अभी कुछ दिनों पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने बिलकुल सही कहा कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) ने देश का कबाड़ा कर दिया। आरएसएस सरसंघ चालक माननीय मोहन भगवत ने उनका समर्थन भी किया। माननीय उच्चतम न्यायलय ने 4 जुलाई, 2013 को महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय के विषय में अपना निर्णय देते हुए चिंता जताई थी कि पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ने के पश्चात भी नैतिक व्यवहार में पतन क्यों होता जा रहा है ? इसका सीधा कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी )। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण हम भारतीयों की मानसिकता कितनी गिरेगी , किस स्तर तक हम मूर्ख बनेंगे इसका अनुमान लगा पाना कम से कम अब तो उतना कठिन नहीं लगता। मूर्खता का आलम ये है कि इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण संस्कारों की तो बात छोड़ दीजिये सामान्य अनुभूतियों पर भी जबरदस्त खतरा है। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले इस स्तर तक मूर्ख हो चुके हैं कि अब कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज के स्नातक पठ्यक्रम में 50 अंकों का "लव कोर्स" चलाया जाएगा। "मूर्ख ही दुष्ट होता है" क्योंकि मूर्खता के कारण "उद्देश्य की प्रक्रिया" उसे समझ में ही नहीं आती जिसके कारण वो उद्देश्य के निमित्त उटपटांग और खतरनाक दुष्टता करता है। अगर मूर्ख बनने की यही रफ़्तार रही तो निश्चित रूप से वो दिन दूर नहीं जब जूता-मोजा पहनने, कपड़े खोलना - पहनना आदि भी कोर्स के रूप में पढाया जाएगा। क्या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफ़ेसर ये बताएँगे को पशु बिना म्लेच्छपना के प्रेम के सन्दर्भ में म्लेच्छों से कहीं अधिक बुद्धिमान कैसे हैं? आखिर ये मूर्ख मलेच्छ प्रोफ़ेसर साबित क्या करना चाहते हैं ? क्या वो सभी को अपने जैसा ही मूर्ख और मलेच्छ बनाना चाहते हैं ?
लगभग 4 वर्ष पूर्व नई दिल्ली स्थित "राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसन्धान केंद्र" ने भाषा और बुद्धिमत्ता पर एक प्रयोग किया, उन्होंने कुछ छात्रों को लिया और एमआरआई मशीन में लिटा कर पहले उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पढ़ने को कहा गया तो ये पाया गया कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी ) पढ़ने के दौरान मस्तिष्क के मात्र बाएं भाग का बहुत थोड़ा सा भाग ही सक्रिय था लेकिन जब उन्हें देवभाषा हिंदी पढ़ने को कहा गया तो परिणाम चौकाने वाले थे पूरा का पूरा मस्तिष्क 100 प्रतिशत तक सक्रिय हो गया। यह प्रयोग सामान रूप से सभी प्रतिभागियों किया गया और सामान परिणाम थे। परिणाम के अर्थ ये बिलकुल स्पष्ट हो गया कि हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोल कर अपने मस्तिष्क का 10 प्रतिशत से भी बहुत कम उपयोग कर पाते हैं अर्थात इस बोली में हम निरे मूर्ख हैं जिसका दुश्प्रभाव आज भारत के प्रत्येक क्षेत्र में दिख रहा है हर ओर गिरावट ही गिरावट दिख रही है जिसका परिणाम है अपराध, निकृष्टता, संस्कारों का भयानक लोप, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि। उपरोक्त प्रयोग से ये सिद्ध होता है कि मातृभाषा में किसी भी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता 100 प्रतिशत तक होती है इसीलिए हर विकसित देश अपनी मातृभाषा में ही विकसित हुआ है न कि म्लेच्छ बोली में। वैसे भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) अंतर्राष्ट्रीय बोली नहीं है ये मात्र 12 देशों में बोली जाती है वो भी उनमे जो म्लेच्छों के पराधीन थे स्वयं "संयुक्त राष्ट्र संघ" भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में काम नहीं करता। "संयुक्त राष्ट्र संघ" की आधिकारिक भाषा फ्रेंच है। और तो और पूरे ब्रिटेन में भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोली जाती।
जीवन-संघर्ष में जहाँ हमें आगे निकलने के कुछ अतिरिक्त मानसिक क्षमता की महती आवश्यकता होती है हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति मनोग्रस्त बन कर मूर्ख बन्दर की भांति अमेरिका और अन्य विकसित देशों का नक़ल कर रहे हैं। हमारी लगभग सभी व्यासायिक शिक्षा म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में है ये तो ऐसा ही है किसी का पैर काट दीजिये और कहिये कि ओलम्पिक के रेस में स्वर्ण पदक जीत कर दिखाए। अभी कुछ वर्ष पहले "संयुक्त राष्ट्र संघ" ने अपने एक रिपोर्ट में कहा था भारत के 97 प्रतिशत से अधिक प्रोफेशनल नकारा हैं किसी काम लायक नहीं हैं आईआईएम, एम्स, आईआईटी जैसी संस्थाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं। मुंबई के डब्बा वाले और धोबियों के प्रदाई तंत्र का प्रबंधन इतना विकसित है कि हार्वर्ड और कैम्ब्रिज के लोग उस पर शोध के लिए आते हैं। उन डब्बा वाले और धोबी जिनकी अधिकतम शिक्षा कक्षा 7 है, आईआईएम के म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफेसरों से भी कहीं अधिक बुद्धिमान और सशक्त हैं। ये जादू है मातृभाषा का और यह तब तक ही है जब तक वो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) से मुक्त हैं जिस दिन उन्हें म्लेच्छ बोली सिखा दी जाएगी ये जादू समाप्त हो जाएगा। अक्सर समाचार पत्रों में ये पढ़ने को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है। वैसे भी जब तक इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रकोप नहीं था तब तक तो कुछ वैज्ञानिक पैदा भी हुए लेकिन जैसे-जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ा है भारत से वैज्ञानिक तो विलुप्त ही हो चुके हैं 125 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में एक भी नोबेल पुरस्कार का न आना ये सिद्ध करता है इस म्लेच्छ बोली से हम भारतीय बिलकुल मूर्ख बन चुके हैं हमारे पास बुद्धि बची ही नहीं है। जबकि हर वर्ष हजारों लोगों को स्वर्ण पदक रेवड़ी की भांति बांटी जाती है ये ठीक वैसा ही है जैसे एक मूर्ख दुसरे मूर्ख के मूर्खता की परीक्षा ले रहा होता है।वैसे भी जो हमारा परीक्षा लेने का तंत्र है उससे किसी भी स्तर पर किसी के बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली ही नहीं जा सकती। भारतीय उद्योग जगत को यदि सबसे आगे निकलना है तो निश्चित रूप से उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का त्याग कर पूर्ण पूर्ण बुद्धिमत्तायुक्त सेवा पर ध्यान देना चाहिए।
भारत की ब्यूरोक्रेसी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की दीवानी है परिणाम किसी भी सफल नीति का न बन पाना। राष्ट्रीय हाहाकार की इस स्थिति को रुपये की गिरते स्तर को देख कर एक अँधा भी सरलता से अनुमान लगा सकता है कि देश म्लेच्छ बोली बोलने वाले मूर्खों के हाथ में है। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है "भारत सर्वदा युद्ध का मैदान जीतता है किन्तु टेबल पर हार जाता है" बिलकुल सटीक कहावत है इसके पीछे कारण ये है कि युद्ध वो लड़ते हैं जो मातृभाषा (देवभाषा) बोलते हैं किन्तु टेबल पर म्लेच्छ बोली बोलने वाली मूर्ख ब्यूरोक्रेसी बैठती है जो सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं करती। धर्म के दस लक्षण हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं उनका पालन सिर्फ बुद्धिमान और वीर ही कर सकते हैं मूर्ख नहीं, मूर्ख मात्र अपराधी हो सकता है अनाचारी हो सकता है दुराचारी हो सकता है या भ्रष्टाचारी हो सकता है। धर्म से दूर होने का सबसे महत्वपूर्ण कारणों में ये म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) भी है कारण मूर्खता ।
भाषा और बुद्धिमत्ता पर गंभीर कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ जिनके कार्य को "होर्फ लिग्विस्टिक हाइपोथिसिस" के नाम से जाना जाता है, में कहा है कि मातृभाषा ही हमें परिवेश को समझने और अनुभूति करने हेतु मंच का निर्माण करती है और मातृभाषा ही हमारे सोचने के तरीके को निर्धारित करती है जिसका सीधा सम्बन्ध बुद्धिमत्ता से होता है। लेकिन जब हम उसमे किसी विदेशी भाषा को जबरदस्ती घुसाने का प्रयास करते हैं तो वो मंच बुरी तरह प्रभावित होता है जिससे परिवेश के प्रति समझ और अनुभव करने की प्रवृत्ति नष्ट होने लगती है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप उसका अनुवाद कितनी तेजी से कर लेते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मातृभाषा का जबदस्त पक्ष लेते हुए कहा कि 14 वर्षों तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे उनके सीखने की प्रवृत्ति पूरी तरह 100 प्रतिशत सक्रिय रहे। मातृभाषा माँ होती है जिसका कोई विकल्प नहीं, जैसे माँ अपने प्यार और स्नेह से बच्चों को सशक्त और वीर बनाती है वैसे ही मातृभाषा भी व्यक्ति उत्तरोत्तर मानसिक रूप से सशक्त और बुद्धिमान बनाती है। यही कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण गीतकारों को गीत नहीं मिल रहा है, कहानीकारों को कहानी नहीं मिल रही, संगीतकारों को संगीत नहीं मिल रही। स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि एक वेश्या और संस्कारित नारी अंतर करना भी कठिन होता जा रहा है सन्नी लीओन का उदहारण सबके सामने है इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिन्हें प्रचंड उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्रख्यात रूसी सिद्धांतकार गेंन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है" में लिखा है "साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते उनकी परिवर्तनकारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत (म्लेछ्पना) या विदेशी बोली हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खड़ी करती है। संसाधनों का उपयोग सीधे-सीधे बुद्धिमत्ता का प्रश्न होता है ठीक वैसे ही जैसे बन्दर के हाथ में तलवार। हम जितने अधिक बुद्धिमान होंगे उतना बेहतर तरीके और मौलिकता से हम संसाधनों का उपयोग करेंगे। आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना के कारण भारत में संसाधनों की क्या स्थिति है बिलकुल सपष्ट है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में मनोवौज्ञानिक तथ्य तो और भी भयानक हैं "किसी भी सन्दर्भ में बिना तार्किक आलोचना के आधार के दूसरे संस्कृति की अत्यंत प्रशंसा तथा अनुपालन तथा एक संस्कृति को , अवास्तविक, रूढ़िबद्ध और विदेशी गुणवत्ता का बताया जाता है "(गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) मानसिक बीमारी है जिसे "चिंता विकृति" में वर्गीकृत किया जाता है। "डिक्शनरी ऑफ़ साइकोलॉजी" ये भी बताती है कि अनावश्यक रूप से या प्रभाव ज़माने के लिए भी म्लेच्छ्पना या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रदर्शन करना मानसिक बीमारी (चिंता विकृति) है। इस चिंता विकृति के कारण व्यक्ति की बुद्धिमत्ता लगभग समाप्त हो जाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है, कई प्रकार की शारीरिक बीमारिओं के घर कर जाने सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि जैसे - जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ रहा है बीमारियाँ भी बढ़ रही है मजे की बात ये कि म्लेच्छ बोली वाले चिकित्सक भी भयानक रूप से इसकी चपेट में हैं। कोई भी म्लेच्छ बोली वाला चिकित्सक न तो शारीरिक रूप से स्वस्थ है और न ही मानसिक रूप से।
ये हमारा परम सौभाग्य है हमारे पास संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा है जो मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि विकास के लिए भी सर्वोत्तम तो है ही साथ ही हर स्तर चाहे वो मानवीय हो या यांत्रिक, पर अतिउपयोगी है किन्तु मूर्खता के कारण हमारा ध्यान उस पर जा ही नहीं रहा। वहीं नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स के नेतृत्व में 1895 से ही के गहन शोध के उपरांत अमेरिका ने अपने युवा पीढी को संस्कृत में पारंगत बनाने की ठान ली है संस्कृत अब नासा की आधिकारिक भाषा ही बनने नहीं जा रही बल्कि बड़े पैमाने पर संस्कृत माध्यम में स्कूल भी खोलने जा रहा है। पता नहीं ये सौभाग्य भारत में कब आएगा।
सन्देश और अर्थ बिलकुल स्पष्ट है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना (अंग्रेजियत) का प्रदर्शन करे वो न सिर्फ मूर्ख है बल्कि मानसिक रोगी भी है जिसके अपराधिक और विनाशकारी होने सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है।