"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा रोगप्रतिरोधक (Immune) क्षमता
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" इतना विकसित विज्ञान है कि बिना किसी
दवा के मस्तिष्क के प्रवृत्त्यों को सटीक डायग्नोसिस करके उसके "न्यूरल
पाथवेज़" को स्वभाविक अवस्था में स्थापित कर दिया जाए तो शरीर की रोग
प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है और पूरे 100% तक
बढ़ाया जा सकता है। अध्ययनों में ये पाया गया है कि हमारी रोगप्रतिरोधक प्रणाली
काफी हद तक हमारी भावनाओं पर निर्भर करती है यदि हम अपनी मानसिकता और भावनाओं को
स्वभाविक स्वरुप में "सशक्त" कर लें तो इसमें बहुत हद तक वृद्धि की जा
सकती है।
ऐसा ही एक
मामला आया था लगभग 1 साल पहले 24 वर्षीय युवक का।
उसका डिप्रेशन डायग्नोसिस के अधार पर मनोचोत्सकीय इलाज पिछले 11 सालों से चल रहा था लाभ बिल्कुल नहीं होने के कारण लाभ की उम्मीद
में इस बीच उसने तीन-चार मनोचिकित्सकों को बदला लेकिन लाभ होने के बजाय मामला और
बिगड़ता जा रहा था। लगभग 12 साल पहले इस युवक का पेट खराब हुआ
था बहुत इलाज कराने के बाद भी कोई फायदा नही हुआ तो किसी ने बताया कि डिप्रेशन के
कारण पेट खराब रहता है अतः उसे पेट का इलाज नहीं बल्कि डिप्रेशन का इलाज कराना
चाहिए फिर उसने अपने डॉक्टर्स से पूछा तो डॉक्टर ने इसकी पुष्टि कर दी। फिर उसने
अपना मनोचिकित्सकीय इलाज कराना शुरू किया और 11 साल तक कराता
रहा अंत में हार मान के उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उसके मानसिक अवस्था का परीक्षण किया
गया तो पता चला उसे डिप्रेशन ही नहीं है बल्कि उसे चिंता विकृति भी है जिसपर
डिप्रेशन आधारित है। इसी के आधार पर उसके मस्तिष्क की प्रवृत्तितों के
"न्यूरल पाथवेज़" को सेट कर दिया गया जिससे लगभग 1.75 महीने में बीमारी और दवाओं से पूरी तरह मुक्ति मिल गयी। लगभग 2 महीनो के बाद जब वो मिला तो उसने बताया कि उसका "इस्नोफिलिया"
भी ठीक हो गया मुझे ये सुन के बहुत आश्चर्य हुआ तो मैंने पूछा कि तुमको कैसे पता
चला कि तुमको "इस्नोफिलिया" है ? तो उसने बताया कि पिछले दस साल वो नियमित रक्त की जाँच कराता है और उसमे
इस्नोफिलिया का स्तर जहाँ 4-6% तक होना चाहिए वहीँ उसके
रिपोर्ट में इसका स्तर 20% के आस-पास था। जब उसने या कहा तो
फिर से उसके रक्त की जाँच कराई गयी जिसमे उसका "लिम्फोसाईट" काउंट 21-24% से बढ़कर 46%
था जो कि पहले की तुलना में लगभग दोगुनी (100%) वृद्धि
थी जो उसके "इस्नोफिलिया" के ठीक होने की शुरुआत थी जो अगले तीन से छः
महीने में उसके "इस्नोफिलिया" का स्तर
सामान्य हो गया ये सब संभव हुआ बिना किसी दवा के वैसे भी रोगप्रतिरक्षा तंत्र को
मजबूत करने के लिए एलोपैथी में कोई दवा है ही नहीं जबकि कमजोर करने के लिए पूरा
कार्टिसोल उपलब्ध है।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उस युवक का मस्तिष्क इतना
सशक्त हो गया कर लिया कि "रोगप्रतिरोधक क्षमता" में 100% के वृद्धि हो गयी और "इस्नोफिलिया"
जैसे असामान्यता भी बिल्कुल ठीक हो गयी जिसे एलोपैथी में लाईलाज माना जाता है और
जो दवाओं से ठीक होना तो संभव ही नहीं है। आज वह युवक बड़े आराम से चावल, दही, प्याज, मूली आदि खाता है
और उसे कोई परशानी नहीं होती। आज वो पूरी स्वस्थ मानसिकता और स्वस्थ शरीर के साथ
जीवन का पूरा आनंद उठा रहा है।
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