"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा शोध छात्र
सभी शोध छत्रों के अनिवार्य रूप से "उच्च मानसिक क्षमता" की बहुत जरूरत होती है। उच्च स्तरीय शोध तभी संभव जब शोधार्थी अपनी पूरी मानसिक क्षमता का अभिनव प्रयोग करे तभी वह एक तो समय से अपना शोध-प्रबंध पूरा कर सकता है, शोध के दौरान आने वाली समस्याओं को वह अवसरों में बदल सकता है तथा यदि शोध के दौरान किसी भी प्रकार की नई खोज होने की थोड़ी भी सम्भावना है तो उसका अनुभव कर विश्लेषण करते हुए नयी खोज भी कर सकता है। इन सबके लिए बिल्कुल अलग प्रकार के मस्तिष्क के "विश्लेषण क्षमता" की जरूरत होती है जो मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही मिल सकता है कहीं और से नहीं क्योंकि "मन (mind) को सूक्ष्मता से विश्लेषित कर "मानसिक उन्नति" का मार्ग सिर्फ और सिर्फ इसी उन्नत और अतिविकसित मनोविज्ञान से मिल सकता है। अतः सभी शोध छात्रों को चाहिए कि शोध में पंजीकरण होते ही अनिवार्य रूप से "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" द्वारा अपनी मानसिक और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करें वैसे जो छात्र पहले से शोध कर रहे हैं वो भी इसका लाभ उठा सकते हैं।
वैसे शोध-कार्य इतना तनाव भरा और उच्च मानसिक दबाव वाला कार्य होता है कि कई प्रकार के मनोविकार के भी घर कर जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हमेशा बनी रहती है जैसे डिप्रेशन, चिंता विकृति और व्यक्तित्व की समस्याएँ कुछ ज्यादा ही दिखती हैं जिससे न सिर्फ शोधार्थी के मानसिक क्षमता का ह्रास होता है बल्कि शोध की गुणवत्ता पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है इस लिहाज से "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" का उपयोग करके वे अपनी मानसिक परेशानियों न सिर्फ मुक्ति पा सकते हैं बल्कि अपनी "बौद्धिक क्षमता" में वृद्धि कर नयी खोज करके नया इतिहास भी रच सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक भौतिक विज्ञान के शोधार्थी का मामला आया जो पिछले डेढ़ साल से अपना मनोचिकित्सकीय इलाज करा रहा था उसे डिप्रेशन में बताया गया था। उसके मस्तिष्क का ग्राफोलोजिकल जाँच करने पर पता चला कि उसे केवल डिप्रेशन ही नहीं OCD की भी समस्या है। दरअसल कुछ दिनों पहले वो अपने घर से कहीं बिना बताए चला गया था फिर कुछ दिनों के घर वाले उसे पकड़ के ले आए थे। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की मदद से न सिर्फ वो 1 महीने में ठीक हो गया बल्कि उसका मस्तिष्क काफी "सशक्त" भी हो गया। उसके शोध की गुणवत्ता इतनी उच्चकोटि की थी कि आज वो यूरोप में वैज्ञानिक है। अन्य ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से स्वयं को एकदम बदल डाला।
सभी शोध छत्रों के अनिवार्य रूप से "उच्च मानसिक क्षमता" की बहुत जरूरत होती है। उच्च स्तरीय शोध तभी संभव जब शोधार्थी अपनी पूरी मानसिक क्षमता का अभिनव प्रयोग करे तभी वह एक तो समय से अपना शोध-प्रबंध पूरा कर सकता है, शोध के दौरान आने वाली समस्याओं को वह अवसरों में बदल सकता है तथा यदि शोध के दौरान किसी भी प्रकार की नई खोज होने की थोड़ी भी सम्भावना है तो उसका अनुभव कर विश्लेषण करते हुए नयी खोज भी कर सकता है। इन सबके लिए बिल्कुल अलग प्रकार के मस्तिष्क के "विश्लेषण क्षमता" की जरूरत होती है जो मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही मिल सकता है कहीं और से नहीं क्योंकि "मन (mind) को सूक्ष्मता से विश्लेषित कर "मानसिक उन्नति" का मार्ग सिर्फ और सिर्फ इसी उन्नत और अतिविकसित मनोविज्ञान से मिल सकता है। अतः सभी शोध छात्रों को चाहिए कि शोध में पंजीकरण होते ही अनिवार्य रूप से "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" द्वारा अपनी मानसिक और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करें वैसे जो छात्र पहले से शोध कर रहे हैं वो भी इसका लाभ उठा सकते हैं।
वैसे शोध-कार्य इतना तनाव भरा और उच्च मानसिक दबाव वाला कार्य होता है कि कई प्रकार के मनोविकार के भी घर कर जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हमेशा बनी रहती है जैसे डिप्रेशन, चिंता विकृति और व्यक्तित्व की समस्याएँ कुछ ज्यादा ही दिखती हैं जिससे न सिर्फ शोधार्थी के मानसिक क्षमता का ह्रास होता है बल्कि शोध की गुणवत्ता पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है इस लिहाज से "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" का उपयोग करके वे अपनी मानसिक परेशानियों न सिर्फ मुक्ति पा सकते हैं बल्कि अपनी "बौद्धिक क्षमता" में वृद्धि कर नयी खोज करके नया इतिहास भी रच सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक भौतिक विज्ञान के शोधार्थी का मामला आया जो पिछले डेढ़ साल से अपना मनोचिकित्सकीय इलाज करा रहा था उसे डिप्रेशन में बताया गया था। उसके मस्तिष्क का ग्राफोलोजिकल जाँच करने पर पता चला कि उसे केवल डिप्रेशन ही नहीं OCD की भी समस्या है। दरअसल कुछ दिनों पहले वो अपने घर से कहीं बिना बताए चला गया था फिर कुछ दिनों के घर वाले उसे पकड़ के ले आए थे। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की मदद से न सिर्फ वो 1 महीने में ठीक हो गया बल्कि उसका मस्तिष्क काफी "सशक्त" भी हो गया। उसके शोध की गुणवत्ता इतनी उच्चकोटि की थी कि आज वो यूरोप में वैज्ञानिक है। अन्य ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से स्वयं को एकदम बदल डाला।
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