Monday, 30 December 2013

बानर चान्स और बनाना जर्नलिज़्म 

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे एक लोकोक्ति है Once is chance, Twice is coincident, Third time is Pattern मीडिया वाले जिस तरह काँग्रेस कुमार केजरीवाल के "चांस" पर  डोमकच "डांस" करते फिर रहे हैं उससे तो यही लगता है केजरीवाल को समाप्त करने के लिए मोदी जी समर्थकों को ज्यादा मेहनत शायद ही करनी पड़े। बड़े - बड़े "नाई - खलनाई" फिल्म के ट्रेलर चलाए जा रहे न्यूज़ चैनलों पर ... मैंने एक "सुपारी पत्रकार" से इस बारे मे पूछा तो कहने लगे "...हम नायक को दिखा रहे हैं ..." मैंने पलट कर पूछा " ... वो नायक है या नाई ...?" पत्रकार खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी दर्शाते हुए कहा "...आपको शायद नायक का अर्थ नहीं पता ..." मैंने कहा "... जिसे खलनाई को आप नाई के रूप मे दिखाना चाहते हैं वो दरअसल नाई भी नहीं है ..." ज्ञानी पत्रकार भड़क कर पूछे " ... आपके कहने का मतलब क्या है ..." मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...मेरे कहने का मतलब है जैसे आप अपने चैनल मे हैं वैसे काँग्रेस कुमार केजरीवाल राजनीति मे हैं ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार को फिर भी समझ मे नहीं आया पूछा "... मैं अभी भी समझा नहीं ..." मैंने उन्हें समझाते हुए कहा "...जैसे  आप किसी काम के नहीं हुए तो पत्रकार बन गए ... ठीक वैसे भी नहीं उससे भी गए गुजरे ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार को गुस्सा आने लगा था बोले "...आप सपष्ट कीजिये ..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "...मैंने शुरू मे कहा जिसे आप खलनाई को नाई के रूप मे दिखा रहे हैं वो नाई भी नहीं है ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार गुस्से मे बोले "... आगे बोलिए ...क्या है वो ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...निरा बंदर है वो जिसके हाथ मे उस्तारा है ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार का गुस्सा कम नहीं हुआ था "....देखिये उसने राजनीति बादल दी ..." मैंने कहा "...उससे ज्यादा और बेहतर बदलाव गोरखपुर मे आशा देवी, जबलपुर मे शबनम मौसी, सागर मे शबनम बुआ और भोपाल मे भी ऐसे बदलाव हो चुके हैं ...इस बार दिल्ली की बारी थी ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार बोले "...ये उनसे बेहतर है ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा "... हाँ वो तो है कम से कम बंदर के हाथ मे उस्तरा है..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार बोले "...आपको राजनीति के बारे मे बहुत कुछ नहीं पता... " मैंने कहा "...हो सकता है लेकिन इतना जरूर पता है कि एक ही सन्दर्भ मे दो बार शपथ ग्रहण नहीं होता ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार फिर कन्फ्युज हो गए और पूछा "...क्या मतलब ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... एक बार बच्चों की शपथ दूसरी बार रामलीला मैदान ईश्वर की कसम दोनों का सन्दर्भ एक ही है ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "...अच्छा बदलाव है राजनीति मे ...वैसे भी भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ है ...." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार सफाई देते हुए बोले "...रजनीति मे ये सब चलता है ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...लेकिन वो तो सिखाने आए थे ...सफाई करने आए थे ?" ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार कुछ बोल नहीं रहे थे ... मैंने कहा "...बंदर कभी भी खुद को साबित नहीं करता हमेशा चान्स पर हाथ मारता है ठीक आपके खलनाई काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ..." ये कह कर मैंने सुपारी पत्रकार को नमस्कार कहा....     

Friday, 27 December 2013

काँग्रेस कुमार केजरीवाल
कल यानी 28 दिसम्बर को काँग्रेस कुमार केजरीवाल रामलीला मैदान मे कसम खाने वाले हैं वैसे भी काँग्रेस कुमार केजरीवाल अभी कुछ दिन पहले ही बच्चों की "शपथ" लेते हुए कहा था कि सरकार बनाने के लिए वो न तो किसी का समर्थन लेंगे और न ही किसी को समर्थन देंगे। खैर एक "आपाई" मुझे बता रहे थे कि वो उनके अपने ही बच्चे थे तो मेरे भी सामने कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल के "शपथ ग्रहण" पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं था। "आपाई" बड़ा ही अपने गुमान मे थे बता रहे थे "...भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार हो रहा है..." मैंने कहा "... हाँ वो तो है कोई बच्चों की शपथ लेने के बाद कसम खाने रामलीला मैदान मे आने वाले हैं ..." आपाई थोड़ा गुस्से मे बोले "...देखिये आप हर बात मे नुक्ता चीनी न करें ..." मैंने उल्टे सवाल दागते हुए कहा "... भले ही आप भूँकता - भेली करते फिरें ...!!!" आपाई बोले "...आपको मालूम हमने राजनीति को बदल कर रख दिया..." मैंने पलट कर पूछा " ... फिलहाल तो शपथ मे ही अदला - बदली हो रही हैं लोग बाग समझ ही नहीं पा रहे हैं टूट क्या रहा है..." आपाई बोले "... पहली बार किसी ने सरकारी सुरक्षा और बंगला लेने से इंकार किया है ..." मैंने पलट कर पूछा "...तो इसके लिए इतना भूँकता-भेली करने क्या जरूरत है ..." आपाई बोले " ...क्यों नहीं आखिर हम लोग यहाँ लोगों को राजनीति सीखाने आए हैं ..." मैंने पलट कर पूछा " ... तो इसके लिए चीखने की क्या जरूरत है ...?" आपाई बोले "... डेमोक्रेसी है ..." मैंने कहा "... आप लोगो ने तो डेमोक्रेसी को बिलकुल डोमोक्रेसी बना के रख दिया है ..." आपाई अपना आपा खोने लगे और पूछा "...आपके कहने का मतलब क्या है ..." मैंने शांति से उत्तर देते हुए कहा "... मेरे कहने का मतलब वही है जो आपके समझ आ रहा है ... चारो ओर डेमोक्रेसी के नाम पर डोमकच मचा रखा है...." आपाई का गुस्सा बढ़ने लगा बोले "... आपको ऐसा कहने का कोई हक नहीं..." मैंने उसी गुस्से मे पूछा "... क्यों भाई ..." आपाई बोले "... आपके खिलाफ भी जांच करवा सकते हैं ..." मैंने पलट कर पूछा "...डी॰ कोली जी भी कसम खाने वाले थे क्या ..." आपाई बोले " ... मैं समझा नहीं ..." मैंने कहा "...जैसे बिन्नी का शपथ टूटा डी॰ कोली का भी शपथ टूटना चाहिए ..." आपाई ने आश्चर्य जताते हुए पूछा "... वो क्यों भला ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... भाई डोमोक्रेसी मचा रही है आपने ... पूरी आपा डोमकच करने मे व्यस्त है ..." आपाई ने आपा खोते हुए मुझसे निवेदन किया "...आप साफ - साफ कहिए ..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "... भाई साधारण सी बात है काँग्रेस के इशारे पर वही लोग बढ़िया डोमकच करते हैं जो शपथ - कसम को तोड़-मरोड़ कर वादाखिलाफी करने मे माहिर होते हैं ..." आपाई का दिमाग फिर भी आपे मे नहीं था बोले "... मैं अभी भी समझा नहीं ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...डी॰ कोली ही कायदे का आम आदमी है ... कसम तो उसे लेना चाहिए है रामलीला मैदान मे ...!!!" आपाई को फिर भी शायद कुछ समझ मे नहीं आ रहा था ...वो धीरे-धीरे खिसकने लगे थे ....        

Wednesday, 11 December 2013

पता नहीं केजरीवाल को मीडिया वाले केजरीवाल को किस आधार पर इतना ज्यादा प्रोजेक्ट कर रहे हैं जबकि वास्तविकता सबके सामने है केजरीवाल भाजपा से पीछे हैं  

Tuesday, 3 December 2013

कांव - कांव कजरी - भाव मारे अन्हरी

योगेंद्र यादव जी को कौआ और हंस मे अंतर ही नहीं पता। कौए को हंस की चाल चलाना चाहते हैं पता नहीं उनको क्या लगता है उनके दिमाग मे यदि कुछ चलता है तो इसका सीधा मतलब ये है समझ लीजिये कि कौआ खतरे मे है। उसे कांव - कांव करके खतरे से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश करनी पड़ती है। केजरीवाल की नरेन्द्र भाई मोदी से तुलना करना ठीक वैसा ही है। उनके इस बेहूदे और मूर्खतापूर्ण सर्वेक्षण से ये साफ लग जाता है कि सौ चूहे खा कर बिल्ली हज पर जाने को तैयार है लेकिन उसके के लिए सबसिडी नहीं मिल रही है। केजरीवाल एंड कम्पनी जिस तरह से तरह - तरह के खाल बादल रही है पहले लोमड़ी की खाल मे थी फिर कौए की खाल मे कांव-कांव करने लगी अब बिल्ली की खाल मे चूहे के शिकार मे है ताकि हज कर सके। उनकी कंपनी के इस खाल परिवर्तन से कितना असर दिल्ली की जनता पर होगा ये वो भी अच्छी तरह जानते हैं वैसे भी लोमड़ी, कौआ, बिल्ली इतने मूर्ख नहीं होते जितने वो दिखते है भले ही कितने ही मंदबुद्दि के क्यों न हों। उनके पास अपने शिकार का पूरा आंकड़ा होता है विश्वास कीजिये अन्ना जैसे शेर का भी जिसके दहाड़ने से सिंहासन हिलने लगते हैं।

अभी तो पूरे - पूरे शिकार का इंतजाम करना है हर महीने कम से कम 120 करोड़ तो चाहिए ही पार्टी के वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए यदि उनकी कंपनी दिल्ली मे ही स्थिर रहती है तो लेकिन खुदा न खास्ता यदि "आप" का विस्तार करना पड़ा तो कितनी बड़ी मुसीबत होगी इसका अंदाजा है किसी को ? क्या देश के युवकों और नौजवानो के सामने यही छिछोरई और उघटापैची करने का काम बचा है ? इससे देश की अर्थव्यवस्था का कैसे भला होगा ? सवाल ये है कि सारा रिजर्व बैंक केवल इसी काम मे जुटेगा कि जो भी हो "आम आदमी पार्टी" को जिंदा रखो ?

दिल्ली की दिलदारी का जिस प्रकार से इस केजरीवाल एंड कंपनी ने कबाड़ा किया है उससे आगे बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है यदि "आप" को समाप्त नहीं किया गया तो। अभी तो दिल्ली को काँग्रेस ने बलात्कार की राजधानी बनाया यदि "आप" खत्म नहीं हुई तो यकीन मानिए अन्ना का चंदा जब हड़प लिया गया तो "आम आदमी" का जेब और बैंक - बैलेंस हड़पने मे कितना समय लगेगा और वो भी सर्फ और सिर्फ बारह तेरह लोगों के लिए जिनके कैडर भी भाड़े के टट्टू ही हैं ? आखिर महत्वाकांक्षी तो जनता को होना चाहिए !          

Sunday, 1 December 2013

योगेंद्र यादव का यौगिक युग्म "आप" का आपा गुम ?

दो दिन पहले "आम आदमी पार्टी" के योगेंद्र यादव ने कोंग्रेसी संसद के गुमनाम कम्पनी के सहयोग से अपने पक्ष मे जिसमे उन्होने "आप" को 35 से 50 सीटें जीतने की संभावना जताई। अजीब सा चुनाव सर्वेक्षण जारी करके अपने ही पैरों पर जबर्दस्त कुल्हाड़ी मारी है। योगेंद्र यादव ने सन 1983 का हवाला देते हुए एन॰ टी॰ रामाराव के तेलुगुदेशम पार्टी का उद्धहरण देते हुए खुद के सर्वेक्षण का अजीब सा और घटिया बचाव करने की कोशिश की। उनका तर्क या कुतर्क ये था कि नई पार्टी के लहर को समान्य तौर पर पहचाना नहीं जा सकता लेकिन यादव जी ये नहीं बता पाए कि उनके और कोंग्रेसी संसद के पास ऐसी कौन सी मशीन है केवल वे ही इस लहर को देख पाए बाकी नहीं। वैसे भी वो पिछले दो बार से गुजरात मे नरेन्द्र भाई मोदी को बुरी तरह हाराते रहे हैं। पीछे कई बार उनके सर्वेक्षण बुरी तरह उल्टे साबित हुए हैं।

इसकी उम्मीद एक सामान्य समझ रखने वाले व्यक्ति से भी नहीं की जाती। पता नहीं कैसे "आप" ने ऐसा कैसे कर लिया? "आप" का ये स्टैंड न सिर्फ लोगों को बहुत अजीब सा लग रहा है बल्कि ऐसा लगता है कि को कोई जघन्य अपराधी किसी भी तरह ये मनवाने पर उतारू है  कि उससे बड़ा कोई महात्मा या धर्मात्मा है ही नहीं।

उन्नत (एडवांस) मनोविज्ञान की दृष्टि से खुद को बचाने का निहायत ही घटिया, बेहूदा और मूर्खतापूर्ण हरकत है। ऐसा कैसे है इसकी चर्चा मे आगे करूंगा।

Saturday, 30 November 2013

पाँच प्रश्न और "आप"की पंचलकड़ी *

केजरीवाल एंड कंपनी और उनके "आप" के "पाप के भंडाफोड़" की शुरुआत उसी दिन से शुरू हो गई थी जब उन्होने पिछले महीने 23 अक्टूबर को डॉ राघवेंद्र कुमार ( https://www.facebook.com/Dr.Raghvendra.Kumar ) द्वारा पूछे गए 5 बेहद मौलिक, आसान किन्तु महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने से वो भागने लगे, उन पांचों प्रश्नो को डॉ राघवेंद्र कुमार ने उनकी वैबसाइट पर लोड पर तो किया ही था साथ ही "आम आदमी पार्टी" फ़ेसबुक अकाउंट पर भी शेयर किया था लेकिन उनके "आप" के फ़ेसबुक अकाउंट उन प्रश्नों को अनटैग कर दिया फिर भी उन सभी प्रश्नो को इस लिंक https://www.facebook.com/AamAadmiParty/posts/424336560999443?ef=notif&notif_t=like पर अभी भी देखा जा सकता है। उन पाँच प्रश्नो के कारण "आम आदमी पार्टी" मे खलबली सी मच गई थी। डॉ राघवेंद्र के वो पाँच प्रश्न ऐसे थे कि उसे फॉलो करने वालों को स्पष्ट लगने लगा कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है फिर उसके बाद जिस प्रकार से लोग "आप" की हकीकत जानने के लिए आतुर हुए उसका नतीजा आज सबके सामने है। हालाँकि केजरीवाल एंड कंपनी ने अपने वेबबसाइट से उन सभी प्रश्नो को स्थिति बहुत ज्यादा खराब होने पर कुछ दिनो बाद डिलीट कर दिया, लेकिन नाम के मेनशन होने के कारण और उनके अब भी होने से ये साफ पता चलता है कि केजरीवाल से कुछ पूछा गया था। उसे इस लिंक पर देखा जा सकता है http://www.aamaadmiparty.org/page/PolKhol ।

इस घटना बाद तो जैसे प्रश्न पूछने का सिलसिला ही चल पड़ा खुद "आम आदमी पार्टी" के वैबसाइट पर बहुत से लोग सवाल पूछने लगे। मध्य प्रदेश और बिहार भाजपा ने भी राहुल गांधी और काँग्रेस से पाँच सवाल उसी तर्ज पर पूछ डाले और तो और उन प्रश्नो के प्रभाव को देखते हुए टीवी चैनल भी टीआरपी बढ़ाने के लिए 5 सवाल पूछने लगे। IBN 7 पर शाम के शाम के सामय प्रसारित होने वाला  "बड़ा सवाल", कार्यक्रम इसका प्रमाण है। उन प्रश्नो के तेजी से वाइरल हो जाने का प्रभाव के कारण केजरीवाल एण्ड कंपनी की लोकप्रियता मे तेजी से गिरावट आई जिसके चलते कंपनी को साफ-साफ लगने लगा कि बचा-खुचा वोट बैंक भी बचाना बहुत जरूरी है लिहाजा वो बरेली तौकीर रजा से समर्थन तक मांगने जा पहुंचे।

अभी 27 नवंबर को एबीपी न्यूज़ और आजतक चैनल पर दिखाए गए ओपेनियन पोल के मुताबिक केजरीवाल की लोकप्रियता अच्छी ख़ासी घटी। एबीपी न्यूज़ का सर्वेक्षण 14 नवंबर तक का है तबतक अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और सीडी नहीं आई थी जिसे न्यूज़ एंकर नेहा ने कई बार ज़ोर देकर दोहराया। ABP न्यूज़ का "ओपेनियन पोल" डॉ कुमार के पाँच प्रश्नो के जबरदस्त प्रभाव की पुष्टि करता है, वहीं आजतक चैनल द्वारा भाजपा को 40 सीटें देना भी इस तथ्य को प्रमाणित करता है हालांकि उसका सर्वेक्षण 24 नवंबर तक का है।

भाजपा की लोकप्रियता मे वृद्धि के लिए भाजपा के लोगों ने जितनी मेहनत की है वो अपने आप मे सराहनीय है निःसन्देह उससे दिल्ली मे भाजपा की राह बहुत आसान हो गई है। नरेंद्र भाई मोदी के जादू का तो कहना ही क्या सारा देश ही उसका कायल है। लेकिन "आप" की ईंट से ईंट बजाने की शुरुआत जो डॉ राघवेंद्र ने की वो अद्भुत, अनोखा है और अतिप्रभावशाली है। रही सही कसर अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और स्टिंग ऑपरेशन और सामूहिक सोशल मीडिया कैम्पेन ने पूरी कर दी। अब तो कहा ये भी जा रहा है की "आप" का दिल्ली विधान सभा चुनाव मे खाता खुलना भी मुश्किल लग रहा है। राष्ट्र के मुख्य धारा के तीन - तीन मीडिया समूह "आप" के पक्ष मे होने के बावजूद सोशल मीडिया के समूहिक कुशल प्रबंधन ने "आप" को खत्म ही कर दिया। सोशल मीडिया का यदि बेहतर, सटीक और पूरी मानसिक क्षमता से प्रयोग हो तो बाजी रातों - रात पलटी जा सकती है चाहे वो राजनीति हो, कॉर्पोरेट हो या कोई और क्षेत्र।

 डॉ राघवेंद्र कुमार की अतिउन्नत  मनोवैज्ञानिक पद्धति परंपरागत मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा (Traditional Psychology & Psychiatry) से इतना अधिक विकसित और उन्नत है कि किसी भी मानसिकता को इतना सशक्त किया जा सकता है कि व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है, बड़े से बड़े उद्देश्य को भी आसानी से प्राप्त कर सकता है। डॉ राघवेंद्र कुमार के 5 प्रश्न, अन्ना के दोनों पत्र व सीडी, स्टिंग ऑपरेशन और सोशल मीडिया के समूह ने "आप" का अंतिम संस्कार कर ही दिया।

* नोट- पंचलकड़ी पूर्वाञ्चल मे व्यक्ति के अंतिम संस्कार की सबसे अंतिम क्रिया होती है।    
    

Wednesday, 27 November 2013

"आप" के वजूद का मतलब

दिल्ली विधान सभा चुनाव मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए मुझे आश्चर्य होगा। जिस प्रकार से "आप" की पोल खुली है वो न सिर्फ अपने आप मे अनोखा है बल्कि भारतीय राजनीति का एक दुखदायी पक्ष इसलिए भी है कुछ अतिमहत्वाकांक्षी लोगों का समूह ईमानदारी के नाम पर बड़ी आसानी से लोगों की आँखों मे सारे आम धूल झोंकता हुआ चला जाता है और फिर फिर धीरे - धीरे जब उनकी पोल - पट्टी खुलती है तो लोग न सिर्फ सन्न रह जाते हैं बल्कि खुद को बेबस भी पाते हैं।  क्योंकि एक ऐसी पार्टी जो चुनाव लड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर लोगों को  न सिर्फ लोगों को धोखे मे रखने मे सफल रहती है बल्कि उसका किसी भी मुद्दे पर कोई विजन भी जनता के समक्ष नहीं आता। इतने आरोप तो चुनाव से पहले किसी भी भ्रष्ट पार्टी पर भी कभी नहीं लगे जितने आप पर अभी लग चुके हैं।

अस्सी के दशक के बेहद ईमानदार वी॰ पी॰ सिंह के दौर को याद कीजिये जिसकी उपज लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा आदि जैसे लोग हैं जिनका वास्तविक भ्रष्ट स्वरूप सबके सामने है। विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी भी प्रकार से और किसी भी प्रकार से अरविंद केजरीवाल से कम ईमानदार नहीं थे लेकिन जनता दल बनने से पहले और बाद मे भी उस व्यक्ति पर किसी भी भ्रष्टाचार, अनाचार या किसी हेर-फेर के आरोप कभी नहीं लगे। उस व्यक्ति ने पार्टी का टूटना स्वीकार किया लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी विश्वनाथ प्रताप सिंह की ईमादारी के आगे कहाँ खड़ी होती है जिसके खिलाफ सारे आम झूठ तक बोलने का आरोप है। विश्वनाथ प्रताप सिंह पर उनके गुरु राजीव गांधी ने भी कभी भी उनके उनपर कोई आरोप नहीं लगा पाए उल्टे केजरीवाल के गुरु "अन्ना" ने ही केजरीवाल को "लालची" तक कह डाला है। विश्वनाथ प्रताप सिंह की बेहद ईमानदार राजनीति ने देश की क्या दुर्गति की सभी लोगों के पता है उसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है।

जिस प्रकार से लोगों ने प्रयोग के तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को आजमाया था उसी तर्ज पर केजरीवाल भी लोगों से खुद को आजमाने की अपील कर रहे हैं। याद कीजिये किस प्रकार मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने कश्मीर के आतंकवादियों से मिलकर खुद अपनी बेटी महबूबा मुफ़्ती के अपहरण का नाटक खेला और बदले मे दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ा गया, बेहद ईमानदार विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार दिल्ली के जमा मस्जिद के ईमाम की गोडधरिया करते थे ईमानदार केजरीवाल उससे भी आगे बढ़ कर तौकीर रजा तक की गोडधरिया तक करते हैं, बटाला हाउस इनकाउंटर, मुस्लिम आरक्षण की वकालत आदि तो है ही दिल्ली के जनमानस मे। आतंकवादियों, नक्सलियों और कश्मीर पर ईमानदार केजरीवाल एंड कंपनी का स्टैंड किसी से छिपा नहीं है।

एक बहुत बड़ा और अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि दुर्भाग्य से यदि केजरीवाल दिल्ली का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाते है तो क्या "आम आदमी पार्टी" को वो खत्म कर देंगे ? यदि नहीं तो उनके वेबसाइट के अनुसार 10,000 कर्मचारियों का 20,000 रुपये मासिक के हिसाब से हर महीने वेतन के लिए 20 करोड़ रुपये मासिक कम से कम कहाँ से लाकर देंगे ? इसके लिए वो कौन सा रास्ता अपनाएँगे जो ईमानदारी का ही होगा? ये प्रश्न दिल्ली के लोगों के सामने तो है ही साथ ही "आप" के कर्मचारियों को सोचना चाहिए कि "आप" का होना ही अपने आपमे बहुत बड़ा भ्रष्टाचार नहीं है ?    

Monday, 25 November 2013

स्टिंग सीडी, बहुत बड़ी गंदगी को छोटी गंदगी से ढकने की कोशिश

केजरीवाल कितना बड़ा फर्जीवाड़ा कर सकते हैं इसे समझने के लिए दिमाग को थोड़ा उलटा करना पड़ता है फिर "आप" की गंदी और फर्जी दुनियाँ का वास्तविक स्वरूप और कायदे से दिखने लगता है। इतने बड़े - बड़े खुलासे होने के बावजूद कुछ खास मीडिया चैनलों पर उसका खबर न बनना अपने आप मे बहुत आश्चर्यजनक तो लग ही रहा है साथ ही उन खास चैनलों के महत्वपूर्ण पत्रकारों द्वारा केजरीवाल और "आप" का निहायत ही बेहूदे तरीके से बचाव करना भी खटक रहा है। इससे मुझे लगा कि इसकी भी थोड़ी छान-बीन करनी चाहिए वैसे तो ये पहले से ही विदित है कि मुख्य धारा के तीन बड़े मीडिया समूह केजरीवाल और "आप" के समर्थन मे हैं उसमे से एक तो पूरी तरह से है।  अभी तक किसी भी मीडिया समूह ने इस तथ्य को प्रकाश मे लाने जहमत नहीं उठाई है कि वास्तव मे केजरीवाल और "आप" के पीछे का वो वास्तविक सच क्या है कि अन्ना को अचानक केजरीवाल को चिट्ठी लिख कर उनसे पूछ - ताछ करनी पड़ी। सभी मीडिया समूहों ने अपना रंग ठीक उसी अंदाज मे बादल लिया जिस अंदाज मे केजरीवाल एंड कम्पनी चाहती थी।

जरा याद कीजिये 17 नवंबर की तारीख जब अन्ना ने दूसरी बार अरविंद केजरीवाल को पत्र लिख कर उनसे चंदे का हिसाब मांगा था जिससे पूरी की पूरी "आप" और केजरीवाल भड़क गए थे और केजरीवाल को सफाई देना पड़ी थी प्रेस कान्फ्रेंस कर के । वैसे अन्ना उनकी सफाई से थोड़ा भी संतुष्ट नहीं थे फिर उनसे जबरदस्ती केजरीवाल के समर्थन मे बयान दिलवाया गया था जो दूसरे दिन सुबह आया था। खैर ये सब याद दिलाना इसलिए आवश्यक है कि एक तो थोड़ी याद ताजा हो जाए दूसरे इन घटनाक्रमों के सामयिकी के संदर्भ मे मानसिकता के लिए पृष्ठभूमि तैयार हो जाए। अन्ना ने दो चिट्ठियाँ केजरीवाल को लिखीं थे दूसरी "पाकिस्तान के इस्लामिस्ट" से हो रहे फंडिंग के बारे मे थी जो बेहद गंभीर मामला हो सकता था खास राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ मे लेकिन ये खबर किसी भी मीडिया पर बिल्कुल ही नहीं चली और इसे दबा दिया गया। आप ये तय मानिए यदि अन्ना की दोनों चिट्ठियाँ और सीडी नहीं आई होती तो स्टिंग ऑपरेशन का ये खुलासा बिल्कुल ही नहीं होता।

एक बात तो तय है कि अन्ना केजरीवाल और "आप" के लिए किसी प्राधिकरण से कम नहीं हैं लिहाजा उनका समर्थन और विरोध "आप" के लिए बहुत मायने रखता है। जब दूसरे दिन 19 नवम्बर को अन्ना ने वो सीडी जारी की जो सीधे - सीधे केजरीवाल एंड कंपनी पर सीधा हमला था और केजरीवाल एंड कम्पनी उससे बहुत आहत भी थी। दरअसल उस सीडी ने केजरीवाल एंड कंपनी की पोल सिरे से खोल के रख दी थी जो "आप" और केजरीवाल के लिए बहुत बड़ा झटका था "आम आदमी पार्टी" के सारे के सारे पदाधिकारी सकते मे थे। ऊपर कोढ़ मे खाज ये कि "आप" के वेतनभोगी कर्मचारियों ने अन्ना खिलाफ सोशल मीडिया पर ऐसा मोर्चा खोला और ऐसी भद्दगी की कि अन्ना से समझौते और वापसी की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं। इस नई मुसीबत का ठोस उपाय करना बहुत जरूरी था।

केजरीवाल और उनकी टीम ने कांटे को कांटे से निकालने का प्रयास किया। सूत्रों से ऐसी खबर मिली है कि इस स्टिंग ऑपरेशन की सीडी काँग्रेस ने खुद "आप" के खास पदाधिकारियों के सहयोग से ही बनवाई थी जिसका प्रमाण है अनुरंजन झा और डॉ कुमार विश्वास के बेहद करीबी रिश्ते जिसे खुद डॉक्टर साहब ने इसे स्वीकार भी किया है और अब जरा ध्यान दीजिये डॉ कुमार विश्वास के प्रति इस सीडी मे बहुत "सॉफ्ट स्टिंग" है। जिसे बड़ी आसानी से खुद उनके द्वारा ही मैनेज कर लिया गया और खुलासे के बाद केवल उन्होने ही टीवी पर बयान दिया, बाकी किसी ने भी नहीं। केजरीवाल सहित "आप" का कोई भी पदाधिकारी स्टिंग सीडी मे कहीं भी नहीं है। ये कहा जा रहा है कि ये ऑपरेशन नवंबर के पहले सप्ताह मे किया गया था। कुछ सूत्रों का ये भी कहना है कि उम्मीदवारों को काबू मे रखने के लिए उनकी सीडी बनवाई गई थी और सभी के खिलाफ ऐसे सुबूत हैं केजरीवाल के बयानों का जरा विश्लेषण कीजिये तो पता चल जाएगा। ये ठीक वही चाल है जैसा कि अन्ना के पूर्व ब्लॉगर राजू पारुलकर ने खुलासा किया था कि केजरीवाल के पास अन्ना के साथ नोकझोंक की सीडी है जिससे वो अन्ना को ब्लैकमेल करते हैं। लेकिन अन्ना के खुलासे की मजबूरी मे इस स्टिंग ऑपरेशन की सीडी को सार्वजनिक करना पड़ा।

अन्ना के के दोनों पत्र और सीडी बाद जिस तरह से "आप" के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा था उसे ढंकने के लिए उससे बहुत छोटे खतरे या यूं कहे कि "आप" की गंदगी को देश के सामने प्रस्तुत कर दिया गया ठीक दूसरे ही दिन ताकि नुकसान ज्यादा न हो मीडिया तो केजरीवाल और "आप" के पक्ष मे है ही इसी आधार पर इसे विरोधियों की चाल बताकर सहानुभूति बटोरी जाएगी। आप देखिये मीडिया मे वही हो रहा है और अन्ना का मुद्दा बिलकुल नेपथ्य मे है। आज तक किसी भी ऐसे मामले मे किसी भी सीडी का रॉ फुटेज नहीं मांगा गया था चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो ऐसा पहली बार एक सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा किया गया। फिर अनुरंजन झा से भी चुनाव आयोग ने तो रॉ फुटेज मांगा नहीं था उन्होने स्वेच्छा से दिया था क्यों ? यदि स्वेच्छा से चुनाव आयोग को दे सकते हैं तो उसी स्वेच्छा से "आप" को भी तो दे सकते थे ! ये सब सोची समझी चाल के तहत अन्ना वाले मुद्दे को दबाने के लिए किया गया खास कर पाकिस्तान से हो रहे फंडिंग के मामले को।

स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के संदर्भ मे हुए दोनों प्रेस कांफ्रेंसों मे अरविंद केजरीवाल की अनुपस्थित रहना अपने आप मे बहुत रहस्यमयी था, आखिर उनकी पार्टी पर इतना बड़ा खतरा था और उनका ही नदारद रहना आश्चर्यजनक था। उस प्रेस कान्फ्रेंस मे काँग्रेस के दो सांसदों के भाईयों का उपस्थित रहना इस शक को विश्वास मे बादल देता है। दरअसल केजरीवाल सोची समझी चाल के तहत प्रेस कान्फ्रेंस मे नहीं आए थे उसके पीछे कारण ये था कि कहीं अन्ना के दोनों पत्रों और सीडी का मामला कहीं फिर से न उछल जाए और और सारे डैमेज कंट्रोल पर सिरे से पानी फिर जाए।

लेकिन "आप" के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र बता रहे हैं कि ये चाल भी कहीं न कहीं से उल्टी पड़ती दिखाई दे रही है क्योंकि केजरीवाल के बारे मे कुछ और खुलासे अन्य माध्यमों से भी हो रहे हैं। जैसेकि वो कमिश्नर थे ही नहीं आदि आदि। इस सीडी मे कुछ - कुछ जगहों कठोर मुद्दों के आ जाने के कारण भी मुश्किलें बढ़ गईं हैं लेकिन ये तो तय है कि सीडी मे जो कुछ भी है वो बिलकुल सत्य है जिसे काँग्रेस के कुछ लोग, अनुरंजन झा और केजरीवाल ने शायद हलके मे लिया था। संभावना ये भी जताई जा रही है कि चुनाव के बाद अनुरंजन झा के खिलाफ मामले को वापस ले लिया जाएगा।
फर्जी का फर्ज, मर्जी का मर्ज फिर ...

मैंने उसी दिन, जिस दिन स्टिंग ऑपरेशन पर "आप" का पहला प्रेस कान्फ्रेंस हुआ था, कह दिया था चुनाव आयोग इस तरह के निर्णय कर ही नहीं सकता फिर भी उससे इस तरह के निर्णय की मांग करना जनता की आँखों मे धूल नहीं बल्कि मिर्ची झोंकने के समान था। वैसे उस प्रेस कान्फ्रेंस मे "काँग्रेस पार्टी" के दो सांसदों के भाई भी उपस्थित थे वो वहाँ पर किस लिए थे और क्या कर रहे थे ? ये एक ऐसा विदित रहस्य है जिस पर आसानी ये उम्मीद की जा सकती थी कि चुनाव आयोग का फैसला क्या होगा वो भी 48 घंटे के अंदर। "आम आदमी पार्टी" की उम्मीद के मुताबिक "आप" के पक्ष मे चुनाव आयोग ने अपना फैसला सुना दिया ये तो किसी को भी बहुत आश्चर्य नहीं हुआ। वैसे भी जब चुनाव आयोग ने "आप" के उम्मीदवारों का पर्चा खारिज ही नहीं किया तो फिर किस आधार पर वो फैसला सुना सकता है? जहां तक मेरी जानकारी है चुनाव आयोग न्यायाधिकरण संस्था है ही नहीं तो फिर उससे किसी निर्णय की मांग किस आधार पर किया गया ?

ध्यान दीजिये "आप" की ओर से कहा जा रहा है कि स्टिंग ऑपरेशन फर्जी है। ये बयान ही अपने आपमे फर्जी है क्योंकि ऑपरेशन तो हुआ ही है उसका विडियो भी सारे आम उपलब्ध है और उसे दिल्ली के ही नहीं बल्कि पूरे देश के करोड़ों लोगों ने देखा। तो करोड़ों लोगों का देखना भी फर्जी है क्या ? फर्जी कामों के लिए "आप" वैसे भी मशहूर हो चुकी है योगेंद्र यादव के नेतृत्व मे काँग्रेस के सहयोग से ही "आप" के पक्ष मे  मशहूर फर्जी ओपेनियन पोल हो चुका है जिसकी पोल बड़ी आसानी से खुल गई, केजरीवाल कभी रेवेन्यू कमिश्नर थे ही नहीं फिर भी वो फर्जी बयान देते रहते हैं कि कि वो आईआरएस कमिश्नर थे और करोड़ों कमा सकते थे, लेकिन वो अपनी श्रीमती जी के ईमानदार कामों पर कोई बयान जारी नहीं करते, केजरीवाल जी फर्जी कमिश्नर होते हुए भी एक एनजीओ मे मे काम करते हुए 25000 रुपये मासिक का वेतन उठाया इस पर उनका कोई बयान नहीं आया। और भी बहुत कुछ है जिसपर उनको कुछ न कुछ तो कहना ही चाहिए फर्जी ही सही, साथ ही इस विषय पर भी कि तीन जगहों से मतदाता कैसे हैं ? क्या ये स्टिंग भी फर्जी ऑपरेशन है ?

परसों के नाच-गाने के समारोह मे "आप" के कर्मचारियों के बीच उनका उत्साहवर्धन करने के लिए डॉ कुमार विश्वास ने अपने कर्मचारियों को ये विश्वास दिलाते हुए कहा कि वो "आप" के "सांडक्य" हैं और उसी की भूमिका निभाते हैं पता नहीं वो किसको या किस वर्ग को ये विश्वास दिला रहे थे साथ ही उनका ये कथन कि वो पौरुषहीन नहीं हैं। खैर ये कितना फर्ज से जुड़ा मामला है ये पता नहीं चल पाया लेकिन ये जरूर पता चला कि "आप" मे "सांडक्यों" की पोस्ट भी है जिसके लिए अवसादी और मनोग्रस्त कविताओं का पाठ भी करना जरूरी है कम से कम इतनी योग्यता तो होनी ही चाहिए इस पद के लिए।     

Sunday, 24 November 2013

"आप" का कल्पना से भी परे का खर्च

कल "आम आदमी पार्टी" के एक कर्मचारी संतोष कोहली ने आत्महत्या कर लिया। पुलिस को कोई आत्महंता-पत्रावली नहीं मिली इसलिए लगता है कि अपने निजी कारणों से उसने ऐसा किया होगा। उधर कोई आत्महत्या कर रहा है और इधर जंतर - मंतर पर नाच गाना चल रहा है वैसे नाचने - गाने मे कोई बुराई नहीं है खास कर उस समय जब पिछले महीने 21 अक्टूबर की तारीख जब डॉ राघवेंद्र कुमार ने केजरीवाल से 5 प्रश्न पूछे थे और तब केजरीवाल जवाब देने से भागने लगे थे उसके बाद अन्ना का खुलासा और फिर स्टिंग ऑपरेशन ने पूरी की पूरी पोल खोल के रख दी हो। इस स्थिति मे मतदाताओं को लुभाने के लिए नाच - गाना करना एक अच्छा उपाय हो सकता है ऐसा निष्कर्ष डॉ कुमार विश्वास और फर्जी ओपेनियन रखने वाले योगेन्द्र यादव जैसे लोग जिस समूह मे हों उसी समूह का का हो सकता है। हालांकि जिस प्रकार की भीड़ जंतर - मंतर पर दिख रही थी वो अपने आप मे प्रशंसनीय है सभी "आप" के कर्मचारी (नकली कार्यकर्ता) अपने गणवेश मे थे सभी अन्ना की नकल करते हुए टोपी ओढ़े हुए थे। किसी की आत्महत्या के समय ऐसे समारोह का आयोजन काफी हिम्मत का काम है। वैसे भीड़ को देखते हुए मुझे ये समझ मे नहीं आ रहा था कि इतने कर्मचारियों को 20,000/- प्रति माह (कम से कम) के हिसाब से वेतन कैसे दिया जाता होगा ? मेरे हिसाब से कल जंतर - मंतर पर कम से कम 5000 लोग तो रहे ही होंगे तो सवाल ये उठता है कि इतने लोगों को का वेतन एक महीने का हुआ 100000000/- रुपया हर महीने कम से कम। वैसे मैंने कल "आप" के पूरे कर्मचारियों को एक साथ देखा यदि सब के सब रहे हों तो।

ये आंकड़ा पूरी तरह ठोस, अपरिहार्य न्यूनतम है जो खर्च करना ही करना है बाकी विज्ञापन का खर्च, गाड़ी, तेल, खाना-पीना और भी बहुत से खर्चे अलग से। सारे खर्चे अगर जोड़ लिए जाएँ तो इतना खर्च तो सपा-बसपा-काँग्रेस भी नहीं करतीं।  "आप" की वैबसाइट पर केवल 20 करोड़ का आंकड़ा है इतने मे तो "आप" के कर्मचारियों का वेतन भी नहीं हो पाएगा। स्टिंग ऑपरेशन मे एक बात खुल कर आई है कि टीवी और अन्य माध्यमों का विज्ञापन बहुत महंगा है। "आप" के कुछ लोगों के माध्यम से ये पता चला कि मुख्यधारा के तीन टीवी चैनल "आप" के पक्ष मे हैं उनमे से दो तो आंशिक रूप से हैं किन्तु एक तो पूरी तरह से "आप" के पक्ष मे है। उस मीडिया हाऊस के "आप" के पक्ष मे होने का आलम ये है कि उसके पत्रकार सारे आम "आम आदमी पार्टी" का प्रचार करते हैं। उनके लेख तो केजरीवाल और "आप" के पक्ष मे तो होते ही हैं उनका फ़ेसबुक अकाउंट भी ऐसा है कि लगता है कि वो भी "आप" के कर्मचारी हैं। अब मुख्य धारा की तीन - तीन चैनलो को मैनेज करने का भरी-भरकम खर्च ? ये खर्च इतना बड़ा है कि इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि रात मे 12 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रति 10 सेकंड के विज्ञापन का खर्च कम से कम 1000/- रुपया है अधिकतम 22000/- रुपया प्रति 10 सेकंड है। अरबों - खरबों का हिसाब - किताब है सिर्फ विज्ञापन का खर्च। यहाँ तो मामला प्रत्यक्ष विज्ञापन का नहीं बल्कि उससे से भी बढ़ कर है पूरी की पूरी मीडिया हाउस ही "आप" के प्रचार मे अपने हिसाब से लगी हुई है। खर्चे का अनुमान लगा लीजिये।

बहुत बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतना खर्च जिसमे कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन ही 10 करोड़ रूपाया प्रति माह है, विज्ञापन का खर्च भी करोड़ों मे है ही, पूरी की पूरी मीडिया हाउस केजरीवाल और "आप" के प्रचार मे लगी हुई है साथ मे दो मीडिया हाउस भी सहयोग कर रहे हैं अरबों - खरबों का खेल है ये ? आखिर इतना फ़ंड आ कहाँ से रहा है ? 

Saturday, 23 November 2013

स्टिंग सीडी का सटीक सही समय

अब तो सारी पोल-पट्टी "आम आदमी पार्टी" की सिरे से खुल ही चुकी है उनका सड़ा तंत्र सबके सामाने बजबजाती गंदी नाली की तरह सबके सामने आ चुका है तो "आप" वाले घोर आपत्ति कर रहे हैं इस सीडी के आने की सामयिकी पर, उन लोगों को घोर ऐतराज है कि चुनाव के ही समय ये सीडी क्यों आई ? इससे स्टिंग ऑपरेशन करने वाले की मंशा पर "आप" वालों को संदेह है। तार्किक आधार पर संदेह करना कहीं से भी गलत नहीं है संदेह से ही विश्वास करने का आधार बनाता है। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले अनुरंजन झा की मंशा पर ठीक संदेह के आधार पर विशवास करते हुए ये क्यों न कहा जाए कि ठीक इसी समय इस सीडी को आना बहुत जरूरी था ?

अमेरिका मे एक लोकोक्ति है "यदि आप किसी की सच्चाई जानना चाहते हैं तो उसे चुनाव मे खड़ा कर दीजिये" ठीक यही बात "आम आदमी पार्टी" पर भी अक्षरशः लागू होती है। एक स्वस्थ लोकतन्त्र और समाज के लिए ये बहुत आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों की आप कभी भी पोल खोलें या न खोलें चुनाव के समय उसकी पोल जरूर खोलनी चाहिए, उसके काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा यदि है तो ठीक उसी समय जरूर समाज के सामने लाना चाहिए ये सामान्य और जिम्मेदार नागरिक का न सिर्फ धर्म है बल्कि कर्तव्य भी है क्योंकि लोकतान्त्रिक समाज मे चुनाव का समय बेहद संक्रामण का समय होता है जिसके माध्यम से गलत और गंदे लोगों से समाज को बचाया जाना बहुत आवश्यक होता है। अतः मुझे "आम आदमी पार्टी" के खिलाफ इस स्टिंग ऑपरेशन के सामयिकी के संदर्भ मे अनुरंजन झा की प्रशंसा करने मे तनिक भी कोई संकोच नहीं है। मेरा उनसे तथा उन सभी से ये अनुरोध है कि यदि कुछ और भी सच्चाई "आप" के बारे मे है तो निश्चित रूप से समाज के समक्ष ले कर आएँ। क्योंकि वोट करते समय कुछ भी अंधेरे मे नहीं रहना चाहिए।

वैसे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के आने के बाद "आप" के कर्मचारियों (नकली कार्यकर्ता ) की हालत उस बंदरिया की भांति हो चुकी है जिसका बच्चा मर गया होता है और वो उस बच्चे की लाश को तब तक अपने सीने से चिपकाए घूमती रहती है जब तक उसके लाश से भयानक बदबू नहीं आने लगती, अब ये देखने वाली बात होगी "आप" के कर्मचारियों को "आम आदमी पार्टी" के लाश की दुर्गंध कब तक उनके नाक मे पहुँचती है। वैसे तो "आप" के बहुत से कर्मचारियों ने अपना नया रोजगार खोजने का प्रयास बहुत तेज कर दिया है लेकिन अचानक ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी बढ़ जाने के कारण पारिश्रमिक पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है।

वैसे केजरीवाल ने अपना पूरा प्रयास किया "आम आदमी पार्टी" को एक कॉर्पोरेट की तरह चलाने का, इसीलिए उन्होने चुनाव जीतने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जो कहीं भी नैतिक नहीं थे, उन्होने सारी मर्यादा को बिलकुल ताक पर रख दिया जो कहीं से भी उचित नहीं था,  जो भारतीय राजनीति के इतिहास मे ये बिलकुल अपने तरह का अनूठा प्रयास है, किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को "वेतन" देने का निकृष्टतम मामला है। इसीलिए जिन्होने "आप" को चंदे के रूप मे बड़ी राशि दी है वो सकते मे हैं।  

Friday, 22 November 2013

"आप" का अपना पाप छिपाने की असफल कोशिश

कल शाम के स्टिंग आपरेशन की सीडी आने के बाद जिसमे "आप" के 9 उम्मीदवारों के वास्तविक स्वरूप के दर्शन हुए हैं , पर "आम आदमी पार्टी" ने आज प्रेस कान्फ्रेंस किया जिसमे उन्होने अपने उम्मीदवारों को सफ़ेद बिलकुल पाक-साफ बता कर जनता को सारे शाम बेवफ़ूफ बनाने का प्रयास किया गया वैसे जनता के आँखों मे तो धूल "आप" द्वारा बहुत पहले से झोंका जा रहा था। वैसे अपने ही जाच करके अपने फैसला सुना दिया ठीक वैसे ही जैसे शीला दीक्षित, कलमाड़ी, पावन बनसल आदि को ईमानदार ठहराते हुए क्लीन चिट प्रदान करती है। ध्यान दें -
1- काँग्रेस की मदद से अपने पक्ष मे फर्जी ओपीनियन पोल करवाने वाले योगेन्द्र यादव ने इस बात ज़ोर दिया की सीडी मे संदर्भ के साथ संवाद नहीं है लिहाजा संदर्भ बदला गया है ...ध्यान दीजिये उनके पास सीडी की मूल कॉपी नहीं है फिर भी वो संदर्भ बदलने आरोप किस आधार पर लगा रहे हैं ? जबकि पूरा ऑपरेशन देखने पर ऐसा कहीं भी नहीं लगता। एक विषय पर फ्रेम बदलने का जो आधार वो बता रहे हैं  रहा है वो बिलकुल कहीं भी पूरे ऑपरेशन मे है ही नहीं। योगेन्द्र यादव का झूठ यहीं पर पकड़ मे आ जाता है...

2 - योगेंद्र यादव ने शाजिया इल्मी के पी॰ए॰ सिद्धार्थ के ऊपर कोई टिप्पणी नहीं की जबकि पैसे को मैनेज करने का सारा रास्ता वही बता रहा था, बाद मे प्रशांत भूषण ने कहा वो पत्रकार उनकी मर्जी से आया था। इसका कोई मतलब ही नहीं था ये बिलकुल संदर्भित तथ्य है जिसे शाजिया के पी॰ए॰ को रेफर किया था ठीक पैसे के लेन-देन के संदर्भ मे

3- योगेन्द्र यादव तो लगता है सुप्रीम जज से भी महान हैं उन्होने बड़ी बचकानी टिप्पणी की ये ऑपरेशन प्रायोजित है क्यों भाई इस ऑपरेशन को कोई प्रायोजित क्यों नहीं कर सकता ? ये ठीक वैसा ही प्रश्न है कोई केजरीवाल ये पूछे कि "आप" 2013 के ही दिल्ली विधान सभा चुनाव मे ही क्यों खड़े हैं? इसका उत्तर यादव जी दें सकते हैं तो दे...

4- यादव जी को इस बात पर भी घोर आपत्ति है कि इस समय इस सीडी को नहीं आना चाहिए क्योंकि ये चुनाव का समय है क्यों चुनाव का समय है इसे वो चाल बताते हैं इसलिए उन्हें सारे कुकर्म करने की छूट मिल जाती है क्या ? और उनका काला और कच्चा चिट्ठा चुनाव के समय क्यों नहीं आना चाहिए ?? हालांकि ये सीडी उनके कुकर्मों से ज्यादा उस "आप" के गंदे और भ्रष्ट तंत्र पर है जिस पर पूरी की पूरी "आम आदमी खड़ी" है और जिसका कोई भी अपवाद नहीं है केजरीवाल भी नहीं। वैसे कहा तो ये भी जा रहा है कि पूरे के पूरे 70 लोगों के काले कारनामो की सीडी है यहाँ प्रश्न "आप" के पूरे के पूरे गंदे तंत्र का है...

5- योगेन्द्र यादव ने ये दावा किया कि भारत के इतिहास मे "आप" पहली पार्टी है जो ऐसा करती है वैसा करती है लेकिन स्टिंग ऑपरेशन मे शाजिया साफ - साफ कार्यकर्ताओं को "वेतन" सैलरी की बात कर रही हैं ...यादव जी आप बिलकुल सही हैं भारत मे "आप" ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जहां कार्यकर्ताओं को मोटी तनख्वाह मिलती है ...इसीलिए 3 दिन पहले ही मुझे शक हुआ था तभी मैंने अपने आर्टिकल का शीर्षक दिया था "चंदा या निवेश"। वेतन वाले मुद्दे पर किसी ने भी कोई सफाई नहीं दी है ...इसका मतलब सारी भीड़ भाड़े पर आती है "आप" के कार्यक्रमों मे ...

6 - आपराधिक मानहानि मामला दायर करने जा रहे रही है "आप" क्या भद्दा मज़ाक है दिल्ली की जनता के साथ ...आखिर इसमे ऐसा क्या है जिससे ये साबित होता है जिसने ये स्टिंग ऑपरेशन किया वो अपराधी है ...?
या तो "आप" जनता को खड़े - खड़े बेवकूफ़ बनाना चाहती है जैसा कि पहले से करती आ रही है या फिर अन्ना के आरोप के बाद बचा हुआ अपना "अस्थिपंजर" मजबूती से दिखाना चाहती है इस उम्मीद मे कि लोग डर जाएंगे ...वैसे भी आज तक किसी भी स्टिंग ऑपरेशन किसी प्रकार के आपराधिक मानहानि का मुक़द्दमा हुआ ही नहीं ...क्यों इसका कोई आधार ही नहीं बन सकता ..मुझे तो लगता है  कहीं उल्टे मुक़द्दमा करने वाले ही जेल मे न चले जाएँ ....

7- योगेन्द्र यादव चुनाव आयोग से मांग करेंगे कि 48 घंटे मे जांच कर के बताएं कि वो आरोप सही हैं या नहीं ध्यान देन ये बहुत शातिर बयान है जिसके तहत चुनाव आयोग के अधिकार के बाहर के विषय को तथ्य बनाने की कोशिश की जा रही है उन्हें ये पता है कि चुनाव आयोग इस पर कुछ नहीं करेगा करने का अधिकार भी नहीं है।

8 - योगेंद्र यादव जी ने फरमाया कि 1 घंटे की सीडी पर वो करवाही नहीं कर सकते ...यदि समय महत्वपूर्ण है तो बंगरू लक्ष्मण की सीडी की सीडी शायद 5 मिनट की थी तो उनको 4 साल की जेल हो सकती है तो एक घंटे की सीडी 48 साल की सजा क्यों नहीं होनी चाहिए ?

... आदि आदि

आज के प्रेस कान्फ्रेंस से ये स्पष्ट है कि "आप" के सभी लोगों ये पता है कि स्टिंग ऑपरेशन की सीडी बिल्कुल सही है यदि ऐसा नहीं होता तो अनिरुद्ध झा उसे चुनाव आयोग को नहीं सौंपते, इस प्रेस कांन्फ्रेंस से माध्यम से उन्होने अपने "आप" के पापों को छुपा कर जनता की आँखों मे धूल झोंकने की निहायत ही असफल कोशिश की है .....

Thursday, 21 November 2013

केजरीवाल की क्रेडेबिलिटी क्राइसिस

कल जब से अन्ना की सीडी मीडिया मे चल रही है केजरीवाल और उनकी "आम आदमी पार्टी" संदेह बहुत अधिक गहरा गया है। वैसे भी अरविंद केजरवाल एंड कंपनी की  अलगाव मानसिकता किसी से छिपी नहीं है उनके परम सहयोगी प्रशांत भूषण कई बार खुले तौर कश्मीर को पाकिस्तान को सौंप देने की खुली वकालत कर चुके हैं और समय समय पर करते रहे हैं, केजरीवाल अपने फ़ेसबुक अकाउंट पर कई बार "आइ लव माइ पाकिस्तान" तक लिख चुके हैं, केजरीवाल जी को अफजल गुरु को फांसी दिये जाने मे देश की बदनामी दिखती ही है उन्हे अहजल गुरु और भगत सिंह के कोई अंतर नहीं दिखाता, बटाला हाऊस इनकाउंटर को फर्जी बताने वाले केजरीवाल और उनके " "आम आदमी पार्टी"  को पाकिस्तान के इस्लामिस्ट से ऑनलाइन चंदा मिलने का तथ्य प्रकाश में जब से आया है राष्ट्रीय स्टार संदेह बहुत अधिक बढ़ गया है। वैसे भी केजरीवाल को पाकिस्तान से चंदा मिलने का क्या कारण और आधार है ? भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के दोनों छोटे भाई पाकिस्तान मे है एक पाकिस्तान का शिक्षा मंत्री है तथा दूसरा टीवी एंकर है इसी से आसानी समझा जा सकता है कि केजरीवाल और "आम आदमी पार्टी" को पाकिस्तान के इस्लामिस्ट से चंदा कैसे मिल रहा है और और चंदे का क्या और कितना महत्व है साथ ही उसका मकसद भी बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।

अन्ना की सीडी मिलने के बाद केजरीवाल और उनके "आप" का वास्तविक स्वरूप जिस प्रकार से जनता के सामने आया है उनकी विश्वसनीयता समाप्त ही हो चुकी है कुछ लोग जो न सिर्फ "आम आदमी पार्टी" पदाधिकारी थे लेकिन इस घटनाक्रम के बाद अब नहीं है, का साफ - साफ कहना है "सुरेश कलमाड़ी, कनीमोझी, मनमोहन सिंह, ए राजा, लालू यादव आदि और अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी मे क्या अंतर है ? अन्ना ने तो केजरीवाल की कलई ही खोल के रख दी है ...उन्होने ने नौकरी के दौरान क्या किया इससे मुझे कोई मतलब नहीं था लेकिन अब शक होता है ...केजरीवाल तो अभी कोई चुनाव नहीं जीते हैं किसी भी पद पर नहीं है फिर भी ऐसे आरोप तो समान्यतः शुरू मे किसी भी नेता पर नहीं लगे ... वी पी सिंह पर भी नहीं लगे थे ... लेकिन चंदा हड़पने की सच्चाई ने आत्मा को हिला के रख दिया ...मेरा स्पष्ट मानना है कि अन्ना कभी भी झूठ नहीं बोल सकते, किसी के बहकावे मे नहीं आ सकते, कोई भी उनको भड़का नहीं सकता ..." एक और पूर्व "आप" कार्यकर्ता का स्पष्ट कहना था कि "केजरीवाल जब केजरीवाल तौकीर रजा से मिलने बरेली गए तभी मन खिन्न हो गया था, उस सामय तो जैसे तैसे तर्क - कुतर्क से मन को समझा लिया, लेकिन अब तो शक यकीन मे बदल गया है" आगे जोड़ते हुए वो कहते हैं "अभी चुनाव से पहले ही केजरीवाल को चंदा दिखा घोटाला करने के लिए उन्होने कर लिया, आगे क्या - क्या करेंगे लोग हमसे पूछते हैं देने के लिए हमारे पास कोई उत्तर नहीं है और तो और बहुत से वोटर तो गारंटी तक की मांग करने लगे है हमारे पास देने को उत्तर नहीं है गारंटी कहाँ से देंगे मुंह छिपाने तक की नौबत है हमारे लिए" ये पूछने पर कि वो व्यक्तिगत तौर पर "आम आदमी पार्टी" को वोट देंगे उन लोगों का स्पष्ट उत्तर नहीं मे था, उन सभी पूर्व "आप" कार्यकर्ताओं को काफी अफसोस भी है कि ठीक 2 दिन पहले तक वो केजरीवाल के कट्टर समर्थक हुआ करते थे।
  

Wednesday, 20 November 2013

अन्ना और वास्तविक "आप"

अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार अन्ना के मुद्दे पर अपना स्वरूप दिखाया है उससे उनकी "आम आदमी पार्टी" के कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी सहमत ही नहीं हैं बल्कि बहुत ज्यादा खिन्न भी हैं। जो खिन्न हैं उनका स्पष्ट मानना है कि केजरीवाल को कड़ा रुख अपनाने के बजाय के विनम्रता से पेश आना चाहिए था और अन्ना पर भद्दे प्रत्यारोपण से बचना चाहिए था। ऐसा न करके उन्होने इतना बड़ा नुकसान कर दिया जिसकी भरपाई संभव नहीं, इसके साथ - साथ उन्होने अपने सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को भी अन्ना को आड़े हाथों लेने का आदेश दे डाला। जिसे सोशल मीडिया पर उनके कार्यकर्ताओं द्वारा अन्ना पर किए जा रहे भद्दी से भद्दी  टिप्पणिया आसानी से देखी जा सकती हैं। वैसे अब तो ये तय माना जा रहा है दिल्ली मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए तो बड़ी बात होगी।

अरविंद केजरीवाल के रूख से जो "आप" के पदाधिकारी सहमत नहीं हैं वो दरअसल बहुत ज्यादा केजरीवाल से डरे और सहमे भी हुए हैं कोई भी बहुत ज्यादा खुल कर बोलने को तैयार नहीं है सिवाय केजरीवाल के आदेशों का आँख बंद करके पालन करने के। केजरीवाल का ये तानाशाही स्वरूप "आम आदमी पार्टी" के बहुत से बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं को कहीं से भी रास नहीं आ रहा है। उसमे से बहुत सारे तो केजरीवाल के इस रूप से परिचित ही नहीं थे वो पहली बार इस स्वरूप के देख कर न सिर्फ अचंभित हैं बल्कि बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हैं। आगे वो इस विषय पर या असहमति के किसी अन्य मुद्दे पर क्या स्टैंड लेते हैं देखने वाली बात होगी।

एक बात तो अकाट्य रूप से सत्य है कि अरविंद केजरीवाल के जो भी सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप है वो सिर्फ और सिर्फ अन्ना हज़ारे के कारण से है लिहाजा अन्ना हज़ारे का सन्दर्भ केजरीवाल और "आप" के लिए किसी प्राधिकरण (Authority) से कम नहीं। अतः यदि अन्ना हज़ारे कोई स्पष्टीकरण चाहते हैं तो उल्टे उनपर प्रत्यारोपण करना किसी घृष्टता से कम नहीं है। वैसे भी केजरीवाल ने वो सारे हथकंडे चुनाव जीतने के निमित्त अपनाए जो उन्हे किसी भी कीमत पर नहीं अपनाने चाहिए थे चाहे वो फर्जी ओपिनियन पोल का मामला हो जिसे उनके ही पदाधिकारी योगेन्द्र यादव ने कराया, कामिटमेंट के बावजूद अन्ना के नाम का दुरपयोग करना, जनलोकपाल के संदर्भ मे दिल्ली की जनता से झूठे वादे करना, सुरक्षा और बंगला न लेने का हथकंडा अपनाना (दिल्ली के विधायकों को सुरक्षा और बंगला नहीं मिलता), भ्रष्ट लोगों को बड़े पैमाने पर पार्टी का उम्मेदवार बनाना या फिर वोट बैंक गंदी राजनीति करने के निमित्त तौकीर रजा से मुलाक़ात करना। केजरीवाल हर उस हथकंडे को अपनाया जिसके कारण राजनीति मे गंदगी बढ़ती ही है और बढ़ती गई। वैसे कुमार विश्वास ये स्वीकार कर चुके है आंदोलन मे जमा हुए 2 करोड़ रुपए थे जिसे दिल्ली विधान सभा चुनाव मे खर्च कर दिया गया है फिर केजरीवाल किस मुंह से ये सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं सारा पैसा आंदोलन मे ही खर्च हो गया था ?

केजरीवाल और उनके कुछ सहयोगियों द्वारा अन्ना पर ये दोषारोपण करना कि उनको बहकाया गया है फुसलाया गया है केजरीवाल एंड कंपनी की बेहद ओछी मानसिकता को ही दर्शाता है। जो आदमी पिछले लगभग 35 साल से निरंतर समाजसेवा कर रहा है, समाज को बादल रहा है, ईमानदारी कि ऐसी प्रतिमूर्ति कि उसके स्टैंड से सरकारें तक हिल जाएँ उस व्यक्ति को कोई बहका सकता है, फुसला सकता है, गलत सूचना दे सकता है ? 

Tuesday, 19 November 2013

चंदा या निवेश ?

17 नवम्बर को अन्ना द्वरा केजरीवाल को लिखी तीनों प्रश्नो का उत्तर मे उन्होने गोलमोल ही सफाई दी है जिसे तार्किक उत्तर बिलकुल ही नहीं माना जा सकता जैसे जनलोकपाल का संदर्भ राष्ट्रीय संदर्भ मे है जबकि वो सिर्फ दिल्ली का चुनाव लड़ रहे हैं इसके उन्होने महाराष्ट्र और उत्तराखंड के लोकायुक्त बिल का हवाला दिया है फिर वो अपने बैनर जो दिल्ली मे लगा रखे हैं उनपर जनलोकपाल का जिक्र कैसे है ? अन्ना के नाम का दुरपयोग हर जगह दिल्ली मे देखा जा सकता है फिर कैसे केजरीवाल सफेद झूठ बोल रहे हैं यहाँ तक कि जनलोकपाल के साथ भी अन्ना का नाम जोड़ा गया।

चिट्ठी के कोष के उपयोग जवाब केजरीवाल ने इतना कहा कि जस्टिस  संतोष की भांति किसी सेवानिवृत न्यायधीश से जांच करा लें, इस निमित्त सारी आवश्यक जानकारी वो स्वयं उपलब्ध कराएंगे। पता नहीं उस जमा राशि की फ़ाइल बनी भी है या नहीं यदि बनी भी होगी तो मिलने की क्या गारंटी है।वैसेभी अगर सबकुछ ठीक - ठाक होता तो एक - एक पैसे का पूरा हिसाब केजरीवाल अन्ना को उसी समय दे दिये होते जो उन्होने नहीं किया। वैसे अन्ना के पूर्व ब्लॉगर राजू पारुलकर के एक बहुत बड़ा खुलासा ये किया कि एक बार अन्ना से केजरीवाल की सारे सदस्यों के बीच इकट्ठा हुए फंड के बटवारे को लेकर बहुत तीखी नोकझोंक हुई थी जिसे कजरीवाल ने रिकॉर्ड कर के अपने पास रख लिया और उसी सीडी आधार पर केजरीवाल अन्ना को ब्लैकमेल कर रहे हैं। यही कारण है कि केजरीवाल के मुद्दे पर अन्ना को यू टर्न लेना पड़ जाता है जैसा आज सुबह रालेगण सिद्धि मे हुआ। ये केजरीवाल की असलियत है।

वैसे 14 नवंबर के बाद से ही "आम आदमी पार्टी" के संदर्भ मे तेजी से घटित हुए घटनाक्रम से पूरी पार्टी सन्न तो है ही सकते मे भी है। एक तो पहले से ही पार्टी मोदी की लोकप्रियता के कारण गंभीर चुनावी परेशानी का सामना कर रही थी और अब कोढ़ मे खाज बन कर ये मुद्दा आ गया। "आप" की परेशानी सिर्फ यही नहीं है कि चुनाव जीतना वैसे भी उनके लिए पहले ही बहुत कठिन था लेकिन अबतो करीब - करीब असंभव सा हो गया है।

अभी कुछ दिन पहले ही पार्टी फंडिंग पर न्यायालय के आदेश पर जांच चल रही है जिससे "आप" के कार्यकर्ता खार खाए हुए है। पार्टी अगर नहीं जीती तो केजरीवाल बहुत बड़े धर्मसंकट मे फंस जाएंगे ऐसा पार्टी के पदाधिकारी भी मानते हैं। इस हालिया घटनाक्रम  से पार्टी चंदा देने वाले भी बहुत ज्यादा चिंतित हैं उन्हें उनका पैसा डूबता हुआ साफ नजर आ रहा है। सवाल ये उठता है कि चंदा देने वालों ने क्या "आप" को चंदा चंदा समझ के दिया या पार्टी मे "निवेश" किया? एक व्यक्ति जिनहोने "आप" को बड़ी राशि चंदे के रूप मे दिया है, बता रहे थे कि केजरीवाल उनकी टीम ने उन्हें धोखे मे रखा ..सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल और उनकी टीम ने चंदा लेने से क्या वादा किया था ? आखिर बड़ी राशि चंदे के तौर पर देने वाले "रिटर्न" की उम्मीद क्यों कर रहे हैं?

अरविंद केजरीवाल चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं उनके लिए इस समय उनके गुरु अन्ना हज़ारे आदि का कोई मतलब नहीं है उनके कार्यकर्ता भी पता नहीं किस उम्मीद मे हैं जाहिर सी बात है इतनी उम्मीद आदमी तभी करता है जब उसका बहुत कुछ दांव पर लगा हो खास कर पैसा। अतः ये जानना बहुत आवश्यक है कि केजरीवाल ने "चंदा" लिया या "निवेश" के लिए "आम आदमी पार्टी" के बॉन्ड जारी किये ???

  

Monday, 18 November 2013

मोदी की लोकप्रियता और "आप" का भ्रष्ट आचरण

दिल्ली विधान सभा चुनाव बड़ा दिलचस्प होता जा रहा है। कई मायानों मे ये इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है यहाँ चुनाव प्रचार कोई अपना कर रहा है लेकिन हो किसी और का रहा है। "आम आदमी पार्टी" के बेहद महत्वपूर्ण पदाधिकारी सकते मे हैं उनको कोई रास्ता नहीं मिल रहा जिससे इस गंभीर समस्या से मुक्ति पा सकें। वो बता रहे थे कि जहां भी भी वो जा रहे हैं घरों के लोग खुल कर मोदी के पक्ष मे बोल रहे हैं लिहाजा "आप" के पदाधिकारियों को वोटरों को समझाने मे काफी दिक्कत हो रही है। एक दिन "आप" की टीम प्रचार मे निकली और लगभग 178 घरों मे संपर्क किया जिसमे से 158 घरों के लोगों ने मोदी के पक्ष मे खुल कर बोला तब लोगों को समझाने के लिए "आप" के कार्यकर्ताओं को कहना पड़ता है मोदी को आप लोकसभा मे वोट कीजिएगा लेकिन विधानसभा मे "आम आदमी पार्टी" को वोट कीजिये। जब लोग बवाल को टालने के लिए सहमति दे दे रहे हैं तो लोगो की उस बनावटी सहमति को "आप" के सामान्य कार्यकर्ता तो अपना वोट मान कर बम-बम हैं लेकिन पदाधिकारियों के चेहरे से हवाईयां उडी हुई हैं। अब तक के चुनावी इतिहास मे ये पहली बार देखा जा रहा है कि लोग किसी खास नेता के लिए लोग विरोध तक कर रहे हैं नहीं तो इसके पहले लोग प्रत्याशी का मन रखने के लिए हाँ हाँ कह देते थे लेकिन वोट अपनी मर्जी से करते थे। ये पहली बार है कि "आम आदमी पार्टी" मोदी के समर्थन मे विरोध झेल रही है। यही कारण है कि केजरीवाल को रोड शो के लिए निकालना पड़ा लेकिन वो भी सफल नहीं है ये भी नई चिंता का विषय है "आम आदमी पार्टी" के लिए। एक दिन तो हद ही गई जब लोगों ने केजरीवाल का सरे आम मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया। नुक्कड़ सभाएं भी कम ही की जा रही हैं इस डर से कि कहीं लोग प्रश्न पूछ कर मज़ाक उड़ाना न शुरू कर दें। सोशल मीडिया पर जिस प्रकार से "आम आदमी पार्टी" के कार्यकर्ताओं ने बदतमीजी की है उसका भी दिल्लीवासियों मे बहुत गुस्सा है।

वही पदाधिकारी बता रहे थे कि नई समस्या ये भी है करीब - करीब सारे कार्यकर्ता नौजवान हैं लिहाजा अतिउत्साह मे गलत और सही का भी भान नहीं रहता जिससे सामान्य तौर पर नई - नई मुसीबतें अक्सर खड़ी होती रहती हैं जिसे नियंत्रित करना भी काफी मुश्किल है। वैसे समस्याएँ ऐसी हैं जिस पर पार्टी के पदाधिकारियों को काफी माथापच्ची करने के बाद भी समाधान निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। वैसे पदाधिकारियों को महिला कार्यकर्ताओं को लेकर भी खासे चिंतित हैं बड़ी संख्या मे मिलती शिकायतों के बाद महिला कार्यकर्ताओं को या तो उनके घर वाले प्रचार मे जाने से रोक रहे हैं या फिर वो खुद डर के मारे चुनाव प्रचार मे जाने से कतरा रही है। अचानक महिला कार्यकर्ताओं की संख्या कम हो जाने से जवान पुरुष कार्यकर्ताओं की संख्या भी बहुत कम हो गई है।

 ये अवधारणा की लड़ाई नहीं बल्कि बेहद निम्न कोटि की व्यावहारिक परेशानी है ..जो "आचरण का भ्रष्टाचार" है जो वास्तव मे बहुत खतरनाक है .... 

Sunday, 27 October 2013

आज पटना की शानदार हुंकार रैली के माध्यम से जनता ने नरेन्द्र भाई मोदी के प्रचण्ड नेतृत्व मे न सिर्फ आतंकवादियों को मुहतोड़ जवाब दिया बल्कि उन्हें भी तगड़ा तमाचा मारा जो वास्तव मे बहुत अनिष्ट की उम्मीद पाले हुए थे। 8 से 10 लाख की भीड़ अकल्पनीय रूप से न सिर्फ उस अनिष्ट को दरकिनार करते हुए नरेन्द्र भाई को सुना बल्कि शानदार और अतिसंयम का परिचय देते हुए कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ये उन लोगों के मुंह पर करारा और जोरदार जूतेदार तमाचा है जो गुजरात दंगों के बहाने मोदी जी विरुद्ध अनिष्ट करने का सपना देखते हैं। ऐसा शानदार और प्रभावी नेतृत्व जिसे देखकर आँखें भर जाएँ कि यदि नेता डटा रहे तो जनता जान देने को भी तैयार...वंदन करने का मन करता है ऐसे नेतृत्व को जो लगातार विस्फोटों के बाद भी डटी रही ... मोदी जी और उनकी टीम चाहती तो भीड़ को भड़का कर बहुत कुछ कर सकती थी लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। क्या ये मात्र संयोग ही है कि कल ही श्रीमती जनार्दन द्विवेदी ने मोदी जी को धमकी दी और आज ये लोकतन्त्र का पहला काला कारनामा हो गया। वैसे अभी-अभी खबर मिली है कि कुछ समय पहले यानि करीब एक से डेढ़ घण्टा पहले मोदी जी के मंच के नीचे से भी कुछ बरामद हुआ है जहां से मोदी जी ने पूरे एक घंटा भाषण दिया। पता नहीं क्यों नितीश बाबू इशरत जहां के शौक को चिपकाकर बाहर निकलते हुए ये कहना ही भूल गए कि "शौक बड़ी चीज है " प्रेस से बात करते हुए बार-बार कह रहे थे कि कोई सूचना नहीं थी लेकिन उसी के आधे घण्टे बाद ही आईबी ने कहा कि उसने इनपुट दिया था रैली मे अनिष्ट हो सकता है ठीक उसी के बाद गुजरात पुलिस के इनपुट की भी खबर आ गई। पता नहीं नितीश बाबू आईबी और गुप्तचर संस्थाओं के इनपुट को शादी का निमंत्रण क्यों समझते हैं ... एक बहुत ज्यादा खोपड़ी के जदयू नेता तो ऐसे सनपात गए हैं कि उनकी खोपड़ी मे चल कुछ रहा है मुंह से निकल कुछ रहा है...बोलती है कि बंद ही नहीं होते ...उधर श्रीमान असत्यव्रत चतुरबेडी ने भी व्यापक तौर पर बेहद असंतुलित नजर आए जो भी उधार की खोपड़ी थी ने काम करना शायद बंद कर दिया और बक-बक करने लगे ....। रैली मे लगातार 6 विस्फोट बहुत बड़ी और भयानक घटना है जिसे उसे उस संदर्भ मे भी देखा जाना चाहिए जब 18 अप्रैल 2013 को जानी - मानी राष्ट्रीय स्तर की मोदी विरोधी मानी जाने वाली पत्रकार मधु किश्वर ने गृह मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से दावा करते हुए बेहद सनसनीखेज बयान दिया था। जिसपर अच्छा - खासा बवाल मचा था।
वास्तव मे आज बिहार की जनता को देख ऐसा लगा कि वास्तव मे मोदी जी के नेतृत्व मे जनता जान भी दे सकती है ...ऐसे नेतृत्व और जनता दोनों के लिए बड़ी से बड़ी प्रशंसा भी कम ही लगती है ...श्रद्धा से जी भर उठता है ...

Wednesday, 23 October 2013

"आप" के श्री अरविन्द केजरीवाल जी अनुरोध है कि  वो कृपया डॉ. राघवेन्द्र कुमार ( https://www.facebook.com/Dr.Raghvendra.Kumar ) द्वारा पूछे गए पाँच (5 ) बेहद मौलिक एवं अतिमहत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने का कष्ट करें जिससे उनके "ईमानदारी" सन्दर्भ में जो भी संदेह जनता और विशेष जनता में है वो दूर हो सके। ये सभी प्रश्न श्री केजरीवाल जी के "आप" के पेज पर भी है जिसका लिंक है https://www.facebook.com/AamAadmiParty/posts/424336560999443?ref=notif&notif_t=like इसके साथ साथ उनके वेबसाइट के "पोलखोल" पेज पर भी ये प्रश्न उपलब्ध हैं जिसका लिंक http://www.aamaadmiparty.org/page/PolKhol# है। वे सभी प्रश्न पुनः विस्तार पूर्वक नीचे दिए जा रहे हैं कृपया अवलोकन करें और श्री केजरीवाल जी पर दबाव बनाएं कि वो इनका उत्तर दें -

DrRaghvendra Kumar 
मैंने अभी कुछ दिन पहले अपने भूतपूर्व मित्र धानी नरेश जी के फेसबुक आईडी पर कुछ लोगों से बहस हो गई तो किसी के पास भी मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं था उल्टे कुछ लोगों ने अपनी अवस्था का भी लिहाज न करते हुए अभद्र भाषा का भी प्रयोग किया लेकिन मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जो केवल एक ही था जिसका अवलोकन धानी नरेश जी के आईडी पर किया जा सकता है यदि उन्होने पोस्ट डिलीट न किया हो तो। खैर, मेरे कुछ प्रश्न श्री अरविंद केजरीवाल जी से यदि वो इनका उत्तर दे पाएँ तो थोड़ा और बेहतर होगा -
1॰ "आप"ने अपने सरकारी कार्यकाल के दौरान कितने भ्रष्टाचारियों या अपराधियों जो आपने कार्यक्षेत्र मे आते थे पकड़ कर जेल मे डाला ? आपके सेवाकाल के विपरीत अशोक खेमका जी, किरण बेदी जी, गोविंद राघो खैरनार जी, दुर्गा शक्ति नागपाल जी, विनोद राय जी, टी एन शेषन जी आदि के सेवाकाल अदम्य निर्भीकता वाले सेवाकाल हैं जिनका अपना ही इतिहास है और तो और बहुत से तो ईमानदारी के नाम पर अपनी जान तक गवां बैठे। आपका भी ऐसा कुछ हो तो कृपया बताएं।
2॰ गुजरात को छोड़ कर भारत मे सभी जगह सभी विभागों (जहां भी हो सकता है) मे रूटीन ट्रांसफर होता है लेकिन आप उस रूटीन ट्रांसफर से बचे रहे जैसा कि मुझे पता चला ? गुजरात मे एक अवधारणा के तहत ट्रान्सफर नहीं होते जिसे मोदी जी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं तो क्या इस तरह की अवधारणा आपके विभाग मे भी थी ? यदि नहीं तो क्यों आपका ट्रांसफर नहीं होता था ?
3॰ आप दावा करते हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त कर देंगे या बहुत कम कर देंगे इसके लिए आप जनलोकपाल का सहारा लेंगे ठीक है ये एक पक्ष है जनलोकपाल से मै सहमत हूँ होना भी चाहिए, लेकिन किसी भी तंत्र के संदर्भ मे उसके वैज्ञानिक तथ्यपरक होने की बहुत जरूरत होती है जिससे उसे सार्वभौमिकता के स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जा सके तो क्या आपने अपराध विज्ञान, भ्रष्टाचार विज्ञान आदि जैसे विषयों का जनलोकपाल के ड्राफ्टिंग से पहले अध्ययन किया था ? यदि किया था उसके संबंध मे आपके किसी शोधपत्र का प्रकाशन कहीं भी हुआ ? यदि हुआ है कृपया लिंक उपलब्ध कराएं ! यदि नहीं तो तो फिर आप या किस तार्किक आधार पर दावा कर रहे हैं कि आप भ्रष्टाचार समाप्त या बहुत कम कर देंगे ? हो सकता है आपके जनलोकपाल के लागू होने के बाद भ्रष्टाचारी कोई नया रास्ता खोज ले और भ्रष्टाचार बहुत बढ़ जाए जो नियंत्रण से परे हो !
4॰ जब आपके पास सरकारी शक्तियाँ थीं तो आपने उनका उपयोग भ्रष्टाचार पर प्रहार करने मे नहीं किया जैसा कि मुझे पता चला है फिर इस संदर्भ मे आपके दावे पर विश्वास कैसे किया जाए? जैसा कि आपके टिकट वितरण मे ही आपके जनलोकपाल फ़ेल होते नजर आ रहे हैं, यदि 70 मे से 5 भी असफल होते हैं तो आपके असफलता का दर 7.14% है जो 1 करोड़ की जनसंख्या मे 71400 लोग स्वाभाविक रूप से भ्रष्ट रहेंगे ही जो बहुत बड़ी संख्या है ये इस मायने मे भी बहुत महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति विस्तार करने की होती है एक बात, दूसरी बात ये कि "भ्रष्टाचार या अपराध की प्रवृत्ति" पर आपकी कोई अवधारणा नहीं दिखती यदि हो तो कृपया बताएं।
5॰ आप बार - बार ये दावा करते क्यों करते हैं कि आप आईआरएस की शानदार नौकरी छोडकर आए हैं? जबकि आपकी श्रीमती जी नौकरी कर रही हैं, यदि आप स्वयं को बहुत बड़ा त्यागी साबित करना चाहते हैं तो आप अपनी अपनी पत्नी से तलाक ले लें या फिर अपनी पत्नी से भी त्यागपत्र दिलवा कर "आप" ज्वाईन करवाएँ। क्या आपका ये दावा कुछ इस प्रकार का नहीं लगता कि महिसासुर, हिरणकश्यपु, आसाराम बापू आदि जैसे लोग जो खुद को ही भगवान या भगवान का अवतार मानने लगते हैं और लोगों से ये कहने लगते हैं कि सिर्फ वे ही भगवान हैं दूसरा कोई नहीं लिहाजा लोग उनकी ही पूजा करेंगे तो वो ही उनका उद्धार करेंगे जैसा कि आप ईमानदारी के संदर्भ मे कर रहे हैं ? जो संभवतः संविधान की दृष्टि मे अपराध न हो किन्तु जघन्य "पाप" जरूर माना जाता है !

Sunday, 20 October 2013

"कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय या खाए बौराए जग वा पाए बौराए" एक सोना दूसरा धतूरा लेकिन विश्लेषक बताते हैं सोने मे धतूरे से सौगुनी अधिक मादकता होती है...कांग्रेछिः सरकार को जिस प्रकार घोटालों का धतूरा खाते-खाते धूर्तई पर उतारू है उससे तो ये होना ही था। जब सामने सोने का सपना हो तो धतूरे    

Tuesday, 15 October 2013

वैसे तो हर साल दशहरा आता है इस वर्ष भी आया और चला गया लेकिन ये दशहरा कुछ खास इसलिए भी था कि रावण जैसे कुछ लोग ही रावण का पुतला फूंकने का प्रयास कर रहे थे। वैसे रावण तो महाज्ञानी और महापंडित भी था लेकिन था बिलकुल अंडरएचीवर मनमोहन सिंह की तरह। रावण ने भी बहुत से असफलताओं पर इस्तीफा नहीं दिया था दे दिया होता तो कम से कम ईमानदार और ज्यादा कार्यकुशल राजा विभीषण हो गया होता और उसकी सोने की लंका तो बची होती, प्रभु श्रीराम को इतनी    
बकलोल बबुआ ने जिद्द पकड़ ली थी अब कुछ न कुछ तो करेंगे ही ठीक वैसे ही कुक्कुरविलासी अंदाज मे ...बड़े ताव मे आए थे बेचारे मकान साहब पता नहीं कहाँ से मकुनी लेकर आए थे और पतराहुंकार लोगों के सामने चबाने बैठे ही थे कि बकलोल बबुआ अपने चचा लोगों की 

Friday, 11 October 2013

पता नहीं दिल्ली की जनता धारकोसवा से परिचित है कि नहीं मुझे नहीं पता लेकिन एक दिल्लीवासी हमारे मित्र बता रहे थे कि बच्चों के मामले मे धरकोसवा की नादानी बड़ी कारगर है। इसीलिए कुछ लोग इसी आधार पर खुद को भुनाने जंतर-मंतर पर लोगों को ताबीज बांटने के लिए अनशन पर बैठ गए थे बाद मे पता चला था कि अनशन का मंत्र उसी बुजुर्ग से उधार लिया था जिसने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध मे खुद के जान की बाजी लगा दी थी । खैर एक धरकोसवा से मैंने पूछा तो उल्टे वो मुझसे ही पूछने लगा "...आपको क्या लगता है ...?" मैंने कहा "...मुझे तो 'आप' आप लगते हैं ..." धरकोसवा गुस्से मे आ गया बोला "...देखिये हम भले ही धरकोसवा हैं लेकिन बड़े-बुजुर्ग की इज्जत करना जानते हैं और कभी जनता को घोखा नहीं देते ..." मैंने सफाई देते हुए कहा "...मैंने तो कभी ऐसा नहीं कहा ..." धरकोसवा कहने लगा "...लेकिन आपने जिससे मेरी तुलना की है उसपर मुझे घोर आपत्ति है ..." मैंने उससे क्षमा मांगते हुए कहा "...अच्छा भाई क्षमा करो मैंने मान लिया कि 'आप' वास्तव मे 'आप' नहीं हो ..." मैंने थोड़ा आश्चर्य से पूछा "...लेकिन तुमको समस्या क्या है ..." धरकोसवा ने कहा "...हम नहीं चाहते कि जैसे अन्ना बाबा की नकल करके उघटापैची किया गया उसी तरह हमारी भी नकल करके को वही सब करे ..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "...लेकिन ये तो राजनीति है ..." धरकोसवा ने उल्टे मुझसे पूछा"...तो फिर 'आप' के लोगों हमारी नकल करने की क्या जरूरत है ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...इसमे समस्या क्या है फिर ..." धरकोसवा ने कहा "...समस्या है लोग हमको केजरीवाल और न जाने क्या - क्या समझ लेते है ..." मैंने कहा "... इससे तो तुम्हारी इज्जत बढ़ जानी चाहिए ..." धरकोसवा ने कहा "...हम लोग 'आप' की तरह चप्पल पहन कर पलंग नहीं चढ़ते..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब...?" धरकोसवा ने उत्तर देते हुए कहा "...केजरीवाल और उनके 'आप' लोग तो वही बड़ी सफाई से वो करते हैं कि लोग देख के ही शर्मा जाएँ..." मैंने फिर पूछा "...थोड़ा स्पष्ट कीजिये ..." धरकोसवा ने स्पष्ट करते हुए कहा "...कुमार विश्वास जी का चश्मा देखिये 11000 से कम का नहीं है नौकरी छोडने के बाद ये आलम है ...प्रशांत भूषण के बिजली का बिल देख लीजिये, अंजलि दामनिया, शाजिया इल्मी की आपनो के खिलाफ सारे आम नौटंकी, उनके नक्सलियों को देखिये जो उनके आंतरिक लोकपाल मे हैं, खुद केजरीवाल जब नौकरी मे थे तब तक कुछ नहीं किया निकलते ही पता नहीं किस बुर्के से उनको दिव्य शक्तियाँ मिले लगीं और पहले तो अन्ना बाबा का नकल किया अब लोगों की नकल कर रहे हैं लोगों को बेवकूफ़ बनाने के लिए ..." मुझे कुछ कहने मे दिक्कत हो रही थी तो उसी धरकोसवा ने कहा "...देखिये अगर 'आप' का बस चले न भारत को पाकिस्तान बनते बिलकुल देर नहीं लगेगी ..." मैंने उससे पूछा "...लेकिन किसी वकील के ऑफिस मे घुस कर उसे थप्पड़ मारना वो भी सरे आम ...कहाँ तक सही है ...?"  धरकोसवा ने उत्तर देते हुए कहा "...आप थप्पड़ की बात न करो जी 'आप' के लोगों को तो सजा ऐसी मिलनी चाहिए कि जूता भी शर्मा जाए खास कर नकलची बंदर बनने पर, कश्मीर के मुद्दे पर हर बार बुर्कानशीं होने पर..." अंत मे धरकोसवा ने कहा "...देखिये हमे भी इज्जत के साथ जीने का हक़ है ...कम से कम केजरीवाल और उनके 'आप' से मेरी तुलना न करें तो बेहतर होगा ..." ये कह के धरकोसवा चला गया ...  

Wednesday, 9 October 2013

ये जादू है नरेंद्र भाई मोदी का कि नितीश बाबू को दिल्ली को अमेरिका बनाना पड़ा जिससे युद्ध करने के लिए हथियार का उधार ले सकें। हलन कि उनके गोश्त-गुरु कोई-कोई दोस्त-दारू भी कहते हैं, लालू तो जेल मे घोटाला मैनेजमेंट पढ़ा रहे हैं वैसे ये बहुत कम लोगों को पता है उनका पहला चेला नितीश कुमार ही थे शरद यादव को को तो सर्दी हो गई थी तो उन्होने ने आगे चल कर अपना सर्दी जुकाम ठीक करने के लिए बहुत बड़ी मात्रा मे गोरू-बछरू का खरी-खुद्दी खा गए थे लेकिन नेतृत्व नितीश कुमार का ही था। मैनेजमेंट के मामले मे हड़पने की कला के उस्ताद लालू का नितीश छाप करामाती व्यक्तित्व इस मामले मे नितीश से बेहतर है कि उनको पहले ही हड़प कर घोटने कला बढ़िया आती है लेकिन बेचारे नितीश जब लालू जेल मे हैं तो उन्ही के तर्ज पर खुद को छुट्टा सांड घोषित करना ही पड़ेगा सो उन्होने कर दिया। मैंने एक टोपोरी छाप सिक-उल्लर जदयू नेता से पूछा तो कहने लगे "...नितीश सांड नहीं हैं ..." मैंने कहा "...नोबल पुरस्कार की घोषणा तो हो चुकी ..." जदयू नेता ने कहा "...हमे किसी भी चीज का लोभ नहीं हैं ..." मैंने पूछा "...तो फिर राजनीति मे क्या झख मारने आए हैं ..." जदयू नेता ने उत्तर देते हुए कहा "...हम बिहार की सेवा के लिए आए हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...सेवा तो जेल मे रह कर बेहतर तरीके से हो सकती है ..." अब जदयू नेता चौंक गए बोले "...आपका क्या मतलब है ..." मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...आपके गुरु बाबा तो जेल से ही सेवा कर रहे हैं मैनेजमेंट पढ़ा कर ..." जदयू नेता बोले "...आप क्या बात करते है उनके गुरु तो नितीश कुमार हैं ..." मैंने आश्चर्य दर्शाते हुए हुए कहा "...तब तो मोदी अपने जगह सही हैं ..." जदयू नेता कोंफ्यूज हो गए "...नेरेन्द्र मोदी वो नहीं कर सकते जो वो बिहार मे करना चाहते हैं ..." मैंने भी सोचा चलो अब इनहोने नरेंद्र भाई मोदी का नाम ले ही लिया तो पेंच कसा जाए मैंने पूछा "...कौन रोकेगा उनको ...?" जदयू नेता मुसकुराते हुए बोले "...देख लीजिये यहाँ की जनता ने बुलाया और राष्ट्रपति आने को तैयार हो गए ..." मैंने कहा '..धन्य हो बुद्धिमान टोपोरी नेता अपनी अकल बुर्के मे छिपा के रखते हैं क्या ...?" जदयू नेता ने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब ...?" मैंने कहा "...बहुत सही किया है बिहार को स्पेशल दर्जा दिलवा के ...दर्जा के साथ-साथ बकलोल युवराज ने आपको अपनी बकलोलई भी उपहार मे दे दिया और आप लोगों ने ले भी लिया ..." अभी भी जदयू नेता का आश्चर्य कम नहीं हुआ था सो उन्होने पूछा "...हमरा को समझ मे नहीं आया ..." मैंने ताना मरते हुए कहा "....अरे बकलोल के चेला जहां अभी कुछ लोग समर्थन मे हैं अगर नरेन्द्रभाई मोदी को तुम लोग रोक लिए तो सारा बिहार ही उनका समर्थक हो जाएगा ...चारा के साथ लगता भैंस का अकाल भी खा गए..." ये सुन के जदयू नेता को तो जैसे साँप सूंघ गया मारे गुस्से मे नितीश को कोसते हुए बोले "...हम कहते थे नितीश बाबू लालू को अपना गुरु मत बनाओ ...लेकिन बुद्धि होगी तब न सुनेंगे ..." मैंने कहा "...नितीश बाबू अभी भी लालू को गुरु मानते हैं ..." वो सोचते हुए थोड़ा भरोसे से उन्होने पूछा "...वो आपको कैसे पता ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...नितीश बाबू को बिहार की जनता जूता और काला झण्डा दिखा रही है ..." जदयू नेता ने हामी  भरते हुए कहा "...हाँ वो तो है ..." मैंने कहा "...लेकिन लालू भले हार गए लेकिन जनता ने उनको कभी जूता नहीं दिखाया और न ही चलाया ..." उन्होने पूछा "...तो ..." मैं थोड़ा गुस्सा दिखते हुए कहा "...क्या तो तो करता है बकलोल.." वो अनुरोध करते हुए बोले "...तो बताईए न ..." मैंने कहा "....जैसे लालू ने आडवाणी को गिरफ्तार किया था उसी तर्ज पर नितीश भी नरेंद्र भाई मोदी को गिरफ्तार करना चाहते हैं ..." जदयू नेता अपना सिर पकड़ कर बैठ गए ....बहुत देर तक बैठे ही रहे .....

Sunday, 6 October 2013

जलन का नाती जब अपनी औकात मे आता है तो यकीन मानिए अच्छे-अच्छे अंडरअचिएवर की भी पगड़ी तेल लेने चली जाती है। फिर वही पगड़ी तेल मे अंगरेजी धुन पर नाचते अपने बेइज्जती का गुणगान करती है अजी लानत है ऐसी हरकट्टों पर। लेकिन उनके समूह के ही लोग बाग बताते हैं कि जमाना खराब है नाती अपनी बेइज्जती को दूसरों की बेइज्जती समझने की हमेशा होशियारी करता है। नतीजा पेड़ पर उल्टा लटकने की शर्त पर अपना कुल कपड़ा फाड़-फूड़ के बुर्का खोजने चल देता हैं। जमाना खराब है ही तो मने अपने कौन बढ़िया हैं? बड़े बुजुर्ग भी इस नाती का गोड़ धोते नजर आते हैं जैसे इस उम्मीद मे कि नाती का पनाती कुछ तो उल्टी करबे करेगा। जय हो जलन महराज अपने तो लुटिया डुबाए ही ऐसा दमड़नोची खनदान छोड़ गए कि जनता जब उल्टी करती है तो उसकी पसलियाँ ही बाहर आ जाती हैं। इसपर उन जलन का नाती कहता फिरता है कि ये तो देश के जीन मे है पता नहीं नाती कहना क्या चाहता है अपने बुजुर्गों की तरह जीन कहना चाहता है, जिन्न कहना चाहता है कि जिन्ना कहना चाहता है कुछ भी पता नहीं चलता। इन्ही के समूह के एक बुजुर्गवार बता रहे थे कि  बड़े बड़े सीताराम को भी यहाँ तीताराम बन कर घूम-घूम के चक्करघिरनी खेलना पड़ता है जिससे तीताराम को आगे चल कर तोताराम मे बदलने मे कोई परेशनी न हो। ये सब सहर्ष प्रक्रिया होनी चाहिए नहीं तो वही हश्र होता है जो कभी धोती फाड़ के रुमाल कर दिया जाता है। वैसे जिन्न लोगों की इज्जत बच जाती है तो ऐसे लोग बाग सीनाजोरी करते हुए सीने पर ताल थूककर हीरा पदक (Diamond Medal) धारण करके घूमते हैं। ऐसे ही एक तीताराम तोताराम मे धर्मांतरित हो कर अपनी इज्जत बचा चुके हमारे सामने बक-बक करते हुए कह रहे थे कि अपना देश गोरे लोगों का नहीं है इसलिए जो काला है इसी देश मे है कहीं और नहीं। बड़ा हुरपेटने पर उन्होने अपनी मीठी जुबान को कष्ट देते हुए कहा कि देश का काला देश के बाहर कैसे जा सकता है ? ये सुन के मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्यों कि मुझे पता है कि निःशब्द तोताराम की तोतागिरी से ज्यादा कुछ नहीं है लिहाजा लानत भेजने के लिए सिर्फ इतना ही कहना जरूरी था कि जैसे कोई भी ऐरा-गैरा इस देश का पहला दूसरा तीसरा या चौथा प्रधानमंत्री बन सकता है तो ठीक उसी तरह इस देश का काला बाहर भी जा सकता है भले इस देश की आम जनता आम आदमी  अपनी पसलियों की उल्टी करता फिरे। एक अन्य समूह के किसी ने नाती को नहीं पुचकारा को उसकी अम्मा को को बहुत बुरा लगा था उनके समूह लोग बताना शुरू कर दिये थे कि कानून को अपना काम करने के बजाय दूसरों का काम ही ज्यादा करना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे सीबीआई करती है और कर के दिखने की कोशिश भी कर रही है। नाती को भरोसा है कि कुछ न कुछ तो होगा लेकिन उनके ही समूह के एक और तोताराम बता रहे थे कि जमाना ऐसा है कि अगर बाहर हुए तो बाहर नहीं भीतर हो सकते हैं इसलिए परिक्रमा करना बहुत जरूरी है भले ही पेट साफ हो या न हो, कब्जियत किसे नहीं है प्रधानमंत्री की कुर्सी के पेट मे कब्जा जमाए बैठे क्या उस कुर्सी के लिए ही कब्जियत नहीं हैं बल्कि देश के लिए भी बहुत बड़े कब्ज बन चुके है जिसका स्थाई निस्तारण बहुत जरूरी है ...  

Thursday, 19 September 2013

किश्तवाड़ के बाद मुजफ्फरनगर में दंगे हुए लेकिन किसी टोपोरी छाप सेकुलर ने बुर्का उठा के झांकने की कोशिश नहीं की उनपर प्रवचन देना तो दूर की बात है, लेकिन यही लोग जब दंगाविजय सिंह की तर्ज पर     आ-उल गधी पर बैठ कर लुआठी चमकाते हैं ऊपर से प्रवंचना करते हुए चोरी ऊपर से सीनाजोरी करते हैं तो जाहिर सी बात है सेकुलर बुर्के मे आग तो लगेगी ही। कोई भी प्रवंचना के अलावा कुछ करता तो गनीमत थी लेकिन सब के सब उसी गधी के मुंह पर हाथ रख कर उसी की आवाज मे ढेंचू-ढेंचू करने के सिवा कुछ नहीं कर रहे। बड़ी मुश्किल एक खाँटी भाई कोंग्रेसी मिले तो मैंने उनसे पूछा "...उत्तर प्रदेश मे विधान सभा चुनाव की उम्मीद कब-तक है ...?" खाँटी भाई चौंक कर बोले "...क्यों आपको ऐसा क्यों लगता है ...?" मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा "...अरे भाई यू॰पी॰ मे केवल डेढ़ साल मे ही 100 से ऊपर दंगे हो चुके हैं ..." खाँटी भाई ने बड़े भोले अंदाज  मे उत्तर दिया "...तो क्या हुआ ! वैसे हम लोग भी अपनी बात रख कूके हैं ...?" मैंने फिर उसी आश्चर्य से पूछा "...क्यों ? प्रदेश मे कानून व्यवस्था की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है ...!" खाँटी भाई ने कहा "...हम लोग धर्म निरपेक्ष हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...तो क्या दंगा भी धर्म निरपेक्ष था ..." खाँटी भाई ने कहा "...हम लोग धर्म निरपेक्षता की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं ..." मैंने कहा "...इसीलिए तो लोग सकते मे हैं..." खाँटी भाई ने थोड़ा दिलचस्पी लेते हुए मुझसे पूछा "...सकते मे किस लिए ...?" मैंने उन्हें उत्तर देते हुए कहा "...कि आप और आप जैसे लोग लोग सांप्रदायिक दंगे  नहीं करवा पाते ..." उनके हाथ मूछों पर चली गईं खुशमिजाजी से कहा "...यही तो काँग्रेस की पालिसी है ..." मैंने कहा "...हाँ सही बात है आप लोगों ने सिर्फ धर्मनिरपेक्ष दंगे करवाए हैं ..." वो थोड़ा गुस्से मे आ गए बोले "...भाजपा के लोगों ने सांप्रदायिक दंगे करवाए हैं वोट के लिए ..." मैंने शांत स्वभाव से कहा "...मेरा भी वही कहना है काँग्रेस ने वोट के लिए 600 से अधिक धर्म निरपेक्ष महादंगे करवाए हैं छोटे - छोटे दंगों को जोड़ लिया जाए तो संख्या 65 वर्षों मे 80,000 से अधिक पहुँच जाती है..." खाँटी भाई बोले "... देखिये हमे धर्म निरपेक्षता का धर्म निभाना पड़ता है...!" मैंने थोड़ा गुस्से मे उनसे पूछा "...तो क्या इसके लिए बहुसंख्यकों की हत्या जरूरी है ...?" खाँटी भाई बोले "...देश को सही रास्ते पर ले जाने के लिए सत्ता मे रहना जरूरी है ...!" मुझे बहुत अजीब सा लगा पूछा "...मौत का सौदा करते समय आपकी अंतरत्मा कांपती नहीं ...?" खाँटी भाई बेपरवाही से बोले "...हमारे कॉंग्रेस पार्टी देशी-विदेशी सभी तरह के त्यागी हैं ..." मुझे दुख भी हुआ और आश्चर्य भी सो पूछा "...तो क्या सभी के लिए खून और काला धन जरूरी है ..." खाँटी भाई इत्मीनान उत्तर देते हुए बोले "...वैसे तो ये त्याग की कीमत नहीं है लेकिन सांप्रदायिकता के खिलाफ जंग मे पैसा तो लगता ही है ..." मैंने गुस्से से कहा "...गुजरात मे गोधरा की प्रतिक्रिया पर किसी भी स्तर पर किसी की संलिप्तता नहीं मिली, लेकिन आप लोगों ने आसमान सर पर उठा लिया था ...लेकिन यहाँ तो पूरी की पूरी सरकार ही शामिल थी दंगे के प्रयोजन मे ..." खाँटी भाई बोले "...आप समझने की कोशिश कीजिये हम धर्मनिरपेक्ष लोग हैं ..." मैंने गुस्से से तर्क रखा "...मतलब दंगा धर्म निरपेक्ष था ..." खाँटी भाई बोले "...हाँ आप ऐसा ही कुछ समझ लीजिये ..." मैंने उनसे कड़े स्वर मे पूछा "...आप कार्यवाही सिर्फ सांप्रदायिक दंगे के खिलाफ करते हैं धर्मनिरपेक्ष दंगों के खिलाफ नहीं ..!" खाँटी भाई कुछ बोल नहीं रहे थे ....   

Tuesday, 17 September 2013

...जीवंत भारत के सार्थक, विपुल विश्वास के उन्मुक्त निःशेष उद्भव, अनंत कमल की कोमलता, विषयुक्त कलंकीट काँग्रेस को मृतकर जनामृत प्रदान करने वाले भारतार्य व दुर्निवार्य  राजनीतिज्ञ "श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी" को उनके जन्मदिन पर हम सभी नागरिकों की ओर से उनको कोटि-कोटि बधाई एवं सादर नमन ... 

Sunday, 25 August 2013

कुछ नौजवान भिखारियों का लैपटॉप साल भर में ही ख़राब हो गया तो वे परेशान हो गए उनका बिज़नस सीधे-सीधे प्रभावित होने लगा तो पंहुचे उसे ठीक कराने लेकिन लैपटॉप मिस्त्री ने लैपटॉप ठीक करने से इसलिए इनकार कर रहा था क्योंकि लैपटॉप देखने से ही लग रहा था कि उसका हार्डवेयर हार्ड न रह कर बहुत ज्यादा मुलायम हो गया है जिससे उसपर मिस्त्री का दिमाग अकल-less हो गया वो लिहाजा वो काम ही नहीं कर रहा था। मिस्त्री ने नाराज हो कर मजाक में पूछा "… लैपटॉप से कुश्ती लड़ते हो क्या … ?" भिखारियों ने जवाब दिया "…इसके साथ हम नहीं रास्ते ही कुश्ती लड़ते है …" मिस्त्री ने फिर आश्चर्य से पूछा "…ये कैसे संभव है … " भिखारियों ने जवाब दिया "…उत्तर प्रदेश सरकार ने कृत्रिम सडकें उखड़वा कर प्राकृतिक सड़कें बनवा दीं है …" मिस्त्री ने जवाब दिया "…फिर तो ये लैपटॉप भी कृत्रिम न रह कर अपनी प्राकृतिक अवस्था में लगभग जा ही चुके हैं …" भिखारियों को पता नहीं फिर भी क्यों लगा रहा था कि उनके साथ नाइंसाफी नहीं हुई लिहाजा वो किसी भी तरह अपना लैपटॉप ठीक कराने के मूड में थे। एक भिखारी ने मिस्त्री कहा "…इसे ठीक कराने में कितना खर्चा आएगा …?" मिस्त्री ने कहा "…मुलायम हो चुके हार्डवेयर को ठीक कर पाना तो करीब-करीब नामुमकिन है …" भिखारीयों ने गिडगिडाते हुए मिस्त्री से कहा "…आप किसी भी तरह इसे ठीक करें नहीं तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी …" मिस्त्री भी कोई कम खिलाड़ी नहीं था बोला "…इसे ठीक करने के लिए इसे कंपनी भेजना पड़ेगा …" भिखारियों ने पूछा "…कितना समय लगेगा …?" मिस्त्री बोला "… कम से कम तीन महीना तो लग ही जाएगा …" भिखारियों को लगा कि ये बहुत ज्यादा समय है फिर उन्होंने मिन्नत करते हुए मिस्त्री से पूछा "…थोड़ा जल्दी नहीं हो पाएगा …" मिस्त्री ने कड़े हो कर जवाब दिया "…टोपोरी छाप सेकुलर पॉलिटिक्स समझ रखा है क्या जब चाहो धडाक से समर्थन दे दो - जब चाहो धडाक से समर्थन वापस ले लो …लैपटॉप है कोई बच्चों का खेल नहीं …" भिखारी बेचारे शांत हो गए फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने मिस्त्री से पूछा "…वैसे कितना खर्चा आएगा…?" मिस्त्री ने जवाब दिया "…एक लैपटॉप की बनवाई पड़ेगी करीब 12 हजार रूपए …" भिखारियों के तो होश ही उड़ गए बनवाई सुन के, उन्होंने कहा "…ये तो बहुत ज्यादा है …" मिस्त्री ने जवाब देते हुए कहा "…कीमत डॉलर के हिसाब से रूपए में है… वैसे असल खर्चा तो 4 हजार ही है…" भिखारियों ने मन मार के अपनी सहमति देते हुए जिज्ञासावश पूछा "…बनवाई डॉलर के हिसाब से क्यों…?" मिस्त्री ने उत्तर देते हुए कहा "…कंपनी अमेरिका की है इसलिए…" उसमे से ज्यादातर भिखारी पढ़े-लिखे थे एक ने मिस्त्री से पूछा "…इसका डेटा गायब तो नहीं होगा…?" मिस्त्री ने कहा "…क्यों डेटा गायब भी हो जाए तो तुम लोगों को क्या फर्क पड़ता है …" भिखारी ने कहा "…हम भिखारी भले हैं लेकिन पूरा डेटा भी रखते हैं चाहे वो आय से कम संपत्ति हो या आय से ज्यादा …!" मिस्त्री ये सुन कर बहुत प्रभावित हुआ लेकिन जिज्ञासावश पूछा "…कोई भी फाइल डिलीट मतलब गायब नहीं करते …?" भिखारियों ने शान से एक सुर में कहा "…आप लैपटॉप ठीक करवाकर एक - एक डेटा चेक कर सकते हैं …" ये सुन कर शायद किसी टूटती उम्मीदों के कारण मिस्त्री बहुत भावुक हो गया था …मेरे भी आखों से आंसू आखिर छलक ही पड़े। 

Wednesday, 21 August 2013

बिना प्याज का चोखा अब छछूंदर भी खाने से इनकार करते फिर रहे है बड़ी उम्मीद पाले बैठे थे खांटी भाई कांग्रेसी लोग कि कम से कम छछूंदर तो उनका चोखा खा ही लेंगे लिहाजा भारतीय वोटरों की क्या औकात कि उनको वोट न दें ! खैर चोखा अपनी जगह, प्याज अपनी जगह के बजाय दूसरे की जगह, अब भला कोई ये तो बताए किस पाजी ने ये अफवाह उड़ा दी कि छछून्दरों की दुनियां में रूपया नहीं महगा डॉलर चलता है तो फिर ये क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि भारतीय वोटरों को डॉलर की ही लत लग जाए। खांटी भाई कांग्रेसियों की दुनियां है लिहाजा हर प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा चाहे मौन से आबरू बेचकर या बकलोल बबुआ की बकलोलई से। अलम्बरदारी करना मजबूरी है तो लाल किले की प्राचीर पर चढ़ना भी जरूरी है तो वहां से भी चोखा चमकाने से बाज नहीं आए, अलम्बरदारी में भूल गए कि लाल किले और तिरंगे की भी एक मर्यादा होती है कम से कुछ तो लिहाज करना चाहिए था। खैर बुढौती में दुनियां ज्यादा दिखाई देती है भले दुनियांदारी में पैजामे का नाडा ही खुला जा रहा हो।  मैंने खांटी भाई कांग्रेसी से पूछा तो कहने लगे "…देखिये वो बड़े अर्थशास्त्री हैं …" मैंने गुस्से में सवाल दागा "…तो इसका क्या मतलब अपनी तरह सभी के पैजामे का नाडा खोलावएंगे …? " खांटी भाई बोले मुझे शांत करते हुए बोले "…आपका गुस्सा जायज है…" मैंने कहा "…तो अब डॉलर के बाद प्याज को भी क्यों सेने लगे ?... लंगोटी भी नहीं सूख रही …?" खांटी भाई बोले "…मौसम की मार के आगे हम क्या कर सकते हैं…?" मैंने कड़े आवाज में कहा "…हाँ सही बात है जिनके पास डॉलर की छतरी नहीं है वो कर ही क्या सकते हैं…!" खांटी भाई बोले "…इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था…" मैंने पलटकर उनसे पूछा "… इसीलिए बोफर्स की तर्ज पर 20 अगस्त वाह! वैसे आपके बकलोल युवराज ने 'रूपया घटाओ' का नारा दिया है क्या … ?" खांटी भाई तमतमा कर बोले "… वो बकलोल नहीं हैं …" मैंने भी तमतमा कर पूछा "…तो फिर क्या हैं वो 'डॉलर' हैं, 'रूपया' हैं क्या हैं…? अपनी पहचान बताने में उनको शर्म …" खांटी भाई ने बीच में बात काटते हुए कहा "…पूरी दुनियां में मंदी है तो भारत पर भी प्रभाव पड़ेगा ही … " मैंने कहा "…अमेरिका और यूरोप तो आराम से चोखा में प्याज डाल के खा रहे हैं … फिर भारत को भी कायदे से खाना चाहिए … " खांटी भाई बोले "… सरकार उपाय कर रही है … " मैंने गुस्से से उनपर सवाल दागा "… पिछले 9 साल से आप और आपके तीनमूर्ति अपने पैजामे का नाडा नहीं बांध सकी …!" खांटी भाई थोड़ा कंफ्यूज हो गए बोले "…देखिये पैजामे का नाडा बांधना और उपाय करना दोनों अलग-अलग चीजें हैं …!" मैंने उनसे टिपण्णी करते हुए पूछा "…क्यों आप लोग वाजपेयी जी का भी एहसान भी नहीं मानेंगे … ?" उन्होंने पलट कर मुझसे पूछा "…किस बात का … " मैंने कहा "…उन्ही की बदौलत नाडा न बांध पाने के बावजूद आपका पैजामा अभी तक सरका नहीं … चोरी और सीना जोरी भी शान से करते रहे…" खांटी भाई ने कहा "…प्याज इतना बेरहम उन्हीं के बदौलत है…" मैंने पलटकर सवाल किया "…तो क्या इसीलिए आप खांटी भाई लोग हराम का वोट खरीदने के चक्कर में हैं…?" खांटी भाई थोड़ा उखड गए बोले "…आप लोगों को तो भारत की तरक्की देखी नहीं जाती …" मैंने पूछा "…खांटी भाई कांग्रेसी लोगों की तरक्की ही भारत की तरक्की है शायद …" खांटी भाई बोले "…आप देखिये खुशहाली बढी है …" मैंने सवाल दागा "…फिर छछून्दरों को भी क्या परेशानी हो गई भले-चंगे थे वो…?" खांटी भाई झल्लाते हुए बोले "…घबरईये नहीं सरकार उपाय कर रही है…" मैंने भी झल्लाते हुए कहा "…अपने पैजामे का नाडा तो बांध ही नहीं पा रहे हैं चले हैं उपाय करने…जो अपनी इज्जत ही नहीं बचा पा रहा उसका हर प्रयास दूसरों की इज्जत और जान के लिए खतरा ही होता है …" खांटी भाई कुछ बोले बगैर उठकर कहीं चले गए, मुझे लगा जल्दी से जल्दी वहां से फुट लेने में ही भलाई है … 

Wednesday, 14 August 2013

शोर सबसे अधिक चोर ही मचाते हैं ठीक उसी तरह जिस तरह समय-समय पर दिग्विजय सिंह शोर मचाते रहते हैं। इसके पीछे उन चोरों की क्या मानसिकता रहती है ये हर किसी को पता है कि कोई उनपर शक न करे और ध्यान भटकाया जा सके। अभी बहुत दिन नहीं बीते छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सली हमले के एक सप्ताह बाद ही दिग्विजय सिंह ने अपनी जाँच रिपोर्ट जारी करते हुए धमतरी के भरी सभा में हमले के पीछे भाजपा को दोषी ठहराने का प्रयास किया था। जब एनआईए की रिपोर्ट उस हमले के पीछे कांग्रेसी ही निकले थे। याद कीजिये उसके करीब 1 महीने के बाद दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था कि आरएसएस बम बनाना सिखाती है उसके बाद उनका बयान कि बीजेपी दंगे करवाना चाहती है और आश्चर्यजनक रूप से पहले मेरठ में फिर कुछ दिनों बाद ईद के दिन जम्मू के किश्तवाड़ में हिन्दू विरोधी दंगे भड़क उठते हैं। क्या आपको "चोर का शोर" सुनाई दे रहा है ? क्या ये आश्चर्यजनक नहीं है कि बकलोल युवराज सहित अन्य टोपोरी छाप सेकुलर भयानक रूप से शांत हैं मेरठ और किश्तवाड़ दंगों पर ?? ऐसा ही ध्यान भटकाऊ शोर दिग्विजय सिंह ने 26/11 के बाद वीरगति प्राप्त पुलिस ऑफिसर हेमंत करकरे के सन्दर्भ में भी मचाया था। बटाला हाउस मुठभेंड़ पर भी दिग्विजय सिंह ने भयानक शोर मचाया था अन्य और भी ऐसे ही कांड हैं जिन पर दिग्विजय सिंह चोर की भांति शोर मचाते रहे हैं। उनका इंटेलिजेंस मोसाद और सीआईए से भी तेज काम करता है जो आधिकारिक जांच रिपोर्ट से भी काफी पहले आ जाती है। अभी हाल ही में बोधगया सीरियल एलपीजी गैस ब्लास्ट पर भी उनकी रिपोर्ट जांच एजेंसियों की रिपोर्ट से काफी पहले आ गयी और उन्होंने घोषित कर डाला कि उसमे गुजरात का हाथ है। उसकी आधिकारिक जाँच का हस्र हुआ किसी को पता नहीं। वैसे भी वो आश्चर्यजनक रूप से सभी कांडों पर वो शोर नहीं मचाते जैसे उन्होंने कभी भी शोर मचाते हुए नहीं कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को ट्रेनिंग आरएसएस दे रही है, वहां पर चल रहे बम विस्फोटों के पीछे भी आरएसएस का हाथ है, मिस्र में बड़े पैमाने पर वहां की जनता इस्लाम के ही खिलाफ होती जा रही है उसके पीछे भी आरएसएस और बीजेपी का हाथ है,  पाकिस्तान द्वारा सीमा पर किये जा रहे युद्धविराम का बार-बार उल्लंघन के पीछे आरएसएस का हाथ है या चीन की बेहूदगी के पीछे भी उन्हें आरएसएस का हाथ नहीं दिखता। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से लगभग हर हिन्दू विरोधी दंगों के पीछे महीनो पहले उन्हें वो जानकारी पता नहीं किस दिव्य ज्ञान से मिल जाती है जिसकी भनक आईबी और एलआईयू को भी नहीं लगती। ये बहुत गम्भ्रीर विषय है इसकी न्यायिक जाँच होनी चाहिए कि वो हर दंगों या विस्फोट से पहले चोरों की तरह शोर क्यों मचाना शुरू कर देते हैं ?? क्या शोर से उनकी ये मंशा नहीं जाहिर नहीं होती कि किसी भी प्रकार से चाहते हैं कि लोग दंगों के पीछे की सच्चाई न जान सकें जैसा कि किश्तवाड़ दंगों के सन्दर्भ में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है जिसकी भूमिका वो महीनो पहले से बनाते चले आ रहे थे ! वैसे भी जब कभी इनके भौकने का शोर सुनाई देने लगे तब समझ लीजिये कि जल्दी ही जरूर कोई न कोई भयानक दंगा या हिन्दू विरोधी कांड होने वाला है और जांच एजेंसियों को इनके और इनकी पार्टी के खिलाफ जाँच शुरू कर देनी चाहिए। मेरा पूरा विश्वास है चौंकाने वाले तथ्य जाँच एजेंसियों को मिलेंगे …  

Saturday, 10 August 2013

चूहे के बिल में हाथ डाल कर चूहा खोजने वालों के लिए खुशखबरी का ये मतलब बिलकुल नहीं कि चूहा मिल ही गया, खुशखबरी का मतलब ये है कि खुद चूहा बिल्ली की सवारी करता फिर रहा है। लेकिन मजाल क्या कि बिल्ली उस पर झपट्टा मार कर हज करने चल दे। वैसे भले ही इस्लाम में सब्सिडी (हराम) के पैसे हज करना गुनाह हो लेकिन फिर भी …पैसा तो पैसा है चाहे किसी घोटाला छाप डकैती से आवे या हराम से। इधर 65 वर्षों से जिस तरह कांग्रेस ने देश में उल्टी गंगा बहा रखी है, ऐसा नजारा देख कर आश्चर्य नहीं होता उलटे नगाड़ा बजाने वाले बहुत मिल जाते हैं। खांटी भाईयों के जीजा जी भले ही बिल्ली की सवारी सीना तान के कर लें लेकिन बिल्ली तो बिल्ली है। लेकिन लोग-बाग बताते हैं बिल्ली शाकाहारी है लिहाजा क्लीन चिट मिल गयी मैंने इस पर एक खांटी भाई से पूछा तो कहने लगे "…कांग्रेस ने ही स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी …" इस पर मैंने उनसे पूछा "…अच्छा तो बताएये कि स्वतंत्रता की लड़ाई में कितने कांग्रेसियों को फांसी हुई …?" उन्होंने उत्तर देते हुए कहा "…ठीक है फांसी भले न हुई हो जेल तो हुई ही …" मैंने कहा "…अधिकांश खांटी भाई लोग तो जेल कसाब और अफजल गोरु की तरह बिरयानी खाने ही जाते थे …" इस पर उन्होंने कड़ाई से जवाब दिया "… आपका ये आरोप झूठा है… " मैंने कहा "…जी नहीं झूठा बिल्कुल ही नहीं है उसी परंपरा का ही निर्वहन आज भी आप लोग हर स्तर पर जेल के अन्दर और जेल के बाहर भी कर रहे है …" उन्होंने आश्चर्य से पूछा "…क्या मतलब है आपका … ?" मैंने कहा "…आपके जीजा जी को नोटों की बिरयानी कौन खिला रहा है …?" गुस्से में उखड़ते हुए उन्होंने मुझसे पूछा "… आपका मतलब कि हमारी पार्टी ऐसा कर रही है …?" मैंने उनसे कहा "…आपके हिसाब से आजादी की लड़ाई तो भाजपा ने लड़ी नहीं सो बिरयानी तो वो खिला नहीं सकते …!" खांटी भाई ने मुझसे पूछा "…आपका मतलब जेल में सबको बिरयानी मिलती है …?" मैंने कहा "…सबको तो नहीं लेकिन कुछ ख़ास किस्म के लोगों को तो मिलती ही है अन्दर भी बहार भी…" खांटी भाई बोले "…आपके कहने का मतलब मै समझा नहीं …" मैंने उनको समझाते हुए कहा "…वैसे खाद्य सुरक्षा बिल तो उन्ही लोगों के लिए है जो आपकी दृष्टि में भूखे हैं…" खांटी भाई बोले "… हाँ बिलकुल उन्ही लोगों के लिए है …" मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "…आपके जीजा जी की कंपनी का अकाउंट भी भूखा था उसमे केवल 6000 रुपये थे जो केवल साल भर में ही बढ़कर 53 करोड़ हो गए…" खांटी भाई बोले "…इससे क्या साबित होता है …?" मैंने उनको उत्तर देते हुए कहा "…क्यों फ़ूड सिक्युरिटी बिल के पास होने से पहले उसका प्रोटोटाइप नहीं है ये …?" खांटी भाई बोले "…आप लोग जिस राजनीति से प्रेरित हैं वो सबको पता है …" मैंने कड़े हो कर उनसे पूछा "…जेल के भीतर सरकारी दामाद लोगों को और जेल के बाहर अपने दामादों को बिरयानी खिलाना ये कौन सी राजनीतिक प्रेरणा है …?" खांटी भाई बोले "…हम लोगों ने हमेशा स्वस्थ राजनीति की है …" मैंने उनसे पूछा "…अब तो देश स्वतंत्र है लिहाजा देश का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए घोटाला छाप डकैती तो अब आतंकवाद की श्रेणी में रखा ही नहीं जाएगा …?" खांटी भाई ने बड़े आत्मविश्वास से उत्तर देते हुए कहा "…घोटाले और आतंकवाद में जमीन आसमान का अंतर है और हमारी सरकार पूरी संजीदा है इसपर …" मैंने भी उसी टोन में उत्तर देते हुए कहा "...हाँ भले ही भ्रष्टाचार के काले धन से आतंकवाद प्रायोजित किया जाता रहा हो ..." खांटी भाई कुछ बोल नहीं रहे थे तो मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "…आपकी सरकार संजीदा है संभवतः इसीलिए बिल्ली भी शाकाहारी बन कर घूम रही है …!"  मैंने उनको धन्यवाद कहा और नमस्कार कर के विदा लिया।   

Thursday, 8 August 2013

अभी कुछ दिनों पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने बिलकुल सही कहा कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) ने देश का कबाड़ा कर दिया। आरएसएस सरसंघ चालक माननीय मोहन भगवत ने उनका समर्थन भी किया। माननीय उच्चतम न्यायलय ने 4 जुलाई, 2013 को महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय के विषय में अपना निर्णय देते हुए चिंता जताई थी कि पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ने के पश्चात भी नैतिक व्यवहार में पतन क्यों होता जा रहा है ? इसका सीधा कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी )। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण हम भारतीयों की मानसिकता कितनी गिरेगी , किस स्तर तक हम मूर्ख बनेंगे इसका अनुमान लगा पाना कम से कम अब तो उतना कठिन नहीं लगता। मूर्खता का आलम ये है कि इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण संस्कारों की तो बात छोड़ दीजिये सामान्य अनुभूतियों पर भी जबरदस्त खतरा है। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले इस स्तर तक मूर्ख हो चुके हैं कि अब कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज के स्नातक पठ्यक्रम में 50 अंकों का "लव कोर्स" चलाया जाएगा। "मूर्ख ही दुष्ट होता है" क्योंकि मूर्खता के कारण "उद्देश्य की प्रक्रिया" उसे समझ में ही नहीं आती जिसके कारण वो उद्देश्य के निमित्त उटपटांग और खतरनाक दुष्टता करता है। अगर मूर्ख बनने की यही रफ़्तार रही तो निश्चित रूप से वो दिन दूर नहीं जब जूता-मोजा पहनने, कपड़े खोलना - पहनना आदि भी कोर्स के रूप में पढाया जाएगा। क्या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफ़ेसर ये बताएँगे को पशु बिना म्लेच्छपना के प्रेम के सन्दर्भ में म्लेच्छों से कहीं अधिक बुद्धिमान कैसे हैं? आखिर ये मूर्ख मलेच्छ प्रोफ़ेसर साबित क्या करना चाहते हैं ? क्या वो सभी को अपने जैसा ही मूर्ख और मलेच्छ बनाना चाहते हैं ?

लगभग 4 वर्ष पूर्व नई दिल्ली स्थित "राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसन्धान केंद्र" ने भाषा और बुद्धिमत्ता पर एक प्रयोग किया, उन्होंने कुछ  छात्रों को लिया और एमआरआई मशीन में लिटा कर पहले उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पढ़ने को कहा गया तो ये पाया गया कि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी ) पढ़ने के दौरान मस्तिष्क के मात्र बाएं भाग का बहुत थोड़ा सा भाग ही सक्रिय था लेकिन जब उन्हें देवभाषा हिंदी पढ़ने को कहा गया तो परिणाम चौकाने वाले थे पूरा का पूरा मस्तिष्क 100 प्रतिशत तक सक्रिय हो गया। यह प्रयोग सामान रूप से सभी प्रतिभागियों किया गया और सामान परिणाम थे। परिणाम के अर्थ ये बिलकुल स्पष्ट हो गया कि हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोल कर अपने मस्तिष्क का 10 प्रतिशत से भी बहुत कम उपयोग कर पाते हैं अर्थात इस बोली में हम निरे मूर्ख हैं जिसका दुश्प्रभाव आज भारत के प्रत्येक क्षेत्र में दिख रहा है हर ओर गिरावट ही गिरावट दिख रही है जिसका परिणाम है अपराध, निकृष्टता, संस्कारों का भयानक लोप, भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार आदि। उपरोक्त प्रयोग से ये सिद्ध होता है कि मातृभाषा में किसी भी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता 100 प्रतिशत तक होती है इसीलिए हर विकसित देश अपनी मातृभाषा में ही विकसित हुआ है न कि म्लेच्छ बोली में। वैसे भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) अंतर्राष्ट्रीय बोली नहीं है ये मात्र 12 देशों में बोली जाती है वो भी उनमे जो म्लेच्छों के पराधीन थे स्वयं "संयुक्त राष्ट्र संघ" भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में काम नहीं करता। "संयुक्त राष्ट्र संघ" की आधिकारिक भाषा फ्रेंच है। और तो और पूरे ब्रिटेन में भी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोली जाती।

जीवन-संघर्ष में जहाँ हमें आगे निकलने के कुछ अतिरिक्त मानसिक क्षमता की महती आवश्यकता होती है हम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति मनोग्रस्त बन कर मूर्ख बन्दर की भांति अमेरिका और अन्य विकसित देशों का नक़ल कर रहे हैं। हमारी लगभग सभी व्यासायिक शिक्षा म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में है ये तो ऐसा ही है किसी का पैर काट दीजिये और कहिये कि ओलम्पिक के रेस में स्वर्ण पदक जीत कर दिखाए। अभी कुछ वर्ष पहले "संयुक्त राष्ट्र संघ" ने अपने एक रिपोर्ट में कहा था भारत के 97 प्रतिशत से अधिक प्रोफेशनल नकारा हैं किसी काम लायक नहीं हैं आईआईएम, एम्स, आईआईटी जैसी संस्थाएं भी इसका अपवाद नहीं हैं। मुंबई के डब्बा वाले और धोबियों के प्रदाई तंत्र का प्रबंधन इतना विकसित है कि हार्वर्ड और कैम्ब्रिज के लोग उस पर शोध के लिए आते हैं। उन डब्बा वाले और धोबी जिनकी अधिकतम शिक्षा कक्षा 7 है, आईआईएम के म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले मूर्ख प्रोफेसरों से भी कहीं अधिक बुद्धिमान और सशक्त हैं। ये जादू है मातृभाषा का और यह तब तक ही है जब तक वो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) से मुक्त हैं जिस दिन उन्हें म्लेच्छ बोली सिखा दी जाएगी ये जादू समाप्त हो जाएगा। अक्सर समाचार पत्रों में ये पढ़ने को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है। वैसे भी जब तक इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रकोप नहीं था तब तक तो कुछ वैज्ञानिक पैदा भी हुए लेकिन जैसे-जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ा है भारत से वैज्ञानिक तो विलुप्त ही हो चुके हैं 125 करोड़ की जनसँख्या वाले देश में एक भी नोबेल पुरस्कार का न आना ये सिद्ध करता है इस म्लेच्छ बोली से हम भारतीय बिलकुल मूर्ख बन चुके हैं हमारे पास बुद्धि बची ही नहीं है। जबकि हर वर्ष हजारों लोगों को स्वर्ण पदक रेवड़ी की भांति बांटी जाती है ये ठीक वैसा ही है जैसे एक मूर्ख दुसरे मूर्ख के मूर्खता की परीक्षा ले रहा होता है।वैसे भी जो हमारा परीक्षा लेने का तंत्र है उससे किसी भी स्तर पर किसी के बुद्धिमत्ता की परीक्षा ली ही नहीं जा सकती। भारतीय उद्योग जगत को यदि सबसे आगे निकलना है तो निश्चित रूप से उन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का त्याग कर पूर्ण पूर्ण बुद्धिमत्तायुक्त सेवा पर ध्यान देना चाहिए।

भारत की ब्यूरोक्रेसी म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की दीवानी है परिणाम किसी भी सफल नीति का न बन पाना। राष्ट्रीय हाहाकार की इस स्थिति को रुपये की गिरते स्तर को देख कर एक अँधा भी सरलता से अनुमान लगा सकता है कि देश म्लेच्छ बोली बोलने वाले मूर्खों के हाथ में है। एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है "भारत सर्वदा युद्ध का मैदान जीतता है किन्तु टेबल पर हार जाता है" बिलकुल सटीक कहावत है इसके पीछे कारण ये है कि युद्ध वो लड़ते हैं जो मातृभाषा (देवभाषा) बोलते हैं किन्तु टेबल पर म्लेच्छ बोली बोलने वाली मूर्ख ब्यूरोक्रेसी बैठती है जो सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं करती। धर्म के दस लक्षण हमारे शास्त्रों में बताए गए हैं उनका पालन सिर्फ बुद्धिमान और वीर ही कर सकते हैं मूर्ख नहीं, मूर्ख मात्र अपराधी हो सकता है अनाचारी हो सकता है दुराचारी हो सकता है या भ्रष्टाचारी हो सकता है। धर्म से दूर होने का सबसे महत्वपूर्ण कारणों में ये म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) भी है कारण मूर्खता ।

भाषा और बुद्धिमत्ता पर गंभीर कार्य करने वाले मनोवैज्ञानिक बेंजामिन होर्फ जिनके कार्य को "होर्फ लिग्विस्टिक हाइपोथिसिस" के नाम से जाना जाता है, में कहा है कि मातृभाषा ही हमें परिवेश को समझने और अनुभूति करने हेतु मंच का निर्माण करती है और मातृभाषा ही हमारे सोचने के तरीके को निर्धारित करती है जिसका सीधा सम्बन्ध बुद्धिमत्ता से होता है। लेकिन जब हम उसमे किसी विदेशी भाषा को जबरदस्ती घुसाने का प्रयास करते हैं तो वो मंच बुरी तरह प्रभावित होता है जिससे परिवेश के प्रति समझ और अनुभव करने की प्रवृत्ति नष्ट होने लगती है, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप उसका अनुवाद कितनी तेजी से कर लेते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मातृभाषा का जबदस्त पक्ष लेते हुए कहा कि 14 वर्षों तक बच्चों को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे उनके सीखने की प्रवृत्ति पूरी तरह 100 प्रतिशत सक्रिय रहे। मातृभाषा माँ होती है जिसका कोई विकल्प नहीं, जैसे माँ अपने प्यार और स्नेह से बच्चों को सशक्त और वीर बनाती है वैसे ही मातृभाषा भी व्यक्ति उत्तरोत्तर मानसिक रूप से सशक्त और बुद्धिमान बनाती है। यही कारण है म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण गीतकारों को गीत नहीं मिल रहा है, कहानीकारों को कहानी नहीं मिल रही, संगीतकारों को संगीत नहीं मिल रही। स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि एक वेश्या और संस्कारित नारी अंतर करना भी कठिन होता जा रहा है सन्नी लीओन का उदहारण सबके सामने है इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिन्हें प्रचंड उदहारण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

प्रख्यात रूसी सिद्धांतकार गेंन्नारी मारिको ने अपनी पुस्तक "वैज्ञानिक और तकनीकि क्रांति क्या है" में लिखा है "साधन अपने आप सार्वजानिक संक्रियाओं को प्रभावित नहीं करते उनकी परिवर्तनकारी क्षमता तब सामने आती है जब वे व्यक्ति की इन्द्रियों के साथ जुड़े होते हैं" विदेशियत (म्लेछ्पना) या विदेशी बोली हमें परिवेश को इन्द्रियों से पूरी तरह सहसम्बन्धित होने में बाधा खड़ी करती है। संसाधनों का उपयोग सीधे-सीधे बुद्धिमत्ता का प्रश्न होता है ठीक वैसे ही जैसे बन्दर के हाथ में तलवार। हम जितने अधिक बुद्धिमान होंगे उतना बेहतर तरीके और मौलिकता से हम संसाधनों का उपयोग करेंगे। आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना के कारण भारत में संसाधनों की क्या स्थिति है बिलकुल सपष्ट है।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के सन्दर्भ में मनोवौज्ञानिक तथ्य तो और भी भयानक हैं "किसी भी सन्दर्भ में बिना तार्किक आलोचना के आधार के दूसरे संस्कृति की अत्यंत प्रशंसा तथा अनुपालन तथा एक संस्कृति को , अवास्तविक, रूढ़िबद्ध और विदेशी गुणवत्ता का बताया जाता है "(गाइडो बोलाफी. डिक्शनरी ऑफ रेस, एथनिसिटी एंड कल्चर. सेज प्रकाशन लिमिटेड, 2003. पीपी. 332) मानसिक बीमारी है जिसे "चिंता विकृति" में वर्गीकृत किया जाता है।  "डिक्शनरी ऑफ़ साइकोलॉजी" ये भी बताती है कि अनावश्यक रूप से या प्रभाव ज़माने के लिए भी म्लेच्छ्पना या म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का प्रदर्शन करना मानसिक बीमारी (चिंता विकृति) है। इस चिंता विकृति के कारण व्यक्ति की बुद्धिमत्ता लगभग समाप्त हो जाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है, कई प्रकार की शारीरिक बीमारिओं के घर कर जाने सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। यही कारण है कि जैसे - जैसे म्लेच्छ्पना बढ़ रहा है बीमारियाँ भी बढ़ रही है मजे की बात ये कि म्लेच्छ बोली वाले चिकित्सक भी भयानक रूप से इसकी चपेट में हैं। कोई भी म्लेच्छ बोली वाला चिकित्सक न तो शारीरिक रूप से स्वस्थ है और न ही मानसिक रूप से।

ये हमारा परम सौभाग्य है हमारे पास संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा है जो मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि विकास के लिए भी सर्वोत्तम तो है ही साथ ही हर स्तर चाहे वो मानवीय हो या यांत्रिक, पर अतिउपयोगी है किन्तु मूर्खता के कारण हमारा ध्यान उस पर जा ही नहीं रहा। वहीं नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स के नेतृत्व में 1895 से ही के गहन शोध के उपरांत अमेरिका ने अपने युवा पीढी को संस्कृत में पारंगत बनाने की ठान ली है संस्कृत अब नासा की आधिकारिक भाषा ही बनने नहीं जा रही बल्कि बड़े पैमाने पर संस्कृत माध्यम में स्कूल भी खोलने जा रहा है। पता नहीं ये सौभाग्य भारत में कब आएगा।

सन्देश और अर्थ बिलकुल स्पष्ट है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) और म्लेच्छ्पना (अंग्रेजियत) का प्रदर्शन करे वो न सिर्फ मूर्ख है बल्कि मानसिक रोगी भी है जिसके अपराधिक और विनाशकारी होने सम्भावना बहुत ज्यादा रहती है।

Saturday, 3 August 2013

इटैलियन सरोगेट मदर

कांग्रेस के सन्दर्भ में ही कांग्रेस की इटैलियन सरोगेट मदर ने निलंबित आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल का पक्ष लेते हुए दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को पत्र लिखा है जो सबको पता है। क्या लिखा है पता नहीं लेकिन लिखा है जरूर। आखों पर पट्टी बांध कर हाथी को छू कर उसे को परिभाषित करने वाले खांटी भाई कांग्रेसियों ने धर्मनिरपेक्षता का बुर्का मुलायम सिंह यादव एंड कंपनी से  छीनने की पूरी - पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इटैलियन सरोगेट मदर के बिना ऐसा करना यदि संभव हो जाए तो क़यामत नहीं आ जाएगी ? लिहाजा दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को पीछे से गुदराना बहुत जरूरी था। दुर्दांत अंडरएचिएवर अर्थशास्त्री के पास अगर इतनी बुद्धि और संवेदनशीलता होती तो विश्वास कीजिये तीन चौथाई खांटी भाई कांग्रेसी लोग मय मुलायम सिंह एंड कंपनी निश्चित रूप से जेल में होते। खैर ये तो यूपी की राजनीति ऐसी है कि कुछ कहने या लिखने का भी मन नहीं करता लेकिन फिर भी लोग बताते हैं दुर्गा शक्ति के निलंबन से एक तीर से दो निशाने साधे गए। नरेन्द्र भाटी साहब को प्रियदर्शिनी बना के सामने खड़ा कर दिया गया है और भीतर से बुर्का - बुर्काव्वल का गन्दा खेल चल रहा है। मामला तो सीधा सा यही है कि रघुराज प्रताप सिंह को तोते ने क्लीन चिट दे दी वो रमजान के महीने में तो दिवंगत डीएसपी जियाउल हक विधवा जिनको अपने दिवंगत पति की कीमत लगाने और उसे इनकैश कराने की ही फिकर हमेशा से रही है, ने जब नाराजगी का नाटक खेला है तो उसपर कुछ न कुछ तो करना ही था। आखिर धर्मनिरपेक्षता का बुर्का ही खतरे में पड़ गया था। खनन माफियागिरी का मुद्दा उठा कर एक तरह से मुलायम सिंह एंड कंपनी खुद को कांग्रेसी बुर्के में ही दिखाना चाहती है लेकिन इटैलियन सरोगेट मदर को ये बर्दाश्त नहीं लिहाजा उन्होंने ने अपने दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को ही लहका दिया। लेकिन मजा देखिये मुलायम सिंह के लोग भी भी कम नहीं हैं तोता को काबू में करके इटैलियन सरोगेट मदर के पीछे खेमका जी का डंडा लेकर पड़ गए। पता नहीं केजरीवाल किस कोने में बैठ स्टील के गिलास में कांग्रेस का दूध पी कर पहलवानी की प्रेक्टिस कर रहे हैं। कोई मुझे बता रहा था कि दरअसल उनके काग्रेसी दूध के गिलास में एक साथ कई मक्खियां पड़ गईं तो वो कांग्रेसी दूध की सफाई झाड़ू से कर रहे थे। खैर इस उघटापैंची और बुर्का-बुर्काव्वल के छीना-झपटी के खेल को बहुत दूर तक कैसे लेकर जाया जाए इसकी चिंता जितनी कांग्रेस को है उससे कही ज्यादा चिंता मुलायम सिंह एंड कंपनी को है क्यों कि उनकी दृष्टि में मीडिया वाले अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं बार-बार यूपी में बीजेपी को नंबर एक पर दिखा दे रहे हैं। इसी बीच उनके ही लोग जब दुर्गा शक्ति नागपाल के मुद्दे पर अपने मुँह अपना अंगूठा डालते दिखे तो तो खुद मुलायम सिंह को अपना स्टैंड लेना ही पड़ा इससे क्या फर्क पड़ता है कि इटैलियन सरोगेट मदर अपने दुर्दांत अंडरएचीवर अर्थशास्त्री को लहकाती हैं या खुद उनका बेटा हिंडन नदी में डुबकी लगाने इसलिए इनकार कर दे कि वो बहुत मनहूस क्षेत्र है।     

Monday, 29 July 2013

सेन साहब

इस उमस भरी गर्मी में शशि थरूर के कैटल क्लास जिसे उनकी पार्टी बिना गुठली का आम आदमी समझती है, का पसीना छूटा जा रहा है। वो तो खैर कुक्कुरमुत्ता-पुत्र (पाटलीपुत्र की तर्ज पर) बने घूम रहे हैं लेकिन उनके ही लोग बताते हैं कि उनकी पार्टी का गर्मी के मारे कैटल क्लास से कहीं ज्यादा बुरा हाल है। यही कारण है कि ठन्डे देश के रहने वाले खानाबदोश अर्थशास्त्री जो बकलोल ददुआ छाप ही लगते हैं, बुलाया है। अब बेचारे उनसे कहा गया कि इस उमस भरी गर्मी में गर्मी कम करने का ठोस उपाय करें अब ददुआ छाप नोबेल पुरस्कार विजेता पकड़ लाए कुत्ता और कुत्ते की पूंछ पकड़ कर उसी से हवा झलने लगे, पूरी की पूरी कांग्रेस उनके प्रयास से ही हवा खा रही है फिर भी पार्टी है कि ठंडी होने का नाम नहीं ले रही। बड़ी परेशानी है इतने प्रयास के बाद भी गर्मी बढ़ती ही जा रही है।  मुसीबत तो तब और खड़ी हो गयी जब उस गर्मी की आंच खुद ददुआ छाप अर्थशास्त्री पर पड़ने लगी बहुत-बहुत कल्याणकारी बौछार उस कुत्ते के माध्यम से करने का प्रयास किया लेकिन सब पश्चिम बंगाल की तर्ज पर गाल बजाने जैसा ही था सो नया कल्याणकारी बौछार करने के लिए उस कुत्ते को फिर तैयार किया गया अब बगल के बिहार की सिंचाई हो रही है लेकिन गर्मी है कि फिर भी कम नहीं होने का नाम ही नहीं ले रही। कांग्रेसी भाई लोग बैठना तो कहीं और चाहते थे लेकिन मजबूरी में बैठना पड़ा वहां जहाँ वो किसी भी कीमत जाना ही नहीं चाहते थे। ददुआ छाप अर्थशास्त्री के आने के पहले से ही यह सब हो रहा है या उनके आने के बाद पता नहीं लेकिन पूरी की पूरी कांग्रेस नरेन्द्र भाई मोदी के अंगीठी पर बैठ कर बकलोल बबुआ की तरह अंगूठा चूस रही है। कुत्ते की पूंछ से कांग्रेस पार्टी के लिए हवा झलने वाले ददुआ छाप अर्थशास्त्री ने पूछा कि तैयारी क्यों नहीं करते तो उसी बकलोल बबुआ के आदेश पर पूरी कांग्रेस ने दोहराया कि तैयारी तो कर रहे हैं पूरी कांग्रेस पानी, दूध, चीनी, चायपत्ती और भी बहुत कुछ घोंट कर (सभी लोग इसे भी घोंटाला भी कह रहे हैं ) नरेन्द्र भाई मोदी के अंगीठी पर बैठ गयी है। सभी को ये पूरी उम्मीद है पेट में ही चाय जरूर बन जाएगी क्योंकि बकलोल बबुआ का डरावना आदेश है सो अग्नि देवता को भी अपना नियम बदलना पड़ेगा। अब पता नहीं अग्नि देवता अपना नियम बदलेंगे, नहीं बदलेंगे या फिर पता नहीं क्या करेंगे लेकिन ये तो तय है कि कांग्रेसी घपले के लिए पिछली बार की तरह इस बार कोई नियम नहीं बदलने वाला सो  ददुआ बिरादरी के अर्थशास्त्री के भी पेट में ही चाय जरूर बन जाएगी। बड़ी उम्मीद है कुत्ते की पूँछ की हवा से बकलोल बबुआ और उनकी मम्मी के पक्ष में हवा बनेगी, लहर चलेगी और न जाने क्या - क्या लेकिन ऐसा कुछ होना तो दूर उलटे और हवा खराब हो गई नरेन्द्र भाई मोदी के लहर में ऐसा फंसे हैं कि येन - सेन - प्रकारणेन जान बचाने के लाले पड़ने लगे हैं।  भारत रत्न वैसे तो योग्य लोगों को ही मिलना चाहिए लकिन ठीक है ये एक ऐसा रतन है जिसके बारे में दावा किया जाता रहा है कि ये कुत्ते की पूँछ हिलाकर तूफ़ान खड़ा कर सकता है। देखते रहिये ये मेरा दावा है कि मोदी के अंगीठी पर बैठी बुर्कानशीं कांग्रेस के पेट चाय जरूर खौलेगी साथ ही कुत्ते की पूंछ से काग्रेस को हवा देने वाले ददुआ छाप नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री के पेट में भी … पता नहीं उनके पेट राजनीति का कूदता चूहा जिन्दा बचेगा या नहीं ….

Saturday, 27 July 2013

कैटल क्लास

कुक्कुरमुत्ता ( मशरूम ) खा कर खुद को कैटल क्लास से ऊपर उड़ने वाले शशि थरूर के पार्टी की इकॉनमी का हाल ठीक वैसे ही है जैसे किसी बकलोल के हाथ सांड़ का पगहा पकड़ा दिया जाए। वैसे सांड़ के सींग भी काफी बड़े - बड़े है लिहाजा डर तो स्वाभविक ही है। वैसे तो दो बकलोल है जो सांड़ को सँभालने की कोशिश कर रहे है एक बकलोल "बबुआ बिरादरी" का है जो अंतिम बार स्कूल कब गया था किसी को याद नहीं बताते हैं कि उस समय मिड-डे-मील नहीं मिलता था लिहाजा स्कूल जाने का प्रश्न ही नहीं उठता, दूसरा बकलोल "ददुआ बिरादरी" का है जिसके बारे में कहा जाता है कि वो बेचारे स्कूल में कभी सकून से रहे ही नहीं। उघटापैंची वाला हिसाब किताब हमेशा से रहा है उनका इसीलिए जब बकलोल ददुआ को नरसिंघा जी राव ले के आए तो इनके हल्के कण्ट्रोल वाला सांड़ ने देश पर घोटाला छाप डकैती फिर शुरू कर दिया फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा यूरिया डकैती, चीनी डकैती, गेहूं डकैती … आदि आदि।  अब "बकलोल ददुआ" फुल फ्लेज़ में कुक्कुरमुत्ता (मशरूम) खा के 9 साल से हैं, इस 9 साल में तो बकलोल ददुआ ने देश को बिलकुल कैटल क्लास बना के रख दिया है। बकलोल बबुआ के मम्मी के नेतृत्व में इनके सांड़ ने जो घोटालों के नाम पर जो डकैती मचाई है उसे तो देख कर बड़े-बड़े अहिसक भी हिंसा पर उतारू हो जाएँ जैसे महाभारत में भगवान् कृष्ण ने प्रतिज्ञा करने बावजूद भीष्म पितामह के विरुद्ध सुदर्शन चक्र उठा लिया था। खैर बात वही है कि कैटल क्लास खाता क्या है, कितना खर्च करता है अपनी खुराकी पर …? वैसे तो सैटेलाइट का जमाना है जो धरती पर खड़े हो कर नहीं दिखत वो अंतरिक्ष से साफ दिख जाता है शायद इसीलिए "बकलोल ददुआ" के सांड़ ने घोटाले के माध्यम से यहाँ भी डकैती डाली कि लोगों को वास्तविकता ही न दिखे कि लोग क्या खाते हैं और उस पर कितना खर्च करते हैं। लेकिन भला हो थरूर जी का जो समाज सेवा के नाम अंतरिक्ष में न जा कर वायुमंडल से ही कम से कम कैटल क्लास का मुद्दा तो उठाया अब "बकलोल बबुआ" और "बकलोल ददुआ" के भेजे में कुछ घुसे तबतो लम्पट का तीर दिल पर लगे।  पता नहीं कैसे लोग इस सनकी सांड़ के घोटाला छाप डकैती के बाद कुछ बचने की उम्मीद करते हैं इसीलिए इस सनकी सांड़ के एक और पगहेदार ने कहा कि 5 रूपया में भी खाना मिलाता है मुझे तो बड़ा अच्छा लगा कि चलो कम से कम लोगो के लिए पार्लियामेंट के कैंटीन में खाने की व्यवस्था हो गयी लेकिन सत्यानाश जाए उसका जिसने नियत का "हवाला" दे दिया और कह दिया मने कैटल तो चरते ही रहते है अब चरने में कुक्कुरमुत्ता (मशरूम) भी मिल सकता है और कुक्कुर की हड्डी भी कई पैसा थोड़े न मांगता है फ़ोकट में चरते है कैटल क्लास वाले। उनको 5 रूपया मिले तो अमीर 35 मिले तो इतना अमीर कि यकीन मानिये वो किसी बोफोर्स, 2जी, कोयला, हेलीकाप्टर आदि के आदर्श घोटाला छाप डकैती के खजाने से कम नहीं, वो तो इतना पैसा देख के ही पगला जाएगा फिर खाएगा क्या …पागल बन के घूमेगा …या खाए बौराए जग या पाए बौराए …। घूमेगा तो सनकी सांड़ फिर उसके पीछे पड़ेगा …जिसको दो-तीन बकलोल बबुआ-ददुआ और … सँभालने की कोशिश करेंगे …तमाशा देखने लायक चीज है क्या ????