आदरणीय गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।" मतलब साफ़ है राहुल गाँधी के सीआईआई में भाषण के बाद कांग्रेसियों को तुलसीदस की याद सताने लगी। वैसे एक बात तो साफ़ है कि मजबूरी में किसी को खम्बे पर नहीं चढ़ाया जा सकता अगर कोई ऐसा करता है तो नतीजा आपके सामने है आँखों में भैसें घुस जातीं हैं फिर सारी दुनियां भैंस पर ही नजर आने लगती है। मुझे राहुल गाँधी ये तो पूछने का मौका ही नहीं मिला कि खम्बे पर उनको चढाने की हिम्मत और साजिश किसकी थी लेकिन गिरने पर राहुल बजाज ने "...बुलन्द भारत की बुलंद तस्वीर .." वाले फ्लॉप अंदाज में लंगडी मार के उनको सहलाने की पूरी कोशिश की थी। मैंने राहुल बजाज से इस बारे में पूछा तो कहने लगे "...व्यक्ति के अंतिम समय में मेरी ही गाड़ी काम आएगी ..." मैंने कहा "...मार्केटिंग का हार्वर्ड छाप फंडा यहाँ कैसे चलेगा ...?" उन्होंने कहा "...भैसों की बुलंदी अंतिम समय में काम नहीं आती ..." मैंने जिज्ञासावश पूछा "...आदि गोदरेज और आप में ये साम्य कैसे हो गया ..." उन्होंने बड़ी सहजता से इसका उत्तर दिया "...कॉर्पोरेट के अपने नियम हैं सो हमें तो उसको फॉलो करना ही है ..." मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई सो मैंने फिर पूछा "....नियम में से नि हटाना क्यों जरूरी हो गया ...?" वो मुझे समझाते हुए बोले "...कुछ तो सिस्टम के शाश्वत नियम हैं जो हम लोगों को साफ - साफ़ दिखता है ...इसीलिए राशिद अल्वी साहब हम लोगों को डिकोड करते फिर रहे हैं ..." मैंने पूछा "...फिर नरेंद्र मोदी ..." वो घबरा कर डांटते हुए मुझसे बोले "....आप इस बारे में किसी कांग्रेसी से बात कीजिये ...नमस्कार " ये कह के वो चले गए। मैंने बहुत प्रयास के बाद एक कांग्रेसी से पूछा "...ये भैसों का क्या मामला है ...?" वो बड़े खुशनुमा अंदाज में सीना चौड़ा करते हुए बोले "...मामला भारत के विकास का है भैसों का नहीं ...!" मैंने पूछा " ....लेकिन पार्टी लाइन तो भैसों जैसी ही है जैसा कि आपके प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब फरमा रहे हैं ..." वो बोले "...देखिये राहुल जी बड़े बुद्धिमान व्यक्ति हैं ..." मैंने पूछा "...आपको ये दावा करने की जरूरत बार-बार क्यों पड़ रही है ...?" वो बोले "...हम लोग हाई कमांड की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकते ..." मैंने कहा "...मतलब अब तुलसीदास को ..." वो बीच में ही बात काटते हुए बोले "...कांग्रेस सेक्युलर पार्टी है ..." मैंने पूछा "...ये नया शोध कब हुआ है और किसने किया ...?" वो गुस्से में बोले "...आपको क्या लगता है कि कांग्रेस शोध की पात्र है ...?" मैंने कहा "...ये तो उन विशेषज्ञों से पूछिए जो मीडिया में राहुल गाँधी के दुर्लभ भाषण का अर्थ समझने की लगातार कोशिश कर रहे हैं फिर भी सफल नहीं हो पा रहे ..." वो तपाक से बोले "...वो लोग बुद्धिमान नहीं हैं ..." मैंने कहा "...इसीलिए राशिद अल्वी साहब को भैंसों का सहारा लेना पड़ रहा है ...?" वो निरीहता से बोले "...मै क्या करूँ हम लोग पार्टी लाइन से बिल्कुल हट ही नहीं सकते ..." मैंने पूछा "...तुलसीदास कैसे मददगार साबित होंगे ..." वो बोले "...देखिये हम लोग सभी का सम्मान करते हैं ..." मैंने फिर पूछा "...राहुल गाँधी का और उनके भाषण का भी ...?" वो गुस्से में बोले " ...मजबूरी में बहुत कुछ करना पड़ता है न चाहते हुए भी ..." ये कह के वो तेजी से कहीं चले गए वैसे इस मुहावरे के बारे जहाँ तक मेरी जानकारी है मजबूरी में गधे को बाप बनाने का महात्म्य है यहाँ तो भैसें ही उमड़ पडीं ...
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