Friday, 3 May 2013


“ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” तथा महिलाओं की घरेलू सामंजस्य की समस्याएँ 
आज कल महिलाओं में घरेलू सामंजस्य की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। इसके पीछे कई कारण हैं सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्कारिक तथा व्यावहारिक। वैसे काफी लोग टीवी धारावाहिकों को भी दोष दे रहे हैं तो मेरे समझ से उनका कहना भी कुछ हद तक सही हो सकता है। लेकिन सामंजस्य स्थापित न कर पाने के कारण घर का माहौल बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, सम्बन्धों की मिठास धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है, व्यक्ति का सर्वांगीण विकास प्रभावित हो रहा है जिससे तनाव उत्पन्न होने के कारण कई प्रकार के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानिया खाड़ी होती जा रही हैं जिससे सामाजिक स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ-साथ बच्चों के सामने भी कई प्रकार की दिक्कतें के खड़े हो जाने के कारण उनका मानसिक विकास भी सीधे-सीधे प्रभावित हो रहा है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” के पास इस समस्या का शानदार निराकरण व समाधान है जो पारंपरिक मनोवैज्ञानिक परामर्श से बिल्कुल संभव ही नहीं है क्योंकि उनके पास "एक्यूरेट डायग्नोस्टिक सिस्टम" ही नहीं है, फिर हमारा मस्तिष्क अधूरे परामर्शों को बड़ी निर्दयता से अस्वीकार कर देता जो अपने आप में एक बड़ी समस्या है।लगभग 4 वर्ष पूर्व मुंबई की एक महिला का मामला मेरे पास आया था। वह महिला किसी भी स्थिति में अपने ससुराल में ही नहीं रहना चाहती थी उसे अपने ससुराल के कुछ लोग पसंद नहीं थे जैसा कि उसका कहना था। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” से जब उसके मनोअवस्था की जाँच की गयी तो पता चला कि उसे व्यावहारिक समस्या है। फिर उसके पति की भी जाँच करके सही स्थिति के सन्दर्भ में दोनों के मानसिकता हो सेट कर दिया गया जिसमे मात्र 28 दिनों का ही समय लगा। आज वो महिला ससमान और आनंद के साथ अपने ससुराल में रह रही है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” दरअसल ऐसे परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो सामंजस्य की समस्या से झूझ रहे हैं। 

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