Tuesday, 23 April 2013

दिल्ली में नाबालिग  बच्चियों  के साथ चल रहे हुए अमानुषिक कृत्य अभियान पर जिस प्रकार की संवेदना का प्रवाह हो रहा है वो ठीक तो है किन्तु इस सन्दर्भ में जिस प्रकार की राजनीति सत्ता पक्ष के द्वरा दिखाई जा रही है वो न सिर्फ उसकी संवेदनहीनता दर्शाती है बल्कि एक प्रकार से जनता को बेवकूफ बनाना चाहते हैं मनमोहन सिंह कहते कि समाज को संवेदनशील बनना पड़ेगा ...मनमोहन जी आप बताईये कि बड़ी - बड़ी अट्टालिकाओं जिसे AIIMS, VIMHANS, NIMAHANS, JNU, DU और कुछ उटपटांग नामो वाले बेहूदी बिल्डिंगों में बैठ के कुर्सी तोड़ने वाले "मूर्खों और बुद्धिहीनो की फौज" के होते हुए ऐसे घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं ? आज संवेदनशीलता, समाजिकता और  बुद्धिमत्ता में मधुमक्खी का छत्ता कैसे लग गया ? भावनाएं इस कदर ख़त्म हो चुकी है कि प्रधानमंत्री को महंगाई कम करने के अंदाज में जनता को सांत्वना देने की जरूरत पड़ रही है ...वैसे टाइम मग्जीन द्वारा "अंडरएचीवर" का पुरस्कार पाने वाला व्यक्ति किस हद तक क्या करेगा किसी को कोई भरोसा नहीं। चारो ओर से मांग उठ रही है कड़ा कानून बनना चाहिए ...बलात्कारियों को फंसी पर लटका देना चाहिए ...ठीक है ये सब किया जाना चाहिए लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता कि तंत्र के ऐसे घटकों पर विचार करने की जहमत क्यों नहीं उठाई जाती जिससे कोई भी इसके लिए प्रेरित ही न हो सके ...अभी जी न्यूज़ वाले VIMHANS के किसी मनोचित्सक (साइकेट्रिस्ट) से बात कर रहे थे ...वो महाशय इसे डिसोसीएटिव पर्सनालिटी डिसऑर्डर बता रहे थे ...क्या बेहूदा मजाक है ऐसे - ऐसे लोग जब चिकित्सक बन के घूमेंगे तो देश, राष्ट्रभक्ति, चरित्र , मानवता ....आदि का बलात्कार तो होगा ही हमें दरअसल इन मूर्खों के प्रकोप से भी समाज को बचाना है ...पता नहीं मीडिया वालों के पास दिमाग नाम की चीज भी है या नहीं ओपीनियन लेने के लिए  इन मेडिकल-मैड के पास जाने से पहले cchr.org की साईट पता नहीं क्यों देखते नहीं ...सारी दुनिया मनोचिकित्सा (साइकाइट्री) को प्रतिबंधित करने मांग कर रही है। अभी कुछ दिन पहले हमरे शहर गोरखपुर की मेडिकल (MBBS) की छात्रा ने गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लिया ...दरअसल उसका मानसिक इलाज चल रहा था और डिप्रेशन में थी ....क्या मजाक है इलाज के दौरान और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के कुछ ही दिनों के बाद उसने खुद को खत्म कर लिया ....ऐसे मामले आए दिन बढ़ रहे है जैसे - जैसे शिक्षा का विकास होता जा रहा है ...

डॉ मनमोहन सिंह ये नहीं बता पा रहे हैं कि समाज में संवेदनशीलता बढ़ेगी कैसे ... कौन जाँच करेगा ...कौन सी मशीन है ...कौन सी विधि है जिससे ये पता लगाया जा सकेगा कि समाज में संवेदनशीलता की क्या स्थिति है ... पता नहीं क्यों लोग इस तथ्य पर नहीं जाते या जा पाते कि कोई भी अपराधी अपराध करने से पहले कानून का अध्ययन नहीं करता ...कोई चोर, डकैत, बलात्कारी, घूसखोर ऐसा करता हो तो मुझे मुझे तो नहीं मालूम ..फिर "डर" की बात पता नहीं कहाँ से आ जाती है ...डर बिल्कुल अलग चीज है ...अपराध बिल्कुल अलग ...कानून का डर समाज को बहुत छोटे स्तर पर प्रभावित करता है ...पता नहीं ये ये बात लोगों को समझ में क्यों नहीं आती ...यदि हमें इस मानवता, राष्ट्र, समाज, भावनाओं, संस्कारों, संस्कृति और देवियों को बलात्कार से बचाना है तो तो निश्चित रूप से लोगों की मानसिकता को "शक्तिशाली" करके बहुत बड़े स्तर पर लोगों को बुद्धिमान बनाना होगा ...इसके लिए पूरे तंत्र को नए सिरे से बदलने की जरूरत है ....     

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