Saturday, 4 May 2013

मेरे पिछले पोस्ट से कुछ लोग आहत हुए, उनकी भावनाओं को ठेस पहुँची इसके लिए मै उनसे करबद्ध क्षमा प्रार्थी हूँ जिसमे विभिन्न क्षेत्रों के प्रोफेशनल लोग शामिल हैं दरअसल मेरा उद्देश्य उन लोगों को ठेस पहुँचाना नहीं था बल्कि विषय की भयानक वास्तविकता की और ध्यान दिलाने लिए प्रेरित (आप उकसाना समझ सकते हैं ) करना था। मै मीडिया के लोगों से खास तौर पर क्षमा प्रार्थी हूँ यदि उनको मेरे किसी वक्तव्य से ठेस लगी हो तो। लेकिन मेरा उनसे निवेदन है कि मुद्दा कोई भी हो उसे उसके वास्तविक धरातल और उसके सम्पूर्ण पहलू के सन्दर्भ में ही प्रेषित होना चाहिए। मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि वो लोग बड़े ह्रदय के हैं मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे।

कुछ लोगों ने घोर आपत्ति दर्ज कराई कि मै विदेशियत (म्लेच्छ्पना) के विरुद्ध क्यों हूँ चाहे वो बोली या किसी अन्य रूपों में क्यों न हो। मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि कृपया वो लोग भाषा जो व्यक्तित्व के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिसमे व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (intelligence) सबसे महत्वपूर्ण होती है, के सन्दर्भ में हुए शोध-कार्यों का अध्ययन करें। भाषा ही है जो व्यक्ति को अपने परिवेश से सीधे सम्बद्ध करती है जिससे उसके प्रत्येक स्तर पर संवेदनशीलता का विकास होता है ये स्तर अनंत हो सकते हैं। संवेदनहीन, बुद्धिहीन व्यक्ति आखिर किस काम का होगा ? आखिर क्या कारण है कि विश्व का कोई भी देश विदेशी भाषा में विकसित नहीं हो सका है ? रूसी माध्यम सिद्धांतकार गेन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है " में लिखा है " साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते , उनकी परिवर्तन कारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत या विदेशी भाषा हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खडी करती है।  हमारी नैतिकता, हमारे संस्कार दिन पर घटते जा रहे हैं, हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं, आखिर क्या कारण है कि जैसे-जैसे अंगरेजी बढ़ती जा रही है भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। आज स्थिति ये कि यदि कोई व्यक्ति इमानदार है तो वही उसकी योग्यता बन जा रही है जबकि इमानदारी व्यक्ति का गुणधर्म होता है। आज हमें इमानदार बनने के लिए स्वयं से ही संघर्ष करना पड़ रहा है। मातृभाषा व्यक्ति के इमानदारी को कैसे और किस हद विकसित करती है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि इमानदारी शब्द कोई संस्कृत या हिंदी संस्करण नहीं है ये गुणधर्म इतना स्वभाविक और मौलिक है।

हमारे समाज का नैतिक स्तर कितना गिर चुका है कि हमें आभास तक नहीं होता आलम ये है कि हमारे कुछ प्रोफेशनल फेसबुक मित्रो ने स्वयं को "दूसरा भगवान" तक कह डाला वो अपने ही मुख से जबकि स्थिति इसके विपरीत है जो लोग खुद को दूसरा, तीसरा या चौथा भगवान, अवतार या देवदूत समझते हैं उन्हें DSM (IV) देखना चाहिए। जो लोग "बिना आलोचनात्मक दृष्टि के विदेशियत या विदेशी बोली को स्वीकार या प्रदर्शन करते हैं वे दरअसल "मानसिक रूप से बीमार"  है उन्हें एंग्जायटी डिसऑर्डर है (गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) इसकी व्याख्या यदि हम करें तो यदि आप आलोचनात्मक दृष्टि रखेंगे तो अपनाने कोई प्रश्न ही नहीं है। क्या ये भद्दा मजाक नहीं है हम शिक्षा के नाम पर बहुत बड़े स्तर पर लोगों को "मानसिक रोगी" बनाया जा रहा है। अब एक मानसिक रोगी के पास बुद्धि कितनी होगी इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। इसीलिए विद्वान राहुल देव ने अभी हाल ही मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में इसे "राष्ट्रीय मूर्खता" कहा है।

एक बार पुनः मै क्षमा प्रार्थी हूँ यदि अनजाने में मुझसे किसी को ठेस पहुँची हो तो ....


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