Friday, 19 April 2013

दिल्ली में 5 वर्ष के बच्ची के साथ जो कुछ भी हुआ, सुन के मन बहुत खिन्न है दुखी है, ऐसा लगता है जैसे हम पता नहीं किस हम किस भारत में आ गए हैं जहाँ धर्म, जीवन मूल्य, समाजिकता, संस्कार, संस्कृति, राष्ट्रीयता और उसी सन्दर्भ में गौरवशाली अनुभूति का इतना लोप हो चुका है कि समाज को बृहद्द "मानसिक विकृतियों" से बचा पाना भी मुश्किल हो रहा है? क्या ये जघन्य अपराध मात्र पुलिस तंत्र की ही विफलता है? ये बहुत आवश्यक है इस अमानवीय कुकृत्य के सन्दर्भ में इमानदारी से विचार किया जाए। ध्यान देने वाली बात है कि पुलिस की भूमिका और उसका कर्तव्य अपराध को रोकने से कहीं अधिक न्यायिक प्रक्रिया के सन्दर्भों में होती है क्योकि हर जगह पुलिस नहीं हो सकती यदि ऐसा कर भी दिया जाए आम नागरिक की नितान्तता की भयानक प्रश्न चिन्ह लग जाएगा जो और भी बुरी स्थिति हो सकती है। यहाँ मेरा उद्देश्य पुलिस का बचाव करना नहीं है बल्कि मूल समस्या के वास्तविक कारणों की और ध्यान दिलाना है जिससे ऐसे जघन्य अपराध हुआ करते हैं।

मेरा ऐसा मानना है हमने कुछ ऐसे आदर्शों के रूप में कुछ ऐसे "अप्रासंगिक आदर्शों" को ग्रहण करने प्रयास किया है जो समाज को विकसित करने के बजाय उसमे उत्तरोत्तर और अधिक जहर घोलती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण जो मुझे समझ में आता है वो है "शिक्षा व्यवस्था"। शिक्षा के माध्यम लोगों को शिक्षित को किया जा रहा है लेकिन क्या इस बात गारंटी है कि जो शिक्षा हमें मिल रही है वो धर्मयुक्त और संस्कारयुक्त है यदि है तो फिर ऐसे अपराधों के बाद उस अपराधी को दण्डित करने के साथ - साथ उन सभी सभी शिक्षकों और अध्यापकों को भी उतना ही दण्ड मिलना चाहिए जिनकी शिक्षा के उपरान्त उस अपराधी ने अपराध किया। जैसा कि बार - बार समाजिक स्तरों "पढ़े - लिखे " होने की दुहाई दी जाती है। वास्तव में हमें "समाजिक अवधारणा" के स्तर पर वास्तव निरपेक्ष रूप से गंभीरता से शुरू से अंत तक विचार करने जरूरत है। हमें अपने समाज, देश, राष्ट्रीय अवधारणा को सांस्कृतिक सन्दर्भों में परिभाषित करना होगा।

भाषागत नीतियों के सन्दर्भों में यदि देखा जाए तो स्थिति उत्तरोत्तर बुरी से बहुत बुरी होती जा रही है। वास्तव में हम इस प्रक्रिया के माध्यम से हम मूर्खों की वो फौज खड़े करते जा रहे हैं जिनको मात्र परिणाम से मतलब होता है प्रक्रिया से नहीं जैसे यदि किसी का बलात्कार ही करना है तो उसे सिर्फ बलात्कार करने से मतलब होगा किससे करें कैसे करें इससे उसे कोई या तो मतलब नहीं होगा फिर उसका मस्तिष्क उस सन्दर्भ में खतरनाक रूप से प्रतिक्रियावादी हो जाएगा जैसाकि अक्सर देखने को मिलता है। ध्यान देने वाली बात यहाँ ये है कि अपराध वो लोग ही करते हैं जो लोग मानसिक स्तर पर कमजोर होते हैं मजबूत मानसिकता वाला व्यक्ति यानि उद्देश्य के सन्दर्भ में प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझने वाला व्यक्ति बहुत हद तक संभव है कि वो अपराध से दूर रहेगा। भाषागत नीति का एक बहुत बड़ा महत्व इस सन्दर्भ में भी है कि व्यक्ति की बुद्धिमत्ता दरअसल इसी पर निर्भर करती है जो प्रत्यक्षतः उसके शक्ति के रूप में परिलक्षित होती है। इसी का परिणाम है कि आईआईएम वालों से मैनेजमेंट के मामले में मुंबई के डब्बा वाले और धोबी कहीं बहुत ज्यादा विकसित हैं इसीलिए हार्वर्ड से लोग इन डब्बा वालों और धोबियों के प्रदायी तंत्र पर शोध करने आते है। क्या वास्तव इन्हें अंगरेजी सीखने की जरूरत है ? मेरा दावा है अगर इन्हें अंगरेजी सिखा दी जाए तो बहुत संभव है इनकी प्रवीणता समाप्त हो जाएगी। इसी कारण से भारत में नोबेल पुरस्कार के लायक मेधा का अकाल है। यही तथ्य अपराधो के सन्दर्भ एवं उसके प्रारूप पर भी लागू होती है। यह भाषागत अनीति भी बहुत महत्वपूर्ण घटक के रूप में जहरीली हो चुकी है जिसमे हमारी "प्रेरण प्रवृत्ति " काम करती है इसके कारण इतना बड़ा अंतर उत्पन्न हो चुका है समाज के बहुत बड़े वर्ग का मस्तिष्क भयानक भ्रम की स्थिति में है जो प्रत्यक्ष रूप से अपराध को बढ़ावा देता है।

तो आज जरूरत इस बात की है कि समस्या को गहराई से समझा जाए जिससे समाज को "मानसिक विकृतियों " से बचाया जा सके। ध्यान दीजिये मनोचिकित्सा (साइकाइट्री) और पारंपरिक मनोविज्ञान की सहायता से समस्या को सुलझाने के बजाय और गंभीर बना लेंगे देखें लिंक www.cchr.org .तो हमें इसे दरकिनार करते हुए इमानदारी से विचार करना होगा।

No comments:

Post a Comment