Friday, 3 May 2013


"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा न्यायिक सेवाएँ 
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" सामान्य मनोचिकित्सा एवं पारंपरिक मनोविज्ञान से बहुत अधिक उन्नत एवं विकसित है जिसका उपयोग हर उस स्तर पर किया जाता है जिससे हमारी मानसिकता का सीधा सम्बन्ध होता है। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों को बहुत मानसिक दबाव, तनाव, आनंदकारी संवाद एवं उच्च तार्किक शक्ति का सामना करना पड़ता है इसके लिए बहुत आवश्यक है कि उनके बीच आपसी और बेहतरीन ताल-मेल रहे। ऐसा न होने पर कई प्रकार की मनोविकृतियाँ घर कर जाती हैं जिसका परिणाम होता है मानसिक क्षमता में कमी। इससे दोनों प्रकार से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसका निराकरण न तो मनोचिकित्सा के पास है और न ही पारंपरिक मनोविज्ञान के पास। जबकि "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के सहायता से न सिर्फ वे इन मानसिक  विकारों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं, सक्रिय प्रवृत्तियों में ताल-मेल बैठा पाने में सफल रहते हैं बल्कि मानसिक रूप से काफी सशक्त भी हो जाते हैं।ऐसा ही अनेक मामलों में एक मामला आया था पूर्वी बिहार के जिले के "सिविल जज" का जो अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण "चिंता विकृति" "आबसेसिव कोम्पल्सिव डिसऑर्डर" हो गया था और लगभग 2 वर्षों से काफी परेशान थे और दवाओं से कोई लाभ नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद से उनको न सिर्फ 25-30 दिनों में इस विकृति से मुक्ति मिल गयी बल्कि उनका मस्तिष्क भी पहले से कहीं बहुत ज्यादा सशक्त हो गया। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" किसी वरदान से कम नहीं है।

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