Tuesday, 30 April 2013

"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा प्रोफेशनल स्टूडेंट्स
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि प्रोफेशनल कोर्सेज जैसे (MBBS, BE, B.Tech, MBA, BBA, MCA etc.) आदि कोर्सेस में दाखिला लेते हैं तो वे बहुत ज्यादा तनाव का तो सामना करते ही हैं साथ ही हैं कई प्रकार की कुंठा के भी शिकार हो जाते हैं कोर्स पूरा करने का तनाव तो होता ही है साथ ही कोई और विकल्प न होने कारण स्थिति और भी विकट हो जाती है ऐसी गंभीर समस्या केवल कम्पटीशन बीट करके दाखिला लेने वालों के साथ भी बहुत बड़ी मात्रा में होती है यही कारण है IIT जैसे संस्थान में अध्ययन करने वाले छात्र नशे के चपेट में आ जाते हैं शराब का नशा तो आम बात हो चुकी है डिप्रेशन, एंग्जायटी डिसऑर्डर, पर्सनालिटी डिसऑर्डर आदि मानिसक विकृतियाँ लगभग आम हो चली हैं इन संस्थाओं का कॉन्फेशन पेज इस खतरनाक स्थिति को दर्शाता है। जो छात्र डोनेशन दे कर प्रोफेशनल संस्थाओं में दाखिला लेते हैं उनकी स्थिति तो और भी बुरी होती है। किसी भी कीमत पर हमें इन संस्थाओं को मानसिक विकृतियों से बचाना बहुत आवश्यक है क्योंकि इससे न सिर्फ उत्पादकता प्रभावित होती है बल्कि इन छत्रों की "मानसिक क्षमता" पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस गंभीर समस्या का स्थाई समाधान "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से ही संभव है। क्योंकि मात्र इसी विधा से हम प्रोफेशनल छात्रों को "मानसिक शक्ति" प्रदान कर सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक मामला लखनऊ के एक B. Tech के छात्र का आया था। दरअसल उसका दाखिला मध्य प्रदेश के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में डोनेशन पर हुआ था। किसी प्रकार से वो पहला साल तो निकाल लिया लेकिन दूसरे साल में उसे बहुत परेशानी होने लगी अध्ययन से उसका मन भागने लगा और धीरे-धीरे उसकी आत्महत्या करने की इच्छा बढ़ने लगी थी। वह घर लौट आया तो वास्तव में घर वाले बिल्कुल स्तब्ध रह गए थे। लेकिन जीवन की बात समझ कर समझौता करने पर विवश थे। लेकिन उन्होंने ""ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता ली और मात्र 1 महीने के अन्दर वो छात्र न सिर्फ डिप्रेशन से बिल्कुल बहार आ गया बल्कि "मानसिक रूप से अत्यंत सशक्त" भी गया। वो अपने कॉलेज गया और पढाई फिर से शुरू की अब काफी शानदार परफोर्मेंस है उसका। दरअसल उन सभी छत्रों को इस "उन्नत और अतिविकसित मनोविज्ञान" का लाभ निश्चित रूप से उठाना चाहिए जो प्रोफेशनल कोर्स कर रहे हैं इससे वो नया इतिहास भी रच सकते हैं। उन छत्रों को तो अवश्य ही इस विधा से अपनी मानसिकता को सशक्त कर लेना चाहिए जो प्रोफेशनल कोर्सेस में दाखिला लेने जा रहे हैं जिससे न सिर्फ वो अपने कोर्स को शानदार तरीके से पूरा कर सकें, कई पेटेंट भी हासिल कर सकें बल्कि विकृतियों से भी दूर रह सकें।
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा कोचिंग करने वाले छात्र
कोचिंग करके विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams ) जैसे CPMT, AIPMT, AIIMS, AIJEE, UPTU, BANK P.O., CIVIL CERVICES आदि की तैयारी करने वाले छात्रों को "उच्च मानसिक व बौद्धिक क्षमता" की बहुत आवश्यकता रहती है। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की सहायता से "मानसिक सशक्तिकरण" प्राप्त कर लेने वाले प्रतियोगी छात्र  अत्यधिक मानसिक तनाव और दबाव का सकारात्मक उपयोग करते हुए सरलता से और सहज रूप में अपनी बौद्धिक स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति, तार्किक शक्ति, आत्मविश्वास, अवसर प्रबंधन, तेजी से सही निर्णय लेने के क्षमता, बौद्धिक विमर्श आदि अन्य जीवंत प्रवित्तियोँ को पूरी  तरह सुदृढ़ और बहुत मजबूत कर सकते हैं जिससे छात्र तेजी से तो सीखते , समझते और याद करते ही हैं साथ ही उतनी ही तत्परता से वो अपने स्मरण शक्ति का प्रयोग करते हुए ज्ञान का उचित उपयोग भी करते हैं यह "बौद्धिक क्षमता"  मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से ही मिलना संभव है कहीं और से नहीं।  "मानसिक सशक्तिकरण" बहुत आवश्यक होता है क्यों कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में पैसा बहुत लगता है और उससे बड़ी बात समय बहुत कीमती होता है जितना समय बीतता जाता है उतना ही पैसा लगता जाता है।  ऐसी परिस्थितियों में मानसिक तनाव व दवाव बढ़ाने वाले बहुत से करक-घटक होते हैं जिनके कारण छत्रों की न सिर्फ क्षमता कम हो जाती है और उनका चयन भी मुश्किल में पड़ जाता है बल्कि कई प्रकार की "मानसिक विकृतियों" के भी शिकार हो जाते हैं जिसके कारण उनको सामान्य जीवन जीने में भी मुश्किल होती है। "उच्च मानिसक दबाव व तनाव" को ठीक से प्रबंधित न कर पाने के कारण उनका बहुमूल्य धन तो डूबता ही है साथ ही समय भी गवां देते हैं। इसलिए इन परेशानियों से बचने एवं अपना चयन समय से सुनिश्चित करने के लिए ये बहुत आवश्यक है कि कोचिंग संस्थाओं से जुड़ने (Joining Coaching Institutes ) पहले निश्चित रूप से वे अपनी मानसिकता और बौद्धिकता को "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से सशक्त कर लें। इससे सामय और पैसे दोनों की बचत होगी और फिर ये एडवांस थेरेपी बहुत सस्ती भी है और सटीकता के हद तक कारगर भी।
वैसे सामान्यतः ऐसे बहुत से छात्र लखनऊ, कानपुर, कोटा आदि से आते हैं जिन्होंने अत्यधिक तनाव और दबाव के कारण कोचिंग ज्वाइन करने  कुछ ही दिनों बाद कोचिंग छोड़ दिया था, ध्यान देने वाली बात ये है कि देश की लगभग सभी बड़ी और नामी कोचिंग संस्थाएं अपने यहाँ मनोवैज्ञानिक भी रखती हैं लेकिन वे समस्या का समाधान करने बजाय और गंभीर बना देते हैं। ऐसा एक मामला आया था कानपुर के छात्र का जो PMT/CPMT आदि की तैयारी कर रहा था। लगभग 6 महीने तैयारी करने के बाद अत्यधिक तनाव के कारण उसका पेट खराब रहने लगा, इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाने के कारण उसे पीलिया ने भी जकड लिया नतीजतन उसे कानपुर छोड़ना पड़ गया। पूरे दो साल तक उसका इलाज चला फिर भी उसका पेट ठीक नहीं हो रहा था। जब उसने मुझसे संपर्क किया तो उसके मनोअवस्था का  ग्राफोलोगजिकल जाँच के बाद पता चला कि वो गंभीर डिप्रेशन में है। फिर उसी के आधार पर "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" उसका "मानसिक सशक्तिकरण" कर दिया गया, नतीजा ये हुआ कि न सिर्फ उसका पेट बिल्कुल ठीक हो गया बल्कि उसका उसी साल CPMT से MBBS में सिलेक्शन भी हो गया।
कोटा से भी बहुत से केसेस आते हैं जिनको डिप्रेशन, ओबसेशन आदि की शिकायत होती है जिससे उनका मन पढने में बिल्कुल नहीं लगता "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" के माध्यम से पूरी मानसिक शक्ति प्राप्त कर लेते हैं साथ ही चयन भी सुनिश्चित कर लेते हैं। 

Monday, 29 April 2013

"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" तथा शोध छात्र
सभी शोध छत्रों के अनिवार्य रूप से "उच्च मानसिक क्षमता" की बहुत जरूरत होती है। उच्च स्तरीय शोध तभी संभव जब शोधार्थी अपनी पूरी मानसिक क्षमता का अभिनव प्रयोग करे तभी वह एक तो समय से अपना शोध-प्रबंध पूरा कर सकता है, शोध के दौरान आने वाली समस्याओं को वह अवसरों में बदल सकता है तथा यदि शोध के दौरान किसी भी प्रकार की नई खोज होने की थोड़ी भी सम्भावना है तो उसका अनुभव कर विश्लेषण करते हुए  नयी खोज भी कर सकता है। इन सबके लिए बिल्कुल अलग प्रकार के मस्तिष्क के "विश्लेषण क्षमता" की जरूरत होती है जो मात्र "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" से ही मिल सकता है कहीं और से नहीं क्योंकि "मन (mind) को सूक्ष्मता से विश्लेषित कर "मानसिक उन्नति" का मार्ग सिर्फ और सिर्फ इसी उन्नत और अतिविकसित मनोविज्ञान से मिल सकता है। अतः सभी शोध छात्रों को चाहिए कि शोध में पंजीकरण होते ही अनिवार्य रूप से  "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" द्वारा अपनी मानसिक और बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करें  वैसे जो छात्र पहले से शोध कर रहे हैं वो भी इसका लाभ उठा सकते हैं।
वैसे शोध-कार्य इतना तनाव भरा और उच्च मानसिक दबाव वाला कार्य होता है कि कई प्रकार के मनोविकार के भी घर कर जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हमेशा बनी रहती है जैसे डिप्रेशन, चिंता विकृति और व्यक्तित्व की समस्याएँ कुछ ज्यादा ही दिखती हैं जिससे न सिर्फ शोधार्थी के मानसिक क्षमता का ह्रास होता है बल्कि शोध की गुणवत्ता पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है इस लिहाज से "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" का उपयोग करके वे अपनी मानसिक परेशानियों न सिर्फ मुक्ति पा सकते हैं बल्कि अपनी "बौद्धिक क्षमता" में वृद्धि कर नयी खोज करके नया इतिहास भी रच सकते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक भौतिक विज्ञान के शोधार्थी का मामला आया जो पिछले डेढ़ साल से अपना मनोचिकित्सकीय इलाज करा रहा था उसे डिप्रेशन में बताया गया था। उसके मस्तिष्क का ग्राफोलोजिकल जाँच करने पर पता चला कि उसे केवल डिप्रेशन ही नहीं OCD की भी समस्या है। दरअसल कुछ दिनों पहले वो अपने घर से कहीं बिना बताए चला गया था फिर कुछ दिनों के घर वाले उसे पकड़ के ले आए थे। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की मदद से न सिर्फ वो 1 महीने में ठीक हो गया बल्कि उसका मस्तिष्क काफी "सशक्त" भी हो गया। उसके शोध की गुणवत्ता इतनी उच्चकोटि की थी कि आज वो यूरोप में वैज्ञानिक है। अन्य ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्होंने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" की सहायता से स्वयं को एकदम बदल डाला।

"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" तथा रोगप्रतिरोधक (Immune) क्षमता
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" इतना विकसित विज्ञान है कि बिना किसी दवा के मस्तिष्क के प्रवृत्त्यों को सटीक डायग्नोसिस करके उसके "न्यूरल पाथवेज़" को स्वभाविक अवस्था में स्थापित कर दिया जाए तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है और पूरे 100% तक बढ़ाया जा सकता है। अध्ययनों में ये पाया गया है कि हमारी रोगप्रतिरोधक प्रणाली काफी हद तक हमारी भावनाओं पर निर्भर करती है यदि हम अपनी मानसिकता और भावनाओं को स्वभाविक स्वरुप में "सशक्त" कर लें तो इसमें बहुत हद तक वृद्धि की जा सकती है।
ऐसा ही एक मामला आया था लगभग 1 साल पहले 24 वर्षीय युवक का। उसका डिप्रेशन डायग्नोसिस के अधार पर मनोचोत्सकीय इलाज पिछले 11 सालों से चल रहा था लाभ बिल्कुल नहीं  होने के कारण लाभ की उम्मीद में इस बीच उसने तीन-चार मनोचिकित्सकों को बदला लेकिन लाभ होने के बजाय मामला और बिगड़ता जा रहा था। लगभग 12 साल पहले इस युवक का पेट खराब हुआ था बहुत इलाज कराने के बाद भी कोई फायदा नही हुआ तो किसी ने बताया कि डिप्रेशन के कारण पेट खराब रहता है अतः उसे पेट का इलाज नहीं बल्कि डिप्रेशन का इलाज कराना चाहिए फिर उसने अपने डॉक्टर्स से पूछा तो डॉक्टर ने इसकी पुष्टि कर दी। फिर उसने अपना मनोचिकित्सकीय इलाज कराना शुरू किया और 11 साल तक कराता रहा अंत में हार मान के उसने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की शरण ली। "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" से उसके मानसिक अवस्था का परीक्षण किया गया तो पता चला उसे डिप्रेशन ही नहीं है बल्कि उसे चिंता विकृति भी है जिसपर डिप्रेशन आधारित है। इसी के आधार पर उसके मस्तिष्क की प्रवृत्तितों के "न्यूरल पाथवेज़" को सेट कर दिया गया जिससे लगभग 1.75 महीने में बीमारी और दवाओं से पूरी तरह मुक्ति मिल गयी। लगभग 2 महीनो के बाद जब वो मिला तो उसने बताया कि उसका "इस्नोफिलिया" भी ठीक हो गया मुझे ये सुन के बहुत आश्चर्य हुआ तो मैंने पूछा कि तुमको कैसे पता चला कि तुमको "इस्नोफिलिया" है ? तो उसने बताया कि पिछले दस साल वो नियमित रक्त की जाँच कराता है और उसमे इस्नोफिलिया का स्तर जहाँ 4-6% तक होना चाहिए वहीँ उसके रिपोर्ट में इसका स्तर 20% के आस-पास था। जब उसने या कहा तो फिर से उसके रक्त की जाँच कराई गयी जिसमे उसका "लिम्फोसाईट" काउंट 21-24% से बढ़कर 46% था जो कि पहले की तुलना में लगभग दोगुनी (100%) वृद्धि थी जो उसके "इस्नोफिलिया" के ठीक होने की शुरुआत थी जो अगले तीन से छः महीने में उसके "इस्नोफिलिया" का स्तर सामान्य हो गया ये सब संभव हुआ बिना किसी दवा के वैसे भी रोगप्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए एलोपैथी में कोई दवा है ही नहीं जबकि कमजोर करने के लिए पूरा कार्टिसोल उपलब्ध है। 
"ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथिरेपी" के माध्यम से उस युवक का मस्तिष्क इतना सशक्त हो गया कर लिया कि "रोगप्रतिरोधक क्षमता" में 100% के वृद्धि हो गयी और "इस्नोफिलिया" जैसे असामान्यता भी बिल्कुल ठीक हो गयी जिसे एलोपैथी में लाईलाज माना जाता है और जो दवाओं से ठीक होना तो संभव ही नहीं है। आज वह युवक बड़े आराम से चावल, दही, प्याज, मूली आदि खाता है और उसे कोई परशानी नहीं होती। आज वो पूरी स्वस्थ मानसिकता और स्वस्थ शरीर के साथ जीवन का पूरा आनंद उठा रहा है।

“ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” तथा मेडिकल प्रोफेशनल्स
ऐसा नहीं है कि चिकित्सकों (डॉक्टरों) को मानसिक या शारीरिक समस्याएँ नहीं होती। अक्सर देखा गया है कि बहुत अधिक समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाने के कारण तथा अन्य कारणों जैसे अत्यधिक कार्यभार, अत्यधिक मानसिक दबाव, तनाव आदि से उनको भी मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसका परिणाम होता मानसिक क्षमता में कमी जिससे वो काफी चिडचिडे, प्रतिक्रियावादी और अन्य मानसिक विकारों के चपेट में आ जाते हैं। इससे न सिर्फ उनका प्रोफेशन प्रभावित होता है बल्कि संबंधों के साथ-साथ घर का माहौल भी खराब होने लगता है। पारंपरिक मनोचिकित्सा एवं मनोविज्ञान के पास इसका कोई समाधान नहीं है इस वास्तविकता से वो भली भांति परिचित होने के कारण वे समस्याओं को झेलने के लिए बाध्य होते हैं। लेकिन अब कारगर समाधान के रूप में “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” है जिससे न वो अपनी परेशानियों से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं बल्कि अपने मानसिक क्षमता में आशातीत वृद्धि भी कर सकते हैं।
हमारे गोरखपुर शहर के ही बहुत से डाक्टर इसका लाभ उठा चुके हैं। मै यहाँ पर बड़े गंभीर केस का उल्लेख करना चाहूँगा, लगभग 1.5 साल पहले एक एनेस्थेसिया के डॉक्टर ने मुझसे संपर्क किया। दरअसल पिछले 18 सालों से मानसिक विकृति से पीड़ित थे और उनको मनोचिकित्सकीय स्तर पर "डिप्रेशन" के तौर पर डायग्नोज़ किया गया था और उसीका 18 साल से इलाज चल रहा था बेचारे नींद की गोली खा के सोते थे सबेरे उठते ही काफी थका हुआ महसूस करते थे। इन सब कारणों से उनके संबंधों पर भी प्रभाव पड़ने लगा था। जब “ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी” के माध्यम से उनकी मानसिक अवस्था की जाँच की गयी तो पता चला कि उनको डिप्रेशन है ही नहीं उन्हें negative attitude की समस्या थी। इसी के अधार पर उनके मस्तिष्क को "सशक्त" कर दिया गया, मात्र 1.5 महीने में ही रोग और दवाओं से उनको पूरी तरह मुक्ति मिल गयी। ऐसे बहुत से डॉक्टर हैं जिन्होंने "ग्राफोलोजी एवं ग्राफोथेरेपी" की मदद से स्वयं, पत्नी एवं बच्चों सहित पूरे परिवार को मानसिक रूप से सशक्त कर चुके हैं। 

Tuesday, 23 April 2013

दिल्ली में नाबालिग  बच्चियों  के साथ चल रहे हुए अमानुषिक कृत्य अभियान पर जिस प्रकार की संवेदना का प्रवाह हो रहा है वो ठीक तो है किन्तु इस सन्दर्भ में जिस प्रकार की राजनीति सत्ता पक्ष के द्वरा दिखाई जा रही है वो न सिर्फ उसकी संवेदनहीनता दर्शाती है बल्कि एक प्रकार से जनता को बेवकूफ बनाना चाहते हैं मनमोहन सिंह कहते कि समाज को संवेदनशील बनना पड़ेगा ...मनमोहन जी आप बताईये कि बड़ी - बड़ी अट्टालिकाओं जिसे AIIMS, VIMHANS, NIMAHANS, JNU, DU और कुछ उटपटांग नामो वाले बेहूदी बिल्डिंगों में बैठ के कुर्सी तोड़ने वाले "मूर्खों और बुद्धिहीनो की फौज" के होते हुए ऐसे घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं ? आज संवेदनशीलता, समाजिकता और  बुद्धिमत्ता में मधुमक्खी का छत्ता कैसे लग गया ? भावनाएं इस कदर ख़त्म हो चुकी है कि प्रधानमंत्री को महंगाई कम करने के अंदाज में जनता को सांत्वना देने की जरूरत पड़ रही है ...वैसे टाइम मग्जीन द्वारा "अंडरएचीवर" का पुरस्कार पाने वाला व्यक्ति किस हद तक क्या करेगा किसी को कोई भरोसा नहीं। चारो ओर से मांग उठ रही है कड़ा कानून बनना चाहिए ...बलात्कारियों को फंसी पर लटका देना चाहिए ...ठीक है ये सब किया जाना चाहिए लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता कि तंत्र के ऐसे घटकों पर विचार करने की जहमत क्यों नहीं उठाई जाती जिससे कोई भी इसके लिए प्रेरित ही न हो सके ...अभी जी न्यूज़ वाले VIMHANS के किसी मनोचित्सक (साइकेट्रिस्ट) से बात कर रहे थे ...वो महाशय इसे डिसोसीएटिव पर्सनालिटी डिसऑर्डर बता रहे थे ...क्या बेहूदा मजाक है ऐसे - ऐसे लोग जब चिकित्सक बन के घूमेंगे तो देश, राष्ट्रभक्ति, चरित्र , मानवता ....आदि का बलात्कार तो होगा ही हमें दरअसल इन मूर्खों के प्रकोप से भी समाज को बचाना है ...पता नहीं मीडिया वालों के पास दिमाग नाम की चीज भी है या नहीं ओपीनियन लेने के लिए  इन मेडिकल-मैड के पास जाने से पहले cchr.org की साईट पता नहीं क्यों देखते नहीं ...सारी दुनिया मनोचिकित्सा (साइकाइट्री) को प्रतिबंधित करने मांग कर रही है। अभी कुछ दिन पहले हमरे शहर गोरखपुर की मेडिकल (MBBS) की छात्रा ने गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लिया ...दरअसल उसका मानसिक इलाज चल रहा था और डिप्रेशन में थी ....क्या मजाक है इलाज के दौरान और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के कुछ ही दिनों के बाद उसने खुद को खत्म कर लिया ....ऐसे मामले आए दिन बढ़ रहे है जैसे - जैसे शिक्षा का विकास होता जा रहा है ...

डॉ मनमोहन सिंह ये नहीं बता पा रहे हैं कि समाज में संवेदनशीलता बढ़ेगी कैसे ... कौन जाँच करेगा ...कौन सी मशीन है ...कौन सी विधि है जिससे ये पता लगाया जा सकेगा कि समाज में संवेदनशीलता की क्या स्थिति है ... पता नहीं क्यों लोग इस तथ्य पर नहीं जाते या जा पाते कि कोई भी अपराधी अपराध करने से पहले कानून का अध्ययन नहीं करता ...कोई चोर, डकैत, बलात्कारी, घूसखोर ऐसा करता हो तो मुझे मुझे तो नहीं मालूम ..फिर "डर" की बात पता नहीं कहाँ से आ जाती है ...डर बिल्कुल अलग चीज है ...अपराध बिल्कुल अलग ...कानून का डर समाज को बहुत छोटे स्तर पर प्रभावित करता है ...पता नहीं ये ये बात लोगों को समझ में क्यों नहीं आती ...यदि हमें इस मानवता, राष्ट्र, समाज, भावनाओं, संस्कारों, संस्कृति और देवियों को बलात्कार से बचाना है तो तो निश्चित रूप से लोगों की मानसिकता को "शक्तिशाली" करके बहुत बड़े स्तर पर लोगों को बुद्धिमान बनाना होगा ...इसके लिए पूरे तंत्र को नए सिरे से बदलने की जरूरत है ....     

Friday, 19 April 2013

दिल्ली में 5 वर्ष के बच्ची के साथ जो कुछ भी हुआ, सुन के मन बहुत खिन्न है दुखी है, ऐसा लगता है जैसे हम पता नहीं किस हम किस भारत में आ गए हैं जहाँ धर्म, जीवन मूल्य, समाजिकता, संस्कार, संस्कृति, राष्ट्रीयता और उसी सन्दर्भ में गौरवशाली अनुभूति का इतना लोप हो चुका है कि समाज को बृहद्द "मानसिक विकृतियों" से बचा पाना भी मुश्किल हो रहा है? क्या ये जघन्य अपराध मात्र पुलिस तंत्र की ही विफलता है? ये बहुत आवश्यक है इस अमानवीय कुकृत्य के सन्दर्भ में इमानदारी से विचार किया जाए। ध्यान देने वाली बात है कि पुलिस की भूमिका और उसका कर्तव्य अपराध को रोकने से कहीं अधिक न्यायिक प्रक्रिया के सन्दर्भों में होती है क्योकि हर जगह पुलिस नहीं हो सकती यदि ऐसा कर भी दिया जाए आम नागरिक की नितान्तता की भयानक प्रश्न चिन्ह लग जाएगा जो और भी बुरी स्थिति हो सकती है। यहाँ मेरा उद्देश्य पुलिस का बचाव करना नहीं है बल्कि मूल समस्या के वास्तविक कारणों की और ध्यान दिलाना है जिससे ऐसे जघन्य अपराध हुआ करते हैं।

मेरा ऐसा मानना है हमने कुछ ऐसे आदर्शों के रूप में कुछ ऐसे "अप्रासंगिक आदर्शों" को ग्रहण करने प्रयास किया है जो समाज को विकसित करने के बजाय उसमे उत्तरोत्तर और अधिक जहर घोलती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण जो मुझे समझ में आता है वो है "शिक्षा व्यवस्था"। शिक्षा के माध्यम लोगों को शिक्षित को किया जा रहा है लेकिन क्या इस बात गारंटी है कि जो शिक्षा हमें मिल रही है वो धर्मयुक्त और संस्कारयुक्त है यदि है तो फिर ऐसे अपराधों के बाद उस अपराधी को दण्डित करने के साथ - साथ उन सभी सभी शिक्षकों और अध्यापकों को भी उतना ही दण्ड मिलना चाहिए जिनकी शिक्षा के उपरान्त उस अपराधी ने अपराध किया। जैसा कि बार - बार समाजिक स्तरों "पढ़े - लिखे " होने की दुहाई दी जाती है। वास्तव में हमें "समाजिक अवधारणा" के स्तर पर वास्तव निरपेक्ष रूप से गंभीरता से शुरू से अंत तक विचार करने जरूरत है। हमें अपने समाज, देश, राष्ट्रीय अवधारणा को सांस्कृतिक सन्दर्भों में परिभाषित करना होगा।

भाषागत नीतियों के सन्दर्भों में यदि देखा जाए तो स्थिति उत्तरोत्तर बुरी से बहुत बुरी होती जा रही है। वास्तव में हम इस प्रक्रिया के माध्यम से हम मूर्खों की वो फौज खड़े करते जा रहे हैं जिनको मात्र परिणाम से मतलब होता है प्रक्रिया से नहीं जैसे यदि किसी का बलात्कार ही करना है तो उसे सिर्फ बलात्कार करने से मतलब होगा किससे करें कैसे करें इससे उसे कोई या तो मतलब नहीं होगा फिर उसका मस्तिष्क उस सन्दर्भ में खतरनाक रूप से प्रतिक्रियावादी हो जाएगा जैसाकि अक्सर देखने को मिलता है। ध्यान देने वाली बात यहाँ ये है कि अपराध वो लोग ही करते हैं जो लोग मानसिक स्तर पर कमजोर होते हैं मजबूत मानसिकता वाला व्यक्ति यानि उद्देश्य के सन्दर्भ में प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझने वाला व्यक्ति बहुत हद तक संभव है कि वो अपराध से दूर रहेगा। भाषागत नीति का एक बहुत बड़ा महत्व इस सन्दर्भ में भी है कि व्यक्ति की बुद्धिमत्ता दरअसल इसी पर निर्भर करती है जो प्रत्यक्षतः उसके शक्ति के रूप में परिलक्षित होती है। इसी का परिणाम है कि आईआईएम वालों से मैनेजमेंट के मामले में मुंबई के डब्बा वाले और धोबी कहीं बहुत ज्यादा विकसित हैं इसीलिए हार्वर्ड से लोग इन डब्बा वालों और धोबियों के प्रदायी तंत्र पर शोध करने आते है। क्या वास्तव इन्हें अंगरेजी सीखने की जरूरत है ? मेरा दावा है अगर इन्हें अंगरेजी सिखा दी जाए तो बहुत संभव है इनकी प्रवीणता समाप्त हो जाएगी। इसी कारण से भारत में नोबेल पुरस्कार के लायक मेधा का अकाल है। यही तथ्य अपराधो के सन्दर्भ एवं उसके प्रारूप पर भी लागू होती है। यह भाषागत अनीति भी बहुत महत्वपूर्ण घटक के रूप में जहरीली हो चुकी है जिसमे हमारी "प्रेरण प्रवृत्ति " काम करती है इसके कारण इतना बड़ा अंतर उत्पन्न हो चुका है समाज के बहुत बड़े वर्ग का मस्तिष्क भयानक भ्रम की स्थिति में है जो प्रत्यक्ष रूप से अपराध को बढ़ावा देता है।

तो आज जरूरत इस बात की है कि समस्या को गहराई से समझा जाए जिससे समाज को "मानसिक विकृतियों " से बचाया जा सके। ध्यान दीजिये मनोचिकित्सा (साइकाइट्री) और पारंपरिक मनोविज्ञान की सहायता से समस्या को सुलझाने के बजाय और गंभीर बना लेंगे देखें लिंक www.cchr.org .तो हमें इसे दरकिनार करते हुए इमानदारी से विचार करना होगा।

Thursday, 18 April 2013

हमारे गोरखपुर शहर के उचक्कों और पाकिस्तानी आतंकवादियों में अब खासी समानता आ गयी है पहले जहाँ चोरी छिपे बहुत कुछ होता था अब तो सरे आम कुक्कुर की पूंछ में बम बांध कर तमाशा देख कर ताली भी बजा रहे हैं, इसके साथ - साथ सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण समानता ये है कि दोनों को तरकुल (ताड़) के पेड़ पर चढ़कर बड़े शान से थूकने के लिए बहुत मजबूत सीढ़ी उपलब्ध हो गयी है। हमारी गोरखपुर की जनता ही है उचक्कों और आतंकवादीयों में फर्क नहीं करती जैसे आदर्शवादी स्वरुप में हमारा संविधान नागरिकों में फर्क नहीं करता भले ही छिछोर और टीका - टोपारी छाप सेकुलर नेता ऐसा करने से बाज नहीं आते। यही बाजगिरी का आलम है कि बड़े आराम से वो जहाँ चाहते हैं थूक के चले जा रहे हैं। तरकुल पर चढ़ के थूकने बाद एक उचक्का छाप आतंकवादी नीचे उतरा तो बड़े शान से काटजू साहब का गुडगान कर रहा था तो मैंने पूछा "...काटजू साहब ने कहा था क्या ऊपर चढ़ कर उत्पात करने के लिए ..." वो बोला "...काहे वो बोलेंगे .." मैंने पूछा "...फिर ..." वो बोला "...ये सब थूकने का काम पूछ कर थोड़े ही किया जाता है ...ये सब काम करने के बाद हम लोग उनको सूचना दे देते हैं ....बाकी सारा काम वो देख लेते हैं ..." मैंने पूछा "...तुमको डर नहीं लगता ..." वो बोला "...पूरी सरकार के साथ हम भी खड़े हैं ..." मैंने जिज्ञासावश अपना पक्ष रखा "...तुम खड़े हो सकते हो सरकार के साथ पर  सरकार थोड़े न खडी है तुम लोगों के साथ ..." वो बोला "...क्यों बिना खड़े हुए ही माफ़ी नामा का दौर चल रहा है ...!" मैंने आश्चर्य से कहा "...हाँ लगता तो ऐसा ही है ..." वो बोला "...देखियेगा उन साहब के कन्धों पर बैठ के हम शहर भर हम घूम-घूम के थूकेंगे ..." मैंने कहा "...लेकिन नियम कानून भी कोई चीज़ होती है ..." वो बोला "...कोई कुछ नहीं करेगा... आपको पता नहीं है क्या कि वो जनाब सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश रह चुके हैं ..." मैंने आशचर्य से कहा "...ये तो तुम्हारे लिए समस्या होनी चाहिए ..." वो उचक्का छाप आतंकवादी बड़े आत्मविश्वास से बोला "...यही तो हमारी सिक्योरिटी है ..." मेरा मुह दुखद आश्चर्य से खुला रह गया फिर वो बोला "...देखिएगा अगर हम फसेंगे तो पूरी की पूरी सरकार फंसेगी ..." मैंने आश्चर्य से फिर  पूछा "...क्या तुमको थोडा भी डर नहीं लगता ..." वो बोला "...किस बात का डर ...पहले भी हम सेफ थे ही अब तो सपने में भी हम सेफ हो चुके हैं ..." मैंने फिर दुखद आश्चर्य से पूछा "...इसीलिए बीजेपी पार्टी के सामने भी थूकने पहुँच गए ..." वो बोला "...पहुंचे नहीं शान से गए और शान से आए ..." मैंने कहा "...अब तुमको कोई नहीं बचा सकता ... " वो बोला "...माफ़ीनामा तो पहले से कानूनी जामा वालों ने एडवांस में तैयार करा रखा है  ..." मैंने कहा "...ये लोग कौन ..." वो बोला "...वही जो लोग पहले आप लोगों को  न्याय देते थे अब हम लोगों को  देंगे ..." मैंने चेतावनी देते हुए गुस्से में कहा "...ये सब नौटंकी बहुत दिनों तक नहीं चलेगी ..." वो बड़े ठंडे दिमाग से बोला "...नरेन्द्र मोदी दिल्ली प्रधानमंत्री बन कर आएँगे तब न ..." मैंने पूछा "...क्यों तुमको कोई शक है क्या ..." वो फिर ठन्डे दिमाग से बोला "...पहले उनको काटजू साहब से निबटना पड़ेगा हम तो फिर भी बहुत बड़ी हस्ती है ...पूरे इंडिया का ठेका लिए घूम - घूम के थूक रहे हैं ..." ये कह वो उचक्का छाप आतंकवादी जोर-जोर से अट्टहास करने लगा ....मैंने फिर कुछ पूछने के कोशिश नहीं की ...  

Sunday, 14 April 2013

विद्योत्मा ने जब एक उंगली दिखाई तो "उस" मूर्ख को लगा के ये मेरी एक आँख फोड़ना चाहती है तो उसने दोनों आँखे फोड़ने के उद्देश्य से दो उंगलियां उठा दी, पराजित पंडितों ने व्याख्या की कि यदि ईश्वर एक है तो ईश्वर एवं जीव दो हैं ...ऐसा ही हाल है आज की कांग्रेस का, नरेंद्र मोदी यदि विकास की एक उंगली दिखाते हैं तो  राहुल गाँधी विकास और भ्रष्टाचार की दो उंगलियाँ दिखाते हैं ...पूरी की पूरी कांग्रेस पराजित पंडितों की भांति राहुल गाँधी के भाषण की व्याख्या करती फिर रही है। नरेंद्र भाई मोदी ने युवाशक्ति के उपयोग की बात की तो राहुल गाँधी को लगा इन युवाशक्ति का उपयोग करके मोदी जी हमको मरवाना चाहते हैं जैसे विद्योत्मा ने पांच उंगली दिखाई थी तो "मूर्ख" को लगा था कि ये उसे झापड़ मरना चाहती है तो उसने विद्योत्मा को ये सोच के मुक्का दिखा दिया कि तुम मुझे झापड़ मरोगी तो मै तुमको मुक्का मरूँगा ठीक इसी तर्ज पर राहुल गाँधी ने नरेंद्र भाई मोदी को "मधुमक्खी का छत्ता" दिखा ये सोच के कि देखो यदि तुम मुझे युवाशक्ति से मरवाओगे तो तुम्हारे उपर मधुमक्खी छोड़ दिया जाएगा। सारी कांग्रेस पराजित पंडितों की भांति राहुल गाँधी की वक्तव्य की व्याख्या करती फिर रही है। वैसे भी पराजित पंडितों ने उस "मूर्ख" से कहा भी था तुम चुप रहना ठीक वैसे ही राहुल गाँधी भी चुप थे , शास्त्रार्थ से पराजित पंडितों ने विद्योत्मा से कहा था कि ये प्रकांड पंडित है जैसा कि राहुल गाँधी के बारे में कांग्रेस के पराजित पंडित लगातार कहते फिर रहे हैं लेकिन ये "मौन व्रत धारण" किये हुए हैं राहुल गाँधी भी वैसा ही कर रहे थे लेकिन सी आईआई के मंच पर राहुल गाँधी को अपना मौन व्रत तोडना पड़ गया सारा का सारा खेल बिगड़ गया। अभी पता चला है कांग्रेस के पराजित पंडितों ने राहुल गाँधी को फिर से मौन व्रत धारण करने की सलाह दे दी है। वो मूर्ख जिस डाल पर बैठा था उसी को काट रहा था इसी से पराजित पंडितों को लगा गया था कि दुनियां में इससे बड़ा "मूर्ख" कोई और नहीं हो सकता लेकिन वो शास्त्रार्थ करने को तैयार ही नहीं हो रहा था लेकिन जब शादी का प्रलोभन दिया गया तब वो तैयार हुआ था। लेकिन सीआई आई के मंच पर राहुल गाँधी ने जो कहा वो किसके समझ में क्या आया ये बहुत गंभीर शोध का विषय है लेकिन विद्योत्मा की भूमिका में नरेन्द्र भाई मोदी के उपर राहुल गाँधी के पराजित पंडितों की व्याख्या से उतना ही असर होता दिख रहा है जितना विद्योत्मा ने उस "मूर्ख" से विवाह के पश्चात् "उष्ट्र" के बजाय "उट्र" "उट्र"के उच्चरण के बाद हुआ था लेकिन समस्या यहाँ ये है कि उस समय डेमोक्रेसी नहीं थी आज डेमोक्रेसी है अतः चिंता की कोई बात नहीं। सीआईआई के मंच से राहुल गाँधी ने अपनी बेहद पर्सनल बात शादी की बात क्यों छेड़ी ....बहुत बड़ा सवाल है ...आगे उन्होंने क्या कहा इसका कोई मतलब नहीं है ...उन्होंने शादी शब्द का उच्चरण ही क्यों किया ...इस बात की व्यख्या कांग्रेस के पराजित पंडित नहीं कर रहे हैं ...इसी के साथ एक बहुत बड़ा सवाल ये भी खड़ा होता है कि वो "मूर्ख" तो विद्योत्मा से शादी करने के लालच में शास्त्रार्थ करने को तो तैयार हो गया लेकिन राहुल गाँधी ने किस लालच में सेआईआई के मंच पर आ कर अपना मौन व्रत तोड़ा था...???

Monday, 8 April 2013

परसों यानी 6 अप्रैल को मेरे साथ एक अजीब से घटना घट गयी जिससे न सिर्फ मुझे बहुत आश्चर्य हुआ बल्कि बहुत दुःख भी हुआ। जैसा कि आप सभी देख रहे हैं समय समय पर विभिन्न विषयों पर मेरी पोस्टिंग मेरे टाइमलाइन पर आती रहती है आप में से बहुत लोग उसे पसंद भी करते हैं, बहुत से लोग सकारात्मक - प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हैं साथ ही कुछ आलोचना भी , मेरा उन सभी लोगों को सादर आभार है। ऐसे लोगों की भी बहुत बड़ी सख्या है जो मुझे मैसेज करके मेरे आर्टिकल्स को पसंद करते हैं वो पब्लिक फोरम पर ऐसा क्यों नहीं कर पाते मुझे नहीं पता किन्तु मेरा उन सभी के प्रति सादर आभार है साथ ही कृतज्ञता भी। जो लोग मेरी  प्रशंसा या आलोचना करते हैं मेरा उनके प्रति सादर आभार।

मेरे कुछ मित्रों ने मुझे बताया कि गोरखपुर नगर के बुद्धिजीवी वर्ग में ये अफवाह है कि मेरे द्वारा लिखे गए  सारे व्यंगलेख नई दिल्ली के  किसी उच्च नामी मीडिया समूह के किसी व्यक्ति द्वारा नाम बदल कर लिखा जा रहा है। शुरू में तो मैंने इसे बहुत हल्के में लिया लेकिन जब यही बात कई बार मेरे समक्ष आई तो मामला गंभीर हो गया दरअसल इससे मेरी पहचान खतरे में पड़ गयी थी। फिर मैंने भी थोड़ी बहुत इन्क्वायरी की तो पता चला कि बुद्धिजीवी वर्ग ले लोग समझते हैं कि "इडिया टुडे" की फीचर एडिटर द्वरा नाम बदल कर लिखा जा रहा है मुझे नहीं पता था कि "इंडिया टुडे" का फीचर एडीटर कौन है तभी संयोग से मेरे फेसबुक मित्र नरेंदरकर मिश्रा जी ने मनीषा पाण्डेय (फीचर एडीटर, इंडिया टुडे) की एक पोस्टिंग को शेयर किया था जब मैंने उनका लेख देखा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि उनके लेखन और मेरे लेखन में जमीन आसमान का अंतर है फिर भी ये बुद्धिजीवी वर्ग लोग पता नहीं कैसे ये धारणा बना बैठे। खैर ! मैंने मनीषा जी की प्रोफाइल देखी फिर उनकी मित्र सूची भी, उसमे मुझे ओम थानवी (चीफ एडीटर, जनसत्ता) जी का अकाउंट मिला जिसे मैंने लाइक कर लिया। मीडिया पर्सन न होने के कारण मीडिया के लोगों के बारे मुझे कुछ भी पता नहीं रहता और फिर इसकी कभी कोई जरूरत भी महसूस नहीं हुई।

अब आते हैं मुख्य घटना पर दरअसल 6 अप्रैल को हुआ ये था कि ओम थानवी जी ने मिस्र की यात्रा करके लौटने के अपने कुछ फोटोग्राफ्स को अपने फेसबुक अकाउंट पर अपलोड किया था जिसमे एक ऊंट की सवारी का था उस बारे में उन्होंने जैसे लिखा था उससे मुझे अजीब सा लगा तो मैंने उनसे पूछा कि क्या मीडिया में आना उद्देश्य था या किसी और क्षेत्र के लायक नहीं हुए तो मीडिया में आ गए। ओम थानवी जी ने  बड़ी शालीनता और विस्तार से मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि हाँ ये बात सही है कि मै संयोग से पत्रकार बन गया। लेकिन उनके कुछ अनुयायियों को ये बात हजम नहीं हुई और मेरे बारे में उल्टा सीधा कहने के साथ-साथ ये भी पूछा कि मुझे ऐसा क्यों लगता है मैंने बड़ी शालीनता उनके अनुयायियों का उत्तर देते हुए कहा कि उनके अपने फोटोग्राफ्स की टिप्पणी में कहीं दृष्टिकोण की व्यापकता नहीं दिखती जो जीवन पर्यंत व्यक्ति के हर गतिविधि में दिखता है इसी से मुझे लग गया कि ओम थानवी जी मीडिया में आना उनका उद्देश्य नहीं रहा होगा इसके लिए मैंने अतिउन्नत मनोविज्ञान (ग्राफोलोजी) का प्रयोग किया था मेरी आशंका को थानवी जी ने सही साबित किया। लेकिन उत्तर में मैंने उनके अनुयाईयों के लहजे का भी इस्तेमाल किया था। लेकिन ध्यान देने वाली बात ये भी है कि मैंने कहीं भी ओम थानवी जी आलोचना तक नहीं की थी। उनके  अनुयायियों द्वारा जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया उसे देखने वाले में से कुछ लोगों ने मुझे मैसेज के माध्यम जो कहा वो वास्तव में गंभीर है। मैंने शालीनता से अनुयायी शब्द का प्रयोग किया है।

मैंने अपने लेखों की टिप्पणियों में से आलोचनात्मक टिप्पणीयों तक को नहीं हटाया जबकि ऐसा किया जा सकता है आलोचकों को ब्लाक करने की बात तो बड़े दूर की है लेकिन पता नहीं क्यों ओम थानवी जी ने मुझे ब्लाक कर दिया। जनसत्ता जैसे अखबार का चीफ एडीटर का ब्लाक करना मेरे लिए वास्तव में दुखद तो है ही साथ ही अविश्वसनीय रूप से आश्चर्यजनक भी ...मुझे मैसेज करने वालों ने अधिकांश लोगों का यही मत था ओम थानवी जी को ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए था। खैर उन्हें जो करना था उन्होंने कर दिया लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस आदि जैसे साइट्स को यदि समाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) कहा जा रहा है जो कि है भी तो निश्चित रूप से ये अखबार, टीवी, रेडियो, नॉनइंटरेक्टिव साइट्स आदि निहायत ही असमाजिक माध्यम (अनसोशल मीडिया) हैं ...  

  

Friday, 5 April 2013

आदरणीय गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।" मतलब साफ़ है राहुल गाँधी के सीआईआई में भाषण के बाद कांग्रेसियों को तुलसीदस की याद सताने लगी। वैसे एक बात तो साफ़ है कि मजबूरी में किसी को खम्बे पर नहीं चढ़ाया जा सकता अगर कोई ऐसा करता है तो नतीजा आपके सामने है आँखों में भैसें घुस जातीं हैं फिर सारी दुनियां भैंस पर ही नजर आने लगती है। मुझे राहुल गाँधी ये तो पूछने का मौका ही नहीं मिला कि खम्बे पर उनको चढाने की हिम्मत और साजिश किसकी थी लेकिन गिरने पर राहुल बजाज ने "...बुलन्द भारत की बुलंद तस्वीर .." वाले फ्लॉप अंदाज में लंगडी मार के उनको सहलाने की पूरी कोशिश की थी। मैंने राहुल बजाज से इस बारे में पूछा तो कहने लगे "...व्यक्ति के अंतिम समय में मेरी ही गाड़ी काम आएगी ..." मैंने कहा "...मार्केटिंग का हार्वर्ड छाप फंडा यहाँ कैसे चलेगा ...?" उन्होंने कहा "...भैसों की बुलंदी अंतिम समय में काम नहीं आती ..." मैंने जिज्ञासावश पूछा "...आदि गोदरेज और आप में ये साम्य कैसे हो गया ..." उन्होंने बड़ी सहजता से इसका उत्तर दिया "...कॉर्पोरेट के अपने नियम हैं सो हमें तो उसको फॉलो करना ही है ..." मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई सो मैंने फिर पूछा "....नियम में से नि हटाना क्यों जरूरी हो गया ...?" वो मुझे समझाते हुए बोले "...कुछ तो सिस्टम के शाश्वत नियम हैं जो हम लोगों को साफ - साफ़ दिखता है ...इसीलिए राशिद अल्वी साहब हम लोगों को डिकोड करते फिर रहे हैं ..." मैंने पूछा "...फिर नरेंद्र मोदी ..." वो घबरा कर डांटते हुए मुझसे बोले "....आप इस बारे में किसी कांग्रेसी से बात कीजिये ...नमस्कार " ये कह के वो चले गए। मैंने बहुत प्रयास के बाद एक कांग्रेसी से पूछा "...ये भैसों का क्या मामला है ...?" वो बड़े खुशनुमा अंदाज में सीना चौड़ा करते हुए बोले "...मामला भारत के विकास का है भैसों का नहीं ...!" मैंने पूछा " ....लेकिन पार्टी लाइन तो भैसों जैसी ही है जैसा कि आपके प्रवक्ता राशिद अल्वी साहब फरमा रहे हैं ..." वो बोले "...देखिये राहुल जी बड़े बुद्धिमान व्यक्ति हैं ..." मैंने पूछा "...आपको ये दावा करने की जरूरत बार-बार क्यों पड़ रही है ...?" वो बोले "...हम लोग हाई कमांड की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकते ..." मैंने कहा "...मतलब अब तुलसीदास को ..." वो बीच में ही बात काटते हुए बोले "...कांग्रेस सेक्युलर पार्टी है ..." मैंने पूछा "...ये नया शोध कब हुआ है और किसने किया ...?" वो गुस्से में बोले "...आपको क्या लगता है कि कांग्रेस शोध की पात्र है ...?"  मैंने कहा "...ये तो उन विशेषज्ञों से पूछिए जो मीडिया में राहुल गाँधी के दुर्लभ भाषण का अर्थ समझने की लगातार कोशिश कर रहे हैं फिर भी सफल नहीं हो पा रहे ..." वो तपाक से बोले "...वो लोग बुद्धिमान नहीं हैं ..." मैंने कहा "...इसीलिए राशिद अल्वी साहब को भैंसों का सहारा लेना पड़ रहा है ...?" वो निरीहता से बोले "...मै क्या करूँ हम लोग पार्टी लाइन से बिल्कुल हट ही नहीं सकते ..." मैंने पूछा "...तुलसीदास कैसे मददगार साबित होंगे ..." वो बोले "...देखिये हम लोग सभी का सम्मान करते हैं ..." मैंने फिर पूछा "...राहुल गाँधी का और उनके भाषण का भी ...?" वो गुस्से में बोले " ...मजबूरी में बहुत कुछ करना पड़ता है न चाहते हुए भी ..." ये कह के वो तेजी से कहीं चले गए वैसे इस मुहावरे के बारे जहाँ तक मेरी जानकारी है मजबूरी में गधे को बाप बनाने का महात्म्य है यहाँ तो भैसें ही उमड़ पडीं ...