मदमस्त चलती हुई हाथी के सामने कोई लगे गुर्रा कर लगे अपनी अपनी वीरता दिखाने तो क्या कहियेगा ?, खैर वीरता दिखाने का अधिकार सभी को है लेकिन सीताराम केसरी जैसे बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि वीरता औकात देख कर बखाननी चाहिए। बहुत बड़े भुक्तभोगी रहे है केसरी चचा वो भी कहते थे कि मुझे कांग्रेस में किसी का डर नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे आज राहुल बाबा कहते फिर रहे हैं कि उनको भी नरेन्द्र मोदी से डर नहीं है लेकिन आज अगर केसरी चचा होते तो रोअले आंसू नहीं गिरता उनका क्या हश्र हुआ था उनका, बेचारे को उनकी धोती फाड़ के रुमाल बना कर उनको 10 जनपथ की और बड़े अदब के साथ गिफ्ट किया गया था। मैंने इसकी तहकीकात की तो पता चला कि वो सारे रुमाल जो उनको उपहार में दिए गए थे वो दरअसल उनके न डरने का ही इनाम था। वो तो भला हो कांग्रेस के अंदरूनी मामला का कि मामला धोती के नीचे तक नहीं पहुंचा नहीं तो रूमाल से भी कोई छोटी चीज होती तो वो भी उपहार में उनको 10 जनपथ की ओर से दे दिया गया होता। आजकल कांग्रेस में ज्ञानियों की बाढ़ सी आ गयी है अभी (अ) सत्यव्रत चतुर्वेदी जय रामरमेश जी को प्रवचन फरमा रहे थे रामचरित मानस पढ़ कर आते ही किष्किन्धाकांड की भांति हमला बोल दिया "...भय बिनु होहिं न प्रीति ..." वैसे भी व्यक्ति अपने अंतिम समय में राम-राम ही जपने लगता तो उसे कुछ दिव्य ज्ञान भी मिलता है ऐसा सीताराम केसरी चचा जैसे बुजुर्ग बताते थे सो चुतुर्वेदी जी को ज्ञान मिला ही होगा तो उन्होंने सीधे - सीधे प्रवचन को एकवचन में सुना दिया " ...अगर उनको नरेन्द्र भाई मोदी से इतना ही डर लगता है तो चले जाएँ भाजपा में ..." ये उनका दिव्य ज्ञान था, उनको अपनी दिव्य दृष्टि से पता चल गया था कि ज्यादा भय का अर्थ प्रेम ही होता है जाहिर है रमेश जी निश्चित रूप से मोदी-प्रेम में पागल है ऐसा उनको लगा होगा जो निश्चित रूप से अंतिम समय में मिलता है। लेकिन चतुर्वेदी जी भस्मासुर के वक्तव्य पर कोई टिप्पणी नहीं की जिससे ये साबित होता है कि उनको अभी भी उनका ज्ञान अधूरा है संभवतः इसलिए कि चचा केसरी तो केसरी चचा नेहरू को भी आत्मसात किये रहना उनको मुफीद लगता है लिहाजा घोटालों के बाद कुर्सी की माया का मोह बढ़ना अस्वभाविक बिल्कुल नहीं लगता। जाहिर है राहुल बाबा भी इसी एस्स.चतुर्वेदी छाप ज्ञान का फायदा उठाते दिख रहे हैं और कह रहे हैं कि उनको नरेन्द्र भाई मोदी से डर नहीं लगता। वैसे सीताराम केसरी चचा को दिव्य ज्ञान कौन दिया था पता नहीं लेकिन मुझे विश्वास है वो भी कोई एस्स. चतुर्वेदी ही रहा होगा जिसकी ज्ञान की बदौलत उनको काफी उपहार मिले थे। खैर मदमस्त हाथी के सामने गुर्राना अपने आप में एक ज्ञान भरा एडवेंचरस खेल है जो मंदबुद्धि के बच्चो में काफी लोकप्रिय है लिहाजा इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमारे पूर्वांचल में एक बड़ी मशहूर लोकोक्ति है कहा जाता है "...काठ के वीरों को डर नहीं लगता ..." केसरी चचा कितने बड़े काठ के वीर थे ये वो ही जाने लेकिन इतना तो सभी को पता है कि जब उनकी धोती फाड़ के रुमाल के रूप में गिफ्ट किया गया था तो उसी के बाद से वो बड़े दुखी रहने लगे थे। लोग-बाग़ बताते हैं कि केसरी चचा को अपने जिन्दगी के अंतिम दिनों में बहुत पछतावा हुआ था इसलिए नहीं कि वो कांग्रेस में थे बल्कि इसलिए कि अपने ही कांग्रेस की ओर से उनके निडर होने का बहुत शानदार पुरस्कार दिया गया था। जयराम रमेश और राहुल बाबा के बीच यदि मतभेद है तो सिर्फ असत्य ज्ञान के कारण है।
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