मानसिक समस्याएँ और बद्धिमत्ता की वास्तविक स्थिति
"NO MIND, NO PROBLEM"
अक्सर देखा जाता है कि लोगों को जब मानसिक समस्या होती है तो वो समझते हैं कि उनके पास औरों की तुलना में कम बुद्धि है इसलिए मानसिक विकृति हो गयी। वास्तव में ऐसा नहीं है, वास्तविकता ये है कि जिन लोगों को सामान्य तौर पर मानसिक परेशानी होती है उनके पास सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा बुद्धि होती है वो ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और जब वो अपने इस अधिक बुद्धि का समुचित और पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाते, उपयोग करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाते, उचित उपयोग नहीं कर पाते, अनुचित उपयोग करते हैं या अनुचित करने के लिए बाध्य रहते हैं तो वहीं से मानसिक समस्या खड़ी होनी आरम्भ हो जाती है जो शीघ्र ही विभिन्न मानसिक विकृतियों के रूप में दिखने लगती है। अतः ये मान लेना कि जिनको मानसिक विकृति है वो लोग कम बुद्धिमान होते हैं बिल्कुल गलत है। यदि इस सन्दर्भ में इतिहास को देखा जाए तो जो तथ्य निकल के सामने आता है वो ये है कि जिन लोगों ने इतिहास रचा उन सभी लोगों को कोई न कोई और कभी न कभी मानसिक विकृति जरूर थी वो चाहे भारत के लोग रहे हों या भारत के बहार के। आप देखिये स्टीफेन हाकिंग जिन्हें 20 सदी का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति माना जाता है उन्हें भीषण विकलांगता है, अलबर्ट आइंस्टीन को बचपन में ही मानसिक विकृति थी, वर्जिन कंपनी के मालिक सर रिचर्ड चार्ल्स नोकोलस ब्रेनसन, विश्वविख्यात पूजी निवेशक होवेर्ड हुघेस को असेंट्रिक बिहेवियर, एप्पल कंपनी के सीईओ स्व. स्टीव जॉब्स को बाइपोलर, नेपोलियन बोनापार्ट को एंग्जायटी डिसऑर्डर था, अरस्तू को स्चिज़ोफ्रेनिया, आदि बहुत से लोग लोग दुनियां की दृष्टि में मानसिक रूप से सक्षम बिल्कुल नहीं थे इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि उनके पास बौद्धिकता की कमी थी। रिलायंस कंपनी के संस्थापक स्व. धीरुभाई अम्बानी ने मुंबई जाने से पहले 100 रूपए का नोट नहीं देखा था उन्हें भी अपना स्कूल बीच में ही छोड़ना पड़ा था, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अबुल कलाम चार बार बीएआरसी और एयरफोर्स की परीक्षा में असफल रहे तो इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि उनके पास बुद्धि की कमी थी। दरअसल उनके पास बुद्धि इतनी ज्यादा थी कि सामान्य सामाजिक तंत्र में फिट ही नहीं हो पा रहे थे लेकिन इन्होने अपना तंत्र विकसित किया या अपनी ही कठिनाईयों को अवसरों में बदला तो तो इन लोगों ने इतिहास ही रच डाला। प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे को गंभीर अवसाद हो गया था और जब वो उससे बहार निकले तो बिल्कुल नए अन्ना हजारे थे जिन्होंने वास्तव में इतिहास ही रच डाला। यही समस्या सामान्य तौर पर देखने को मिलती है कि लोग स्वयं का "मानसिक सशक्तिकरण" नहीं कर पाते।
इसलिए ये मान लेना कि जिनके परीक्षा में कम नंबर आते हैं, पढने में कमजोर हैं, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, मानसिक विकृति है या ऐसे लोग कहीं सफल नहीं हो पा रहे हैं उनके पास बुद्धि की कमी है बिल्कुल गलत है। वास्तव में ऐसे लोगों के पास सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा बुद्धि है वो सामान्य लोगों से ज्यादा बुद्धिमान हैं बस समस्या इतनी सी है कि वो अपने पूरी बुद्धिमत्ता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं या उपयोग के निमित्त वो अपने लिए अवसरों का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें कहीं से हताश हो कर स्वयं समाज से विलग करने की कोई जरूरत नहीं है।
"ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" दरअसल यही करती है वो व्यक्ति के व्यक्तित्व को जिसपर मानव मस्तिष्क की127 प्रवृत्तियां काम करती हैं इनपर आधारित "नैदानिक रिसर्च रिपोर्ट" मानव मस्तिष्क को नए सिरे से अधिगमित करती है और शक्ति के साथ विकास की पूरी संभावनाओं को खोल देती है। इसी कारण से इस अतिउन्नत और आधुनिक विधा से वह सब सामान्य प्रक्रिया में आ चुका है जो पहले मात्र एक संयोग हुआ करता था और कुछ ही लोग अपने मानसिक विकृतियोँ को काबू में करते हुए इतिहास रचा। "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" वास्तव में न सिर्फ व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त करती है बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य को भी बिल्कुल फिट कर देती है। इसलिए ये मानना बिल्कुल बेवकूफी है कि जिनको मानसिक समस्या है उनके पास बुद्धि की कमी है। वो लोग वास्तव में सामान्य लोगों से कही ज्यादा बुद्धिमान हैं। इसीलिए हमारे क्षेत्र में कहा जाता है "NO MIND, NO PROBLEM", "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" की सहायत से इतिहास रचने के लिए तैयार हो जाईये ।
नोट- निदान पूर्णतः औषधि रहित है
इतिहास रचने के लिए संपर्क कीजिये -
डॉ राघवेन्द्र कुमार
ग्राफोलोजिस्ट & ग्राफोथिरेपिस्ट (एडवांस साइकोलॉजी)
नेओसेल्फ: मेन्टल एमपावरमेंट एंड क्यूरिंग सेंटर
अलाहदादपुर, गोरखपुर
फ़ोन - 09838953532
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दवाओं से दूर रहने के लिए ये लिंक ध्यान से देखें लिंक - cchr.org ये बहुत ज्यादा जरूरी है
"NO MIND, NO PROBLEM"
अक्सर देखा जाता है कि लोगों को जब मानसिक समस्या होती है तो वो समझते हैं कि उनके पास औरों की तुलना में कम बुद्धि है इसलिए मानसिक विकृति हो गयी। वास्तव में ऐसा नहीं है, वास्तविकता ये है कि जिन लोगों को सामान्य तौर पर मानसिक परेशानी होती है उनके पास सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा बुद्धि होती है वो ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और जब वो अपने इस अधिक बुद्धि का समुचित और पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाते, उपयोग करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाते, उचित उपयोग नहीं कर पाते, अनुचित उपयोग करते हैं या अनुचित करने के लिए बाध्य रहते हैं तो वहीं से मानसिक समस्या खड़ी होनी आरम्भ हो जाती है जो शीघ्र ही विभिन्न मानसिक विकृतियों के रूप में दिखने लगती है। अतः ये मान लेना कि जिनको मानसिक विकृति है वो लोग कम बुद्धिमान होते हैं बिल्कुल गलत है। यदि इस सन्दर्भ में इतिहास को देखा जाए तो जो तथ्य निकल के सामने आता है वो ये है कि जिन लोगों ने इतिहास रचा उन सभी लोगों को कोई न कोई और कभी न कभी मानसिक विकृति जरूर थी वो चाहे भारत के लोग रहे हों या भारत के बहार के। आप देखिये स्टीफेन हाकिंग जिन्हें 20 सदी का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति माना जाता है उन्हें भीषण विकलांगता है, अलबर्ट आइंस्टीन को बचपन में ही मानसिक विकृति थी, वर्जिन कंपनी के मालिक सर रिचर्ड चार्ल्स नोकोलस ब्रेनसन, विश्वविख्यात पूजी निवेशक होवेर्ड हुघेस को असेंट्रिक बिहेवियर, एप्पल कंपनी के सीईओ स्व. स्टीव जॉब्स को बाइपोलर, नेपोलियन बोनापार्ट को एंग्जायटी डिसऑर्डर था, अरस्तू को स्चिज़ोफ्रेनिया, आदि बहुत से लोग लोग दुनियां की दृष्टि में मानसिक रूप से सक्षम बिल्कुल नहीं थे इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि उनके पास बौद्धिकता की कमी थी। रिलायंस कंपनी के संस्थापक स्व. धीरुभाई अम्बानी ने मुंबई जाने से पहले 100 रूपए का नोट नहीं देखा था उन्हें भी अपना स्कूल बीच में ही छोड़ना पड़ा था, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अबुल कलाम चार बार बीएआरसी और एयरफोर्स की परीक्षा में असफल रहे तो इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि उनके पास बुद्धि की कमी थी। दरअसल उनके पास बुद्धि इतनी ज्यादा थी कि सामान्य सामाजिक तंत्र में फिट ही नहीं हो पा रहे थे लेकिन इन्होने अपना तंत्र विकसित किया या अपनी ही कठिनाईयों को अवसरों में बदला तो तो इन लोगों ने इतिहास ही रच डाला। प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे को गंभीर अवसाद हो गया था और जब वो उससे बहार निकले तो बिल्कुल नए अन्ना हजारे थे जिन्होंने वास्तव में इतिहास ही रच डाला। यही समस्या सामान्य तौर पर देखने को मिलती है कि लोग स्वयं का "मानसिक सशक्तिकरण" नहीं कर पाते।
इसलिए ये मान लेना कि जिनके परीक्षा में कम नंबर आते हैं, पढने में कमजोर हैं, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, मानसिक विकृति है या ऐसे लोग कहीं सफल नहीं हो पा रहे हैं उनके पास बुद्धि की कमी है बिल्कुल गलत है। वास्तव में ऐसे लोगों के पास सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा बुद्धि है वो सामान्य लोगों से ज्यादा बुद्धिमान हैं बस समस्या इतनी सी है कि वो अपने पूरी बुद्धिमत्ता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं या उपयोग के निमित्त वो अपने लिए अवसरों का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें कहीं से हताश हो कर स्वयं समाज से विलग करने की कोई जरूरत नहीं है।
"ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" दरअसल यही करती है वो व्यक्ति के व्यक्तित्व को जिसपर मानव मस्तिष्क की127 प्रवृत्तियां काम करती हैं इनपर आधारित "नैदानिक रिसर्च रिपोर्ट" मानव मस्तिष्क को नए सिरे से अधिगमित करती है और शक्ति के साथ विकास की पूरी संभावनाओं को खोल देती है। इसी कारण से इस अतिउन्नत और आधुनिक विधा से वह सब सामान्य प्रक्रिया में आ चुका है जो पहले मात्र एक संयोग हुआ करता था और कुछ ही लोग अपने मानसिक विकृतियोँ को काबू में करते हुए इतिहास रचा। "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" वास्तव में न सिर्फ व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त करती है बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य को भी बिल्कुल फिट कर देती है। इसलिए ये मानना बिल्कुल बेवकूफी है कि जिनको मानसिक समस्या है उनके पास बुद्धि की कमी है। वो लोग वास्तव में सामान्य लोगों से कही ज्यादा बुद्धिमान हैं। इसीलिए हमारे क्षेत्र में कहा जाता है "NO MIND, NO PROBLEM", "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" की सहायत से इतिहास रचने के लिए तैयार हो जाईये ।
नोट- निदान पूर्णतः औषधि रहित है
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डॉ राघवेन्द्र कुमार
ग्राफोलोजिस्ट & ग्राफोथिरेपिस्ट (एडवांस साइकोलॉजी)
नेओसेल्फ: मेन्टल एमपावरमेंट एंड क्यूरिंग सेंटर
अलाहदादपुर, गोरखपुर
फ़ोन - 09838953532
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