निःसंदेह देवभूमि यानि उत्तराखंड की त्रासदी ऐसी है कि दुःख के मारे कुछ लिखा ही नहीं जा रहा था की पैड पर उंगली चलती ही नहीं थी दिमाग तो मानो जाम सा हो गया था कोई कैसे अपने दुःख को व्यक्त करे लेकिन मेरी उनके प्रति पूरी-पूरी संवेदना है जिन्होंने इस सरकारी त्रासदी को झेला और उनलोगों के प्रति मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि जिन लोगों ने शिव के आगोश में मोक्ष को प्राप्त किया।
समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकारों को सद्बुद्धि और संवेदना के नाम पर कुछ तो मिले। ऐसी त्रासदी पहले न तो मैंने कभी सुनी और न ही कभी देखी ईश्वर करे भविष्य में कभी भी किसी और को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। मैंने इधर 7 दिनों में जो देखा उसे देख कर तो ऐसा ही लगा जिन्हें कभी 1 समय का भी भूख सहन न होता हो उन्होंने कैसे 3-4 दिनों तक भूखे प्यासे रह कर त्रासदी का न सिर्फ सामना किया बल्कि वहां से सकुशल बच कर भी आ गए ये देवभूमि में भगवन शिव की अद्भुत कृपा से ही संभव है। जिन्हें देवभूमि में साक्षात् मोक्ष की प्राप्ति हुई क्या उन लोगों के प्रति भी केंद्र और राज्य सरकार इसी प्रकार से वोट की राजनीति करती रहेंगी ? पता नहीं कैसे कांग्रेस शवों पर बैठ कर वोट गिन लेती है। कोई हमसे बता रहा था कि ये सब रोम-रोम का चमत्कार है कुछ बिका हो या न बिका हो लेकिन रोम-रोम बिक चुका है अभी कल ही समाचार मिला कि उत्तराखंड सरकार ने सहायता सामग्री के बदले पैसों की मांग कर रही है। पता नहीं उन्हें ये क्यों समझ में नहीं आ रहा ये सहायता उन अधिकों (अधिकारी) के लिए नहीं है जिन्हें पैसे चाहिए बल्कि ये सब उन लोगों के लिए है जिनके माकन-दुकान या रोजगार के साधन उस सरकार द्वरा निर्मित कृत्रिम भयानक त्रासदी में बर्बाद हो गए। मुझे नहीं लगता कि मुझे इस सरकारी कृत्रिम त्रासदी के कारणों की पीछे जाने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि बहुत से विशेषज्ञों ने ये राय पहले ही दे दी है कि पवित्र नदियों को आर्थिक लाभ के बजाय जीवन लाभ के लिए उन्हें सदा के लिए उनके प्राकृतिक अवस्था में ही प्रवाहित होने देना चाहिए साथ ही वनों के प्रकृति को भी नहीं बदलना चाहिए। एक्सपर्ट मुझे बता रहे थे कि किसी अंग्रेज अफसर ने सबसे पहले चमोली जिले में बाँझ (ओक) के पेड़ों को नष्ट कर पाइन (चीड़) के जंगलों में बदलने की शुरुआत की थी और वो प्रयास आज भी जारी है जिससे वृक्षों की पर्वतीय भूमि में पकड़ कमजोर हो गयी और बड़े पैमाने पर भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ गईं। पता नहीं कब हमें राक्षसी प्रवृत्ति यानी म्लेछ्पना (अंग्रेजियत) के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी पता नहीं बाबा विश्वनाथ अपना आशीर्वाद कब बरसाएगे और हम हिन्दुस्थानियों को म्लेच्छ्पना से मुक्त करेंगे।
इस सरकारी विपदा की घड़ी में भी कुछ दिग्गी छाप लोगों को नरेंद्र भाई मोदी के नाम पर खुद को गाली देने से भी बाज नहीं आ रहे है। पता नहीं दिग्गी छाप लोगों को ही दिव्य ज्ञान कहाँ से मिल जाता है और वो लोगों के मन की बात भी जान लेते हैं भले वो व्यक्ति कुछ न बोले। या तो दिग्गी छाप लोग उस परम सत्ता से भी ज्यादा पंरम हो चुके हैं या फिर कुछ गंभीर परेशानी है इन लोगों को क्या ये दिग्गी छाप लोग बताएँगे कि प्रत्यक्ष रूप से कब नरेंद्र भाई मोदी ने मात्र गुजरातियों को ही बचाने की बात की ? दुष्टता की भी हद होती है सबको ये लोग अपना युवराज ही समझ लेते हैं। पता चला है कि युवराज पूरे गाजे-बाजे के साथ ट्रक लेकर देवभूमि रावाना हुए हैं लोग बता रहे थे कि कल ही वो लन्दन से आए हैं जन्मदिन मना के लेकिन पता नहीं क्यों ट्रक के साथ चीयर लीडरों को ट्रक से उतार कर जबरदस्ती एन. डी. छाप लोगों के यहाँ भेज दिया गया वो ट्रक के साथ नहीं जा रही हैं।
देवभूमि ने न केवल अपना दिव्य स्वरुप दिखाया है बल्कि स्वयं को उस स्थिति में भी स्थापित करने का प्रयास किया है जैसा उसे होना चाहिए। ठीक ऐसा हम सांसारिक लोगों को भले ही अच्छा न लगे किन्तु ये नहीं भूलना चाहिए शिव को संहारक और मुक्तिदाता के रूप में भी देखा जाता है उनके लिए मृत्यु भी एक पर्व की भांति ही है। उसी दिव्यता से सम्मान शिव और उनके अनंत रूपों की अराधना की जानी चाहिए चाहे वो सृष्टि, संचालन, पालन के रूप में हो या संहारक के रूप में। हर हर महादेव ......
समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकारों को सद्बुद्धि और संवेदना के नाम पर कुछ तो मिले। ऐसी त्रासदी पहले न तो मैंने कभी सुनी और न ही कभी देखी ईश्वर करे भविष्य में कभी भी किसी और को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। मैंने इधर 7 दिनों में जो देखा उसे देख कर तो ऐसा ही लगा जिन्हें कभी 1 समय का भी भूख सहन न होता हो उन्होंने कैसे 3-4 दिनों तक भूखे प्यासे रह कर त्रासदी का न सिर्फ सामना किया बल्कि वहां से सकुशल बच कर भी आ गए ये देवभूमि में भगवन शिव की अद्भुत कृपा से ही संभव है। जिन्हें देवभूमि में साक्षात् मोक्ष की प्राप्ति हुई क्या उन लोगों के प्रति भी केंद्र और राज्य सरकार इसी प्रकार से वोट की राजनीति करती रहेंगी ? पता नहीं कैसे कांग्रेस शवों पर बैठ कर वोट गिन लेती है। कोई हमसे बता रहा था कि ये सब रोम-रोम का चमत्कार है कुछ बिका हो या न बिका हो लेकिन रोम-रोम बिक चुका है अभी कल ही समाचार मिला कि उत्तराखंड सरकार ने सहायता सामग्री के बदले पैसों की मांग कर रही है। पता नहीं उन्हें ये क्यों समझ में नहीं आ रहा ये सहायता उन अधिकों (अधिकारी) के लिए नहीं है जिन्हें पैसे चाहिए बल्कि ये सब उन लोगों के लिए है जिनके माकन-दुकान या रोजगार के साधन उस सरकार द्वरा निर्मित कृत्रिम भयानक त्रासदी में बर्बाद हो गए। मुझे नहीं लगता कि मुझे इस सरकारी कृत्रिम त्रासदी के कारणों की पीछे जाने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि बहुत से विशेषज्ञों ने ये राय पहले ही दे दी है कि पवित्र नदियों को आर्थिक लाभ के बजाय जीवन लाभ के लिए उन्हें सदा के लिए उनके प्राकृतिक अवस्था में ही प्रवाहित होने देना चाहिए साथ ही वनों के प्रकृति को भी नहीं बदलना चाहिए। एक्सपर्ट मुझे बता रहे थे कि किसी अंग्रेज अफसर ने सबसे पहले चमोली जिले में बाँझ (ओक) के पेड़ों को नष्ट कर पाइन (चीड़) के जंगलों में बदलने की शुरुआत की थी और वो प्रयास आज भी जारी है जिससे वृक्षों की पर्वतीय भूमि में पकड़ कमजोर हो गयी और बड़े पैमाने पर भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ गईं। पता नहीं कब हमें राक्षसी प्रवृत्ति यानी म्लेछ्पना (अंग्रेजियत) के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी पता नहीं बाबा विश्वनाथ अपना आशीर्वाद कब बरसाएगे और हम हिन्दुस्थानियों को म्लेच्छ्पना से मुक्त करेंगे।
इस सरकारी विपदा की घड़ी में भी कुछ दिग्गी छाप लोगों को नरेंद्र भाई मोदी के नाम पर खुद को गाली देने से भी बाज नहीं आ रहे है। पता नहीं दिग्गी छाप लोगों को ही दिव्य ज्ञान कहाँ से मिल जाता है और वो लोगों के मन की बात भी जान लेते हैं भले वो व्यक्ति कुछ न बोले। या तो दिग्गी छाप लोग उस परम सत्ता से भी ज्यादा पंरम हो चुके हैं या फिर कुछ गंभीर परेशानी है इन लोगों को क्या ये दिग्गी छाप लोग बताएँगे कि प्रत्यक्ष रूप से कब नरेंद्र भाई मोदी ने मात्र गुजरातियों को ही बचाने की बात की ? दुष्टता की भी हद होती है सबको ये लोग अपना युवराज ही समझ लेते हैं। पता चला है कि युवराज पूरे गाजे-बाजे के साथ ट्रक लेकर देवभूमि रावाना हुए हैं लोग बता रहे थे कि कल ही वो लन्दन से आए हैं जन्मदिन मना के लेकिन पता नहीं क्यों ट्रक के साथ चीयर लीडरों को ट्रक से उतार कर जबरदस्ती एन. डी. छाप लोगों के यहाँ भेज दिया गया वो ट्रक के साथ नहीं जा रही हैं।
देवभूमि ने न केवल अपना दिव्य स्वरुप दिखाया है बल्कि स्वयं को उस स्थिति में भी स्थापित करने का प्रयास किया है जैसा उसे होना चाहिए। ठीक ऐसा हम सांसारिक लोगों को भले ही अच्छा न लगे किन्तु ये नहीं भूलना चाहिए शिव को संहारक और मुक्तिदाता के रूप में भी देखा जाता है उनके लिए मृत्यु भी एक पर्व की भांति ही है। उसी दिव्यता से सम्मान शिव और उनके अनंत रूपों की अराधना की जानी चाहिए चाहे वो सृष्टि, संचालन, पालन के रूप में हो या संहारक के रूप में। हर हर महादेव ......
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