"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा एगोराफोबिया
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी जिसे अतिउन्नत मनोविज्ञान (एडवांस साइकोलॉजी) भी कहा जाता है, मस्तिष्क के प्रवृत्तियों पर सीधे "न्यूरल पाथवे सिस्टम" पर काम कारने के कारण इससे असीम संभावनाएं निर्मित हो जाती हैं जिससे बिना किसी दवा के उपयोग के मात्र 1 महीने के अन्दर न सिर्फ "मानसिक विकृतियों" को सदा के लिए मिटाया जा सकता है बल्कि मष्तिष्क को सरलता से "सशक्त" भी किया जा सकता है।
9 वर्ष पूर्व सिंचाई विभाग में कार्यरत जूनियर इंजिनियर "अगोराफोबिया" (एक प्रकार की चिंता विकृति जिसमे व्यक्ति को भयवश लगता है कि उसका हाव-भाव उसके संवाद के अनुसार नहीं है जिससे उसे संवाद करने काफी परेशानी होती है ) से लगभग पिछले 14 वर्षों से पीड़ित थे तथा मनोचित्सकीय इलाज के लिए हर 15 दोनों पर उनको लखनऊ का चक्कर लगना पड़ता था। उन्होंने मुझे संपर्क किया और विस्तृत ग्राफोलोजिकल नैदानिक सलाह ली जिसमे उन्हें उनकी "नैदानिक ग्राफोलोजिकल रिसर्च रिपोर्ट" के अध्ययन के साथ-साथ कुछ ग्राफोथिरेपीयोँ का भी अभ्यास करना था। दिए गए निर्देशों का उन्होंने पालन किया और पहले 15 - 20 दिनों में उन्हें पूरी तरह से दवा से मुक्ति मिल गयी साथ ही अगले 15 दिनों में उनको इस मानसिक असामान्यता से पूरी तरह मुक्ति मिल गयी और "मानसिक सशक्तिकारण" से उसके बाद वो किसी भी समस्या का न केवल सरलता से सामना करते हैं बल्कि उसका सटीक समाधान भी प्राप्त करने में सफल रहते हैं। आज उनको किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है वो पूरी तरह अपने स्वाभाविक जीवन का आनंद उठा रहे हैं। इस विकृति के कारण घर का भी परिवेश बिगड़ रहा था वो भी बहुत शानदार एवं अनुकरणीय हो चुका है।
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