"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" एवं बच्चों (5 साल से 14 साल तक) की समस्याएँ
आजकल जिस तरह का सामाजिक और पारिवारिक परिवेश बदल रहा है लोगों में प्रतिस्पर्धा का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है, संयुक्त परिवार टूट कर एकल बनते जा रहे हैं, समाजिक ताना-बना विशेष सन्दर्भों में ही विकसित हो रहा है तथा बढ़ते प्रतिस्पर्धा के कारण भी बच्चों के स्वाभाविक और सर्वांगीण विकास पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। संस्कारों की कमी, आगे निकलने की रफ़्तार में शामिल होने की जद्दोजहद, जीवन मूल्यों का ह्रास आदि के कारण भी बहुत असर पड़ा है। वैसे अध्ययनो के अनुसार बच्चों का विकास माता-पिता के आचरण पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। उसके बाद स्कूल के अध्यापकों के व्यवहार और आचरण पर भी बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि सभी कुछ ठीक-ठीक है निश्चित रूप से बच्चों का विकास शानदार होगा और देश का सुदृढ़, जिम्मेदार नागरिक या इतिहास महिला/पुरुष बनने से कोई नहीं रोक सकता। यदि बच्चे को पढने में दिक्कत है, स्कूल जाने से डरता है, जिद्दी है, आज्ञाकारी नहीं है, उसका व्यवहार ठीक नहीं है, उसकी याददाश्त कमजोर है, पढने में कमजोर है तो निश्चित रूप से उसे समस्या है और जितनी जल्दी उसकी समस्याओं का निराकरण कर दिया जाए उतना अच्छा होता है। इसके लिए सबसे विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से बेहतर कोई विधा नहीं है। चूंकि बच्चे का विकास माता-पिता के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है अतः इस सन्दर्भ में माता-पिता का भी अलग-अलग ग्राफोलोजिकल रिसर्च एवं ग्राफोथेरेपी बच्चे के अनुरूप करने के लिए जरूरी होता है। जैसे - जैसे माता-पिता अपने व्यवहार में परिवर्तन लेट जाते हैं बच्चे में वैकासिक परिवर्तन आता जाता है.धीरे-धीरे (1 से 2 महीनो में ही ) बच्चा "मानसिक रूप बहुत सशक्त" हो जाता है जिसे आप उसके व्यवहार में हुए परिवर्तन और शैक्षणिक उन्नति को देख कर आसानी से महसूस कर सकते हैं।
लगभग 4 साल पहले एक 11 साल के बच्चे का मामला आया था बच्चे स्कूल फोबिया हो गया था। बहुत अधिक चिंता करने के कारण उसका पेट भी खराब रहने लगा था जिसका इलाज तीन साल से चल रहा था। उस बच्चे में मनोभाव का ग्राफोलोजिकल जांच करने पर पता चला कि चिंता के कारण उसे फोबिया हुआ है। जब उनके माता-पिता की जांच की गयी तो पता चला कि चिंता का कारण उसकी माता जी में है। उनका एक ही लड़का होने कारण मामला बहुत भावनात्मक स्तर तक गंभीर था। चूंकि हर बच्चे का अपना अलग व्यक्तित्व होता लिहाजा माता-पिता का भी आचरण और व्यवहार उसी के अनुरूप होना चाहिए। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" दरअसल सूक्ष्म स्तर तक सटीकता से यही करती है। वो बच्चा 2 महीने में इतना ठीक हो गया कि कभी भी 90% से कम नंबर उसके आए ही नहीं।
एक बंगाली परिवार का बच्चा थे जो इतना ज्यादा सक्रिय था कि कही 5 मिनट बैठना भी मुश्किल था पढना तो बहुत दूर की बात है। उसका इलाज किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा 2 साल से किया जा रहा था जो कोलकाता और लंदन दोनों जगह बैठते थे लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उनको मात्र 2 महीनो में ही मुक्ति मिल गयी। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने अपने बच्चों के "मानसिक क्षमता" को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम सशक्त किया है। वैसे सभी को इस उन्नत विधा फायदा उठाना चाहिए सावधानी एवं "मानसिक सशक्तिकरण" दोनों के सन्दर्भ में ...
आजकल जिस तरह का सामाजिक और पारिवारिक परिवेश बदल रहा है लोगों में प्रतिस्पर्धा का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है, संयुक्त परिवार टूट कर एकल बनते जा रहे हैं, समाजिक ताना-बना विशेष सन्दर्भों में ही विकसित हो रहा है तथा बढ़ते प्रतिस्पर्धा के कारण भी बच्चों के स्वाभाविक और सर्वांगीण विकास पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। संस्कारों की कमी, आगे निकलने की रफ़्तार में शामिल होने की जद्दोजहद, जीवन मूल्यों का ह्रास आदि के कारण भी बहुत असर पड़ा है। वैसे अध्ययनो के अनुसार बच्चों का विकास माता-पिता के आचरण पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। उसके बाद स्कूल के अध्यापकों के व्यवहार और आचरण पर भी बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि सभी कुछ ठीक-ठीक है निश्चित रूप से बच्चों का विकास शानदार होगा और देश का सुदृढ़, जिम्मेदार नागरिक या इतिहास महिला/पुरुष बनने से कोई नहीं रोक सकता। यदि बच्चे को पढने में दिक्कत है, स्कूल जाने से डरता है, जिद्दी है, आज्ञाकारी नहीं है, उसका व्यवहार ठीक नहीं है, उसकी याददाश्त कमजोर है, पढने में कमजोर है तो निश्चित रूप से उसे समस्या है और जितनी जल्दी उसकी समस्याओं का निराकरण कर दिया जाए उतना अच्छा होता है। इसके लिए सबसे विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से बेहतर कोई विधा नहीं है। चूंकि बच्चे का विकास माता-पिता के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है अतः इस सन्दर्भ में माता-पिता का भी अलग-अलग ग्राफोलोजिकल रिसर्च एवं ग्राफोथेरेपी बच्चे के अनुरूप करने के लिए जरूरी होता है। जैसे - जैसे माता-पिता अपने व्यवहार में परिवर्तन लेट जाते हैं बच्चे में वैकासिक परिवर्तन आता जाता है.धीरे-धीरे (1 से 2 महीनो में ही ) बच्चा "मानसिक रूप बहुत सशक्त" हो जाता है जिसे आप उसके व्यवहार में हुए परिवर्तन और शैक्षणिक उन्नति को देख कर आसानी से महसूस कर सकते हैं।
लगभग 4 साल पहले एक 11 साल के बच्चे का मामला आया था बच्चे स्कूल फोबिया हो गया था। बहुत अधिक चिंता करने के कारण उसका पेट भी खराब रहने लगा था जिसका इलाज तीन साल से चल रहा था। उस बच्चे में मनोभाव का ग्राफोलोजिकल जांच करने पर पता चला कि चिंता के कारण उसे फोबिया हुआ है। जब उनके माता-पिता की जांच की गयी तो पता चला कि चिंता का कारण उसकी माता जी में है। उनका एक ही लड़का होने कारण मामला बहुत भावनात्मक स्तर तक गंभीर था। चूंकि हर बच्चे का अपना अलग व्यक्तित्व होता लिहाजा माता-पिता का भी आचरण और व्यवहार उसी के अनुरूप होना चाहिए। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" दरअसल सूक्ष्म स्तर तक सटीकता से यही करती है। वो बच्चा 2 महीने में इतना ठीक हो गया कि कभी भी 90% से कम नंबर उसके आए ही नहीं।
एक बंगाली परिवार का बच्चा थे जो इतना ज्यादा सक्रिय था कि कही 5 मिनट बैठना भी मुश्किल था पढना तो बहुत दूर की बात है। उसका इलाज किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा 2 साल से किया जा रहा था जो कोलकाता और लंदन दोनों जगह बैठते थे लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उनको मात्र 2 महीनो में ही मुक्ति मिल गयी। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने अपने बच्चों के "मानसिक क्षमता" को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम सशक्त किया है। वैसे सभी को इस उन्नत विधा फायदा उठाना चाहिए सावधानी एवं "मानसिक सशक्तिकरण" दोनों के सन्दर्भ में ...
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