायदे आजम की खटिया को रीप्रोड्यूस किया था। कैसे किया था भले ही ये रहस्य हो लेकिन काम बड़ा बढ़िया करता है। उनके अपने लोग ही बताते हैं कि वो विशेष खटिया बड़े काम की चीज है हराम नीद को भी हलाल में बदल देती है और ओठंग लेने की बाद तो वोट बैंक के ऐसे-ऐसे सपने आते हैं मानो उनको जन्नत की हूर मिल गयी हो। पता नहीं वो जन्नत की हूरें मिड-डे-मील खायी होंगी या नहीं लेकिन इतना तो तय है नितीश बाबू जैसे टपोरियों की सेवा करने में उनको भी बड़ा मजा आता होगा आखिर ए.के. 47 भी कोई चीज होती है ये रहस्य कहीं खुल न जाए इसीलिए गयाजी में 5 किलउवा एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल किया गया था और यकीन मानिये ये रहस्य रहस्य तब तक रहेगा जबतक कि अणें मार्ग पर हूरें मिड-डे-मील खा कर रजाईदार बुर्के में दनादन सीरियल विस्फोट नहीं कर देंगी। खैर कायदे आजम की खटिया पर ओठंगने के बाद तो मौत भी नहीं दिखाई देती भले ही भगवान के स्वरुप माने जाने वाले 10-15 साल के छोटे-छोटे बच्चे ही क्यों न हों क्या फर्क पड़ता है जन्नत तो वोट से खरीदा जाता है लिहाजा ये मरने वाले बच्चे क्या कर सकते हैं सिवाय इनके टोपोरियत सेकुलर भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ने के। बिहार का इतिहास भी ऐसा है कि वहां मृत्यु से अधिक सर्वदा सैद्धांतिक पक्ष को तवज्जो दी जाती रही है गौतम बुद्ध ने भी इसी सन्दर्भ ज्ञान प्राप्त किया था लेकिन टोपोरियत के सेक्युलर उस्ताद तो टोपी-बुर्का पहन के वोट-ज्ञान प्राप्ति की साधना में ऐसे लीन हैं कि देख लीजिये उनको फुर्सत का अकाल है। ये इसी टोपोरियत-साधना की बिलकुल नयी खोज का ही कमाल है कि कोई विस्फोट में मरा नहीं लेकिन भोजन करने से लोग मर जा रहे हैं वो भी बच्चे। पता नहीं नितीश बाबू ने कैसे इसकी खोज टोपी-बुर्का ओढ़ कायदे आजम की खटिया पर बैठ कर डाली। उनकी पार्टी जद यू में इस बात अच्छी खासी चर्चा है कि नितीश बाबू कभी जिन्दगी में गलत काम नहीं करते लोग अगर उनको जूता-चप्पल दिखाते है या उनपर फेंकते तो ये सब उनके अच्छे कामों के लिए ही होता है लिहाजा बिहार कुछ भी हो जाए बि(काऊ)-हार उनके गले में ही जाना चाहिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो किसी भी रूप में और कैसे भी हड्डी है या हड्डा, किसी को नुकसान होता है या फायदा। वैसे इसके लिए उनको कुछ तो मिलना ही चाहिए पुरस्कार के रूप में भी भले ही वो ख़ास वर्ग का वोट ही क्यों न हो।
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