Friday, 28 June 2013

"ग्राफोलोजी & ग्राफोथिरेपी" द्वारा "नेतृत्व क्षमता" का विकास

"ग्राफोलोजी & ग्राफोथिरेपी" इतना उन्नत और विकसित विज्ञान है इससे किसी भी प्रकार के प्रतिभा का विकास बिलकुल नए सिरे से किया जा सकता है। चूंकि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व अद्वितीय (unique) होता है अतः अत्यंत सूक्ष्म स्तर (micro level) पर किसी के व्यक्तित्व को डायग्नोज़ कर लेते हैं तो सरलता से मात्र 28 दिनों में ही "नेतृत्व क्षमता" का विकास किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व अद्वितीय होने के कारण विकास की विधि व्यक्ति व्यक्ति के अनुसार बदलती रहती है। एक ही विधि को हम दुसरे व्यक्ति पर लागू नहीं कर सकते। चूंकि व्यक्तित्व को सूक्ष्म स्तर पर डायग्नोसिस की क्षमता केवल "ग्राफोलोजी" में ही है लिहाजा इससे, "नैदानिक व्यक्तित्व शोध रिपोर्ट"और "ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से इस क्षमता का स्वभाविक विकास किया जाना सरलता से संभव है। वैसे सामान्य तौर पर किसी भी अच्छे, योग्य और इमानदार "नेता" में 13 प्रवृत्तियों का होना बहुत आवश्यक है जैसे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व दृष्टिकोण, अध्ययनशीलता, आत्मविश्वास, प्रचंड तार्किक शक्ति, प्रबल समाजिकता, उन्नतिशील दृष्टिकोण, काल्पनिकता, योजना शक्ति, प्रचंड दायित्वबोध, आशावादिता, प्रचंड धैर्य, संचारी प्रवृत्ति और श्रवणशीलता और गर्व। यदि किसी के "नेता" के अन्दर ये 13 प्रवृत्तियां प्रबल अवस्था में है तो उसे पराजित कर पाना लगभग असंभव है। इसके साथ-साथ ये भी एक तथ्य है कि इन सभी 13 प्रवृत्तियों का विकास एक साथ होना बहुत आवश्यक है नहीं तो एक प्रवृत्ति दुसरे को कमजोर करती रहेगी और पूरी "नेतृत्व क्षमता" का विकास कभी नहीं हो सकेगा। अतः व्यतित्व के स्पष्ट स्वरुप के आधार पर ही ऐसा किया जाना संभव है।
वैसे यदि कोई पहले से ही नेतृत्व के क्षेत्र में है और वो समस्याग्रस्त है तो उसे "ग्राफोलोजी & ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से ठीक कर उस व्यक्ति मानसिकता को प्रबल "नेतृत्व क्षमता" हेतु सरलता से सशक्त किया जा सकता है जो पारंपरिक मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा से बिलकुल ही संभव नहीं। ये तय है कि उपरोक्त 13 प्रवृत्तियां यदि अपने सही और प्रबल स्वरुप में व्यक्ति के व्यक्तित्व के अनुरूप हैं तो निश्चित रूप से उसे पराजित कर पाना सामान्य "नेता" करीब-करीब नामुमकिन होगा। 

Sunday, 23 June 2013

निःसंदेह देवभूमि यानि उत्तराखंड की त्रासदी ऐसी है कि दुःख के मारे कुछ लिखा ही नहीं जा रहा था की पैड पर उंगली चलती ही नहीं थी दिमाग तो मानो जाम सा हो गया था कोई कैसे अपने दुःख को व्यक्त करे लेकिन मेरी उनके प्रति पूरी-पूरी संवेदना है जिन्होंने इस सरकारी त्रासदी को झेला और उनलोगों के प्रति मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि जिन लोगों ने शिव के आगोश में मोक्ष को प्राप्त किया।

समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकारों को सद्बुद्धि और संवेदना के नाम पर कुछ तो मिले। ऐसी त्रासदी पहले न तो मैंने कभी सुनी और न ही कभी देखी ईश्वर करे भविष्य में कभी भी किसी और को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। मैंने इधर 7 दिनों में जो देखा उसे देख कर तो ऐसा ही लगा जिन्हें कभी 1 समय का भी भूख सहन न होता हो उन्होंने  कैसे 3-4 दिनों तक भूखे प्यासे रह कर त्रासदी का न सिर्फ सामना किया बल्कि वहां से सकुशल बच कर भी आ गए ये देवभूमि में भगवन शिव की अद्भुत कृपा से ही संभव है। जिन्हें देवभूमि में साक्षात् मोक्ष की प्राप्ति हुई क्या उन लोगों के प्रति भी केंद्र और राज्य सरकार इसी प्रकार से वोट की राजनीति करती रहेंगी ? पता नहीं कैसे कांग्रेस शवों पर बैठ कर वोट गिन लेती है। कोई हमसे बता रहा था कि ये सब रोम-रोम का चमत्कार है कुछ बिका हो या न बिका हो लेकिन रोम-रोम बिक चुका है अभी कल ही समाचार मिला कि उत्तराखंड सरकार ने सहायता सामग्री के बदले पैसों की मांग कर रही है। पता नहीं उन्हें ये क्यों समझ में नहीं आ रहा ये सहायता उन अधिकों (अधिकारी) के लिए नहीं है जिन्हें पैसे चाहिए बल्कि ये सब उन लोगों के लिए है जिनके माकन-दुकान या रोजगार के साधन उस सरकार द्वरा निर्मित कृत्रिम भयानक त्रासदी में बर्बाद हो गए। मुझे नहीं लगता कि मुझे इस सरकारी कृत्रिम त्रासदी के कारणों की पीछे जाने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि बहुत से विशेषज्ञों ने ये राय पहले ही दे दी है कि पवित्र नदियों को आर्थिक लाभ के बजाय जीवन लाभ के लिए उन्हें सदा के लिए उनके प्राकृतिक अवस्था में ही प्रवाहित होने देना चाहिए साथ ही वनों के प्रकृति को भी नहीं बदलना चाहिए। एक्सपर्ट मुझे बता रहे थे कि किसी अंग्रेज अफसर ने सबसे पहले चमोली जिले में बाँझ (ओक) के पेड़ों को नष्ट कर पाइन (चीड़) के जंगलों में बदलने की शुरुआत की थी और वो प्रयास आज भी जारी है जिससे वृक्षों की पर्वतीय भूमि में पकड़ कमजोर हो गयी और बड़े पैमाने पर भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ गईं। पता नहीं कब हमें राक्षसी प्रवृत्ति यानी म्लेछ्पना (अंग्रेजियत) के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी पता नहीं बाबा विश्वनाथ अपना आशीर्वाद कब बरसाएगे और हम हिन्दुस्थानियों को म्लेच्छ्पना से मुक्त करेंगे।

इस सरकारी विपदा की घड़ी में भी कुछ दिग्गी छाप लोगों को नरेंद्र भाई मोदी के नाम पर खुद को गाली देने से भी बाज नहीं आ रहे है। पता नहीं दिग्गी छाप लोगों को ही दिव्य ज्ञान कहाँ से मिल जाता है और वो लोगों के मन की बात भी जान लेते हैं भले वो व्यक्ति कुछ न बोले। या तो दिग्गी छाप लोग उस परम सत्ता से भी ज्यादा पंरम हो चुके हैं या फिर कुछ गंभीर परेशानी है इन लोगों को क्या ये दिग्गी छाप लोग बताएँगे कि प्रत्यक्ष रूप से कब नरेंद्र भाई मोदी ने मात्र गुजरातियों को ही बचाने की बात की ? दुष्टता की भी हद होती है सबको ये लोग अपना युवराज ही समझ लेते हैं। पता चला है कि युवराज पूरे गाजे-बाजे के साथ ट्रक लेकर देवभूमि रावाना हुए हैं लोग बता रहे थे कि कल ही वो लन्दन से आए हैं जन्मदिन मना के लेकिन पता नहीं क्यों ट्रक के साथ चीयर लीडरों को ट्रक से उतार कर जबरदस्ती एन. डी. छाप लोगों के यहाँ भेज दिया गया वो ट्रक के साथ नहीं जा रही हैं।

देवभूमि ने न केवल अपना दिव्य स्वरुप दिखाया है बल्कि स्वयं को उस स्थिति में भी स्थापित करने का प्रयास किया है जैसा उसे होना चाहिए। ठीक ऐसा हम सांसारिक लोगों को भले ही अच्छा न लगे किन्तु ये नहीं भूलना चाहिए शिव को संहारक और मुक्तिदाता के रूप में भी देखा जाता है उनके लिए मृत्यु भी एक पर्व की भांति ही है। उसी दिव्यता से सम्मान शिव और उनके अनंत रूपों की अराधना की जानी चाहिए चाहे वो सृष्टि, संचालन, पालन के रूप में हो या संहारक के रूप में। हर हर महादेव ......             

Sunday, 16 June 2013

मदमस्त चलती हुई हाथी के सामने कोई लगे गुर्रा कर लगे अपनी अपनी वीरता दिखाने तो क्या कहियेगा ?, खैर वीरता दिखाने का अधिकार सभी को है लेकिन सीताराम केसरी जैसे बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि वीरता औकात देख कर बखाननी चाहिए। बहुत बड़े भुक्तभोगी रहे है केसरी चचा वो भी कहते थे कि मुझे कांग्रेस में किसी का डर नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे आज राहुल बाबा कहते फिर रहे हैं कि उनको भी नरेन्द्र मोदी से डर नहीं है लेकिन आज अगर केसरी चचा होते तो रोअले आंसू नहीं गिरता उनका क्या हश्र हुआ था उनका, बेचारे को उनकी धोती फाड़ के रुमाल बना कर उनको 10 जनपथ की और बड़े अदब के साथ गिफ्ट किया गया था। मैंने इसकी तहकीकात की तो पता चला कि वो सारे रुमाल जो उनको उपहार में दिए गए थे वो दरअसल उनके न डरने का ही इनाम था। वो तो भला हो कांग्रेस के अंदरूनी मामला का कि मामला धोती के नीचे तक नहीं पहुंचा नहीं तो रूमाल से भी कोई छोटी चीज होती तो वो भी उपहार में उनको 10 जनपथ की ओर से दे दिया गया होता। आजकल कांग्रेस में ज्ञानियों की बाढ़ सी आ गयी है अभी (अ) सत्यव्रत चतुर्वेदी जय रामरमेश जी को  प्रवचन फरमा रहे थे रामचरित मानस पढ़ कर आते ही किष्किन्धाकांड की भांति हमला बोल दिया "...भय बिनु होहिं न प्रीति ..." वैसे भी व्यक्ति अपने अंतिम समय में राम-राम ही जपने लगता तो उसे कुछ दिव्य ज्ञान भी मिलता है ऐसा सीताराम केसरी चचा जैसे बुजुर्ग बताते थे सो चुतुर्वेदी जी को ज्ञान मिला ही होगा तो उन्होंने सीधे - सीधे प्रवचन को एकवचन में सुना दिया " ...अगर उनको नरेन्द्र भाई मोदी से इतना ही डर लगता है तो चले जाएँ भाजपा में ..." ये उनका दिव्य ज्ञान था, उनको अपनी दिव्य दृष्टि से पता चल गया था कि ज्यादा भय का अर्थ प्रेम ही होता है जाहिर है रमेश जी निश्चित रूप से मोदी-प्रेम में पागल है ऐसा उनको लगा होगा जो निश्चित रूप से अंतिम समय में मिलता है। लेकिन चतुर्वेदी जी भस्मासुर के वक्तव्य पर कोई टिप्पणी नहीं की जिससे ये साबित होता है कि उनको अभी भी उनका ज्ञान अधूरा है संभवतः इसलिए कि चचा केसरी तो केसरी चचा नेहरू को भी आत्मसात किये रहना उनको मुफीद लगता है लिहाजा घोटालों के बाद कुर्सी की माया का मोह बढ़ना अस्वभाविक बिल्कुल नहीं लगता। जाहिर है राहुल बाबा भी इसी एस्स.चतुर्वेदी छाप ज्ञान का फायदा उठाते दिख रहे हैं और कह रहे हैं कि उनको नरेन्द्र भाई मोदी से डर नहीं लगता। वैसे सीताराम केसरी चचा को दिव्य ज्ञान कौन दिया था पता नहीं लेकिन मुझे विश्वास है वो भी कोई एस्स. चतुर्वेदी ही रहा होगा जिसकी ज्ञान की बदौलत उनको काफी उपहार मिले थे। खैर मदमस्त हाथी के सामने गुर्राना अपने आप में एक ज्ञान भरा एडवेंचरस खेल है जो मंदबुद्धि के बच्चो में काफी लोकप्रिय है लिहाजा इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमारे पूर्वांचल में एक बड़ी मशहूर लोकोक्ति है कहा जाता है "...काठ के वीरों को डर नहीं लगता ..." केसरी चचा कितने बड़े काठ के वीर थे ये वो ही जाने लेकिन इतना तो सभी को पता है कि जब उनकी धोती फाड़ के रुमाल के रूप में गिफ्ट किया गया था तो उसी के बाद से वो बड़े दुखी रहने लगे थे। लोग-बाग़ बताते हैं कि केसरी चचा को अपने जिन्दगी के अंतिम दिनों में बहुत पछतावा हुआ था इसलिए नहीं कि वो कांग्रेस में थे बल्कि इसलिए कि अपने ही कांग्रेस की ओर से उनके निडर होने का बहुत शानदार पुरस्कार दिया गया था। जयराम रमेश और राहुल बाबा के बीच यदि मतभेद है तो सिर्फ असत्य ज्ञान के कारण है। 

Friday, 14 June 2013

भाई वाह ! ऐसे ही बवंडर का तो इंतज़ार था नरेन्द्र भाई मोदी का करिश्मा 

Thursday, 13 June 2013

चिता पर बैठ कर राजसूय यज्ञ पता नहीं किस राजा ने किया ? कहीं भी इतिहास में इसका उल्लेख नहीं मिलता लेकिन इस घोर कलियुग में किसी बात की गारंटी नहीं है। क्या पता किस बुजुर्ग को अपने अंतिम समय में प्लास्टर चढ़ा कर पेरिस के एफिल टावर पर चढ़ने का भूत सवार हो जाए उसके पीछे ये तर्क दिया जाए कि महान बनने की इच्छा है। भाई माना कि कलियुग है तो इसका मतलब ये थोड़े ही है धोती को हवा में लहरा के चीयर लीडरई करेंगे, अगर करेंगे तो खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। हमारे ऋषि मनीषी कह गए हैं पाप में कोई भागीदार नहीं होता भले ही कितना ही प्रिय क्यों न हो इसीलिए वाल्मीकि जी जब सप्तऋषियों को पेड़ में बांध दिया तब उन्होंने वाल्मीकि जी से कहा कि जाओ अपने घर पर पूछ कर आओ कि क्या लोग तुम्हारे पाप में भागीदार होंगे ? वाल्मीकि जी घर गए और पूछा तो लोगों ने नकरातमक उत्तर दिया कोई भी पाप में भागीदार बनने के लिए तैयार नहीं था वाल्मीकि जी  सप्तऋषियों के पैर परों पर गिर पड़े फिर उन्ही सप्तऋषियों ने उन्हें मुक्ति का मार्ग बताया। राम - राम जपने की उम्र में गिरधारी लाल की उघटापैंची पता नहीं कैसे शोभा दे रही है समझ में नहीं आता। नाना जी से कुछ तो सीखना चाहिए जिन्होंने 70 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति से स्वेच्छा से सन्यास ले लिया था। ये जदयू की नकली नौटंकी है जो किसी खास बुजुर्ग के  इशारे पर हो रही है देखियेगा कुछ नहीं होगा समझौता हो जाएगा फिर बुजुर्ग व्यक्ति को हीरो के रूप में प्रोजेक्ट किया जाएगा। भाई 24 में से 21 दल अलग हुए तो राजग कमजोर नहीं हुआ फिर एक और अलग हो रहा है तो इतनी हाय तौबा किस लिए जब कि सबको पता है कि मोदी का करिश्मा जदयू की खटिया तोड़ने के लिये पर्याप्त है। उनकी भी हालत लालू और पासवान की तरह ही हो जाएगी ये तय है। लेकिन अब कौन समझाए कि तेतरी बाजार से तीतर खरीद कर तीतर मारने से शेरखान की उपाधि नहीं मिलती। जंग लगा बन्दूक लेकर घूमने से पता नहीं कैसे चिड़ीमार कहलाएँगे भगवन ही जनता है। जिन्दगी की लड़ाई हमेशा लंगोटी पहन के नहीं लड़ी जाती उसका भी एक समय होता है और जब समय निकल जाता है तो इज्जत हमेशा खतरे में रहती है लेकिन यहाँ तो नकली लड़ाई लड़ी जा रही है है वो भी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव में जिसका परिणाम "मूर्खों के खेल क्रिकेट" की तरह हमेशा से फिक्स है। पता नहीं इस फिक्स मैच के नकली लड़ाई में कोई अपने आप को विजेता कैसे घोषित करेगा ? एक बात तो तय है सही समय का सम्मान वास्तव में बहुत बड़ा सम्मान होता है उसकी सभी लोग उस सम्मान के प्रति श्रद्धावान भी रहते हैं लेकिन जब आदमी चिता पर बैठ कर उसी सम्मान की कीमत वसूल करने कोशिश करने लगता है तो उसके पुत्र भी उसके चिता को मुखाग्नि देने से कतराने लगते हैं।      

Monday, 10 June 2013

प्रिय मित्र टीनू जैन जी !
भाजपा में जो कुछ भी हो रहा है उससे मन बहुत दुखी है जिस प्रकार से माननीय आडवानी जी ने स्टैंड लिया है वो निश्चित रूप से स्वाभाविक नहीं है जैसा कि सभी लोगों को पता है कि पिछले कई वर्षों से सोनिया गांधी द्वारा उनकी बहू गौरी अडवानी से उनके दुराचार की CD के आधार पर वो ब्लैक मेल किये जा रहे है। मैंने और भी तथ्य इकठ्ठा करने की कोशिश की तो पता चला कि आरएसएस में श्री संजय जोशी जो प्रचण्ड संघटनकर्ता माने जाते है और कांग्रेस को समाप्त करने में उनकी भी महती भूमिका रही है, को काबू में करने के लिए कांग्रेस ने अपने किसी कॉल गर्ल को भेज के उनकी CD बनवाई जिसके आधार पर उनको ब्लैक मेल कर के उल्टे-सीधे काम करवाने की कोशिश कांग्रेस ने की नतीजा उनको भाजपा से बाहर होना पड़ा। ऐसा भी पता चला कि अरुण जेटली के खिलाफ भी कोई CD कांग्रेस ने बनवाई है जब वो किसी समय कोलकाता में थे और लडकी उपलब्ध करवाने वाले अहमद पटेल थे जिसके आधार पर उनको भी ब्लैक मेल किया जा रहा है। हालां कि मैंने आपको एक महीना पहले कर्णाटक प्रस्ताव भेजा था लेकिन इधर आप बहुत ज्यादा व्यस्त दिख रहे थे इसलिए मैंने आपको डिस्टर्ब नहीं किया लेकिन मुझे लगता है कि कर्णाटक को तो बाद में देखा जाएगा पहले जो वर्तमान में केन्द्रीय संकट उभरा है उसे भी अवसर में बदलने की बहुत जरूरत है लिहाजा "नरेन्द्र मोदी आर्मी" को विशुद्ध रूप में प्रबल संकट मोचक के रूप में भी आना बहुत आवश्यक है। अगर आप सहमत हैं तो  मै आपको इस सन्दर्भ में प्रस्ताव भेजने के लिए तैयार हूँ जिससे न सिर्फ माननीय आडवानी जी और लोगों सहित भाजपा - आरएसएस का सम्मान बचाया जा सकेगा बल्कि कांग्रेस को भी छठी का दूध याद दिला दिया जाएगा। मुझे आपके उत्तर के प्रतीक्षा है।

डॉ राघवेन्द्र कुमार
कंसलटेंट साइकोग्राफोलोजिस्ट & ग्राफोथिरेपिस्ट (एडवांस psychology)
गोरखपुर
फ़ोन - 09838953532

दुखद तो है और दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है पता नहीं अडवानी जी किसके दबाव में ऐसा कर रहे हैं समझ में नहीं आता। जब आदरणीय नरेन्द्र भाई मोदी के नेतृत्व में गुजरात में पहला चुनाव लड़ा था और भाजपा को बहुमत मिला था तो उन्होंने ही कहा था कि गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला है और उस प्रयोग में अडवानी जी मोदी जी के नेतृत्व सफल भी हुए, हर समय पूरा आशीर्वाद रहा उनका मोदी जी के ऊपर, यहाँ तक कि 2002 में दंगों के बाद उन्होंने ही वाजपेयी जी को बहुमत का हवाला देते हुए मोदी जी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से न हटाने की जबरदस्त वकालत की थी। आज भी बहुमत मोदी जी के पक्ष में है फिर एक व्यक्ति जिसका नाम हवाला मामले में आने पर ही ये भीष्म प्रतिज्ञा कर ले कि जब तक वो आरोपों से मुक्त नहीं हो जाएँगे चुनाव नहीं लड़ेंगे ऐसे दृढ़ व्यक्तित्व के स्वामी के अंततः क्या हो गया ...समझ में नहीं आता। वैसे वाजपेयी जी युग पुरुष हैं उनका वास्तव में कोई जवाब नहीं लेकिन मुझे सर्वदा लगता रहा कि अडवानी जी तार्किक आधार पर वाजपेयी जी से कहीं बेहतर हैं, आडवानी जी यदि स्वार्थी होते जैसा कि आज कल दिख रहा है तो निश्चित रूप से वो वाजपेयी जी किनारे करके प्रधानमंत्री कबके बन गए होते उस समय को याद कीजिये उनके पास वाजपेयी जी से कहीं ज्यादा बहुमत था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया फिर आज उनको क्या हो गया है समझ में आता, मेरा मानना है कि निश्चित रूप से उनका ये आचरण उनके अपने स्वाभाव के विपरीत है। आश्चर्यजनक रूप से कहीं भी उनके प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिख रही। वो किसी के दबाव में ऐसा कर रहे हैं पता नहीं।    

Sunday, 9 June 2013

नरेन्द्र भाई मोदी भाजपा के चुनाव समिति के अध्यक्ष चुन लिए गए सारे देश में हार्दिक प्रसन्नता की लहर है लेकिन बन्दर की पूंछ पकड़ कर लटक कर दुनियां देखने वालों को दूसरों पर इसलिए बहुत हंसी आती है क्योंकि वो समझते हैं और लोग भी यदि उनके जैसा नहीं कर रहे हैं तो मूर्ख हैं वैसे तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है "जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी" जाहिर है भाजपा विरोधी भाजपा को भी अपनी ही नजर से देखेंगे और दूसरों को मूर्ख कहेंगे कह भी रहे हैं। बड़ी चिंता हो रही है कांग्रेस को दूसरे बुजुर्गों की तो मैंने सीताराम केसरी का हवाला देते हुए एक खांटी कांग्रेसी से पूछा तो कहने लगे "...कांग्रेस में बुजुर्गवाद नहीं चलता है ..." मैंने पूछा "...तो क्या चलता है ...?" वो बोले "...हमारे यहाँ वही होता है लोकतान्त्रिक तरीके पर हाई कमांड का आदेश होता है ..." खैर मेरे पास बुजुर्गवाद पर और कुछ पूछने के लिए नहीं था सो मुझे उनसे विदा लेना ही बेहतर लगा। अचानक आज दुसरे दिन एक खांटी कांग्रेसी किसी मीडियाबम के साथ मुझसे मिलने आ धमके। मैंने हाल - चाल पूछा तो कोई ख़ास उत्तर नहीं दिया। खैर उन्होंने चाय पीते ही मुझसे ही इंटरव्यू करना शुरू कर दिया उन्होंने मुझसे पूछा "...आप कट्टर मोदी समर्थक हैं बताईये मोदी का ये तरीका कहाँ तक ठीक है ...?" मैंने उत्तर देते हुए सवाल दागा "...तो उनको कांग्रेस से प्रेरणा लेनी चाहिए ...?" वो बोले "...बुजुर्ग बुजुर्ग होता है ..." मैंने बीच में ही बात कटते हुए कहा "...मैंने या मोदी जी ने कब कहा कि बुजुर्ग बुजुर्ग  नहीं होता वैसे उनका समर्थन और आशीर्वाद तो मिला ही है ..." खांटी कांग्रेसी ने पूछा "...भाजपा में बुजुर्गों का सम्मान क्यों नहीं होता ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा " इंदिरा गांधी के समय में नीलम संजीव रेड्डी, नारायण दत्त तिवारी, सुरजेवाला को जैसा अप्सरा सम्मान, अभी हाल ही जो सम्मान विद्या चरण शुक्ल,  ...ऐसा सम्मान तो भाजपा में वाकई नहीं दिया जाता ..." इस पर खांटी साहब चुप हो गए तो मीडियाबम ने मोर्चा संभालते हुए पूछा  "...अच्छा आप बताईये कि मोदी में ऐसा क्या है कि आप लोग आँख मूँद कर समर्थन करते हैं ...?" मैंने  उत्तर देते हुए कहा "...आपके प्रश्न में ही मेरा उत्तर है ...मोदी के अन्दर ऑंखें खोल देने की क्षमता ...लेकिन कांग्रेस को तो अंधसमर्थक ही चाहिए ..." मडियाबम ने फिर सवाल दागा "...वो तो सेकुलर नेता नहीं हैं ..." मैंने उलटे उन्ही से सवाल किया "...ये दिव्य ज्ञान आपको कहाँ से मिला ...?" वो बड़ी देर तक चुप रहे फिर बोले "...उनका विकास गुजरात माडल खोखला है ...!" मैंने कहा "...मैंने तो किसी माडल का नाम नहीं लिया गुजरात के विकास के मॉडलिंग तो आप ही लोग कर रहे हैं ..." वो थोडा उखड़ते हुए बोले "...उनके आने से एंडीए टूट नहीं जाएगा ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...थरिया पीटने से भूख मिटती हो बताईये ..." मीडियाबम बोले "...मै समझा नहीं ..." मैंने उनको समझाते हुए कहा "...भूख का न लगना बहुत खतरनाक बीमारी है जिसका इलाज होना जरूरी है ..." मीडियाबम बोले "...मोदी के पास इसका इलाज है ...?" मैंने उनको समझाते हुए कहा "...भाई भारत की लाज तो भ्रष्टाचार और अतिक्रमण से चली गयी ...इलाज के लिए ही मोदी जी का आना जरूरी है ..." मीडियाबम ने फिर से सवाल पूछने की कोशिश की "...आपने बताया नहीं कि मोदी के पास इसका इलाज है या नहीं ..." मैंने कहा "...रामदेव बाबा मोदी जी का खुल के समर्थन कर रहे हैं इसका जवाब वो बेहतर दे सकते हैं ..." तभी रामदेव का नाम सुनते ही खांटी साहब भड़क गए कहने लगे "...उनके खिलाफ सीबीआई जाँच चल रही है ..." मैंने कहा तो चलाईये सीबीआई की जाँच उनके खिलाफ क्या फर्क पड़ता है हाथी को बेहया के सटहे से चोट नहीं लगती ...अच्छा नमस्कार ...वो लोग चले गए ....         
मानसिक समस्याएँ और बद्धिमत्ता की वास्तविक स्थिति
"NO MIND, NO PROBLEM"

अक्सर देखा जाता है कि लोगों को जब मानसिक समस्या होती है तो वो समझते हैं कि उनके पास औरों की तुलना में कम बुद्धि है इसलिए मानसिक विकृति हो गयी। वास्तव में ऐसा नहीं है, वास्तविकता ये है कि जिन लोगों को सामान्य तौर पर मानसिक परेशानी होती है उनके पास सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा बुद्धि होती है वो ज्यादा बुद्धिमान होते हैं और जब वो अपने इस अधिक बुद्धि का समुचित और पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाते, उपयोग करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाते, उचित उपयोग नहीं कर पाते, अनुचित उपयोग करते हैं या अनुचित करने के लिए बाध्य रहते हैं तो वहीं से मानसिक समस्या खड़ी होनी आरम्भ हो जाती है जो शीघ्र ही विभिन्न मानसिक विकृतियों के रूप में दिखने लगती है। अतः ये मान लेना कि जिनको मानसिक विकृति है वो लोग कम बुद्धिमान होते हैं बिल्कुल गलत है। यदि इस सन्दर्भ में इतिहास को देखा जाए तो जो तथ्य निकल के सामने आता है वो ये है कि जिन लोगों ने इतिहास रचा उन सभी लोगों को कोई न कोई और कभी न कभी मानसिक विकृति जरूर थी वो चाहे भारत के लोग रहे हों या भारत के बहार के। आप देखिये स्टीफेन हाकिंग जिन्हें 20 सदी का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति माना जाता है उन्हें भीषण विकलांगता है, अलबर्ट आइंस्टीन को बचपन में ही मानसिक विकृति थी, वर्जिन कंपनी के मालिक सर रिचर्ड चार्ल्स नोकोलस ब्रेनसन, विश्वविख्यात पूजी निवेशक होवेर्ड हुघेस को असेंट्रिक बिहेवियर, एप्पल कंपनी के सीईओ स्व. स्टीव जॉब्स को बाइपोलर, नेपोलियन बोनापार्ट को एंग्जायटी डिसऑर्डर था, अरस्तू को स्चिज़ोफ्रेनिया,  आदि बहुत से लोग लोग दुनियां की दृष्टि में मानसिक रूप से सक्षम बिल्कुल नहीं थे इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं है कि उनके पास बौद्धिकता की कमी थी। रिलायंस कंपनी के संस्थापक स्व. धीरुभाई अम्बानी ने मुंबई जाने से पहले 100 रूपए का नोट नहीं देखा था उन्हें भी अपना स्कूल बीच में ही छोड़ना पड़ा था, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अबुल कलाम चार बार बीएआरसी और एयरफोर्स की परीक्षा में असफल रहे तो इसका अर्थ ये कदापि नहीं कि उनके पास बुद्धि की कमी थी। दरअसल उनके पास बुद्धि इतनी ज्यादा थी कि सामान्य सामाजिक तंत्र में फिट ही नहीं हो पा रहे थे लेकिन इन्होने अपना तंत्र विकसित किया या अपनी ही कठिनाईयों को अवसरों में बदला तो  तो इन लोगों ने इतिहास ही रच डाला। प्रख्यात समाजसेवी अन्ना हजारे को गंभीर अवसाद हो गया था और जब वो उससे बहार निकले तो बिल्कुल नए अन्ना हजारे थे जिन्होंने वास्तव में इतिहास ही रच डाला। यही समस्या सामान्य तौर पर देखने को मिलती है कि लोग स्वयं का "मानसिक सशक्तिकरण" नहीं कर पाते।

इसलिए ये मान लेना कि जिनके परीक्षा में कम नंबर आते हैं, पढने में कमजोर हैं, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है, मानसिक विकृति है या ऐसे लोग कहीं सफल नहीं हो पा रहे हैं उनके पास बुद्धि की कमी है बिल्कुल गलत है। वास्तव में ऐसे लोगों के पास सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा बुद्धि है वो सामान्य लोगों से ज्यादा बुद्धिमान हैं बस समस्या इतनी सी है कि वो अपने पूरी बुद्धिमत्ता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं या उपयोग के निमित्त वो अपने लिए अवसरों का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें कहीं से हताश हो कर स्वयं समाज से विलग करने की कोई जरूरत नहीं है।

"ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" दरअसल यही करती है वो व्यक्ति के व्यक्तित्व को जिसपर मानव मस्तिष्क की127 प्रवृत्तियां काम करती हैं इनपर आधारित "नैदानिक रिसर्च रिपोर्ट" मानव मस्तिष्क को नए सिरे से अधिगमित करती है और शक्ति के साथ विकास की पूरी संभावनाओं को खोल देती है। इसी कारण से इस अतिउन्नत और आधुनिक विधा से वह सब सामान्य प्रक्रिया में आ चुका है जो पहले मात्र एक संयोग हुआ करता था और कुछ ही लोग अपने मानसिक विकृतियोँ को काबू में करते हुए इतिहास रचा। "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" वास्तव में न सिर्फ व्यक्ति को मानसिक रूप से सशक्त करती है बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य को भी बिल्कुल फिट कर देती है। इसलिए ये मानना बिल्कुल बेवकूफी है कि जिनको मानसिक समस्या है उनके पास बुद्धि की कमी है। वो लोग वास्तव में सामान्य लोगों से कही ज्यादा बुद्धिमान हैं। इसीलिए हमारे क्षेत्र में कहा जाता है "NO MIND, NO PROBLEM", "ग्राफोलोजी व ग्राफोथिरेपी" की सहायत से इतिहास रचने के लिए तैयार हो जाईये ।
नोट- निदान पूर्णतः औषधि रहित है

इतिहास रचने के लिए संपर्क कीजिये -
डॉ राघवेन्द्र कुमार 
ग्राफोलोजिस्ट & ग्राफोथिरेपिस्ट (एडवांस साइकोलॉजी)
नेओसेल्फ: मेन्टल एमपावरमेंट एंड क्यूरिंग सेंटर
अलाहदादपुर, गोरखपुर
फ़ोन - 09838953532
अधिक जानकारी के लिए लिंक देखें - facebook.com/Perfect.Neo.Mind तथा facebook.com/perfect.noe.mind 
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Friday, 7 June 2013

हमारे एक जानने वाले पहलवान छाप बीड़ी पीते हैं लेकिन ललकारते और दहाड़ते हैं एक साथ शीला दीक्षित वाले अंदाज में बड़े ही शालीनता से। शीला जी पता नहीं क्यों बार - बार केजरीवाल को भी कुछ सुलगाने के लिए या पता नहीं क्या करने के लिए हाई वोल्टेज बिजली  बड़े दिनों से केजरीवाल अपने ढोलक को तेल पिला रहे थे आखिरकार उन्होंने मुनादी करवा ही डाली कि वो  शीला दीक्षित के खिलाफ ढोल बजाएँगे उनकी मुनादी से दिल्ली वालों को बड़ी राहत मिली ऐसा "आप" बताते फिर रहे हैं। मेरे एक मित्र की पदोन्नति हुई और तो "तुम" से "आप" हो गए। चलिए अच्छा है दिल्ली में "आप" वाले "पाप" रोकेंगे ये समझना तो ठीक वैसा ही है जैसे गड़ही में कूद कर नाक बंद करके सांस लेना। खैर "आप" तो हर जरूरी मुद्दे पर अपनी नाक-कान-आँख और न जाने क्या क्या बंद कर लेते हैं ऐसा वो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी कर चुके हैं कहते हैं केजेरीवाल जब कमिश्नर थे तो किसी को भी नहीं पकड़ा था जबकि पूरा तंत्र उनके साथ था पता नहीं नौकरी छोड़ने के बाद उनके पास दिव्य शक्ति कहाँ से आ गयी। मैंने एकध "आप" से इस बारे में पूछा तो कहने लगे "...कांग्रेस और भाजपा दोनों भ्रष्ट हैं ..." मैंने उनसे प्रतिप्रश्न पूछा "...लोमड़ी और शेर में आपको फर्क नहीं दिखता तो दोष किसका है ...?" वो भड़क कर बोले "...आपका मतलब क्या है ..." मैंने कहा "...भड़कते क्यों हैं ...मतलब तो आप अपने ढोलक से पूछिए ..." वो फिर भी असंतुष्टि भरे लहजे   

Wednesday, 5 June 2013

सियारशेखी बन कर नितीश बाबू चले थे बारात लेकर लेकिन उनको क्या पता था कि रास्ते में टोपोरियत का उस्ताद सेकुलर टोपी पहिन के लालटेन लेकर लाठी लिए उनका इन्तजार कर रहा है। सारी शेखीपना नरेन्द्र मोदी के एक इशारे पर निकल गयी। जेडीयू की खटिया का एक पाया जब कायदे से टूट गया तो कांग्रेस वाले अपनी आदत के मुताबिक पहुँच गए उसमे से दतुअन बीनने, जानकार बताते हैं कि पाया बहुत कायदे से टूटा है लिहाजा बहुत ज्यादा दतुअन निकलने की उम्मीद है। पता नहीं जेडीयू वालों को ये कैसा लगा होगा लेकिन पाया टूटने का गम उनके लिए बहुत भारी है। मैंने जेडीयू नेता से पूछा तो कहने लगे "...ये मोदी का जादू नहीं है ..." मैंने पूछा "...फिर किसका जादू है ..." वो दूसरे ट्रैक पर उत्तर देते हुए बोले "...देश के 90% जनता सेकुलर है आप माने या न माने ..." मैंने कहा "...ये तो आप शाही जी के हारने पर भी कह सकते हैं कि चुनाव आयोग माने या न माने लेकिन शाही जी ही जीते हैं ..." वो थोडा उखड़ते हुए बोले "...देखिये ये कोई फाइनल मैच नहीं था ..." मैंने कहा "...कांग्रेस तो दतुअन बटोरने के फ़िराक में है ..." उन्होंने आश्चर्य दिखाते हुए पूछा "...मै समझा नहीं ..." मैंने कहा "...मोदी के जादू के मात्र एक इशारे से ही जो आपके खटिया का एक पाया टूटा है उसमे से ही लूटने - खसोटने के फ़िराक में है ..." जेडीयू नेता बोले "...ये तो उनकी की पुरानी आदत है ..." मैंने पूछा "...तो क्या आप उनको दतुअन बटोरने देंगे ...?" जेडीयू नेता बोले "...अभी 2014 बहुत दूर है ..." मैंने कहा "...नरेन्द्र मोदी के जादू के आगे तो आपकी बहुत दूर की कौड़ी हो जाएगी ..." जेडीयू नेता बोले "...हमारे सामने दूसरा विकल्प भी है ..." मैंने सम्भावना जताते हुए कहा "...तो अपनी टूटी खटिया से आप लोग कांग्रेस को दतुअन बीनने की इजाजत दे देंगे ...?" वो थोड़ा अनमने मन से बोले "...ये सब हमारा हाई कमांड तय करेगा ..." मैंने पलट कर पूछा "...उसी कांग्रेस के शैली में ...?" वो बोले "...हमारे यहाँ पूरी डेमोक्रेसी है ..." मैंने कहा "...लेकिन लालू जी तो पूरे अनडेमोक्रेटिक शैली में जीते है ..." वो मुझसे सहमति वाले अंदाज़ में बोले "...आपका कहना सही है उनकी गांधी मैदान वाली रैली बिल्कुल डेमोक्रेटिक नहीं थी ..." मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...फिर तो कांग्रेस के दतुअन बीनने का रास्ता साफ़ है ...!" वो थोडा उखड़ते हुए बोले "...आप लोग बहुत मजा ले रहे हैं ..." मैंने भी पलटवार करते हुए कहा "...हमने बहुत पहले ही आप लोगों को अपने लेख में माध्यम से बहुत बार आगाह किया था लेकिन आपका दिल है कि मानता ही नहीं ..." वो थोड़ा हताशा में बोले "...क्या करें हम लोगों कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है ..." मैंने भी थोड़ा गंभीर चुटकी लेते हुए कहा "...क्यों मोदी के तेज के आगे आप लोगों की आँखे चुधिया गईं हैं क्या ...?" वो संभल कर उत्तर देते हुए बोले "...मोदी का तेज कैसे हो सकता है ..." मैंने कहा "...हाँ तेज की बात भी न मानी जाए तो क्या माने जाए मोदी का मात्र एक इशारा ...और आपकी खटिया टूट गयी ...!" वो सफाई देते हुए बोले "...देखिये भाजपा अगर ठीक से साथ देती तो हमारा ये हाल न हुआ होता ..." मैंने कहा "...आपके ही नितीश बाबू मोदी जी को बिहार का वीज़ा नहीं दे रहे हैं ..." वो कड़क कर बोले "...हमको भाजपा से नहीं मोदी से नफरत है ..." मैंने भी कह दिया "...तो फिर बिनावईये कांग्रेस से अपनी टूटी खटिया से दतुअन ...नमस्कार"