ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी तथा अनिद्रा
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से अनिद्रा जैसी बीमारी का सरलतम, तीव्र एवं स्थाई निदान संभव है वो भी बिना किसी दवा के। दरअसल अनिद्रा की पीछे सिर्फ मानसिक कारण ही होते हैं जो हमारी प्रवृत्तियों के गलत उपयोग या किसी किसी वाह्य उद्दीपन के कारण उनके "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन आ जाने के कारण होता है। इसका इलाज नीद की गोलियां कदापि नहीं हैं। नीद की गोलियों से नीद नहीं "नीद का भ्रम" उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे आदत का निर्माण करता जाता है और व्यक्ति को इसकी आदत पड़ने लगती है। नीद की गोलियों से नीद के बाद उठने पर व्यक्ति को ताजगी की अनुभूति (जैसा कि सामान्य नीद के बाद महसूस होता है ) होने के बजाय व्यक्ति काफी थका हुआ महसूस करता है जिसके कारण व्यक्ति चिडचिडा और उग्र तो हो ही जाता है साथ ही व्यावहारिक स्तर पर सामंजस्य स्थापित करने में भी उसे काफी असामान्यता की अनुभूति होती है। इससे बीमारी दूर होने के बजाय कई प्रकार की नई परेशनीयां खड़ी हो जाती हैं अतः नीद की गोलियों से बचाना चाहिए। चूंकि अनिद्रा का कारण मानसिक होता है तथा प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन के कारण होता है अतः "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से इसके कारणों की सटीकता से पहचान कर मस्तिष्क को उसके स्वभाविक वृत्ति के अनुरूप "सशक्त" कर दिया जाता है इससे न सिर्फ अनिद्रा का स्थाई समाधान होता है बल्कि हमें पहले की तुलना में काफी "शक्तिशाली" मस्तिष्क भी प्राप्त होता है।
ऐसा ही मामला आया 29 वर्षीय युवक का जो लगभग 1.5 वर्षों से अनिद्रा का शिकार था। दरअसल वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में उच्चकोटि का एथिलीट था हालाँकि पढने में वो बहुत अच्छा नहीं था लेकिन एथेलीट होने के कारण उसकी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं जो पूरी नहीं हो सकीं जिससे वह अनिद्रा का शिकार हो गया था। 1.5 वर्षों तक वह अपना इलाज कराता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ अंततः उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से न सिर्फ अनिद्रा दूर हो गयी बल्कि उसका मस्तिष्क इतना सशक्त हो गया कि उसने नए सिरे पढाई शुरू की बी.एड. की परीक्षा भी उत्तीर्ण करके आज वो अध्यापक है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उसका मस्तिष्क सामान्य व्यक्तियोँ से भी काफी बेहतर हो गया था।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से अनिद्रा जैसी बीमारी का सरलतम, तीव्र एवं स्थाई निदान संभव है वो भी बिना किसी दवा के। दरअसल अनिद्रा की पीछे सिर्फ मानसिक कारण ही होते हैं जो हमारी प्रवृत्तियों के गलत उपयोग या किसी किसी वाह्य उद्दीपन के कारण उनके "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन आ जाने के कारण होता है। इसका इलाज नीद की गोलियां कदापि नहीं हैं। नीद की गोलियों से नीद नहीं "नीद का भ्रम" उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे आदत का निर्माण करता जाता है और व्यक्ति को इसकी आदत पड़ने लगती है। नीद की गोलियों से नीद के बाद उठने पर व्यक्ति को ताजगी की अनुभूति (जैसा कि सामान्य नीद के बाद महसूस होता है ) होने के बजाय व्यक्ति काफी थका हुआ महसूस करता है जिसके कारण व्यक्ति चिडचिडा और उग्र तो हो ही जाता है साथ ही व्यावहारिक स्तर पर सामंजस्य स्थापित करने में भी उसे काफी असामान्यता की अनुभूति होती है। इससे बीमारी दूर होने के बजाय कई प्रकार की नई परेशनीयां खड़ी हो जाती हैं अतः नीद की गोलियों से बचाना चाहिए। चूंकि अनिद्रा का कारण मानसिक होता है तथा प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन के कारण होता है अतः "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से इसके कारणों की सटीकता से पहचान कर मस्तिष्क को उसके स्वभाविक वृत्ति के अनुरूप "सशक्त" कर दिया जाता है इससे न सिर्फ अनिद्रा का स्थाई समाधान होता है बल्कि हमें पहले की तुलना में काफी "शक्तिशाली" मस्तिष्क भी प्राप्त होता है।
ऐसा ही मामला आया 29 वर्षीय युवक का जो लगभग 1.5 वर्षों से अनिद्रा का शिकार था। दरअसल वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में उच्चकोटि का एथिलीट था हालाँकि पढने में वो बहुत अच्छा नहीं था लेकिन एथेलीट होने के कारण उसकी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं जो पूरी नहीं हो सकीं जिससे वह अनिद्रा का शिकार हो गया था। 1.5 वर्षों तक वह अपना इलाज कराता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ अंततः उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से न सिर्फ अनिद्रा दूर हो गयी बल्कि उसका मस्तिष्क इतना सशक्त हो गया कि उसने नए सिरे पढाई शुरू की बी.एड. की परीक्षा भी उत्तीर्ण करके आज वो अध्यापक है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उसका मस्तिष्क सामान्य व्यक्तियोँ से भी काफी बेहतर हो गया था।
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