Monday, 8 April 2013

परसों यानी 6 अप्रैल को मेरे साथ एक अजीब से घटना घट गयी जिससे न सिर्फ मुझे बहुत आश्चर्य हुआ बल्कि बहुत दुःख भी हुआ। जैसा कि आप सभी देख रहे हैं समय समय पर विभिन्न विषयों पर मेरी पोस्टिंग मेरे टाइमलाइन पर आती रहती है आप में से बहुत लोग उसे पसंद भी करते हैं, बहुत से लोग सकारात्मक - प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हैं साथ ही कुछ आलोचना भी , मेरा उन सभी लोगों को सादर आभार है। ऐसे लोगों की भी बहुत बड़ी सख्या है जो मुझे मैसेज करके मेरे आर्टिकल्स को पसंद करते हैं वो पब्लिक फोरम पर ऐसा क्यों नहीं कर पाते मुझे नहीं पता किन्तु मेरा उन सभी के प्रति सादर आभार है साथ ही कृतज्ञता भी। जो लोग मेरी  प्रशंसा या आलोचना करते हैं मेरा उनके प्रति सादर आभार।

मेरे कुछ मित्रों ने मुझे बताया कि गोरखपुर नगर के बुद्धिजीवी वर्ग में ये अफवाह है कि मेरे द्वारा लिखे गए  सारे व्यंगलेख नई दिल्ली के  किसी उच्च नामी मीडिया समूह के किसी व्यक्ति द्वारा नाम बदल कर लिखा जा रहा है। शुरू में तो मैंने इसे बहुत हल्के में लिया लेकिन जब यही बात कई बार मेरे समक्ष आई तो मामला गंभीर हो गया दरअसल इससे मेरी पहचान खतरे में पड़ गयी थी। फिर मैंने भी थोड़ी बहुत इन्क्वायरी की तो पता चला कि बुद्धिजीवी वर्ग ले लोग समझते हैं कि "इडिया टुडे" की फीचर एडिटर द्वरा नाम बदल कर लिखा जा रहा है मुझे नहीं पता था कि "इंडिया टुडे" का फीचर एडीटर कौन है तभी संयोग से मेरे फेसबुक मित्र नरेंदरकर मिश्रा जी ने मनीषा पाण्डेय (फीचर एडीटर, इंडिया टुडे) की एक पोस्टिंग को शेयर किया था जब मैंने उनका लेख देखा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके लेखन और मेरे लेखन में जमीन आसमान का अंतर है फिर भी ये बुद्धिजीवी वर्ग लोग पता नहीं कैसे ये धारणा बना बैठे। खैर ! मैंने मनीषा जी की प्रोफाइल देखी फिर उनकी मित्र सूची भी, उसमे मुझे ओम थानवी (चीफ एडीटर, जनसत्ता) जी का अकाउंट मिला जिसे मैंने लाइक कर लिया। मीडिया पर्सन न होने के कारण मीडिया के लोगों के बारे मुझे कुछ भी पता नहीं रहता और फिर इसकी कभी कोई जरूरत भी महसूस नहीं हुई।

अब आते हैं मुख्य घटना पर दरअसल 6 अप्रैल को हुआ ये था कि ओम थानवी जी ने मिस्र की यात्रा करके लौटने के अपने कुछ फोटोग्राफ्स को अपने फेसबुक अकाउंट पर अपलोड किया था जिसमे एक ऊंट की सवारी का था उस बारे में उन्होंने जैसे लिखा था उससे मुझे अजीब सा लगा तो मैंने उनसे पूछा कि क्या मीडिया में आना उद्देश्य था या किसी और क्षेत्र के लायक नहीं हुए तो मीडिया में आ गए। ओम थानवी जी ने  बड़ी शालीनता और विस्तार से मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि हाँ ये बात सही है कि मै संयोग से पत्रकार बन गया। लेकिन उनके कुछ अनुयायियों को ये बात हजम नहीं हुई और मेरे बारे में उल्टा सीधा कहने के साथ-साथ ये भी पूछा कि मुझे ऐसा क्यों लगता है मैंने बड़ी शालीनता उनके अनुयायियों का उत्तर देते हुए कहा कि उनके अपने फोटोग्राफ्स की टिप्पणी में कहीं दृष्टिकोण की व्यापकता नहीं दिखती जो जीवन पर्यंत व्यक्ति के हर गतिविधि में दिखता है इसी से मुझे लग गया कि ओम थानवी जी मीडिया में आना उनका उद्देश्य नहीं रहा होगा इसके लिए मैंने अतिउन्नत मनोविज्ञान (ग्राफोलोजी) का प्रयोग किया था मेरी आशंका को थानवी जी ने सही साबित किया। लेकिन उत्तर में मैंने उनके अनुयाईयों के लहजे का भी इस्तेमाल किया था। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि मैंने कहीं भी ओम थानवी जी आलोचना तक नहीं की थी। उनके  अनुयायियों द्वारा जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया उसे देखने वाले में से कुछ लोगों ने मुझे मैसेज के माध्यम जो कहा वो वास्तव में गंभीर है। मैंने शालीनता से अनुयायी शब्द का प्रयोग किया है।

मैंने अपने लेखों की टिप्पणियों में से आलोचनात्मक टिप्पणीयों तक को नहीं हटाया जबकि ऐसा किया जा सकता है आलोचकों को ब्लाक करने की बात तो बड़े दूर की है लेकिन पता नहीं क्यों ओम थानवी जी ने मुझे ब्लाक कर दिया। जनसत्ता जैसे अखबार का चीफ एडीटर का ब्लाक करना मेरे लिए वास्तव में दुखद तो है ही साथ ही अविश्वसनीय रूप से आश्चर्यजनक भी ...मुझे मैसेज करने वालों ने अधिकांश लोगों का यही मत था ओम थानवी जी को ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए था। खैर उन्हें जो करना था उन्होंने कर दिया लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस आदि जैसे साइट्स को यदि समाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) कहा जा रहा है जो कि है भी तो निश्चित रूप से ये अखबार, टीवी, रेडियो, नॉनइंटरेक्टिव साइट्स आदि निहायत ही असमाजिक माध्यम (अनसोशल मीडिया) हैं ...  

  

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