आखिरकार महेंद्र सिंह धोनी ने ये स्वीकार कर ही लिया कि क्रिकेट खेलने वालों के पास वास्तव में बुद्धि की कमी होती है यानी क्रिकेट वास्तव में मूर्खों का खेल है। चलिए ये काम उन्होंने साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता जार्ज बर्नाड शॉ जिन्होंने कभी कहा था कि क्रिकेट 22 मूर्ख खेलते हैं और 22 करोड़ महामूर्ख देखते हैं, के देश इंग्लैंड में जा कर किया बहुत अच्छा किया। ये देशहित में है कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी भारत को क्रिकेट के जघन्य पाप से मुक्ति मिले।
आनंद का जुगाड़ मने Pleasure Technology जैसे Talking Crows Sitting on Buffalo's Back
Friday, 31 May 2013
नरेन्द्र भाई मोदी का जादू अब अद्भुत चमत्कार में बदलने लगा है। कहते हैं कि जादू सर चढ़ कर बोलता है लेकिन वही जादू जब चमत्कार में बदलने लगे तब ...तब तो समझिये कि विरोधियों को अपनी ही सड़ती लाशों से खुशबू आने लगती है जैसा कि कांग्रेस अपने छतीसगढ़ के "सुकमा काण्ड" पर कर रही है। जैसे - जैसे मोदी का प्रभाव बढ़ रहा है वैसे-वैसे अधर्म माने जाने वाले पाप को धर्म और पुण्य माना जाने लगा है। अब देखिये जैसे शिंदे दिल्ली से जयपुर पहुंचे थे तो आतंकवाद का दिव्य ज्ञान लेकर पुहुँचे थे सो उन्होंने बड़े अजीब दार्शनिक अंदाज में कांग्रेस के कान में "हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद" का मन्त्र फूंका था ...लोग बताते हैं कालांतर में यही मन्त्र खुद उनको और कांग्रेस को ही फूंकने पर उतारू हो गया तो वो खुद ही इस मन्त्र को उतार लिए थे ...अब शिंदे साहब अमेरिका से दिव्य ज्ञान लेकर लौटे हैं आते ही नक्सलियों ने उन्हें अद्भुत तरीके से 27 लोगों की हिट लिस्ट पकड़ा दी ... अभी तक जिस इंटेलीजेन्स विभाग की इंटेलीजेन्सी किराये पर दी गयी थी पता नहीं कैसे कैसे वापस लौट आई और दनादन सूचनाएं प्राप्त होनी शुरू हो गईं। अभी कुछ दिन पहले "सुकमा काण्ड" में घायल व्यक्ति बता रहे थे कि उन नक्सलियों के पास लैपटॉप और टैबलेट भी था और वो अपने कमांडर के संपर्क में थे ... घायल जी ये बताना पता नहीं कैसे भूल गए कि लैपटॉप और टैबलेट से वो नक्सली अपने कमांडर से "फेसबुक" से संपर्क में थे या "ट्विटर" से ...? क्या कीजियेगा नरेन्द्र मोदी के चमत्कार का डर देखते जाईये इन लोगों से क्या-क्या करवाता है। कहा जा रहा है कि यही रफ़्तार रही तो अकेले नरेन्द्र मोदी के दम पर भाजपा को 280 से 330 सीटें आसानी से मिल सकती है, यदि थोडा मेहनत कर दिया जाए तो यही सीटें 350 से ऊपर भी पहुँच जाएंगी ...ध्यान दीजिये ये सीटें अकेले भाजपा की हैं नकि एनडीए की ...वो सब जोड़ दिया जाए तो आंकड़ा 400 से 425 तक भी पहुँच सकता है। क्या अजीब संयोग है पता नहीं किसके कहने पर किसी ने नक्सलियों से 27 लोगों की हिट लिस्ट जारी करवाई जाती है लगता है मेरा पिछले पोस्ट के 3 आंकड़े को बहुत महतवपूर्ण मान लिया गया है इसीलिए 27 की संख्या मतलब 2+7=9/3=3...। लोग बताते फिर रहे हैं कि केन्द्रीय गृहमंत्री अपने पूरे फॉर्म में चल रहे है कहते है कि प्रेसिडेंट मैडम की तरह उनको कोई रहस्यमयी बीमारी नहीं है और अपने आँख के डॉक्टर से मिलने अमेरिका गए थे अतः वो शब्दभेदी बाण चलाना जानते हैं उनका निशाना कभी नहीं चूकता चाहे वो पुणे में हों या दिल्ली में ...उनके भौतिक नेत्र भले किसी की गिरवी हों लेकिन उनके दिव्य नेत्र का कोई जवाब नहीं है ...वो वहीं से बैठे-बैठे देख लेते हैं कि नक्सली दिल्ली में वारदात करने वाले हैं या पुणे में ...हमारे एक्सपर्ट बता रहे थे कि किसी खास कारण से हेलूसिनेशन (ऑडीटरी और विसुअल ) ऐसा बहुत कुछ होता है जो इर्रेलिवेंट होता है। अभी कुछ दिन पहले नरेन्द्र मोदी के डर के मरे लालू जी सेकुलर टोपी पहन कर पटना के गांधी मैदान में अपनी टोपोरियत को चमकाए थे अब देखिये कांग्रेस अपनी टोपोरियत को कैसे चमकाती है। इस पर एक खांटी कांग्रेसी कह रहे थे "...हमको नरेन्द्र मोदी से डर नहीं है ..." मैंने पूछा "...तो फिर किससे डर है ...?" वो बोले "...जोगी ने सारा खेल खराब कर दिया ..." मैंने कहा "...फिर .." वो बोले "...शोले देखा हूँ फिर से ..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब ..." वो थोडा अचकचाते हुए बोले "...गब्बर कहता है कि गब्बर के डर से अगर कोई बचा सकता है तो वो वो है गब्बर ..." मैंने कहा "...अच्छा है शुभकामना आपको ..." उनकी आँखों में नए भविष्य को लेकर नई चमक थी ....
Tuesday, 28 May 2013
छत्तीसगढ़ का "सुकमा काण्ड" अंक पहेली के हिसाब से 27 पर आकर अटक या लटक गया,पता नही क्यों 9 की कमी रह गयी वैसे भी 27 में 9 का भाग दिया जाए तो 3 बचता है फिर 9 में भी 3 का भाग किया जाए तो भी 3 ही आता है। खेल बड़ा मजेदार है देखिये घूम फिर के 3 का ही खेल है। 36 को जोड़ दीजिये तो 9 आता है फिर 6 में से 3 घटा दीजिये तो 3 आता है फिर इसी तीन का 9 में भाग दीजिये तो भी 3 ही आता है। क्या अजीब संयोग है 1 नवम्बर इस राज्य के जन्म तिथि है दोनो को जोड़ने पर भी 3 ही आता है और तो और इसका वर्ष सन 2000 है तारीख और सन को जोड़िये तब भी 3 आता है। बहुत मजेदार खेल हो गया सच में कोई भी प्रयास कर के देखे उसे बहुत मजा आएगा। इस खेल में तब और भी मजा आएगा जब खुद ऐश्वर्या राय भी शामिल हो जाएंगी क्योकि उनका भी जन्मदिन 1 नवम्बर ही है मतलब 3 का मजा उनसे भी। सब लोगों को मिल के इस खेल का मजा लेना चाहिए। अभी तीन साल पहले नक्सली हमले में 72 जवान मरे गए थे दोनों को जोड़िये 9 आता है आज से 3 साल पहले मतलब साफ़ है 3। खेल मजेदार होता जा रहा है एक और नमूना देखिये 3 साल पहले ही दिसम्बर के महीने में ही सी. आर. पी. एफ. के 3 जवान शहीद हुए थे मतलब यहाँ भी 3 और सिर्फ 3। मैंने एक खांटी कांग्रेसी को इस बहुत मजेदार खेल के बताया और ये भी बताया कि कैसे छतीसगढ़ में सारा खेल 3 का है मैंने बहुत खुशी - खुशी उन्हें ये खेल बताया साथ में ये भी बताया आप लोग भी 3 ही हैं आपकी प्रेसिडेंट मैडम, आपके बहुत बुद्धिमान उपाध्यक्षयुवराज और मौनी बाबा मनमोहन सिंह। इतना कहते ही वो भड़क गए और मुझे बुरी तरह डांटते हुए बोले "...इधर लोगों की जान जा रही है और आपको खेल सूझ रहा है ...?" मैंने शांत स्वाभाव से कहा "...काहें नाराज होते हैं ये सब तो होता रहता है आज वो कर्मा जैसे 27 को मारे कल आपको मारेंगे ..." वो और भड़क गए बोले "...आपके कहने मतलब क्या है हम लोगों की कोई औकात नहीं है ..." मैंने कहा "...शांत हो जाईये ये 3 अंकों वाला खेल खेलिए इसका खोज आपके प्रेसिडेंट सर ने बहुत पहले शुरू में ही कर दिया था ..." वो और भड़क गए "...इधर खसी की जान जा रही है और सवादू को सवादे नहीं मिल रहा है ..." मैंने कहा "...यही चीज कर्मा-जोगी एंड कंपनी को सलवा-जुडूम के पहले सोचना चाहिए था न ..." वो बोले "...देखिये हम लोग बहुत दुखी हैं .." मैंने कहा "...आपके कर्मा साहब भी जब भोली- भली आदिवासी कन्याओं पर .....तब वहां भी लोगों को बहुत दुःख होता था ..." वो थोडा शांत हो कर लेकिन अकड़ कर बोले "...वो सब तो समय की मांग थी ..." मैंने कहा "...ये सब भी तो समय की मांग है ..." वो बोले "...एन. आई. ए. जाँच कर रही है कोई भी दोषी बचेगा नहीं ..." मैंने कहा "...ये सभी लोग जानते हैं कि दोषी कौन है कर्मा-जोगी का झगड़ा छत्तीसगढ़ में कौन नहीं जनता ..." वो और भड़क गए "...आपका मतलब कि जोगी इसके लिए जिम्मेदार हैं ..." मैंने कहा "...ये आपकी एन.आई.ए. कुछ दिनों में बता देगी घबराईये मत ..." मैंने कहा " ...वैसे आप लोगो को मौनी बाबा 90 चोर का दर्जा दे दिया गया है बहुत पहले ..." वो थोडा डरते हुए पूछे "...इसका मतलब ...?" मैंने कहा "...इसका मतलब कि 90 जोड़िये तो 9 आता है उसमे अपने तीनमूर्ती के 3 से भाग दे दीजिये बचा कितना 3 ..." वो घबरा कर पूछे "...इसका मतलब ..." मैंने कहा "...इसका मतलब अब तीन अक्षर के कांग्रेस को 3 से 30 सीटें ही मिलेंगी ये आकाशवाणी है ..." मैंने आगे जोड़ा "...छोड़िए मर काट तो लगा ही रहता है जो जैसा किया है उसे तो वैसा मिलना ही चाहिए क्यों ...अब जनता भी नक्सलवादी फॉर्म में कुछ कारनामा करने के मूड में दिख रही है ..." वो कुछ नहीं बोल रहे थे। इस हमले का विरोध किया जाए या समर्थन मुझे समझ में नहीं आ रहा।
Thursday, 23 May 2013
ब्रिटेन के प्रख्यात साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार विजेता जार्ज बर्नाड शॉ ने क्रिकेट के बारे में कहा था "क्रिकेट को 22 मूर्ख खेलते हैं उसे 22 करोड़ महामूर्ख देखते हैं", लेकिन हमारे भारत में कुछ महामूर्ख इसे मूर्खों का खेल कहने के बजाय "भद्रजनों" का खेल कह के छछूंदर के सर पर चमेली का तेल लगाते फिरते है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में क्रिकेट जैसे जघन्य पाप को किस तरह से यहाँ की जनता पर थोपा जा रहा है। इसके लिए बड़ी सोची - समझी साजिश के तहत ऐसा किया गया। पहले तो बड़ी निर्ममता से अंगरेजी थोप कर लोगों को मूर्ख बनाया गया जिससे बहुत बड़े स्तर पर लोगों की सोचने समझने की क्षमता ही कुंद हो जाए दुसरे धीरे-धीरे क्रमिक रूप से मीडिया के माध्यम से क्रिकेट जैसे पाप को भारत पर थोप दिया गया। इसके पीछे उनका स्वार्थ यही था कि भ्रष्ट लोग इसके माध्यम से न सिर्फ अपना उल्लू सीधा कर सकें बल्कि लोगों को सीधे-सीधे उल्लू बना के अपनी आर्थिक और राजनीतिक रोटियां भी सेंक सकें सीधे-सीधे जनता की बोटियों के साथ। आईपीएल के माध्यम से क्रिकेट का जो घिनौनापन सामने आ रहा है उसके बारे में तो एक 14 साल का बच्चा मुझसे कह रहा था "...ये लोग विदेशियों को इतना पैसा क्यों देते हैं ..." मैंने उससे कहा "...देखो ये जो लोग उन विदेशियों को पैसा देते हैं वो दरअसल कागज पर उतना होता है असल में ये रकम बहुत कम होती है बाकी सब उनके चोरी का पैसा होता है जो कागजी कारवाही से सफ़ेद हो जाता है ..." वो बच्चा बोला "...इसीलिए खिलाडियों का इसके लिए जम के उपयोग किया जाता है और खिलाड़ी भी बहुत अधिक पैसा बनाने के चक्कर में पाप करने लगते हैं ...!" ये एक 14 साल के किशोर की मार्मिक अनुभूति है। दरअसल इसके पीछे भी "मानसिक बीमारी" ही प्रमुख कारक के रूप में दिखती है जो बहुत अधिक अंगरेजी के कारण उत्पन्न हुई है। अपराध के पीछे जो मानसिकता काम करती है वो ये है कि जब मूर्ख या कम बुद्धि का व्यक्ति बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी हो जाता है तो महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए वो सीधे अपराध का सहारा लेता है कारण सीधा सा है बुद्धिहीन व्यक्ति को प्रक्रिया नहीं दिखती वो केवल उद्देश्य देखता है जो किसी भी तरह प्राप्त करना चाहता है यही कारण है कि क्रिकेट में हर वो जघन्य पाप जिसकी संभवतः आज कल्पना करना भी मुश्किल हो रहा है लेकिन धीरे - धीरे सब सामने आता जा रहा है। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हेंसी क्रोनिये ने भरी अदालत में कहा था "...शायद ही ऐसा कोई मैच होता हो जो फिक्स न होता हो " वो आदमी झूठ नहीं बोल रहा था इसके बावजूद हमारे देश के महामूर्ख एक मूर्ख को भगवान का दर्जा देते हैं क्या पागलपन है। बुद्धिमान व्यक्ति सर्वदा प्रक्रिया पर जोर देता है और वो अपराध से दूर रहता है। क्रिकेट मूर्खों का खेल है और महामूर्ख इसे देखते हैं जैसा कि बर्नाड शॉ ने कहा था इसका आलम ये है कि इसे देखने वाले महामूर्ख इसे देख कर मूर्ख खिलाडियों की टीआरपी बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं फिर उनके विज्ञापन की फीस अचानक कई हजार गुना बढ़ जाती है और यही अंगरेजी बोलने वाले क्रिकेट के महामूर्ख दीवाने मात्र 2 रूपए की वस्तु 50-60 रूपए में खरीदते हैं। किसी भी अर्थशास्त्री (मनमोहन छाप अंगरेजी वाला न हो ) से पूछ के देखिये क्या इससे मुद्रा स्फीति नहीं बढ़ती ???? मजे की बात देखिये कि आज तक इसे किसी भी स्तर पर मुद्दा बनाया ही नहीं गया। क्या क्रिकेट इस देश के साथ घिनौना मजाक नहीं है ....
Friday, 17 May 2013
नरेंद्र भाई मोदी का जादू अब कुछ लोगों के लिए एटम बम लगने लगा है इस बम के कारण डर का आलम ये है कि जो जहाँ है वहीं से अपनी "टोपोरियत" को चमकाना शुरू कर दिया है। कुछ लोगों ने हथियार डाल के युवा के नाम पर बकलोल के हाथ में बागडोर भी सौंप दी है। पता नहीं इसी कारण देखा-देखी में या किसी और कारण से लालू प्रसाद यादव ने सेकुलरिज्म का टोपी पहन के जब गाँधी मैदान अपनी "टोपोरियत" दिखाई तो नितीश कुमार फिर भाजपा के रजाई में दुबकने चल पड़े पता नहीं इस गर्मी में उनको नरेन्द्र भाई वाली रजाई की गर्मी बर्दाश्त हुई या नहीं लेकिन इतना तो तय है कि बहुत से लोग दमकल ले के खड़े थे, जानकार बता रहे थे कि केंद्र से उनको "स्पेशल दर्जा" के तहत मिला था। खैर बात "टोपोरियत" की थी लालू प्रसाद यादव की तो लोग बता रहे हैं कि करीब डेढ़ लाख लोगों ने उनकी "टोपोरियत" की सरे आम दिनदहाड़े सीना ठोक के दीक्षा ली। अभी कुछ साल पहले जब बेउर जेल में चारा घोटाले में गए थे तब उन्होंने राबड़ी देवी को ही नियुक्त किया था अपनी "टोपोरियत" की रक्षा करने के लिए, काजने काहें उनको किसी और पर उनको भरोसे नहीं हो रहा था। उस समय किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हुई थी और राबड़ी देवी ने हंसी - खुशी लालू यादव के "टोपोरियत" को न सिर्फ बर्दाश्त किया था बल्कि बड़े जातन से संभाला भी था। जब वो जेल में थे तो बहुत कुछ पता नहीं चल पा रहा था कि आखिर उनका टाइम कैसे पास होता है। लेकिन अब पता चला है कि वास्तव में वो तो "टोपोरियत" पर गहन चिंतन या चिंता कर के टाइम पास कर रहे थे। लेकिन जब तक वो तैयार होते तब तक उनकी "टोपोरियत" पर नितीश कुमार का कब्ज़ा हो चुका था। उनके ही लोग बताते फिर रहे थे कि ये सब नितीश कुमार ने गलत जगह पर गलत टोपी पहन के किया था लिहाजा इसे धोखे की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। अब उनकी "टोपोरियत" की पराजित विरासत को सँभालने के लिए लगता है उनकी शक्ति कम पड़ रही है इसीलिए नाती-पोतों की फौज को इकठ्ठा कर रहे हैं। इस बारे में मैंने एक राजद नेता से पूछा तो कहने लगे "...देखिये फौज की बहुते जरूरत है ..." मैंने कहा "...नरेन्द्र भाई से इतना डर ...!" राजद नेता बोले "...कांग्रेस भी तो डर रही है तब्बे तो सिब्बल साहब पद-भार सँभालते ही अपना डर जग जाहिर कर दिए ...!" मैंने कहा "...क्या वाकई डर बहुत ज्यादा है ...?" वो बोले "...देखिये राहुल बाबा को उपाध्यक्ष बनते ही अपनी दाढी बनवानी पड़ी इसी से आप अंदाजा लगा लीजिये..." मैंने कहा "...इसीलिए आप भी अपने नाती-पोतों की दाढी बनवा के मैदान कुदा रहे हैं ...!" वो बोले "...देखिये ऐसा करना जरूरी है हमारे पास मैनपॉवर है वो भी मुफ्त का सो यूज़ करने में क्या हर्ज़ है ...?" मैंने कहा "...लालू जी तो भैंस की सींग पकड़ कर भैंस पर चढ़ते थे लेकिन क्या उनका नया मैनपॉवर ऐसा कर पाएगा ...?" राजद नेता बोले "...बिल्कुल करेगा काहे नहीं करेगा ...?" मैंने कहा "...बिहार में आपका यंग मैनपॉवर चलेगा क्या ...?" वो बोले "...कर्नाटक में जब राहुल बाबा चल सकते हैं फिर ये तो अपने बिहार है ..." मैंने कहा "...लेकिन कर्नाटक में तो राहुल बाबा ने 30 सीटों पर प्रचार किया और केवल 12 ही जीत पाए वहीं नरेन्द्र भाई ने भी 30 सीटों पर प्रचार किया और 22 सीट निकाल लिए ..." वो बोले "...यही तो असली डर है ..." मैंने कहा "...तो ..." वो बोले "...नितीश को रोकेंगे ..." मैंने कहा "...कांग्रेस में आने से ...?" वो थोडा कंफ्यूज हो गए और कुछ भी बोलने से मना कर दिया ...
Thursday, 16 May 2013
तोता-मैना की कहानी से बड़े-बड़े सूरमा प्रेरणा लेते फिरते थे लेकिन कहानी बदनाम हो गयी, मैना तो इस कदर पहलवान निकली कि बेचारे तोता को को निरा पालतू बना डाला था। लेकिन मजा देखिये वही मैना जब तोते को किसी की ओर लहकाती थी तो बड़े - बड़े लोग जो खुद को हाथी, तीरंदाज, साईकिल पंक्चरिस्ट और न जाने क्या-क्या समझते थे भीगी बिल्ली बन जाते थे। लेकिन माननीय से देखा नहीं गया सो उन्होंने ठान ही लिया कोयले से बेचारे तोता के मुंह पे कालिख पुतने से बचाएगे सो उन्होंने उपाय करना शुरू किया तो मैना की हालत ही इसलिए खराब हो गयी क्योंकि अब तोता उतारू हो गया मैना को सबक सिखाने के लिए। जानकार बताते हैं कि मैना की नींद उडी हुई है लिहाजा बहुत करीने से इस बदनाम हो चुकी कहानी को "नामी" करने का प्रकिया मैना ने उसी आड़ में शुरू कर दिया है जिसके आधार पर तोते को स्वतंत्र किया जाना है वो भी उच्च निगरानी में। इसके लिए मैना ने जिन पांच सिपहसालारों को तैनात किया है जानकार बताते हैं तोता अगर स्वतंत्र हुआ तो उनको भी कच्चा चबा जाएगा इसलिए उघटापैंची चालू है। इस पर एक खांटी कांग्रेसी कह रहे थे "...माननीय को ऐसा नहीं करना चाहिए ..." मैंने उनसे पूछा "...तो क्या करना चाहिए ...?" खांटी कांग्रेसी बोले "...माननीय को हद में रहना चाहिए ..." मैंने बेरुखी से कहा "...जो आप हद पार करते हैं उसका क्या ...?" खांटी बोले "...जो कहा जा रहा है सही कहा है ..." मैंने कहा "...सरकार को आगे बढ़ने के ये कौन सी टेक्नोलॉजी है ...?" उन्होंने मुझसे पूछा "...क्या मतलब ..." मैंने कहा "....किसी कुत्ते की पूंछ से लटक कर ऐसा करने की क्या जरूरत है ...?" खांटी बोले "...राजनीति में कुछ भी संभव है ...!" मैंने कहा "...मैंने पहली बार देखा है किसी कुत्ते को पीछे से भौंकते हुए ...ये तो बिल्कुल सरकार चलने की अत्याधुनिक जेट प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी है ...इसीलिए अमेरिका के हाथों भारत को बेचना चाहते हैं ..." खांटी थोडा गुस्से में बोले "...आप लोगो को मीन-मेख निकालने के सिवा कोई और काम नहीं है क्या ...?" मैंने कहा "...तोते को तोड़ने - मरोड़ने वाले नप गए तोते को भूख लगी तो एक और लोहा ब्रांड सिपहसलार को कच्चे चबा गया ...बावजूद इसके कि वो बकरे के साथ और भी शक्तिशाली थे ...!" खांटी बोले "...आजादी के मुद्दे पर खुद उधर से ही प्रस्ताव आया है कि सीमित आजादी चाहिए ...!" मैंने कहा "...तोते की चोंच में मैना ने फिर से जबरदस्ती मिर्ची के बजाय कोयला ठूंसने का प्रयास कर रही है ..." खांटी बोले "...देखिये हम सिस्टम को बाईपास नहीं कर सकते ..." मैंने बोला "...सीमित का मतलब क्या है ...? आज़ादी तो आजादी है ..." खांटी बोले "...राजनीति में बहुत कुछ देखना पड़ता है ...!" मैंने कहा "...मतलब भ्रष्टाचार और चोरकटई के सहारे ही सब कुछ फिर से होगा ..." खांटी बोले "...जनता को स्थिरता चाहिए ..." मैंने तल्खी से पूछा "...जनता को या आपको भ्रष्टाचार और चोरकटई कर के बचने के लिए..." खांटी बोले "...जनता को चाहिए ..." मैंने पूछा "...इससे तो अच्छा है तोता आज़ाद हो जाए ..." खांटी बोले "...जनता का जो नुकसान होगा उसकी भरपाई कौन करेगा ..." मैंने कहा "...आजाद तोता ही सक्षम होगा रिकवरी के लिए ..." खांटी पता नहीं किसको फ़ोन मिलाने लगे तो मुझे लगा कि अब वहां से खिसक लेना ही बेहतर है ....मैंने खांटी को नमस्कार कहा ...
Tuesday, 7 May 2013
बन्दर की पूंछ भी कुत्ते की पूँछ जैसा व्यवहार करती है ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है। जहाँ तक मेरी जानकारी है बन्दर अपनी पूछ से अपने को संतुलित करता है छलांग लगाते समय लेकिन ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि एक बन्दर अपनी पूंछ से भारतीय राजनीति को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है वो भी "कल्याणकारी अर्थशास्त्र" के अंदाज़ में। अभी तो "अंडरएचीवर" मिस्टर मौनी बाबा अपने अर्थशास्त्र के दुरमुस से मिर्ची को चाशनी में डुबो के जनता के मुंह में ठूंसते जा रहे हैं लेकिन बीच में लंदन से एक पूंछ आ टपकी यहाँ की राजनीति सँभालने के लिए। पता नही उन्होंने अपने अर्थशास्त्र की पूंछ से भी किसी भूखे की भूख मिटाई या नहीं लेकिन इतना जरूर है कि महाशय भूखे भ्रष्टाचारियों की भूख जरूर मिटाना चाहते हैं। मैंने कांग्रेसी अनर्थशास्त्री से इस बारे में पूछा तो कहने लगे "...देखिये वो नोबेल पुरस्कार विजेता हैं ..." मैंने पूछा "...बताने के लिए धन्यवाद ...लेकिन इससे भारत को कितना लाभ हुआ ..." वो बोले "...हमें उनके ओपीनियन के जरूरत थी ..." मैंने थोड़ी तल्खी से पूछा "...9 साल तक भूख से मरने वाले कितनी लाशों को गिना उन्होंने ...?" वो थोडा सकपकाते हुए बोले "...उनका काम लाशें गिनना नहीं है ...' मैंने कहा "...आपको पुनःधन्यवाद मेरी जानकारी पुख्ता करने के लिये लेकिन उनका काम लाशें गिनना नहीं है तो ...!" वो गुस्से में बोले "...तो क्या ...वो भाजपा के खिलाफ बोले हैं तो क्या गलत किया ...?" मैंने तल्खी से पूछा "...नोबेल पुरस्कार पाने के इतने सालों के बाद भारतीय संसद पर ही उनको अपना पूंछ लहराने को मिला है ...?" वो कॉन्फिडेंस से सफाई देते हुए बोले "...भाजपा संसद चलने नहीं दे रही ..." मैंने पूछा "...इसका क्या मतलब लंदन से कल्याणकारी पूंछ हिलवाएंगे ...? उन्होंने उत्तर दिया "...उन्होंने भाजपा से पूछा है तो भाजपा को उत्तर देना चाहिए ...!" मैंने कहा "...बन्दर की पूँछ कुत्ते की पूंछ जैसी हरकत करने पर क्या आप थपरी पीटते हैं ...?" वो बोले "...हाँ पीटते हैं ..." मैंने कहा "...फिर तो उन्होंने जितनी लाशों पर अपना पूंछ फिराया है वो बता दें ..." उन्होंने मुझसे पूछा "...इससे क्या होगा ..?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...भाजपा को भी उत्तर देने में कोई दिक्कत नहीं होगी ..." वो बोले "...ये तो बहनेबाजी है ..." मैंने कहा "...ठीक है तो वो साहब ये बता दें कि उनके 'कल्याणकारी अर्थशास्त्र' से कितनो का कल्याण हुआ है ...?" वो थोडा लडखडाते हुए बोले "...देखिये ...वो ..वो ...मैं ...क्या है कि ...उनकी अब बहुत जरूरत है ..." मैंने पूछा "...नए प्रधानमंत्री के रूप में या ...?" वो तुरंत बात काटते हुए बोले "...नहीं नहीं भाजपा से सवाल करना जरूरी था बस ..." मैंने कहा "...ये काम तो कोई भी कर सकता था इसके लिए लंदन से पूंछ फिरवाने की क्या जरूरत थी ...?" वो बोले "...बात इंडिया की है ..." मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा "...तो सर्कस दिखने के लिए विदेशी ब्रांड बन्दर कुक्कुर स्टाइल में पूंछ हिलेगा तभी होगा ...!" वो कड़े आवाज में बोले "...आप भाजपा से कहिये संसद चलने दे ...!" मैंने कहा "...ये तो वही बात हुई ...खुद अपना सिर फोड़ कर दूसरों को पत्थर मारना ..." वो बोले "...हम यहाँ राजनीति करने आए हैं ...कुछ और नहीं..." मैंने बीच बात काटते हुए कहा "...इसके लिए किसी की भी पूंछ किसी की भी स्टाइल में हिलवा या फिरवा सकते हैं ....क्यों ...?" अब उनको मेरी बातों से दिक्कत होने लगी थी ...मुझे भी अपना पैकअप कर चलना उचित लगा ....
Monday, 6 May 2013
आज कल कांग्रेसी सरकार में पूंछ उठव्वल चल रहा है बड़े सूरमा बने फिर रहे थे लेकिन आलम ये है कि इस सरकार में जिसकी पूंछ उठा के देखो वही मादा निकल रही है....मौनी बाबा की पूंछ उठी वो भी मादा ही निकले...बड़े ताम-झाम थे ए. के. एंटनी के रक्षा मंत्री के मर्द के रूप में लेकिन उनकी भी पूंछ उठी तो जनाब जो निकले वो किसी मादा से कम नहीं थे। सारी मादाएं मर्दानगी का "डोमकच नाच" खेल रही थीं तभी बीच में ज्योतिरादित्य राजे सिंधिया जिनकी अभी पूंछ उठ नहीं सकी है उम्मीद है जल्दी ही उठ जाएगी, ने अपने युवराज की तुलना नरेन्द्र भाई मोदी से कर डाली। यकीन मानिये मुझे तो ऐसा लगा जैसे कोई यमराज को सामने देखकर पता नही किस उम्मीद में "डोमकच" करते हुए गाना गा रहा हो "...देखा है पहली बार साजन की आँखों में प्यार ...नमस्कार..." उनकी दिलेरी की दाद देनी पड़ेगी। मेरे कुटिल मुस्कान को देखकर जलेबी खाते हुए एक खांटी कांग्रेसी ने मुझे धमकी भरे अंदाज में डांटते हुए कहा "...आपको ऐसी कुटिलता शोभा नहीं देती..." मैंने ठहाका लगते हुए कहा "...घबराईये नहीं जल्दी ही सिंधिया साहब की भी पूंछ उठ जाएगी..." उन्होंने प्रतिउत्तर में कहा "...हमारे उपाध्यक्ष का कोई कुछ नहीं कर सकता ..." मैंने कहा "...क्यों बंसल साहब की तरह उनकी भी बलि चढाने का इरादा है...?" उन्होंने कहा "...कांग्रेस की नीतियां बड़ी ठोस होती हैं ..." मैंने कहा "...क्यों उनकी पूंछ आर्डर दे के लोहे की बनवाई गयी है क्या ...?" उन्होंने मुझसे पूछा "...क्या मतलब ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...मतलब ये कि क्या उनकी पूंछ इतनी भारी है कि कोई उठा ही सकता...?" वो बड़े कॉन्फिडेंस में बोले "...बिल्कुल..." मैंने उनसे पूछा "...क्यों सुब्रमनियम स्वामी जी ने कोई बड़ा काम नहीं किया ...?" उन्होंने उत्तर देते हुए कहा "...उनका कोई पोलिटिकल आधार ही नहीं है ..." मैंने कहा "...फिर क्या उम्मीद करते हैं आप ...?" उन्होंने चुनौती देते हुए कहा "...कोई कुछ कर के दिखाए तो सही ..." मैंने कहा "...क्या आपके उपाध्यक्ष जी पूंछ स्वयम्वर में राखी जाएगी जो उनकी पूंछ उठा देगा उसके गले में वर माला ..." वो बीच में बात कटते हुए बोले "...देखए आप चुनौती को सिर्फ चुनौती के रूप में लीजिये मजाक में नहीं..." मैंने कहा "...सिंधिया साहब भी उसी नाच में शामिल हो के खुद को चुनौती दे रहे हैं ...इसमें मेरा क्या दोष...?" वो बोले "...उन्होंने सच्चाई को बयां किया है ..." मैंने उनसे सवाल किया "...वो 15 मंत्री और कांग्रेस पार्टी के अनेक पदाधिकारी जिनकी पूंछ उठी और मादा निकले ...वो ...? वो तपाक से बोले "...वो लोग इस्तीफ़ा नहीं देंगे ..." मैंने भी कड़े आवाज में पूछा "...तो क्या देंगे वो लोग ...?" वो जलेबी वाले को पैसा दे जाने लगे ...मेरे बार-बार पूछने पर भी वो चुप-चाप चले गए कोई जवाब नहीं दिया ........
Sunday, 5 May 2013
कुत्ता जब अपने मालिक या मल्लिका को काटने को आतुर हो जाता है तो उसे पागल घोषित करके मार डाला जाता है लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये है कि जब मालिक या मल्लिका पागल हो जाए तो कुत्ता क्या करे ...कैसे उनको पागल घोषित कर के अपने परम कर्तव्य का निर्वहन करे ...? लेकिन कई अवसरों पर ये भ्रम की स्थिति भैंस के चारे में आग भी लगा देती है जैसा कि मामा-भांजे के खेल में दिख रहा है। सीबीआई वाले बांस ले के बंसल साहब के भांजे के सामने भांजने लगे तो बड़ा आश्चर्य हुआ उससे भी ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब उस भाजम-भाज में बंसल साहब का भांजा अपने मंडली समेत उसकी चपेट में आ गया। इस्तीफ़ा के मुद्दे पर बंसल साहब बांस ले कर उछल-कूद मचाते हुए ईमानदारी का नाच दिखाने लगते हैं ...खैर मैंने एक कटीले और खांटी से पूछा तो वो कहने लगे "...बंसल साहब जी ने खुद जाँच की मांग की है ..." मैंने पूछा "...केवल अपने खिलाफ ...या सभी ...?" वो तुरंत बीच में ही बात काटते हुए बोले "...नहीं नहीं केवल अपने भांजे के खिलाफ ..." मैंने पूछा "...घूस लेने में उनको क्या दिक्कत थी आखिर भांजा ही तो था ..." वो बोले "...बंसल साहब बड़े ईमानदार हैं ..." मैंने कहा "...हाँ ठीक वैसे ही जैसे मनमोहन सिंह ने 100 बार से अधिक मंहगाई कम करने का वादा किया और मंहगाई कम हो गयी ...!" उन्होंने तिलमिला के मुझसे पूछा "...आपका मतलब ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...आप ही लोग फटे ढोल से पखावज की मधुर ध्वनि निकाल सकते हैं ...? वो मंद-मंद मुस्कुराने लगे तो थोड़ी देर बाद मैंने पूछा " ...वैसे सीबीआई किसके इशारे पर बंसल साहब के भांजे का फ़ोन ट्रैप कर रही थी ...?" वो बोले "...ये सवाल सीबीआई से पूछिए ..." मैंने कहा "....वो तो कर्तव्य विमूढ़ हैं ...!" उन्होंने मुझसे पूछा "... क्यों ...?" मैंने कहा "...वो कह रहे थे हम तो आदेश का पालन कर रहे थे ..." वो सकपकाते हुए बोले "...देखए हमारी प्रेसिडेंट मैडम बहुत ईमानदार हैं ..." मैंने कहा "...अभी कल ही उन्होंने पोस्ट किया है आपकी प्रसीडेंट मैडम के खिलाफ मुकद्दमा चलने के लिए पीएमओ में अर्जी दी है ..." उन्होंने हडबडाहट में कहा "...तो क्या हुआ ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...क्यों सुब्रमनियन स्वामी ने पूरा खुलासा किया है अपने अर्जी में ...!" उन्होंने गुस्से में मुझसे पूछा "...किस बात का खुलासा ...?" मैंने कहा "...उनकी पूरी अवैध कमाई 2G और अन्य घोटाले में बन्दर बाँट वो भी अपनी बहनों के साथ ...यहाँ से लेकर इटली तक ...कहीं ऐसा तो ...!" उन्होंने गुस्से में बात काटते हुए मुझसे पूछा "...आपका मतलब क्या है ..." मैंने कहा "...वही जो आपके समझ में आ रहा है ...!" उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ लिहाजा उन्होंने गुस्से में मुझसे पूछा "...मुझे क्या समझ में आ रहा है ...?" मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...सुब्रमनियन स्वामी जी के अर्जी के बाद आपकी प्रेसिडेंट मैडम ने सीबीआई को बांस ले के बंसल साहब की ओर लहका दिया ..." वो बोले "...उससे क्या होगा ..." मैंने कहा "...लोगों का ध्यान बंटेगा और क्या ...छोटी सी बात है ..." उन्होंने मुझे शांत करते हुए कहा "...देखिये ऐसी कोई बात नहीं है ..." मैंने कहा "...तो आज ही सीबीआई बंसल साहब की पचलकड़ी करने क्यों निकल पडी ..." वो चुप रहे थोड़ी देर बाद मैंने कहा "...CWG, जीजाजी, 2G, LIC, कोयला, अंतरिक्ष, मनरेगा, कर्जमाफी और ना जाने कौन कौन घोटाला ...लेकिन आज ही ...सीबीआई को क्या हो गया कि अपने मालिक को काटने दौड़ पडी ....?" वो अपने एसी का कुलिंग पॉइंट बढाने में व्यस्त हो गए ...तो मैंने भी चलना उचित समझा ....
Saturday, 4 May 2013
मेरे पिछले पोस्ट से कुछ लोग आहत हुए, उनकी भावनाओं को ठेस पहुँची इसके लिए मै उनसे करबद्ध क्षमा प्रार्थी हूँ जिसमे विभिन्न क्षेत्रों के प्रोफेशनल लोग शामिल हैं दरअसल मेरा उद्देश्य उन लोगों को ठेस पहुँचाना नहीं था बल्कि विषय की भयानक वास्तविकता की और ध्यान दिलाने लिए प्रेरित (आप उकसाना समझ सकते हैं ) करना था। मै मीडिया के लोगों से खास तौर पर क्षमा प्रार्थी हूँ यदि उनको मेरे किसी वक्तव्य से ठेस लगी हो तो। लेकिन मेरा उनसे निवेदन है कि मुद्दा कोई भी हो उसे उसके वास्तविक धरातल और उसके सम्पूर्ण पहलू के सन्दर्भ में ही प्रेषित होना चाहिए। मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि वो लोग बड़े ह्रदय के हैं मुझे अवश्य क्षमा कर देंगे।
कुछ लोगों ने घोर आपत्ति दर्ज कराई कि मै विदेशियत (म्लेच्छ्पना) के विरुद्ध क्यों हूँ चाहे वो बोली या किसी अन्य रूपों में क्यों न हो। मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि कृपया वो लोग भाषा जो व्यक्तित्व के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिसमे व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (intelligence) सबसे महत्वपूर्ण होती है, के सन्दर्भ में हुए शोध-कार्यों का अध्ययन करें। भाषा ही है जो व्यक्ति को अपने परिवेश से सीधे सम्बद्ध करती है जिससे उसके प्रत्येक स्तर पर संवेदनशीलता का विकास होता है ये स्तर अनंत हो सकते हैं। संवेदनहीन, बुद्धिहीन व्यक्ति आखिर किस काम का होगा ? आखिर क्या कारण है कि विश्व का कोई भी देश विदेशी भाषा में विकसित नहीं हो सका है ? रूसी माध्यम सिद्धांतकार गेन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है " में लिखा है " साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते , उनकी परिवर्तन कारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत या विदेशी भाषा हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खडी करती है। हमारी नैतिकता, हमारे संस्कार दिन पर घटते जा रहे हैं, हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं, आखिर क्या कारण है कि जैसे-जैसे अंगरेजी बढ़ती जा रही है भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। आज स्थिति ये कि यदि कोई व्यक्ति इमानदार है तो वही उसकी योग्यता बन जा रही है जबकि इमानदारी व्यक्ति का गुणधर्म होता है। आज हमें इमानदार बनने के लिए स्वयं से ही संघर्ष करना पड़ रहा है। मातृभाषा व्यक्ति के इमानदारी को कैसे और किस हद विकसित करती है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि इमानदारी शब्द कोई संस्कृत या हिंदी संस्करण नहीं है ये गुणधर्म इतना स्वभाविक और मौलिक है।
हमारे समाज का नैतिक स्तर कितना गिर चुका है कि हमें आभास तक नहीं होता आलम ये है कि हमारे कुछ प्रोफेशनल फेसबुक मित्रो ने स्वयं को "दूसरा भगवान" तक कह डाला वो अपने ही मुख से जबकि स्थिति इसके विपरीत है जो लोग खुद को दूसरा, तीसरा या चौथा भगवान, अवतार या देवदूत समझते हैं उन्हें DSM (IV) देखना चाहिए। जो लोग "बिना आलोचनात्मक दृष्टि के विदेशियत या विदेशी बोली को स्वीकार या प्रदर्शन करते हैं वे दरअसल "मानसिक रूप से बीमार" है उन्हें एंग्जायटी डिसऑर्डर है (गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) इसकी व्याख्या यदि हम करें तो यदि आप आलोचनात्मक दृष्टि रखेंगे तो अपनाने कोई प्रश्न ही नहीं है। क्या ये भद्दा मजाक नहीं है हम शिक्षा के नाम पर बहुत बड़े स्तर पर लोगों को "मानसिक रोगी" बनाया जा रहा है। अब एक मानसिक रोगी के पास बुद्धि कितनी होगी इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। इसीलिए विद्वान राहुल देव ने अभी हाल ही मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में इसे "राष्ट्रीय मूर्खता" कहा है।
एक बार पुनः मै क्षमा प्रार्थी हूँ यदि अनजाने में मुझसे किसी को ठेस पहुँची हो तो ....
कुछ लोगों ने घोर आपत्ति दर्ज कराई कि मै विदेशियत (म्लेच्छ्पना) के विरुद्ध क्यों हूँ चाहे वो बोली या किसी अन्य रूपों में क्यों न हो। मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि कृपया वो लोग भाषा जो व्यक्तित्व के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है जिसमे व्यक्ति की बुद्धिमत्ता (intelligence) सबसे महत्वपूर्ण होती है, के सन्दर्भ में हुए शोध-कार्यों का अध्ययन करें। भाषा ही है जो व्यक्ति को अपने परिवेश से सीधे सम्बद्ध करती है जिससे उसके प्रत्येक स्तर पर संवेदनशीलता का विकास होता है ये स्तर अनंत हो सकते हैं। संवेदनहीन, बुद्धिहीन व्यक्ति आखिर किस काम का होगा ? आखिर क्या कारण है कि विश्व का कोई भी देश विदेशी भाषा में विकसित नहीं हो सका है ? रूसी माध्यम सिद्धांतकार गेन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है " में लिखा है " साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते , उनकी परिवर्तन कारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत या विदेशी भाषा हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खडी करती है। हमारी नैतिकता, हमारे संस्कार दिन पर घटते जा रहे हैं, हम संवेदनहीन होते जा रहे हैं, आखिर क्या कारण है कि जैसे-जैसे अंगरेजी बढ़ती जा रही है भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। आज स्थिति ये कि यदि कोई व्यक्ति इमानदार है तो वही उसकी योग्यता बन जा रही है जबकि इमानदारी व्यक्ति का गुणधर्म होता है। आज हमें इमानदार बनने के लिए स्वयं से ही संघर्ष करना पड़ रहा है। मातृभाषा व्यक्ति के इमानदारी को कैसे और किस हद विकसित करती है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि इमानदारी शब्द कोई संस्कृत या हिंदी संस्करण नहीं है ये गुणधर्म इतना स्वभाविक और मौलिक है।
हमारे समाज का नैतिक स्तर कितना गिर चुका है कि हमें आभास तक नहीं होता आलम ये है कि हमारे कुछ प्रोफेशनल फेसबुक मित्रो ने स्वयं को "दूसरा भगवान" तक कह डाला वो अपने ही मुख से जबकि स्थिति इसके विपरीत है जो लोग खुद को दूसरा, तीसरा या चौथा भगवान, अवतार या देवदूत समझते हैं उन्हें DSM (IV) देखना चाहिए। जो लोग "बिना आलोचनात्मक दृष्टि के विदेशियत या विदेशी बोली को स्वीकार या प्रदर्शन करते हैं वे दरअसल "मानसिक रूप से बीमार" है उन्हें एंग्जायटी डिसऑर्डर है (गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) इसकी व्याख्या यदि हम करें तो यदि आप आलोचनात्मक दृष्टि रखेंगे तो अपनाने कोई प्रश्न ही नहीं है। क्या ये भद्दा मजाक नहीं है हम शिक्षा के नाम पर बहुत बड़े स्तर पर लोगों को "मानसिक रोगी" बनाया जा रहा है। अब एक मानसिक रोगी के पास बुद्धि कितनी होगी इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। इसीलिए विद्वान राहुल देव ने अभी हाल ही मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में इसे "राष्ट्रीय मूर्खता" कहा है।
एक बार पुनः मै क्षमा प्रार्थी हूँ यदि अनजाने में मुझसे किसी को ठेस पहुँची हो तो ....
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" द्वारा प्रतिभा का विकास
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" पारंपरिक मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा से कहीं बहुत विकसित और आधुनिक विज्ञान है जिसके माध्यम से मानव मन (human mind) को तेजी से "सशक्त" कर किसी भी स्तर तक कर विकसित या पहुँचाया जा सकता है। पारंपरिक मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा के विपरीत "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" समाज के लिए एक वरदान है जिससे हर स्तर के हर वर्ग का हर व्यक्ति इसके माध्यम से अपनी मौलिक विलक्षण प्रतिभा के रूप में वरदान के रूप में सरलता से प्राप्त कर सकता है चाहे वो बिज़नसमैंन, डॉक्टर, इंजिनियर, के.जी. से लेकर पीएचडी तक छात्र हों, प्रोफेशनल कोर्सेज के छात्र हों, कम्पटीशन के छत्र हों, महिलाएं हों, कोई भी हो इसके माध्यम से व्यक्ति की मानसिकता को किसी भी ऊँचाई तक पहुँचाया जा सकता है जो किसी भी प्रकार से किसी अन्य के सन्दर्भ में न हो कर व्यक्ति के अपने व्यक्तित्व पर ही आधारित होता है इसलिए किसी भी प्रकार के तनाव, दबाव, मानसिक और शारीरिक परेशानी के होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, अन्य मनोवैज्ञानिक वीडियों के विपरीत ये उन्नत विधा अति आनंदकारी भी है। चूंकि ये सब बिना किसी दवा के होता है अतः साइड इफ़ेक्ट के सम्भावना भी बिल्कुल नहीं रहती। इसके सफलता की दर 100% है अभी तक किसी भी केस के असफल होने की कोई सूचना नहीं है बशर्ते वो दिए गए पूरे निर्देशों का पालन किया हो।
यद्यपि इस उन्नत और अतिविकसित विज्ञान की सफलता के पीछे कई करक और कारण हैं उसमे से सबसे महत्वपूर्ण है इस विधा के पास हर प्रवृत्ति के सूक्ष्मतम स्तर (micro level diagnosis) तक समस्याओं की बिल्कुल सटीक डायग्नोसिस कर लेने के क्षमता जो अन्यंत्र किसी विधा में है ही नहीं। पूछ कर या प्रश्नावली के माध्यम से पूरे तथ्य लिए ही नहीं जा सकते और फिर हमारा तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क "सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं" के सिद्धांत (all or none theory) पर कार्य करता है इसलिए बहुत जरूरी है कि मस्तिष्क को किसी विशेष में लेन के लिए उससे सम्बंधित सम्पूर्ण तथ्य दिए जाएँ अन्यथा मस्तिष्क उन तथ्यों का उग्रता से प्रतिकार कर देगा। इस "प्रतिकार" से भी बहुत बड़ी मानसिक समस्या हो सकती है, जैसा कि सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही "मानसिक सशक्तिकारण" इसीलिए संभव है क्योंकि इससे मस्तिष्क को पूरे तथ्य सरलता से उपलब्ध
यद्यपि इस उन्नत और अतिविकसित विज्ञान की सफलता के पीछे कई करक और कारण हैं उसमे से सबसे महत्वपूर्ण है इस विधा के पास हर प्रवृत्ति के सूक्ष्मतम स्तर (micro level diagnosis) तक समस्याओं की बिल्कुल सटीक डायग्नोसिस कर लेने के क्षमता जो अन्यंत्र किसी विधा में है ही नहीं। पूछ कर या प्रश्नावली के माध्यम से पूरे तथ्य लिए ही नहीं जा सकते और फिर हमारा तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क "सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं" के सिद्धांत (all or none theory) पर कार्य करता है इसलिए बहुत जरूरी है कि मस्तिष्क को किसी विशेष में लेन के लिए उससे सम्बंधित सम्पूर्ण तथ्य दिए जाएँ अन्यथा मस्तिष्क उन तथ्यों का उग्रता से प्रतिकार कर देगा। इस "प्रतिकार" से भी बहुत बड़ी मानसिक समस्या हो सकती है, जैसा कि सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही "मानसिक सशक्तिकारण" इसीलिए संभव है क्योंकि इससे मस्तिष्क को पूरे तथ्य सरलता से उपलब्ध
Friday, 3 May 2013
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा एगोराफोबिया
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी जिसे अतिउन्नत मनोविज्ञान (एडवांस साइकोलॉजी) भी कहा जाता है, मस्तिष्क के प्रवृत्तियों पर सीधे "न्यूरल पाथवे सिस्टम" पर काम कारने के कारण इससे असीम संभावनाएं निर्मित हो जाती हैं जिससे बिना किसी दवा के उपयोग के मात्र 1 महीने के अन्दर न सिर्फ "मानसिक विकृतियों" को सदा के लिए मिटाया जा सकता है बल्कि मष्तिष्क को सरलता से "सशक्त" भी किया जा सकता है।
9 वर्ष पूर्व सिंचाई विभाग में कार्यरत जूनियर इंजिनियर "अगोराफोबिया" (एक प्रकार की चिंता विकृति जिसमे व्यक्ति को भयवश लगता है कि उसका हाव-भाव उसके संवाद के अनुसार नहीं है जिससे उसे संवाद करने काफी परेशानी होती है ) से लगभग पिछले 14 वर्षों से पीड़ित थे तथा मनोचित्सकीय इलाज के लिए हर 15 दोनों पर उनको लखनऊ का चक्कर लगना पड़ता था। उन्होंने मुझे संपर्क किया और विस्तृत ग्राफोलोजिकल नैदानिक सलाह ली जिसमे उन्हें उनकी "नैदानिक ग्राफोलोजिकल रिसर्च रिपोर्ट" के अध्ययन के साथ-साथ कुछ ग्राफोथिरेपीयोँ का भी अभ्यास करना था। दिए गए निर्देशों का उन्होंने पालन किया और पहले 15 - 20 दिनों में उन्हें पूरी तरह से दवा से मुक्ति मिल गयी साथ ही अगले 15 दिनों में उनको इस मानसिक असामान्यता से पूरी तरह मुक्ति मिल गयी और "मानसिक सशक्तिकारण" से उसके बाद वो किसी भी समस्या का न केवल सरलता से सामना करते हैं बल्कि उसका सटीक समाधान भी प्राप्त करने में सफल रहते हैं। आज उनको किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है वो पूरी तरह अपने स्वाभाविक जीवन का आनंद उठा रहे हैं। इस विकृति के कारण घर का भी परिवेश बिगड़ रहा था वो भी बहुत शानदार एवं अनुकरणीय हो चुका है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा मानसिक उन्नति
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" उन लोगों के जीवन भी न सिर्फ प्राणवान करती है बल्कि अनंत उन्नति के मार्ग भी दिखती है जो अपने जीवन से बिल्कुल निराश एवं हताश हो चुके हैं। यद्यपि ऐसे लोग समाज के प्रति बहुत नकारत्मक रूप से सक्रिय नहीं रहते किन्तु अपने परिवार, समाज एवं स्वयं पर भी एक प्रकार से बोझ ही होते हैं। वास्तव में ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी ऐसे समाज, परिवार तथा उस व्यक्ति के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। अध्ययनों में यह पाया गया है कि ऐसे लोग जो जीवन से हताश व निराश हो चुके थे मानसिक सशक्तिकारण के बाद सामान्य व्यक्तियों से भी बहुत बेहतर बन कर निकले इतना बेहतर के उनमे से बहुतों ने तो इतिहास तक रच दिया ऐसे लोगों के सामाजिक प्रस्तुति वास्तव में न सिर्फ देखने लायक होती है बल्कि अनुकरणीय भी होती है।
ऐसा ही एक मामला गोरखपुर शहर का ही था, लड़के की अदम्य इच्छा थी एयरफोर्स में पायलट बनने की, सो उसने NDA की परीक्षाओं में कई बार बैठा किन्तु दुर्भाग्यवश सफल नहीं हुआ उसके बाद उसने CDS की परीक्षाएं दीं फिर भी सफल नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि असफलताओं के लम्बे दौर ने उसे बिल्कुल तोड़ के रख दिया उसके मन में आत्महत्या के विचार आने लगे थे, दो बार तो उसने आत्महत्या का प्रयास भी किया। धीरे-धीरे शराब ने भी अपने घेरे में ले लिया एक प्रकार से वो बिल्कुल बोझ बन चुका था। ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी की सहायता से "मानसिक सशक्तिकरण" के द्वारा आज वही व्यक्ति रक्षा मंत्रालय में बड़ा अधिकारी है तथा बहुत सारे सेकेंड लेफ्टिनेंट रैंक के अधिकारी उसे मातहत काम करते हैं। ऐसा व्यक्ति जिसके लिए जीवन जीना भी मुश्किल हो चुका था आज कई जीवन के लिए वरदान बन चुका है, "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से आज वह उससे भी कहीं आगे निकल गया जो कभी उसका सपना हुआ करता था।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" उन लोगों के जीवन भी न सिर्फ प्राणवान करती है बल्कि अनंत उन्नति के मार्ग भी दिखती है जो अपने जीवन से बिल्कुल निराश एवं हताश हो चुके हैं। यद्यपि ऐसे लोग समाज के प्रति बहुत नकारत्मक रूप से सक्रिय नहीं रहते किन्तु अपने परिवार, समाज एवं स्वयं पर भी एक प्रकार से बोझ ही होते हैं। वास्तव में ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी ऐसे समाज, परिवार तथा उस व्यक्ति के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है। अध्ययनों में यह पाया गया है कि ऐसे लोग जो जीवन से हताश व निराश हो चुके थे मानसिक सशक्तिकारण के बाद सामान्य व्यक्तियों से भी बहुत बेहतर बन कर निकले इतना बेहतर के उनमे से बहुतों ने तो इतिहास तक रच दिया ऐसे लोगों के सामाजिक प्रस्तुति वास्तव में न सिर्फ देखने लायक होती है बल्कि अनुकरणीय भी होती है।
ऐसा ही एक मामला गोरखपुर शहर का ही था, लड़के की अदम्य इच्छा थी एयरफोर्स में पायलट बनने की, सो उसने NDA की परीक्षाओं में कई बार बैठा किन्तु दुर्भाग्यवश सफल नहीं हुआ उसके बाद उसने CDS की परीक्षाएं दीं फिर भी सफल नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि असफलताओं के लम्बे दौर ने उसे बिल्कुल तोड़ के रख दिया उसके मन में आत्महत्या के विचार आने लगे थे, दो बार तो उसने आत्महत्या का प्रयास भी किया। धीरे-धीरे शराब ने भी अपने घेरे में ले लिया एक प्रकार से वो बिल्कुल बोझ बन चुका था। ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी की सहायता से "मानसिक सशक्तिकरण" के द्वारा आज वही व्यक्ति रक्षा मंत्रालय में बड़ा अधिकारी है तथा बहुत सारे सेकेंड लेफ्टिनेंट रैंक के अधिकारी उसे मातहत काम करते हैं। ऐसा व्यक्ति जिसके लिए जीवन जीना भी मुश्किल हो चुका था आज कई जीवन के लिए वरदान बन चुका है, "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से आज वह उससे भी कहीं आगे निकल गया जो कभी उसका सपना हुआ करता था।
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी तथा हाइपरटेंशन
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" इतनी उन्नत और विकसित है कि इसके माध्यम से मस्तिष्क की प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" को सुधार कर या पुनर्निमित करके हम शारीरिक स्वास्थ्य को भी न सिर्फ नियंत्रित कर सकते है बल्कि कई गंभीर समस्याओं का स्थाई निराकरण भी कर सकते हैं। अब उच्चरक्तचाप (हाइपरटेंशन) को ही ले लें इससे ग्रस्त लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है तथा यह पूरी तरह व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करती है। इसका कोई इलाज नहीं है यदि आप किसी चिकित्सक के पास जाईये तो वो सीधे कहेगा कि आपको जीवन भर दवा खानी है धीरे-धीरे आप दवा पर निर्भर होते चले जाते है और आपका शरीर उसके प्रति उतना ही सहनशील होता चला जाता है नतीजा यह होता है कि दवा की मात्रा बढ़नी पड़ती है और उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है अंततः एक दिन दवा भी काम करना बंद कर देती है। दवा का साइड इफ़ेक्ट अलग से आप झेलते हैं। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से इसका कारगर और तीव्र निदान उपलब्ध है वो बिना किसी दवा के।
ऐसा ही एक मामला एक 28 वर्षीय लड़के का था जो उच्चरक्तचाप से काफी दिनों से बहुत परेशान था दवा का सेवन करने की बाध्यता थी। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से लगभग 30 - 40 दिनों में ही उसे इस बीमारी से पूरी तरह निजात मिल गयी। आज उसे ना तो किसी तरह की कोई घबराहट, बेचैनी या परेशानी होती है और न ही उसे इसके लिए किसी तरह की दवा की जरूरत है। "मानसिक सशतिकरण" से सशक्त मानसिकता से वो बिल्कुल सामान्य और शानदार जीवन व्यतीत कर रहा है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" इतनी उन्नत और विकसित है कि इसके माध्यम से मस्तिष्क की प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" को सुधार कर या पुनर्निमित करके हम शारीरिक स्वास्थ्य को भी न सिर्फ नियंत्रित कर सकते है बल्कि कई गंभीर समस्याओं का स्थाई निराकरण भी कर सकते हैं। अब उच्चरक्तचाप (हाइपरटेंशन) को ही ले लें इससे ग्रस्त लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है तथा यह पूरी तरह व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करती है। इसका कोई इलाज नहीं है यदि आप किसी चिकित्सक के पास जाईये तो वो सीधे कहेगा कि आपको जीवन भर दवा खानी है धीरे-धीरे आप दवा पर निर्भर होते चले जाते है और आपका शरीर उसके प्रति उतना ही सहनशील होता चला जाता है नतीजा यह होता है कि दवा की मात्रा बढ़नी पड़ती है और उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है अंततः एक दिन दवा भी काम करना बंद कर देती है। दवा का साइड इफ़ेक्ट अलग से आप झेलते हैं। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से इसका कारगर और तीव्र निदान उपलब्ध है वो बिना किसी दवा के।
ऐसा ही एक मामला एक 28 वर्षीय लड़के का था जो उच्चरक्तचाप से काफी दिनों से बहुत परेशान था दवा का सेवन करने की बाध्यता थी। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से लगभग 30 - 40 दिनों में ही उसे इस बीमारी से पूरी तरह निजात मिल गयी। आज उसे ना तो किसी तरह की कोई घबराहट, बेचैनी या परेशानी होती है और न ही उसे इसके लिए किसी तरह की दवा की जरूरत है। "मानसिक सशतिकरण" से सशक्त मानसिकता से वो बिल्कुल सामान्य और शानदार जीवन व्यतीत कर रहा है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा मानसिक सशक्तिकरण
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से बहुत कुछ सरलता से संभव है जो किसी अन्य माध्यम से या तो असंभव है या इतना मुश्किल कि उसके लिए समर्थ होना भी मुश्किल है। जैसे सामान्य काम काजी लोग जिनका बिज़नस या उनकी नौकरी इतनी स्थिर या यथा स्थिति में है कि उसमे यथोचित विकास ही नहीं हो पाता। ऐसे लोग अपने बिज़नस या नौकरी को लेकर काफी परेशान रहते हैं क्योकि दिन पर दिन खर्चे बढ़ते चले जाते हैं। वैसे भी समय के साथ विकास जरूरी होता है। इसका एक मात्र उपाय है "मानसिक सशक्तिकरण" के माध्यम से मानसिक उन्नयन जो किसी भी स्थिति में सामान्य पारंपरिक मनोविज्ञान से संभव ही नहीं है। यदि वो किसी बिज़नस एक्सपर्ट के पास जाते हैं तो उनकी फीस ही इतनी ज्यादा है कि किसी के लिए भी उसके लिए समर्थ होना बहुत मुश्किल है। दरअसल यह मामला अवधारणा का है जो "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से ही संभव है। इस प्रकार के बहुत से लोग मेरे पास आते हैं जिनको "उन्नत मानसिकता" की बहुत सख्त आवश्यकता होती है वो सफलता पूर्वक "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के मध्यम इसे प्राप्त भी करते हैं।
एक दिलचस्प मामला मेरे पास करीब 2 साल पहले एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का आया था वो एक इन्सुलिन बनाने वाली कंपनी के एम.आर. थे, काफी दिनों से उनका प्रमोशन नहीं हो पा रहा था। मेरे पास आए और "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उन्होंने अपनी मानसिकता को काफी उन्नत कर लिया जिससे उनकी काम करने की क्षमता (वर्क-मेन्टल एफिशिएंसी) बहुत बढ़ गयी, परिणाम ये हुआ कि मात्र 4 महीने के अन्दर ही उनका प्रमोशन हो गया। आज वो दिल्ली में है पूरी दिल्ली के एरिया मेनेजर हैं कंपनी की तरफ से उनको गाडी तथा रहने की सुविधा भी मिली हुई है, शानदार जीवन जी रहे हैं सतत विकास व उन्नति के साथ।
मेरे ऐसे मित्रों की भी एक बड़ी संख्या है जिन्होंने छात्र जीवन में ही "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से अपना "मानसिक सशक्तिकरण" कराया था उनमे से सभी के सभी आज बहुत अच्छी - अच्छी पदों पर हैं। लेकिन बहुत से लोग इससे वंचित रह गए क्योंकि उन्होंने मुझे मजाक में लिया था उनमे से बहतेरे आज भी भटक रहे हैं या फिर गलत तरीके से नौकरी प्राप्त किया।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से बहुत कुछ सरलता से संभव है जो किसी अन्य माध्यम से या तो असंभव है या इतना मुश्किल कि उसके लिए समर्थ होना भी मुश्किल है। जैसे सामान्य काम काजी लोग जिनका बिज़नस या उनकी नौकरी इतनी स्थिर या यथा स्थिति में है कि उसमे यथोचित विकास ही नहीं हो पाता। ऐसे लोग अपने बिज़नस या नौकरी को लेकर काफी परेशान रहते हैं क्योकि दिन पर दिन खर्चे बढ़ते चले जाते हैं। वैसे भी समय के साथ विकास जरूरी होता है। इसका एक मात्र उपाय है "मानसिक सशक्तिकरण" के माध्यम से मानसिक उन्नयन जो किसी भी स्थिति में सामान्य पारंपरिक मनोविज्ञान से संभव ही नहीं है। यदि वो किसी बिज़नस एक्सपर्ट के पास जाते हैं तो उनकी फीस ही इतनी ज्यादा है कि किसी के लिए भी उसके लिए समर्थ होना बहुत मुश्किल है। दरअसल यह मामला अवधारणा का है जो "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से ही संभव है। इस प्रकार के बहुत से लोग मेरे पास आते हैं जिनको "उन्नत मानसिकता" की बहुत सख्त आवश्यकता होती है वो सफलता पूर्वक "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के मध्यम इसे प्राप्त भी करते हैं।
एक दिलचस्प मामला मेरे पास करीब 2 साल पहले एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव का आया था वो एक इन्सुलिन बनाने वाली कंपनी के एम.आर. थे, काफी दिनों से उनका प्रमोशन नहीं हो पा रहा था। मेरे पास आए और "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उन्होंने अपनी मानसिकता को काफी उन्नत कर लिया जिससे उनकी काम करने की क्षमता (वर्क-मेन्टल एफिशिएंसी) बहुत बढ़ गयी, परिणाम ये हुआ कि मात्र 4 महीने के अन्दर ही उनका प्रमोशन हो गया। आज वो दिल्ली में है पूरी दिल्ली के एरिया मेनेजर हैं कंपनी की तरफ से उनको गाडी तथा रहने की सुविधा भी मिली हुई है, शानदार जीवन जी रहे हैं सतत विकास व उन्नति के साथ।
मेरे ऐसे मित्रों की भी एक बड़ी संख्या है जिन्होंने छात्र जीवन में ही "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से अपना "मानसिक सशक्तिकरण" कराया था उनमे से सभी के सभी आज बहुत अच्छी - अच्छी पदों पर हैं। लेकिन बहुत से लोग इससे वंचित रह गए क्योंकि उन्होंने मुझे मजाक में लिया था उनमे से बहतेरे आज भी भटक रहे हैं या फिर गलत तरीके से नौकरी प्राप्त किया।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथीरेपी" तथा जटिल मानसिक विकृतियाँ
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथीरेपी" के सटीकता एवं अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर भी मानसिक विकृतियों के मूल कारणों की पहचान कर लेने की क्षमता के कारण इसके लिए किसी प्रकार के प्रकार के मानसिक विकृति का औषधि रहित एवं स्थाई निदान करना बिल्कुल सरल है चाहे वो विकृति कितनी भी जटिल क्यों न हो। यह इतनी उन्नत एवं विकसित विद्या है कि इसके लिए जटिलता का कोई मतलब ही नहीं है। वैसे भी अध्ययनों में यह पाया गया है कि एक ही प्रवृत्ति के "न्यूरल पाथवेज" में गड़बड़ी के कारण भी अनेक मानसिक विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं जिसे मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही ठीक किया जा सकता है कोई और उपाय नहीं है।
ऐसा ही एक व्यक्ति लगभाग 4 वर्षों से कई प्रकार की मानसिक विकृतियों (मल्टीपल मेन्टल डिसऑडर्स) से बहुत अधिक परेशान थे, वो एक अध्यापक थे और 3.5 वर्षों से अपनी मानसिक परेशनी के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे थे। बहुत अधिक दवाओं के बहुत अधिक सेवन भी उनके स्वास्थ्य को तेजी से नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा था। दरअसल उनकी परेशानी "पैनिक अटैक" से शुरू हुई थी फिर मूड डिसऑर्डर हुआ, शिजोफ्रेनिया के हलके लक्षण भी दिखने लगे थे जो उनकी आर्थिक असुरक्षा के कारण था, पर्सनालिटी डिसऑर्डर, निराशावादिता सहित PTSD भी था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहयता से पहले 15 दिनों में ही उनकी दवा की मात्र घट कर आधी रह गयी फिर अगले 10 दिनों में उनको दवाओं से मुक्ति मिल गयी। फिर अगले करीब 20 से 25 दिनों में वो इतने ठीक हो गए कि स्कूल भी जाने लगे फिर उसके बाद पर्याप्त "मानसिक सस्शक्तिकरण" के पश्चात बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपनी आमदनी बढ़ने में सफल हैं।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथीरेपी" के सटीकता एवं अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर भी मानसिक विकृतियों के मूल कारणों की पहचान कर लेने की क्षमता के कारण इसके लिए किसी प्रकार के प्रकार के मानसिक विकृति का औषधि रहित एवं स्थाई निदान करना बिल्कुल सरल है चाहे वो विकृति कितनी भी जटिल क्यों न हो। यह इतनी उन्नत एवं विकसित विद्या है कि इसके लिए जटिलता का कोई मतलब ही नहीं है। वैसे भी अध्ययनों में यह पाया गया है कि एक ही प्रवृत्ति के "न्यूरल पाथवेज" में गड़बड़ी के कारण भी अनेक मानसिक विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं जिसे मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही ठीक किया जा सकता है कोई और उपाय नहीं है।
ऐसा ही एक व्यक्ति लगभाग 4 वर्षों से कई प्रकार की मानसिक विकृतियों (मल्टीपल मेन्टल डिसऑडर्स) से बहुत अधिक परेशान थे, वो एक अध्यापक थे और 3.5 वर्षों से अपनी मानसिक परेशनी के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे थे। बहुत अधिक दवाओं के बहुत अधिक सेवन भी उनके स्वास्थ्य को तेजी से नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा था। दरअसल उनकी परेशानी "पैनिक अटैक" से शुरू हुई थी फिर मूड डिसऑर्डर हुआ, शिजोफ्रेनिया के हलके लक्षण भी दिखने लगे थे जो उनकी आर्थिक असुरक्षा के कारण था, पर्सनालिटी डिसऑर्डर, निराशावादिता सहित PTSD भी था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहयता से पहले 15 दिनों में ही उनकी दवा की मात्र घट कर आधी रह गयी फिर अगले 10 दिनों में उनको दवाओं से मुक्ति मिल गयी। फिर अगले करीब 20 से 25 दिनों में वो इतने ठीक हो गए कि स्कूल भी जाने लगे फिर उसके बाद पर्याप्त "मानसिक सस्शक्तिकरण" के पश्चात बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपनी आमदनी बढ़ने में सफल हैं।
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी तथा अनिद्रा
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से अनिद्रा जैसी बीमारी का सरलतम, तीव्र एवं स्थाई निदान संभव है वो भी बिना किसी दवा के। दरअसल अनिद्रा की पीछे सिर्फ मानसिक कारण ही होते हैं जो हमारी प्रवृत्तियों के गलत उपयोग या किसी किसी वाह्य उद्दीपन के कारण उनके "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन आ जाने के कारण होता है। इसका इलाज नीद की गोलियां कदापि नहीं हैं। नीद की गोलियों से नीद नहीं "नीद का भ्रम" उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे आदत का निर्माण करता जाता है और व्यक्ति को इसकी आदत पड़ने लगती है। नीद की गोलियों से नीद के बाद उठने पर व्यक्ति को ताजगी की अनुभूति (जैसा कि सामान्य नीद के बाद महसूस होता है ) होने के बजाय व्यक्ति काफी थका हुआ महसूस करता है जिसके कारण व्यक्ति चिडचिडा और उग्र तो हो ही जाता है साथ ही व्यावहारिक स्तर पर सामंजस्य स्थापित करने में भी उसे काफी असामान्यता की अनुभूति होती है। इससे बीमारी दूर होने के बजाय कई प्रकार की नई परेशनीयां खड़ी हो जाती हैं अतः नीद की गोलियों से बचाना चाहिए। चूंकि अनिद्रा का कारण मानसिक होता है तथा प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन के कारण होता है अतः "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से इसके कारणों की सटीकता से पहचान कर मस्तिष्क को उसके स्वभाविक वृत्ति के अनुरूप "सशक्त" कर दिया जाता है इससे न सिर्फ अनिद्रा का स्थाई समाधान होता है बल्कि हमें पहले की तुलना में काफी "शक्तिशाली" मस्तिष्क भी प्राप्त होता है।
ऐसा ही मामला आया 29 वर्षीय युवक का जो लगभग 1.5 वर्षों से अनिद्रा का शिकार था। दरअसल वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में उच्चकोटि का एथिलीट था हालाँकि पढने में वो बहुत अच्छा नहीं था लेकिन एथेलीट होने के कारण उसकी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं जो पूरी नहीं हो सकीं जिससे वह अनिद्रा का शिकार हो गया था। 1.5 वर्षों तक वह अपना इलाज कराता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ अंततः उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से न सिर्फ अनिद्रा दूर हो गयी बल्कि उसका मस्तिष्क इतना सशक्त हो गया कि उसने नए सिरे पढाई शुरू की बी.एड. की परीक्षा भी उत्तीर्ण करके आज वो अध्यापक है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उसका मस्तिष्क सामान्य व्यक्तियोँ से भी काफी बेहतर हो गया था।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से अनिद्रा जैसी बीमारी का सरलतम, तीव्र एवं स्थाई निदान संभव है वो भी बिना किसी दवा के। दरअसल अनिद्रा की पीछे सिर्फ मानसिक कारण ही होते हैं जो हमारी प्रवृत्तियों के गलत उपयोग या किसी किसी वाह्य उद्दीपन के कारण उनके "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन आ जाने के कारण होता है। इसका इलाज नीद की गोलियां कदापि नहीं हैं। नीद की गोलियों से नीद नहीं "नीद का भ्रम" उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे आदत का निर्माण करता जाता है और व्यक्ति को इसकी आदत पड़ने लगती है। नीद की गोलियों से नीद के बाद उठने पर व्यक्ति को ताजगी की अनुभूति (जैसा कि सामान्य नीद के बाद महसूस होता है ) होने के बजाय व्यक्ति काफी थका हुआ महसूस करता है जिसके कारण व्यक्ति चिडचिडा और उग्र तो हो ही जाता है साथ ही व्यावहारिक स्तर पर सामंजस्य स्थापित करने में भी उसे काफी असामान्यता की अनुभूति होती है। इससे बीमारी दूर होने के बजाय कई प्रकार की नई परेशनीयां खड़ी हो जाती हैं अतः नीद की गोलियों से बचाना चाहिए। चूंकि अनिद्रा का कारण मानसिक होता है तथा प्रवृत्तियों के "न्यूरल पाथवेज़" में अवांछित परिवर्तन के कारण होता है अतः "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से इसके कारणों की सटीकता से पहचान कर मस्तिष्क को उसके स्वभाविक वृत्ति के अनुरूप "सशक्त" कर दिया जाता है इससे न सिर्फ अनिद्रा का स्थाई समाधान होता है बल्कि हमें पहले की तुलना में काफी "शक्तिशाली" मस्तिष्क भी प्राप्त होता है।
ऐसा ही मामला आया 29 वर्षीय युवक का जो लगभग 1.5 वर्षों से अनिद्रा का शिकार था। दरअसल वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में उच्चकोटि का एथिलीट था हालाँकि पढने में वो बहुत अच्छा नहीं था लेकिन एथेलीट होने के कारण उसकी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं जो पूरी नहीं हो सकीं जिससे वह अनिद्रा का शिकार हो गया था। 1.5 वर्षों तक वह अपना इलाज कराता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ अंततः उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से न सिर्फ अनिद्रा दूर हो गयी बल्कि उसका मस्तिष्क इतना सशक्त हो गया कि उसने नए सिरे पढाई शुरू की बी.एड. की परीक्षा भी उत्तीर्ण करके आज वो अध्यापक है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उसका मस्तिष्क सामान्य व्यक्तियोँ से भी काफी बेहतर हो गया था।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा न्यायिक
सेवाएँ
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" सामान्य मनोचिकित्सा एवं पारंपरिक मनोविज्ञान से बहुत अधिक उन्नत एवं विकसित है जिसका उपयोग हर उस स्तर पर किया जाता है जिससे हमारी मानसिकता का सीधा सम्बन्ध होता है। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों को बहुत मानसिक दबाव, तनाव, आनंदकारी संवाद एवं उच्च तार्किक शक्ति का सामना करना पड़ता है इसके लिए बहुत आवश्यक है कि उनके बीच आपसी और बेहतरीन ताल-मेल रहे। ऐसा न होने पर कई प्रकार की मनोविकृतियाँ घर कर जाती हैं जिसका परिणाम होता है मानसिक क्षमता में कमी। इससे दोनों प्रकार से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसका निराकरण न तो मनोचिकित्सा के पास है और न ही पारंपरिक मनोविज्ञान के पास। जबकि "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के सहायता से न सिर्फ वे इन मानसिक विकारों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं, सक्रिय प्रवृत्तियों में ताल-मेल बैठा पाने में सफल रहते हैं बल्कि मानसिक रूप से काफी सशक्त भी हो जाते हैं।ऐसा ही अनेक मामलों में एक मामला आया था पूर्वी बिहार के जिले के "सिविल जज" का जो अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण "चिंता विकृति" "आबसेसिव कोम्पल्सिव डिसऑर्डर" हो गया था और लगभग 2 वर्षों से काफी परेशान थे और दवाओं से कोई लाभ नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद से उनको न सिर्फ 25-30 दिनों में इस विकृति से मुक्ति मिल गयी बल्कि उनका मस्तिष्क भी पहले से कहीं बहुत ज्यादा सशक्त हो गया। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" किसी वरदान से कम नहीं है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" सामान्य मनोचिकित्सा एवं पारंपरिक मनोविज्ञान से बहुत अधिक उन्नत एवं विकसित है जिसका उपयोग हर उस स्तर पर किया जाता है जिससे हमारी मानसिकता का सीधा सम्बन्ध होता है। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों को बहुत मानसिक दबाव, तनाव, आनंदकारी संवाद एवं उच्च तार्किक शक्ति का सामना करना पड़ता है इसके लिए बहुत आवश्यक है कि उनके बीच आपसी और बेहतरीन ताल-मेल रहे। ऐसा न होने पर कई प्रकार की मनोविकृतियाँ घर कर जाती हैं जिसका परिणाम होता है मानसिक क्षमता में कमी। इससे दोनों प्रकार से उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसका निराकरण न तो मनोचिकित्सा के पास है और न ही पारंपरिक मनोविज्ञान के पास। जबकि "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के सहायता से न सिर्फ वे इन मानसिक विकारों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं, सक्रिय प्रवृत्तियों में ताल-मेल बैठा पाने में सफल रहते हैं बल्कि मानसिक रूप से काफी सशक्त भी हो जाते हैं।ऐसा ही अनेक मामलों में एक मामला आया था पूर्वी बिहार के जिले के "सिविल जज" का जो अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण "चिंता विकृति" "आबसेसिव कोम्पल्सिव डिसऑर्डर" हो गया था और लगभग 2 वर्षों से काफी परेशान थे और दवाओं से कोई लाभ नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद से उनको न सिर्फ 25-30 दिनों में इस विकृति से मुक्ति मिल गयी बल्कि उनका मस्तिष्क भी पहले से कहीं बहुत ज्यादा सशक्त हो गया। न्यायिक सेवाओं में लगे लोगों के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" किसी वरदान से कम नहीं है।
“ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” तथा महिलाओं की घरेलू सामंजस्य की
समस्याएँ
आज कल महिलाओं में घरेलू सामंजस्य की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। इसके पीछे कई कारण हैं सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्कारिक तथा व्यावहारिक। वैसे काफी लोग टीवी धारावाहिकों को भी दोष दे रहे हैं तो मेरे समझ से उनका कहना भी कुछ हद तक सही हो सकता है। लेकिन सामंजस्य स्थापित न कर पाने के कारण घर का माहौल बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, सम्बन्धों की मिठास धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है, व्यक्ति का सर्वांगीण विकास प्रभावित हो रहा है जिससे तनाव उत्पन्न होने के कारण कई प्रकार के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानिया खाड़ी होती जा रही हैं जिससे सामाजिक स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ-साथ बच्चों के सामने भी कई प्रकार की दिक्कतें के खड़े हो जाने के कारण उनका मानसिक विकास भी सीधे-सीधे प्रभावित हो रहा है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” के पास इस समस्या का शानदार निराकरण व समाधान है जो पारंपरिक मनोवैज्ञानिक परामर्श से बिल्कुल संभव ही नहीं है क्योंकि उनके पास "एक्यूरेट डायग्नोस्टिक सिस्टम" ही नहीं है, फिर हमारा मस्तिष्क अधूरे परामर्शों को बड़ी निर्दयता से अस्वीकार कर देता जो अपने आप में एक बड़ी समस्या है।लगभग 4 वर्ष पूर्व मुंबई की एक महिला का मामला मेरे पास आया था। वह महिला किसी भी स्थिति में अपने ससुराल में ही नहीं रहना चाहती थी उसे अपने ससुराल के कुछ लोग पसंद नहीं थे जैसा कि उसका कहना था। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” से जब उसके मनोअवस्था की जाँच की गयी तो पता चला कि उसे व्यावहारिक समस्या है। फिर उसके पति की भी जाँच करके सही स्थिति के सन्दर्भ में दोनों के मानसिकता हो सेट कर दिया गया जिसमे मात्र 28 दिनों का ही समय लगा। आज वो महिला ससमान और आनंद के साथ अपने ससुराल में रह रही है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” दरअसल ऐसे परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो सामंजस्य की समस्या से झूझ रहे हैं।
आज कल महिलाओं में घरेलू सामंजस्य की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। इसके पीछे कई कारण हैं सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्कारिक तथा व्यावहारिक। वैसे काफी लोग टीवी धारावाहिकों को भी दोष दे रहे हैं तो मेरे समझ से उनका कहना भी कुछ हद तक सही हो सकता है। लेकिन सामंजस्य स्थापित न कर पाने के कारण घर का माहौल बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, सम्बन्धों की मिठास धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है, व्यक्ति का सर्वांगीण विकास प्रभावित हो रहा है जिससे तनाव उत्पन्न होने के कारण कई प्रकार के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानिया खाड़ी होती जा रही हैं जिससे सामाजिक स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ-साथ बच्चों के सामने भी कई प्रकार की दिक्कतें के खड़े हो जाने के कारण उनका मानसिक विकास भी सीधे-सीधे प्रभावित हो रहा है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” के पास इस समस्या का शानदार निराकरण व समाधान है जो पारंपरिक मनोवैज्ञानिक परामर्श से बिल्कुल संभव ही नहीं है क्योंकि उनके पास "एक्यूरेट डायग्नोस्टिक सिस्टम" ही नहीं है, फिर हमारा मस्तिष्क अधूरे परामर्शों को बड़ी निर्दयता से अस्वीकार कर देता जो अपने आप में एक बड़ी समस्या है।लगभग 4 वर्ष पूर्व मुंबई की एक महिला का मामला मेरे पास आया था। वह महिला किसी भी स्थिति में अपने ससुराल में ही नहीं रहना चाहती थी उसे अपने ससुराल के कुछ लोग पसंद नहीं थे जैसा कि उसका कहना था। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” से जब उसके मनोअवस्था की जाँच की गयी तो पता चला कि उसे व्यावहारिक समस्या है। फिर उसके पति की भी जाँच करके सही स्थिति के सन्दर्भ में दोनों के मानसिकता हो सेट कर दिया गया जिसमे मात्र 28 दिनों का ही समय लगा। आज वो महिला ससमान और आनंद के साथ अपने ससुराल में रह रही है। “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” दरअसल ऐसे परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो सामंजस्य की समस्या से झूझ रहे हैं।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा समान्य छात्र
जो छात्र समान्य और परम्परिक क्षेत्रो (जैसे BA, BSc, B.Com, MA, M.Sc., M.Com आदि )में अध्ययन कर रहे हैं अक्सर उनके सामने अपने जीवन को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है चूंकि वे व्यवसायिक कोर्सेज में नहीं होते लिहाजा अपने उद्देश्य को लेकर काफी परेशान रहते हैं। इस परेशनी उनको नौकरी के सन्दर्भ में दूसरों के ओपेनियन पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है अपेक्षाकृत अपने अन्दर छिपी प्रतिभा पर भरोसा करने के। इसका परिणाम ये होता है कि वे भटकाव के शिकार हो जाते हैं और उनके सामने जिस प्रकार का कार्य प्रस्ताव आता है उसे आधे-अधूरे मन से स्वीकार करने के बाध्यता रहती है। पूरे मन से स्वीकार न करने के कारण वे अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुति उस संस्था को नहीं डे पाते जिससे न तो संस्था का पर्याप्त विकास हो पता है और न ही वे स्वयं अपना विकास कर पाते हैं। अतः ये बहुत आवश्यक है वे सभी छात्र - छात्राएं अपनी छिपी प्रतिभा के पहचाने और उसी के अनुसार अपने करियर का चयन करें। इससे न केवल वो अपना सर्वोत्तम प्रस्तुति देने में सफल रहेंगे बल्कि वे अपना विकास भी कायदे से कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें सबसे बेहतरीन और विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता लेनी चाहिए जो उनका सूक्ष्म अनुसंधान कर उनकी प्रतिभा को तो निकालेगी ही साथ ही उसके उपयोग का स्वभाविक रास्ता भी सुझाएगी।
मऊ जिले का मामला है एक छात्र जो बी.एड. कर रहा था कुछ दिनों पहले अचानक डिप्रेशन में आ गया और उत्तरोत्तर उसका ये मर्ज बढ़ता ही जा रहा था लिहाजा उसने अपने आप को उसने BHU के मनोचिकित्सा विभाग में दिखाया। इलाज शुरू हुआ हर 15 दिनों पर उसे डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवा लेने के साथ-साथ परम्परिक मनोविज्ञान के अनुसार उसकी काउन्सलिंग भी होती थी। इन सबके बावजूद उसकी स्थिति खराब होती ही जा रही थी। लगभग 6-7 महीने के बाद जब वो BHU से दवा लेकर और काउन्सलिंग करवाकर लौटा तो और स्थिति खराब हो जाने के कारण लगभग तीन दिनों के बाद उसने आत्महत्या करने की नियत से पुल से नदी में छलांग लगा दी। वो तो अच्छा हुआ कि पास में ही कुछ मछुआरे थे जिन्होंने उसे बचा लिया। उसने उसके बाद उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। आज न सिर्फ डिप्रेशन से पूरी तरह मुक्त है बल्कि उसके शब्दकोश से असंभव और भाग्य शब्द ही गायब चुके हैं क्योंकि "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की बदौलत वो मानसिक रूप से वो बेहद मजबूत हो चुका है।
जो छात्र समान्य और परम्परिक क्षेत्रो (जैसे BA, BSc, B.Com, MA, M.Sc., M.Com आदि )में अध्ययन कर रहे हैं अक्सर उनके सामने अपने जीवन को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है चूंकि वे व्यवसायिक कोर्सेज में नहीं होते लिहाजा अपने उद्देश्य को लेकर काफी परेशान रहते हैं। इस परेशनी उनको नौकरी के सन्दर्भ में दूसरों के ओपेनियन पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है अपेक्षाकृत अपने अन्दर छिपी प्रतिभा पर भरोसा करने के। इसका परिणाम ये होता है कि वे भटकाव के शिकार हो जाते हैं और उनके सामने जिस प्रकार का कार्य प्रस्ताव आता है उसे आधे-अधूरे मन से स्वीकार करने के बाध्यता रहती है। पूरे मन से स्वीकार न करने के कारण वे अपनी सर्वोत्तम प्रस्तुति उस संस्था को नहीं डे पाते जिससे न तो संस्था का पर्याप्त विकास हो पता है और न ही वे स्वयं अपना विकास कर पाते हैं। अतः ये बहुत आवश्यक है वे सभी छात्र - छात्राएं अपनी छिपी प्रतिभा के पहचाने और उसी के अनुसार अपने करियर का चयन करें। इससे न केवल वो अपना सर्वोत्तम प्रस्तुति देने में सफल रहेंगे बल्कि वे अपना विकास भी कायदे से कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें सबसे बेहतरीन और विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता लेनी चाहिए जो उनका सूक्ष्म अनुसंधान कर उनकी प्रतिभा को तो निकालेगी ही साथ ही उसके उपयोग का स्वभाविक रास्ता भी सुझाएगी।
मऊ जिले का मामला है एक छात्र जो बी.एड. कर रहा था कुछ दिनों पहले अचानक डिप्रेशन में आ गया और उत्तरोत्तर उसका ये मर्ज बढ़ता ही जा रहा था लिहाजा उसने अपने आप को उसने BHU के मनोचिकित्सा विभाग में दिखाया। इलाज शुरू हुआ हर 15 दिनों पर उसे डॉक्टर के परामर्श के अनुसार दवा लेने के साथ-साथ परम्परिक मनोविज्ञान के अनुसार उसकी काउन्सलिंग भी होती थी। इन सबके बावजूद उसकी स्थिति खराब होती ही जा रही थी। लगभग 6-7 महीने के बाद जब वो BHU से दवा लेकर और काउन्सलिंग करवाकर लौटा तो और स्थिति खराब हो जाने के कारण लगभग तीन दिनों के बाद उसने आत्महत्या करने की नियत से पुल से नदी में छलांग लगा दी। वो तो अच्छा हुआ कि पास में ही कुछ मछुआरे थे जिन्होंने उसे बचा लिया। उसने उसके बाद उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। आज न सिर्फ डिप्रेशन से पूरी तरह मुक्त है बल्कि उसके शब्दकोश से असंभव और भाग्य शब्द ही गायब चुके हैं क्योंकि "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की बदौलत वो मानसिक रूप से वो बेहद मजबूत हो चुका है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा माध्यमिक (10 & 10+2) स्तर के छात्र
ऐसे छात्र-छात्राएं जो हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में हैं उनके सामने अपनी नए जीवन के प्रारूप के लेकर काफी चिंता रहती है, इसके साथ-साथ उनके किशोरावस्था (Adolescence) के कारण भी अतिउत्साह, असामान्य गाम्भीर्य , यौन अनुभूतियों आदि के कारण अक्सर असामान्य स्थिति का सामना करते हैं। जैव-शारीरिक तथा जैव-रसायनिक परिवर्तनों के कारण भी उनके मनोभावों में बहुत ज्यादा उतर-चढाव देखा जाता है। इसके साथ-साथ अपने "जीवन के उद्देश्य" के प्रति वो काफी भ्रम की स्थिति में भी रहते हैं। चूंकि वर्तमान समय में हर जगह सहशिक्षा (co-education) को अपना लिया गया है जिससे समस्या थोड़ी और गंभीर हो गयी है। इसके कारण चिंता-विकृति, मनोदशा विकृति और व्यक्तित्व विकृतियोँ के चपेट में आने की सम्भावना बहुत बढ़ गयी है। इस कारण से किशोरवय नवयुवकों की "मानसिक और बौद्धिक क्षमता" पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इसके दुष्प्रभावों को समाज में आसानी से महसूस किया जा सकता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उनका "मानसिक सशक्तिकरण" करके न केवल हम इन गंभीर समस्याओं से सहजता से मुक्ति पा सकते हैं बल्कि किशोरों को समाज और देश के बृहत्तर सन्दर्भ में उद्देश्यपरक बना कर उनके जीवन को उत्कृष्ट सृजनशील बना सकते हैं।
गोरखपुर नगर के नामी अंगरेजी माध्यम के स्कूल का मामला आया था वो लड़का कक्षा 11 वीं का छात्र था और उसे किसी लडकी के प्रति मनोग्रस्ति (एक तरफ़ा प्यार) का शिकार हो गया। लडकी उसकी तरफ थोड़ा भी दे नहीं दे रही थी जिसके कारण उसे भयानक तनाव होने लगा था। उसके पढाई का तो यूँ समझिये कचूमर ही निकल गया था। कुछ दिनों तक उसने अपना इलाज कराया लेकिन फायदा होने बजाय उसे लगा कि उसकी "मानसिक क्षमता" का ही तेजी ह्रास होता जा रहा है लिहाजा उसने अपना इलाज बंद करके "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उसकी "मानसिकता को सशक्त" करने में मात्र 3 सप्ताह का समय लगा उसके बाद न उसे उस लडकी की याद परशान करती है और न ही कोई घटक बल्कि पढने में भी उसने लगभग 70 से 120% की वृद्धि की। ऐसे बहुत से मामले "OCD, डिप्रेशन और पर्सनालिटी डिसऑर्डर" के है जिन्होंने स्वयं को इस उन्नत और विकसित विज्ञान से काफी "सशक्त" किया है। बीमारी से तो मुक्ति मिली ही दिमाग भी मजबूत हो गया। इसलिए ये बहुत जरूरी है सभी छात्र-छात्रों को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकारण" करा लेना चाहिए।
ऐसे छात्र-छात्राएं जो हाई स्कूल और इंटरमीडिएट में हैं उनके सामने अपनी नए जीवन के प्रारूप के लेकर काफी चिंता रहती है, इसके साथ-साथ उनके किशोरावस्था (Adolescence) के कारण भी अतिउत्साह, असामान्य गाम्भीर्य , यौन अनुभूतियों आदि के कारण अक्सर असामान्य स्थिति का सामना करते हैं। जैव-शारीरिक तथा जैव-रसायनिक परिवर्तनों के कारण भी उनके मनोभावों में बहुत ज्यादा उतर-चढाव देखा जाता है। इसके साथ-साथ अपने "जीवन के उद्देश्य" के प्रति वो काफी भ्रम की स्थिति में भी रहते हैं। चूंकि वर्तमान समय में हर जगह सहशिक्षा (co-education) को अपना लिया गया है जिससे समस्या थोड़ी और गंभीर हो गयी है। इसके कारण चिंता-विकृति, मनोदशा विकृति और व्यक्तित्व विकृतियोँ के चपेट में आने की सम्भावना बहुत बढ़ गयी है। इस कारण से किशोरवय नवयुवकों की "मानसिक और बौद्धिक क्षमता" पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इसके दुष्प्रभावों को समाज में आसानी से महसूस किया जा सकता है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उनका "मानसिक सशक्तिकरण" करके न केवल हम इन गंभीर समस्याओं से सहजता से मुक्ति पा सकते हैं बल्कि किशोरों को समाज और देश के बृहत्तर सन्दर्भ में उद्देश्यपरक बना कर उनके जीवन को उत्कृष्ट सृजनशील बना सकते हैं।
गोरखपुर नगर के नामी अंगरेजी माध्यम के स्कूल का मामला आया था वो लड़का कक्षा 11 वीं का छात्र था और उसे किसी लडकी के प्रति मनोग्रस्ति (एक तरफ़ा प्यार) का शिकार हो गया। लडकी उसकी तरफ थोड़ा भी दे नहीं दे रही थी जिसके कारण उसे भयानक तनाव होने लगा था। उसके पढाई का तो यूँ समझिये कचूमर ही निकल गया था। कुछ दिनों तक उसने अपना इलाज कराया लेकिन फायदा होने बजाय उसे लगा कि उसकी "मानसिक क्षमता" का ही तेजी ह्रास होता जा रहा है लिहाजा उसने अपना इलाज बंद करके "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से उसकी "मानसिकता को सशक्त" करने में मात्र 3 सप्ताह का समय लगा उसके बाद न उसे उस लडकी की याद परशान करती है और न ही कोई घटक बल्कि पढने में भी उसने लगभग 70 से 120% की वृद्धि की। ऐसे बहुत से मामले "OCD, डिप्रेशन और पर्सनालिटी डिसऑर्डर" के है जिन्होंने स्वयं को इस उन्नत और विकसित विज्ञान से काफी "सशक्त" किया है। बीमारी से तो मुक्ति मिली ही दिमाग भी मजबूत हो गया। इसलिए ये बहुत जरूरी है सभी छात्र-छात्रों को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकारण" करा लेना चाहिए।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" एवं बच्चों (5 साल से 14 साल तक) की समस्याएँ
आजकल जिस तरह का सामाजिक और पारिवारिक परिवेश बदल रहा है लोगों में प्रतिस्पर्धा का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है, संयुक्त परिवार टूट कर एकल बनते जा रहे हैं, समाजिक ताना-बना विशेष सन्दर्भों में ही विकसित हो रहा है तथा बढ़ते प्रतिस्पर्धा के कारण भी बच्चों के स्वाभाविक और सर्वांगीण विकास पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। संस्कारों की कमी, आगे निकलने की रफ़्तार में शामिल होने की जद्दोजहद, जीवन मूल्यों का ह्रास आदि के कारण भी बहुत असर पड़ा है। वैसे अध्ययनो के अनुसार बच्चों का विकास माता-पिता के आचरण पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। उसके बाद स्कूल के अध्यापकों के व्यवहार और आचरण पर भी बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि सभी कुछ ठीक-ठीक है निश्चित रूप से बच्चों का विकास शानदार होगा और देश का सुदृढ़, जिम्मेदार नागरिक या इतिहास महिला/पुरुष बनने से कोई नहीं रोक सकता। यदि बच्चे को पढने में दिक्कत है, स्कूल जाने से डरता है, जिद्दी है, आज्ञाकारी नहीं है, उसका व्यवहार ठीक नहीं है, उसकी याददाश्त कमजोर है, पढने में कमजोर है तो निश्चित रूप से उसे समस्या है और जितनी जल्दी उसकी समस्याओं का निराकरण कर दिया जाए उतना अच्छा होता है। इसके लिए सबसे विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से बेहतर कोई विधा नहीं है। चूंकि बच्चे का विकास माता-पिता के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है अतः इस सन्दर्भ में माता-पिता का भी अलग-अलग ग्राफोलोजिकल रिसर्च एवं ग्राफोथेरेपी बच्चे के अनुरूप करने के लिए जरूरी होता है। जैसे - जैसे माता-पिता अपने व्यवहार में परिवर्तन लेट जाते हैं बच्चे में वैकासिक परिवर्तन आता जाता है.धीरे-धीरे (1 से 2 महीनो में ही ) बच्चा "मानसिक रूप बहुत सशक्त" हो जाता है जिसे आप उसके व्यवहार में हुए परिवर्तन और शैक्षणिक उन्नति को देख कर आसानी से महसूस कर सकते हैं।
लगभग 4 साल पहले एक 11 साल के बच्चे का मामला आया था बच्चे स्कूल फोबिया हो गया था। बहुत अधिक चिंता करने के कारण उसका पेट भी खराब रहने लगा था जिसका इलाज तीन साल से चल रहा था। उस बच्चे में मनोभाव का ग्राफोलोजिकल जांच करने पर पता चला कि चिंता के कारण उसे फोबिया हुआ है। जब उनके माता-पिता की जांच की गयी तो पता चला कि चिंता का कारण उसकी माता जी में है। उनका एक ही लड़का होने कारण मामला बहुत भावनात्मक स्तर तक गंभीर था। चूंकि हर बच्चे का अपना अलग व्यक्तित्व होता लिहाजा माता-पिता का भी आचरण और व्यवहार उसी के अनुरूप होना चाहिए। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" दरअसल सूक्ष्म स्तर तक सटीकता से यही करती है। वो बच्चा 2 महीने में इतना ठीक हो गया कि कभी भी 90% से कम नंबर उसके आए ही नहीं।
एक बंगाली परिवार का बच्चा थे जो इतना ज्यादा सक्रिय था कि कही 5 मिनट बैठना भी मुश्किल था पढना तो बहुत दूर की बात है। उसका इलाज किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा 2 साल से किया जा रहा था जो कोलकाता और लंदन दोनों जगह बैठते थे लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उनको मात्र 2 महीनो में ही मुक्ति मिल गयी। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने अपने बच्चों के "मानसिक क्षमता" को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम सशक्त किया है। वैसे सभी को इस उन्नत विधा फायदा उठाना चाहिए सावधानी एवं "मानसिक सशक्तिकरण" दोनों के सन्दर्भ में ...
आजकल जिस तरह का सामाजिक और पारिवारिक परिवेश बदल रहा है लोगों में प्रतिस्पर्धा का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है, संयुक्त परिवार टूट कर एकल बनते जा रहे हैं, समाजिक ताना-बना विशेष सन्दर्भों में ही विकसित हो रहा है तथा बढ़ते प्रतिस्पर्धा के कारण भी बच्चों के स्वाभाविक और सर्वांगीण विकास पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। संस्कारों की कमी, आगे निकलने की रफ़्तार में शामिल होने की जद्दोजहद, जीवन मूल्यों का ह्रास आदि के कारण भी बहुत असर पड़ा है। वैसे अध्ययनो के अनुसार बच्चों का विकास माता-पिता के आचरण पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। उसके बाद स्कूल के अध्यापकों के व्यवहार और आचरण पर भी बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि सभी कुछ ठीक-ठीक है निश्चित रूप से बच्चों का विकास शानदार होगा और देश का सुदृढ़, जिम्मेदार नागरिक या इतिहास महिला/पुरुष बनने से कोई नहीं रोक सकता। यदि बच्चे को पढने में दिक्कत है, स्कूल जाने से डरता है, जिद्दी है, आज्ञाकारी नहीं है, उसका व्यवहार ठीक नहीं है, उसकी याददाश्त कमजोर है, पढने में कमजोर है तो निश्चित रूप से उसे समस्या है और जितनी जल्दी उसकी समस्याओं का निराकरण कर दिया जाए उतना अच्छा होता है। इसके लिए सबसे विकसित विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से बेहतर कोई विधा नहीं है। चूंकि बच्चे का विकास माता-पिता के आचरण और व्यवहार पर निर्भर करता है अतः इस सन्दर्भ में माता-पिता का भी अलग-अलग ग्राफोलोजिकल रिसर्च एवं ग्राफोथेरेपी बच्चे के अनुरूप करने के लिए जरूरी होता है। जैसे - जैसे माता-पिता अपने व्यवहार में परिवर्तन लेट जाते हैं बच्चे में वैकासिक परिवर्तन आता जाता है.धीरे-धीरे (1 से 2 महीनो में ही ) बच्चा "मानसिक रूप बहुत सशक्त" हो जाता है जिसे आप उसके व्यवहार में हुए परिवर्तन और शैक्षणिक उन्नति को देख कर आसानी से महसूस कर सकते हैं।
लगभग 4 साल पहले एक 11 साल के बच्चे का मामला आया था बच्चे स्कूल फोबिया हो गया था। बहुत अधिक चिंता करने के कारण उसका पेट भी खराब रहने लगा था जिसका इलाज तीन साल से चल रहा था। उस बच्चे में मनोभाव का ग्राफोलोजिकल जांच करने पर पता चला कि चिंता के कारण उसे फोबिया हुआ है। जब उनके माता-पिता की जांच की गयी तो पता चला कि चिंता का कारण उसकी माता जी में है। उनका एक ही लड़का होने कारण मामला बहुत भावनात्मक स्तर तक गंभीर था। चूंकि हर बच्चे का अपना अलग व्यक्तित्व होता लिहाजा माता-पिता का भी आचरण और व्यवहार उसी के अनुरूप होना चाहिए। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" दरअसल सूक्ष्म स्तर तक सटीकता से यही करती है। वो बच्चा 2 महीने में इतना ठीक हो गया कि कभी भी 90% से कम नंबर उसके आए ही नहीं।
एक बंगाली परिवार का बच्चा थे जो इतना ज्यादा सक्रिय था कि कही 5 मिनट बैठना भी मुश्किल था पढना तो बहुत दूर की बात है। उसका इलाज किसी मनोवैज्ञानिक द्वारा 2 साल से किया जा रहा था जो कोलकाता और लंदन दोनों जगह बैठते थे लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उनको मात्र 2 महीनो में ही मुक्ति मिल गयी। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने अपने बच्चों के "मानसिक क्षमता" को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम सशक्त किया है। वैसे सभी को इस उन्नत विधा फायदा उठाना चाहिए सावधानी एवं "मानसिक सशक्तिकरण" दोनों के सन्दर्भ में ...
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा विवाह
विवाह हर किसी के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण, सबसे खूबसूरत, सबसे दायित्वपूर्ण, सबसे अनंदायी और सम्पूर्णता भरी अनुभूति है। इसका महत्व इतना अधिक है कि इसे सोलह संस्कारों में से एक संस्कार के रूप में अंगीकार किया गया है। विवाह का अर्थ भी विशेष है विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। अतः यह बहुत आवश्यक है कि विवाह को भी उतने ही महत्वपूर्ण, दायित्वपूर्ण, सौन्दर्यपूर्ण और हर प्रकार अनंदायी स्वरुप में स्वीकार किया जाए। जिससे विवाह के बाद अनंत विश्वास, प्रेम, समर्पण, आनंदायी अनुभूतियों का स्वभाविक प्रवाह अपने जीवन में सुनिश्चित कर सकें। जिससे संबंधों में मिठास उत्तरोत्तर घुलती रहे और आपके सम्बन्ध उतने ही प्रगाढ़ होते चले जाएँ। विवाह मात्र दो व्यक्तित्वों के एक में परिवर्तित होने घटना नहीं है ये वो महत्वपूर्ण अवसर है जिससे दो तंत्रों (system) में मेल स्थापित होता है जिसमे अलग-अलग कई घटक होते हैं और सबमे अद्भुत सामजस्य स्थापित होना चाहिए वास्तव में यही आनंद और उन्नति है। उन्नत एवं अतिविकसित विज्ञान "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से ऐसा से किया जाना सरलता से संभव है।
चूंकि लड़कियां कोमल स्वाभाव की होती हैं, उनको दूसरे घर में जाना होता है और घर का दायित्व उन्ही पर निर्भर करता है इसलिए ये आवश्यक है कि कन्याएं मानसिक रूप से सबल, सक्षम, संवेदनशील, देखभाल करनेवाली तथा चैतन्य हों जिससे वो अपने ससुराल में सबकी दुलारी और स्वयं को एक मानदंड स्थापित करने सफल हो सकें। उनका दाम्पत्य जीवन पूर्ण रूप से आनंदायी हो और हर प्रकार के दुखों और शारीरिक और मानसिक परेशनियों से दूर रहे। इसलिए विवाह से या तो 6 महीने पूर्व या वर ढूढने की प्रक्रिया के आरंभ से ही कन्या को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से "मानसिक और बौद्धिक रूप से सशक्त" बना देना बहुत लाभकारी रहता है। इसकी साथ-साथ जिन कन्याओं को किसी प्रकार की मानसिक परेशानी होती है जैसे विश्वास की कमी, विवाह से डर लगना, शारीरिक सम्बंधों के सन्दर्भ में मिथ्या अनुभूति आदि जैसी समस्या भी हो तो उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से दूर कर उन्हें मानसिक रूप से सक्षम और सशक्त बनाया जा सकता है और वे भी अन्य कन्याओं की भांति शानदार दाम्पत्य जीवन का आनंद उठाने सफल रहेंगी।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" केवल लड़कियों के लिए ही उपयोगी नहीं है बल्कि उन लड़कों के लिए भी बहुत उपयोगी है जिनका विवाह होने जा रहा है अक्सर लड़के अपनी पत्नी के सन्दर्भ में कई प्रकार से अतिवादिता के शिकार रहते हैं चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक। इससे उनका दाम्पत्य जीवन और खुशिया दोनों प्रभावित होती हैं। सम्बन्धों के निर्वंहन और उसे आनंदपूर्ण बनाने का दायित्व केवल पत्नियों पर ही नहीं होता बल्कि पतियों पर भी होता है और इसके लिए भी "सशक्त मानसिकता" की जरूरत होती है। उनके लिए भी "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" बहुत मददगार साबित होती है। उन्हें भी निश्चित रूप से इसका लाभ उठाना चाहिए। सशक्त, आनंदपूर्ण, चैतन्य और दायित्वपूर्ण जोड़े ही सबल, सक्षम और बुद्धिमान संतानों को जन्म दे सकते हैं यह वैज्ञानिक, धार्मिक और पौराणिक सत्य है। इस प्रकार हम न केवल अपनी सेवा करते हैं बल्कि आने वाली पीढी को भी सशक्त करेंगे।
लगभग 10 वर्ष पहले एक कन्या का सशक्तिकरण "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से किया गया था जब उसकी शादी होने वाली थी। विवाह के उपरान्त उसने अपने सशक्त दिमाग का उपयोग करते हुए सभी का मन जीत लिया, आज अपने सुसराल में वो एक मानदंड के रूप में देखी जाती है, वो एक मानक है, उसको दो बच्चे है एक लड़का और एक लडकी लड़का चार भाषाएँ सामान अधिकार के साथ बोलता है, हर साल उसके बच्चे को बेस्ट स्टूडेंट का पुरस्कार मिलता है, विवाह के उपरान्त उसके पति को 6 प्रमोशन मिले आज वो अपने कंपनी में सबसे कम उम्र के GM हैं।
एक लडकी थी जिसे किसी कारणवश शादी के नाम से ही बहुत डर लगता था। एक प्रकार से उसे शादी से फोबिया हो गया था। उसका मनोचिकित्सकीय इलाज करीब 1.5 साल चला। कुछ लाभ होने के बजाय जा मामला बिगड़ गया तब उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद ली। मात्र 15 दिनों में वो बिल्कुल ठीक हो गयी। अगले एक महीने में वो मानसिक स्तर पर बहुत सशक्त हो गयी। आज वो शानदार और बिल्कुल स्वस्थ और आनंदमयी जीवन व्यतीत कर रही है।
विवाह हर किसी के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण, सबसे खूबसूरत, सबसे दायित्वपूर्ण, सबसे अनंदायी और सम्पूर्णता भरी अनुभूति है। इसका महत्व इतना अधिक है कि इसे सोलह संस्कारों में से एक संस्कार के रूप में अंगीकार किया गया है। विवाह का अर्थ भी विशेष है विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। अतः यह बहुत आवश्यक है कि विवाह को भी उतने ही महत्वपूर्ण, दायित्वपूर्ण, सौन्दर्यपूर्ण और हर प्रकार अनंदायी स्वरुप में स्वीकार किया जाए। जिससे विवाह के बाद अनंत विश्वास, प्रेम, समर्पण, आनंदायी अनुभूतियों का स्वभाविक प्रवाह अपने जीवन में सुनिश्चित कर सकें। जिससे संबंधों में मिठास उत्तरोत्तर घुलती रहे और आपके सम्बन्ध उतने ही प्रगाढ़ होते चले जाएँ। विवाह मात्र दो व्यक्तित्वों के एक में परिवर्तित होने घटना नहीं है ये वो महत्वपूर्ण अवसर है जिससे दो तंत्रों (system) में मेल स्थापित होता है जिसमे अलग-अलग कई घटक होते हैं और सबमे अद्भुत सामजस्य स्थापित होना चाहिए वास्तव में यही आनंद और उन्नति है। उन्नत एवं अतिविकसित विज्ञान "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से ऐसा से किया जाना सरलता से संभव है।
चूंकि लड़कियां कोमल स्वाभाव की होती हैं, उनको दूसरे घर में जाना होता है और घर का दायित्व उन्ही पर निर्भर करता है इसलिए ये आवश्यक है कि कन्याएं मानसिक रूप से सबल, सक्षम, संवेदनशील, देखभाल करनेवाली तथा चैतन्य हों जिससे वो अपने ससुराल में सबकी दुलारी और स्वयं को एक मानदंड स्थापित करने सफल हो सकें। उनका दाम्पत्य जीवन पूर्ण रूप से आनंदायी हो और हर प्रकार के दुखों और शारीरिक और मानसिक परेशनियों से दूर रहे। इसलिए विवाह से या तो 6 महीने पूर्व या वर ढूढने की प्रक्रिया के आरंभ से ही कन्या को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से "मानसिक और बौद्धिक रूप से सशक्त" बना देना बहुत लाभकारी रहता है। इसकी साथ-साथ जिन कन्याओं को किसी प्रकार की मानसिक परेशानी होती है जैसे विश्वास की कमी, विवाह से डर लगना, शारीरिक सम्बंधों के सन्दर्भ में मिथ्या अनुभूति आदि जैसी समस्या भी हो तो उसे "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से दूर कर उन्हें मानसिक रूप से सक्षम और सशक्त बनाया जा सकता है और वे भी अन्य कन्याओं की भांति शानदार दाम्पत्य जीवन का आनंद उठाने सफल रहेंगी।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" केवल लड़कियों के लिए ही उपयोगी नहीं है बल्कि उन लड़कों के लिए भी बहुत उपयोगी है जिनका विवाह होने जा रहा है अक्सर लड़के अपनी पत्नी के सन्दर्भ में कई प्रकार से अतिवादिता के शिकार रहते हैं चाहे वो सकारात्मक हो या नकारात्मक। इससे उनका दाम्पत्य जीवन और खुशिया दोनों प्रभावित होती हैं। सम्बन्धों के निर्वंहन और उसे आनंदपूर्ण बनाने का दायित्व केवल पत्नियों पर ही नहीं होता बल्कि पतियों पर भी होता है और इसके लिए भी "सशक्त मानसिकता" की जरूरत होती है। उनके लिए भी "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" बहुत मददगार साबित होती है। उन्हें भी निश्चित रूप से इसका लाभ उठाना चाहिए। सशक्त, आनंदपूर्ण, चैतन्य और दायित्वपूर्ण जोड़े ही सबल, सक्षम और बुद्धिमान संतानों को जन्म दे सकते हैं यह वैज्ञानिक, धार्मिक और पौराणिक सत्य है। इस प्रकार हम न केवल अपनी सेवा करते हैं बल्कि आने वाली पीढी को भी सशक्त करेंगे।
लगभग 10 वर्ष पहले एक कन्या का सशक्तिकरण "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से किया गया था जब उसकी शादी होने वाली थी। विवाह के उपरान्त उसने अपने सशक्त दिमाग का उपयोग करते हुए सभी का मन जीत लिया, आज अपने सुसराल में वो एक मानदंड के रूप में देखी जाती है, वो एक मानक है, उसको दो बच्चे है एक लड़का और एक लडकी लड़का चार भाषाएँ सामान अधिकार के साथ बोलता है, हर साल उसके बच्चे को बेस्ट स्टूडेंट का पुरस्कार मिलता है, विवाह के उपरान्त उसके पति को 6 प्रमोशन मिले आज वो अपने कंपनी में सबसे कम उम्र के GM हैं।
एक लडकी थी जिसे किसी कारणवश शादी के नाम से ही बहुत डर लगता था। एक प्रकार से उसे शादी से फोबिया हो गया था। उसका मनोचिकित्सकीय इलाज करीब 1.5 साल चला। कुछ लाभ होने के बजाय जा मामला बिगड़ गया तब उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद ली। मात्र 15 दिनों में वो बिल्कुल ठीक हो गयी। अगले एक महीने में वो मानसिक स्तर पर बहुत सशक्त हो गयी। आज वो शानदार और बिल्कुल स्वस्थ और आनंदमयी जीवन व्यतीत कर रही है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा पत्रकारिता
पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहाँ नित नयी घटना घटती है और उस घटना को उसी के मनोविज्ञान के अनुरूप किन्तु बिल्कुल नए स्वरूप में प्रस्तुत करना होता है इसके लिए उच्च स्तर की संवेदनशीलता, प्राप्त तथ्यों की विश्लेषण क्षमता, उसके सन्दर्भों की विवेचना, शोध-प्रवृत्ति, उच्च कल्पनाशीलता, तार्किक शक्ति, उच्च समाजिकता, प्रचण्ड आत्मविश्वास आदि प्रवृत्तियों बहुत सख्त जरूरत है। ये सभी प्रवृत्तियां जब बिल्कुल संतुलित और प्रबल अवस्था में होती हैं तो निश्चित रूप से न सिर्फ पत्रकारिता का आनंद उठाया जा सकता है बल्कि समाज को शाश्वत सन्देश दे कर उसमे अपेक्षित बदलाव लाया जा सकता है। सशक्त और प्रभावी पत्रकारिता करने के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। वैसे पत्रकारिता के पेशे में लगे लोगों को भी मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी मानसिक क्षमता प्रभावित होती है जिसे इस उन्नत और विकसित विज्ञान के मदद से रोक कर पत्रकारों को मानसिक रूप से बहुत हद तक सशक्त और प्रबल बनाया जा सकता है। कुछ पत्रकारों ने अपने छात्र जीवन में इस विकसित विधा का लाभ उठा कर पत्रकारिता जगत में एक मुकाम पर हैं। इस पेशे के कारण यदि कुछ मानसिक परशानी यदि आ भी गयी हो तो "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उसे दूर कर मानसिकता को अति सशक्त किया जा सकता है।
ऐसा एक मामला आया था लगभग 4 साल पहले लखनऊ से। वो देश के एक प्रतिष्ठित मैगजीन के लिए पत्रकारिता करते थे और किसी कारण वश उनको एंग्जायटी डिसऑर्डर हो गया था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उनको पूरी तरह से न सिर्फ मुक्ति मिल गयी बल्कि उनकी मानसिक शक्ति भी बहुत बढ़ गयी।
ऐसे ही और भी पत्रकारों को समस्या होने पर इस उन्नत विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से निजात तो पाते ही रहते हैं साथ ही उन्हें मानसिक सशक्तिकरण भी प्राप्त होता रहता है।
पत्रकारिता ऐसा क्षेत्र है जहाँ नित नयी घटना घटती है और उस घटना को उसी के मनोविज्ञान के अनुरूप किन्तु बिल्कुल नए स्वरूप में प्रस्तुत करना होता है इसके लिए उच्च स्तर की संवेदनशीलता, प्राप्त तथ्यों की विश्लेषण क्षमता, उसके सन्दर्भों की विवेचना, शोध-प्रवृत्ति, उच्च कल्पनाशीलता, तार्किक शक्ति, उच्च समाजिकता, प्रचण्ड आत्मविश्वास आदि प्रवृत्तियों बहुत सख्त जरूरत है। ये सभी प्रवृत्तियां जब बिल्कुल संतुलित और प्रबल अवस्था में होती हैं तो निश्चित रूप से न सिर्फ पत्रकारिता का आनंद उठाया जा सकता है बल्कि समाज को शाश्वत सन्देश दे कर उसमे अपेक्षित बदलाव लाया जा सकता है। सशक्त और प्रभावी पत्रकारिता करने के लिए "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" द्वारा "मानसिक सशक्तिकरण" बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। वैसे पत्रकारिता के पेशे में लगे लोगों को भी मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी मानसिक क्षमता प्रभावित होती है जिसे इस उन्नत और विकसित विज्ञान के मदद से रोक कर पत्रकारों को मानसिक रूप से बहुत हद तक सशक्त और प्रबल बनाया जा सकता है। कुछ पत्रकारों ने अपने छात्र जीवन में इस विकसित विधा का लाभ उठा कर पत्रकारिता जगत में एक मुकाम पर हैं। इस पेशे के कारण यदि कुछ मानसिक परशानी यदि आ भी गयी हो तो "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उसे दूर कर मानसिकता को अति सशक्त किया जा सकता है।
ऐसा एक मामला आया था लगभग 4 साल पहले लखनऊ से। वो देश के एक प्रतिष्ठित मैगजीन के लिए पत्रकारिता करते थे और किसी कारण वश उनको एंग्जायटी डिसऑर्डर हो गया था। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से उनको पूरी तरह से न सिर्फ मुक्ति मिल गयी बल्कि उनकी मानसिक शक्ति भी बहुत बढ़ गयी।
ऐसे ही और भी पत्रकारों को समस्या होने पर इस उन्नत विधा "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से निजात तो पाते ही रहते हैं साथ ही उन्हें मानसिक सशक्तिकरण भी प्राप्त होता रहता है।
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी तथा कॉर्पोरेट प्रोफेशनल मैनेजमेंट
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी (उन्नत मनोविज्ञान = एडवांस साइकोलॉजी) वास्तव में इतनी उन्नत है कि गंभीर बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं है। सामान्यतः ये देखा गया है कि गंभीर बौद्धिकता वाले प्रोफेशनल्स में एंग्जायटी और मूड डिसऑर्डर होने की सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है जिससे न सिर्फ उनके कार्य करने की गति प्रभावित होती है बल्कि माहौल भी नकरात्मक रूप से प्रभावित होने लगता है। विपणन (मार्केटिंग) एवं प्रोजेक्ट मैंनेजर्स में अपने लक्ष्य (टारगेट) प्राप्त करने को लेकर इतना दबाव एवं तनाव रहता है कि उसकी इंटेलीजेन्सी असमान्य रूप से प्रभावित होती रहती है ऐसी असमान्यता से बचने तथा उत्तरोत्तर मानसिक उन्नयन के लिए ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी बहुत कारगर है साथ ही आवश्यक भी अन्यथा ऐसी असामन्य अवस्था के लम्बे समय तक बने रहने पर इंटेलीजेन्सी तो घटती ही है साथ ही मूड या एंग्जायटी डिसऑर्डर या दोनों के होने के साथ-साथ व्यक्ति का व्यवहार भी प्रभावित होता है। ऐसा ही एक मामला आया चार्टर अकाउंटटेंट (सी .ए .) का जो पिछले 12 साल से अवसाद (डिप्रेशन) से पीड़ित थे तथा मनोचिकित्सकीय इलाज से परेशान हो चुके थे। ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी की मदद से बिना किसी दवा के वो मात्र 1 महीने में ही स्थाई रूप से न सिर्फ बिल्कुल ठीक हो गए बल्कि उनका मस्तिष्क पहले से काफी सशक्त भी हो गया किसी भी समस्या का तीव्र समाधान खोज लेने में आज उनको कोई परेशानी नहीं होती। आज की तारीख में उनका बिज़नस काफी तेजी से बढ़ रहा है जो पहले संभव नहीं था।
कॉर्पोरेट जगत में उच्च पदों के प्रोफेशनल अधिकारीयों के लिए भी "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" बहुत कारगर है जिसके माध्यम से वे अधिकारी न सिर्फ तनाव और मानसिक दबाव का सकारात्मक उपयोग करने में सफल रहते हैं "समस्याओं को अवसर" में बदल लेने की क्षमता भी विकसित कर लेते हैं।अनेक कंपनियों के कुछ अधिकारीयों ने इस विकसित विधा के लाभ उठाते हुए न सिर्फ कंपनी को उच्च मुकाम तक पहुंचाया बल्कि उन्होंने तेजी से प्रमोशन भी प्राप्त किया, उसमे से कुछ तो प्रमोशन करते हुए अपनी कंपनी में सबसे कम उम्र के जनरल मेनेजर तक बन गए।
ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी (उन्नत मनोविज्ञान = एडवांस साइकोलॉजी) वास्तव में इतनी उन्नत है कि गंभीर बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं है। सामान्यतः ये देखा गया है कि गंभीर बौद्धिकता वाले प्रोफेशनल्स में एंग्जायटी और मूड डिसऑर्डर होने की सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है जिससे न सिर्फ उनके कार्य करने की गति प्रभावित होती है बल्कि माहौल भी नकरात्मक रूप से प्रभावित होने लगता है। विपणन (मार्केटिंग) एवं प्रोजेक्ट मैंनेजर्स में अपने लक्ष्य (टारगेट) प्राप्त करने को लेकर इतना दबाव एवं तनाव रहता है कि उसकी इंटेलीजेन्सी असमान्य रूप से प्रभावित होती रहती है ऐसी असमान्यता से बचने तथा उत्तरोत्तर मानसिक उन्नयन के लिए ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी बहुत कारगर है साथ ही आवश्यक भी अन्यथा ऐसी असामन्य अवस्था के लम्बे समय तक बने रहने पर इंटेलीजेन्सी तो घटती ही है साथ ही मूड या एंग्जायटी डिसऑर्डर या दोनों के होने के साथ-साथ व्यक्ति का व्यवहार भी प्रभावित होता है। ऐसा ही एक मामला आया चार्टर अकाउंटटेंट (सी .ए .) का जो पिछले 12 साल से अवसाद (डिप्रेशन) से पीड़ित थे तथा मनोचिकित्सकीय इलाज से परेशान हो चुके थे। ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी की मदद से बिना किसी दवा के वो मात्र 1 महीने में ही स्थाई रूप से न सिर्फ बिल्कुल ठीक हो गए बल्कि उनका मस्तिष्क पहले से काफी सशक्त भी हो गया किसी भी समस्या का तीव्र समाधान खोज लेने में आज उनको कोई परेशानी नहीं होती। आज की तारीख में उनका बिज़नस काफी तेजी से बढ़ रहा है जो पहले संभव नहीं था।
कॉर्पोरेट जगत में उच्च पदों के प्रोफेशनल अधिकारीयों के लिए भी "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" बहुत कारगर है जिसके माध्यम से वे अधिकारी न सिर्फ तनाव और मानसिक दबाव का सकारात्मक उपयोग करने में सफल रहते हैं "समस्याओं को अवसर" में बदल लेने की क्षमता भी विकसित कर लेते हैं।अनेक कंपनियों के कुछ अधिकारीयों ने इस विकसित विधा के लाभ उठाते हुए न सिर्फ कंपनी को उच्च मुकाम तक पहुंचाया बल्कि उन्होंने तेजी से प्रमोशन भी प्राप्त किया, उसमे से कुछ तो प्रमोशन करते हुए अपनी कंपनी में सबसे कम उम्र के जनरल मेनेजर तक बन गए।
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