Friday, 3 May 2013

"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा पत्रकारिता
पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहाँ नित नयी घटना घटती है और उस घटना को उसी के मनोविज्ञान के अनुरूप किन्तु बिल्कुल नए स्वरूप में प्रस्तुत करना होता है इसके लिए उच्च स्तर की संवेदनशीलता, प्राप्त तथ्यों की विश्लेषण क्षमता, उसके सन्दर्भों की विवेचना, शोध-प्रवृत्ति, उच्च कल्पनाशीलता, तार्किक शक्ति, उच्च समाजिकता, प्रचण्ड आत्मविश्वास आदि प्रवृत्तियों बहुत सख्त जरूरत है। ये  सभी प्रवृत्तियां जब बिल्कुल संतुलित और प्रबल अवस्था में होती हैं तो निश्चित रूप से न सिर्फ पत्रकारिता का आनंद उठाया जा सकता है बल्कि समाज को शाश्वत सन्देश दे कर उसमे अपेक्षित बदलाव लाया जा सकता है। सशक्त और प्रभावी पत्रकारिता करने के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। वैसे पत्रकारिता के पेशे में लगे लोगों को भी मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी मानसिक क्षमता प्रभावित होती है जिसे इस उन्नत और विकसित विज्ञान के मदद से रोक कर पत्रकारों को मानसिक रूप से बहुत हद तक सशक्त और प्रबल बनाया जा सकता है। कुछ पत्रकारों ने अपने छात्र जीवन में इस विकसित विधा का लाभ उठा कर पत्रकारिता जगत में एक मुकाम पर हैं। इस पेशे के कारण यदि कुछ मानसिक परशानी यदि आ भी गयी हो तो "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उसे दूर कर मानसिकता को अति सशक्त किया जा सकता है।
ऐसा एक मामला आया था लगभग 4 साल पहले लखनऊ से। वो देश के एक प्रतिष्ठित मैगजीन के लिए पत्रकारिता करते थे और किसी कारण वश उनको एंग्जायटी डिसऑर्डर हो गया था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उनको पूरी तरह से न सिर्फ मुक्ति मिल गयी बल्कि उनकी मानसिक शक्ति भी बहुत बढ़ गयी।
ऐसे ही और भी पत्रकारों को समस्या होने पर इस उन्नत विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से निजात तो पाते ही रहते हैं साथ ही उन्हें मानसिक सशक्तिकरण भी प्राप्त होता रहता है।

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