Thursday, 13 June 2013

चिता पर बैठ कर राजसूय यज्ञ पता नहीं किस राजा ने किया ? कहीं भी इतिहास में इसका उल्लेख नहीं मिलता लेकिन इस घोर कलियुग में किसी बात की गारंटी नहीं है। क्या पता किस बुजुर्ग को अपने अंतिम समय में प्लास्टर चढ़ा कर पेरिस के एफिल टावर पर चढ़ने का भूत सवार हो जाए उसके पीछे ये तर्क दिया जाए कि महान बनने की इच्छा है। भाई माना कि कलियुग है तो इसका मतलब ये थोड़े ही है धोती को हवा में लहरा के चीयर लीडरई करेंगे, अगर करेंगे तो खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। हमारे ऋषि मनीषी कह गए हैं पाप में कोई भागीदार नहीं होता भले ही कितना ही प्रिय क्यों न हो इसीलिए वाल्मीकि जी जब सप्तऋषियों को पेड़ में बांध दिया तब उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि जाओ अपने घर पर पूछ कर आओ कि क्या लोग तुम्हारे पाप में भागीदार होंगे ? वाल्मीकि जी घर गए और पूछा तो लोगों ने नकरातमक उत्तर दिया कोई भी पाप में भागीदार बनने के लिए तैयार नहीं था वाल्मीकि जी  सप्तऋषियों के पैर परों पर गिर पड़े फिर उन्ही सप्तऋषियों ने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया। राम - राम जपने की उम्र में गिरधारी लाल की उघटापैंची पता नहीं कैसे शोभा दे रही है समझ में नहीं आता। नाना जी से कुछ तो सीखना चाहिए जिन्होंने 70 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति से स्वेच्छा से सन्यास ले लिया था। ये जदयू की नकली नौटंकी है जो किसी खास बुजुर्ग के  इशारे पर हो रही है देखियेगा कुछ नहीं होगा समझौता हो जाएगा फिर बुजुर्ग व्यक्ति को हीरो के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा। भाई 24 में से 21 दल अलग हुए तो राजग कमजोर नहीं हुआ फिर एक और अलग हो रहा है तो इतनी हाय तौबा किस लिए जब कि सबको पता है कि मोदी का करिश्मा जदयू की खटिया तोड़ने के लिये पर्याप्त है। उनकी भी हालत लालू और पासवान की तरह ही हो जाएगी ये तय है। लेकिन अब कौन समझाए कि तेतरी बाजार से तीतर खरीद कर तीतर मारने से शेरखान की उपाधि नहीं मिलती। जंग लगा बन्दूक लेकर घूमने से पता नहीं कैसे चिड़ीमार कहलाएँगे भगवन ही जनता है। जिन्दगी की लड़ाई हमेशा लंगोटी पहन के नहीं लड़ी जाती उसका भी एक समय होता है और जब समय निकल जाता है तो इज्जत हमेशा खतरे में रहती है लेकिन यहाँ तो नकली लड़ाई लड़ी जा रही है है वो भी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में जिसका परिणाम "मूर्खों के खेल क्रिकेट" की तरह हमेशा से फिक्स है। पता नहीं इस फिक्स मैच के नकली लड़ाई में कोई अपने आप को विजेता कैसे घोषित करेगा ? एक बात तो तय है सही समय का सम्मान वास्तव में बहुत बड़ा सम्मान होता है उसकी सभी लोग उस सम्मान के प्रति श्रद्धावान भी रहते हैं लेकिन जब आदमी चिता पर बैठ कर उसी सम्मान की कीमत वसूल करने कोशिश करने लगता है तो उसके पुत्र भी उसके चिता को मुखाग्नि देने से कतराने लगते हैं।      

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