Thursday, 23 May 2013

ब्रिटेन के प्रख्यात साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार विजेता जार्ज बर्नाड शॉ ने क्रिकेट के बारे में कहा था "क्रिकेट को 22 मूर्ख खेलते हैं उसे 22 करोड़ महामूर्ख देखते हैं", लेकिन हमारे भारत में कुछ महामूर्ख इसे मूर्खों का खेल कहने के बजाय "भद्रजनों" का खेल कह के छछूंदर के सर पर चमेली का तेल लगाते फिरते है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में क्रिकेट जैसे जघन्य पाप को किस तरह से यहाँ की जनता पर थोपा जा रहा है। इसके लिए बड़ी सोची - समझी साजिश के तहत ऐसा किया गया। पहले तो बड़ी निर्ममता से अंगरेजी थोप कर लोगों को मूर्ख बनाया गया जिससे बहुत बड़े स्तर पर लोगों की सोचने समझने की क्षमता ही कुंद हो जाए दुसरे धीरे-धीरे क्रमिक रूप से मीडिया के माध्यम से क्रिकेट जैसे पाप को भारत पर थोप दिया गया। इसके पीछे उनका स्वार्थ यही था कि भ्रष्ट लोग इसके माध्यम से न सिर्फ अपना उल्लू सीधा कर सकें बल्कि लोगों को सीधे-सीधे उल्लू बना के अपनी आर्थिक और राजनीतिक रोटियां भी सेंक सकें सीधे-सीधे जनता की बोटियों के साथ। आईपीएल के माध्यम से क्रिकेट का जो घिनौनापन सामने आ रहा है उसके बारे में तो एक 14 साल का बच्चा मुझसे कह रहा था "...ये लोग विदेशियों को इतना पैसा क्यों देते हैं ..." मैंने उससे कहा "...देखो ये जो लोग उन विदेशियों को पैसा देते हैं वो दरअसल कागज पर उतना होता है असल में ये रकम बहुत कम होती है बाकी सब उनके चोरी का पैसा होता है जो कागजी कारवाही से सफ़ेद हो जाता है ..." वो बच्चा बोला "...इसीलिए खिलाडियों का इसके लिए जम के उपयोग किया जाता है और खिलाड़ी भी बहुत अधिक पैसा बनाने के चक्कर में पाप करने लगते हैं ...!" ये एक 14 साल के किशोर की मार्मिक अनुभूति है। दरअसल इसके पीछे भी "मानसिक बीमारी" ही प्रमुख कारक के रूप में दिखती है जो बहुत अधिक अंगरेजी के कारण उत्पन्न हुई है। अपराध के पीछे जो मानसिकता काम करती है वो ये है कि जब मूर्ख या कम बुद्धि का व्यक्ति बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी हो जाता है तो महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए  वो सीधे अपराध का सहारा लेता है कारण सीधा सा है बुद्धिहीन व्यक्ति को प्रक्रिया नहीं दिखती वो केवल उद्देश्य देखता है जो किसी भी तरह प्राप्त करना चाहता है यही कारण है कि क्रिकेट में हर वो जघन्य पाप जिसकी संभवतः आज कल्पना करना भी मुश्किल हो रहा है लेकिन धीरे - धीरे सब सामने आता जा रहा है। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हेंसी क्रोनिये ने भरी अदालत में कहा था "...शायद ही ऐसा कोई मैच होता हो जो फिक्स न होता हो " वो आदमी झूठ नहीं बोल रहा था इसके बावजूद हमारे देश के महामूर्ख एक मूर्ख को भगवान का दर्जा देते हैं क्या पागलपन है। बुद्धिमान व्यक्ति सर्वदा प्रक्रिया पर जोर देता है और वो अपराध से दूर रहता है। क्रिकेट मूर्खों का खेल है और महामूर्ख इसे देखते हैं जैसा कि बर्नाड शॉ ने कहा था इसका आलम ये है कि इसे देखने वाले महामूर्ख इसे देख कर मूर्ख खिलाडियों की टीआरपी बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं फिर उनके विज्ञापन की फीस अचानक कई हजार गुना बढ़ जाती है और यही अंगरेजी बोलने वाले क्रिकेट के महामूर्ख दीवाने मात्र 2 रूपए की वस्तु 50-60 रूपए में खरीदते हैं। किसी भी अर्थशास्त्री (मनमोहन छाप अंगरेजी वाला न हो ) से पूछ के देखिये क्या इससे मुद्रा स्फीति नहीं बढ़ती ???? मजे की बात देखिये कि आज तक इसे किसी भी स्तर पर मुद्दा बनाया ही नहीं गया। क्या क्रिकेट इस देश के साथ घिनौना मजाक नहीं है .... 

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