Monday, 18 February 2013

हमारे गोरखपुर शहर की दो बदनाम चीजें मशहूर हैं एक शहर का सोमवारी जाम दूसरे डाक्टरों के दलाल के रूप में रिक्शे वाले। खैर जाम तो जाम है हर कदम पर खैरमकदम करता मिलता है इस उपहार के साथ कि इस जाम में बड़े-बड़े बकलोलों को भी ज्ञानी होने का दर्जा मिल जाए। ऐसे ही मैंने एक ज्ञानी से पूछा तो कहने लगे "..जाम में अच्छा टाइम पास हो जाता है .." मैंने कहा "...राष्ट्रीय परिदृश्य पर कुछ दिखता है क्या ...?" वो बोले "..इसीलिए तो सरकार जाम लगने नहीं देती .." वो मुझे नमस्कार करके आगे बढ़ गए। मैंने एक रिक्शे वाले को रोका तो उसने सीधे मुझसे पूछा "...क्या हुआ है ...?" मैंने कहा "...कुछ नहीं .." उसने जबरदस्ती पूछा "...अरे आप घबराईये नहीं ...साफ-साफ  बताईये .." मुझे गुस्सा आया मैंने उसे डांटते हुए कहा "...मुझे गोलघर जाना है चलोगे ..." वो बोला "..काहे नहीं चलेंगे ...लेकिन किस डॉक्टर को दिखाना है ..." मुझे फिर रहा नहीं गया "...बकवास बंद करो ...चलना है तो बोलो ... " उसने कहा "...बैठिये .." मेरे बैठने के बाद वो चलने लगा तभी मुझे किसी की मिस्ड कॉल आई तो मेरा गुस्सा बढ़ गया तो रिक्शेवाला बोला "...लगता है आपको बीपी की प्रॉब्लम है .." मैंने कहा "...तो तू क्या करेगा ..." उसने कहा "...मै आपको बढ़िया डॉक्टर के यहाँ ले चलता हूँ ..." मैंने कहा "...तो तू दलाल है क्या उस डॉक्टर का ..." उसने बड़ी गैरत से कहा "...देखिये हम लोगों की भी इज्जत है ..." मैंने कहा "...सीधे-सीधे बता कहना क्या चाहता है ...?" वो बोला "...हमको ऐसा-वैसा मत समझिये ..हमारा बॉस कोई कांग्रेस का नेता नहीं है ..." मुझे लग गया कि "जाम का ज्ञान" इसे भी अच्छा खासा मिला हुआ है सो मैंने पूछा "...कांग्रेस का नेता नहीं है तो क्या है वो ..." वो बोला "...समाजसेवी है ..." मैंने फिर पूछा "...था तो कांग्रेसी ही न ..." वो बोला "...ये मेरा बिज़नेस है भले ही लोग इसे दलाली कहते हैं ..." मैंने कहा "...बड़ा स्वाभिमान है तुझे ..." उसने कहा "...मुझे मार्कंडेय काटजू मत समझिये ..." मैंने कहा "...कब आए थे वो ..." वो बोला "...मै आधार कार्ड देख कर सवारी नहीं बैठाता ..." मैंने आशंका जाहिर करते हुए पूछा "...मतलब तुमने दलाली की ट्रेनिंग बिना परिचय के उनको दे दी ..." वो बोला "...गोरखपुर में बहुत से काम बिना नाव-गाँव पूछे होता है ..." मैंने कहा "...वो तो सीधे-सीधे कांग्रेस की दलाली कर रहे हैं ..." वो बोला "... इससे अच्छा बिज़नेस इस फील्ड में और क्या हो सकता है ...?" मैंने कहा "...सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश रह चुके है ..!" उसने कहा "...ये तो इस शहर का एक्सपरटाईज़ है कि ऐसे ऐसे लोग भी बहुत कुछ सीखने यहाँ चले आते हैं ..." मैंने उसे उकसाते हुए पूछा "...तू ही किसी पीसीआई का प्रेसीडेंट या ऐसा कुछ क्यों नहीं बन जाता ...?"  उसने बड़े शान्ति से उत्तर दिया "...मुझे जो पसंद है वो ये पार्टी नहीं दे सकती ..."  मैंने पूछा "...क्या चाहिए तुझे "...वो बोला "...काले धन में हिस्सा .." मैंने पूछा "...कोई अप्रोच किया इसके लिए ..." वो कुछ नहीं बोल रहा था ...मेरे बार-बार पूछने पर भी वो कुछ नहीं बोला तो मुझे भी चुप हो जाना पड़ा। थोड़ी ही देर में मेरे  उतरने का स्थान आ गया ...पैसे देते समय वो कमीशन को लेकर भुनभुना रहा था।  

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