"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा माध्यमिक (10 & 10+2) स्तर के छात्र
ऐसे छात्र-छात्राएं जो हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में हैं उनके सामने अपनी नए जीवन के प्रारूप के लेकर काफी चिंता रहती है, इसके साथ-साथ उनके किशोरावस्था (Adolescence) के कारण भी अतिउत्साह, असामान्य गाम्भीर्य , यौन अनुभूतियों आदि के कारण अक्सर असामान्य स्थिति का सामना करते हैं। जैव-शारीरिक तथा जैव-रसायनिक परिवर्तनों के कारण भी उनके मनोभावों में बहुत ज्यादा उतर-चढाव देखा जाता है। इसके साथ-साथ अपने "जीवन के उद्देश्य" के प्रति वो काफी भ्रम की स्थिति में भी रहते हैं। चूंकि वर्तमान समय में हर जगह सहशिक्षा (co-education) को अपना लिया गया है जिससे समस्या थोड़ी और गंभीर हो गयी है। इसके कारण चिंता-विकृति, मनोदशा विकृति और व्यक्तित्व विकृतियोँ के चपेट में आने की सम्भावना बहुत बढ़ गयी है। इस कारण से किशोरवय नवयुवकों की "मानसिक और बौद्धिक क्षमता" पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इसके दुष्प्रभावों को समाज में आसानी से महसूस किया जा सकता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उनका "मानसिक सशक्तिकरण" करके न केवल हम इन गंभीर समस्याओं से सहजता से मुक्ति पा सकते हैं बल्कि किशोरों को समाज और देश के बृहत्तर सन्दर्भ में उद्देश्यपरक बना कर उनके जीवन को उत्कृष्ट सृजनशील बना सकते हैं।
गोरखपुर नगर के नामी अंगरेजी माध्यम के स्कूल का मामला आया था वो लड़का कक्षा 11 वीं का छात्र था और उसे किसी लडकी के प्रति मनोग्रस्ति (एक तरफ़ा प्यार) का शिकार हो गया। लडकी उसकी तरफ थोड़ा भी दे नहीं दे रही थी जिसके कारण उसे भयानक तनाव होने लगा था। उसके पढाई का तो यूँ समझिये कचूमर ही निकल गया था। कुछ दिनों तक उसने अपना इलाज कराया लेकिन फायदा होने बजाय उसे लगा कि उसकी "मानसिक क्षमता" का ही तेजी ह्रास होता जा रहा है लिहाजा उसने अपना इलाज बंद करके "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उसकी "मानसिकता को सशक्त" करने में मात्र 3 सप्ताह का समय लगा उसके बाद न उसे उस लडकी की याद परशान करती है और न ही कोई घटक बल्कि पढने में भी उसने लगभग 70 से 120% की वृद्धि की। ऐसे बहुत से मामले "OCD, डिप्रेशन और पर्सनालिटी डिसऑर्डर" के है जिन्होंने स्वयं को इस उन्नत और विकसित विज्ञान से काफी "सशक्त" किया है। बीमारी से तो मुक्ति मिली ही दिमाग भी मजबूत हो गया। इसलिए ये बहुत जरूरी है सभी छात्र-छात्रों को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकारण" करा लेना चाहिए।
ऐसे छात्र-छात्राएं जो हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में हैं उनके सामने अपनी नए जीवन के प्रारूप के लेकर काफी चिंता रहती है, इसके साथ-साथ उनके किशोरावस्था (Adolescence) के कारण भी अतिउत्साह, असामान्य गाम्भीर्य , यौन अनुभूतियों आदि के कारण अक्सर असामान्य स्थिति का सामना करते हैं। जैव-शारीरिक तथा जैव-रसायनिक परिवर्तनों के कारण भी उनके मनोभावों में बहुत ज्यादा उतर-चढाव देखा जाता है। इसके साथ-साथ अपने "जीवन के उद्देश्य" के प्रति वो काफी भ्रम की स्थिति में भी रहते हैं। चूंकि वर्तमान समय में हर जगह सहशिक्षा (co-education) को अपना लिया गया है जिससे समस्या थोड़ी और गंभीर हो गयी है। इसके कारण चिंता-विकृति, मनोदशा विकृति और व्यक्तित्व विकृतियोँ के चपेट में आने की सम्भावना बहुत बढ़ गयी है। इस कारण से किशोरवय नवयुवकों की "मानसिक और बौद्धिक क्षमता" पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इसके दुष्प्रभावों को समाज में आसानी से महसूस किया जा सकता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उनका "मानसिक सशक्तिकरण" करके न केवल हम इन गंभीर समस्याओं से सहजता से मुक्ति पा सकते हैं बल्कि किशोरों को समाज और देश के बृहत्तर सन्दर्भ में उद्देश्यपरक बना कर उनके जीवन को उत्कृष्ट सृजनशील बना सकते हैं।
गोरखपुर नगर के नामी अंगरेजी माध्यम के स्कूल का मामला आया था वो लड़का कक्षा 11 वीं का छात्र था और उसे किसी लडकी के प्रति मनोग्रस्ति (एक तरफ़ा प्यार) का शिकार हो गया। लडकी उसकी तरफ थोड़ा भी दे नहीं दे रही थी जिसके कारण उसे भयानक तनाव होने लगा था। उसके पढाई का तो यूँ समझिये कचूमर ही निकल गया था। कुछ दिनों तक उसने अपना इलाज कराया लेकिन फायदा होने बजाय उसे लगा कि उसकी "मानसिक क्षमता" का ही तेजी ह्रास होता जा रहा है लिहाजा उसने अपना इलाज बंद करके "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उसकी "मानसिकता को सशक्त" करने में मात्र 3 सप्ताह का समय लगा उसके बाद न उसे उस लडकी की याद परशान करती है और न ही कोई घटक बल्कि पढने में भी उसने लगभग 70 से 120% की वृद्धि की। ऐसे बहुत से मामले "OCD, डिप्रेशन और पर्सनालिटी डिसऑर्डर" के है जिन्होंने स्वयं को इस उन्नत और विकसित विज्ञान से काफी "सशक्त" किया है। बीमारी से तो मुक्ति मिली ही दिमाग भी मजबूत हो गया। इसलिए ये बहुत जरूरी है सभी छात्र-छात्रों को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकारण" करा लेना चाहिए।
No comments:
Post a Comment