Friday, 14 June 2019

बन्दर के हाथ तलवार...

लोककसभा चुनाव 2019 के परिणामों ने भारतीय पत्रकारिता की चूलें ये साबित और स्थापित करते हुए हिला कर रख दीं कि भारतीय पत्रकारिता जगत में विशेषज्ञता नाम की कोई चीज ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि ये तथ्य नया है, वस्तुतः ये तथ्य उतना ही पुराना है जितना भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार। इस तथ्य को भी प्रमुखता से उजागर के रख दिया कि एक डिग्री धारक जब किसी लायक नहीं होता तो मीडिया में घुस जाता है। वैसे भी मीडिया में नालायक लोगों के होने की बात को जनसता से पूर्व संपादक ओम थानवी प्रमुखता से सोशल मीडिया पर स्वीकार भे कर चुके हैं। वो स्वयं को भी इसी श्रेणी में रखते हुए बताया था कि वो कभी भी पत्रकार नहीं बनना चाहते थे बल्कि उनकी हार्दिक इच्छा थी प्रबंधक बनने की। जब वो नहीं बन सके तब वो राजस्थान पत्रिका से अपनी पत्रकारिता शुरू की। उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि देश की पत्रकरिता में ऐसे लोग ही हैं जो किसी लायक नहीं हुए तो पत्रकारिता में जा घुसे। भारतीय पत्रकारिता पूरी तरह वैसी ही है जैसे बन्दर के हाथ तलवार...
ओम थानवी का वक्तव्य पत्रकारिता जगत के उस बजबजाते जघन्य सत्य को अक्षरशः साबित करता है जिसमें आप किसी भी विषय या मुद्दे पर योग्यतापरक प्रस्तुति खोजना तो बहुत दूर की बात है इनकी बेशर्म बेहूदगियों के आगे मूर्खता भी शर्माने लगती है। कोढ़ में खाज ये कि इनके पास किसी भी तरह की कोई काबिलियत नहीं है फिर भी खुद को जबरदस्ती स्वयंभू वो भी अपने मुंह से मीडिया विशेषज्ञ घोषित करने से बाज नहीं आते। मीडिया संस्थानों में भी वही छात्र प्रवेश ले रहे हैं जो किसी लायक नहीं होते। रिपोर्टिंग, एंकरिंग, समाचार वाचन, विश्लेषण आदि सभी कुछ इतना घटिया है कि आपको लगेगा कि ये सब हम पर थोपा जा रहा है। ये सब कुछ वैसा ही होता है जैसे गाँव का कोई नलायक सरे आम ये दावा करता "मैं तो बड़े-बड़े लोगों को चराता हूँ" लिहाजा तुमको मेरी बात माननी ही पड़ेगी।
भारतीय पत्रकारिता के हालात इतने बदतर हैं कि इन अयोग्य बंदरों के हाथ आप कुछ भी थमा दीजिये सब तोड़-फोड़ के बराबर कर देते हैं। ताजा उदहारण के तौर पर सबसे नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चल रही जबरदस्त आंधी को करोड़ों अरबों रुपये खर्च करके भी अनुमान तक नहीं लगा पाए जो एक आम मतदाता चीख-चीख कर तूफ़ान चला रहा था। इनसे तथ्य संकलन और उनका विश्लेषण के उम्मीद की बात करना तो जैसे छंछूदर के सर पर चमेली का तेल वाली बात है । क्या ये लोग बाजार नहीं जाते, लोगो से नहीं मिलते, सोशल मीडिया पर नहीं हैं, लोगो की टिप्पणियां नहीं आतीं ? वो सब कुछ होता है इनके साथ जो मेरे जैसे आम नागरिक के साथ होता है लेकिन नतीजा शून्य बटा अंडा (रवीश कुमार की तर्ज पर) क्यो ? क्योकि किसी लायक नहीं हुए तो पत्रकार बन गए। वही मेरे जैसा मतदाता बिना किसी खर्च के अपनी थोड़ी से बुद्धि के प्रयोग मोदी की तूफ़ान का आकलन चुनाव शुरू होने से पहले ही सटीकता से कर लेता है जिसे एक्सिस माई इंडिया जैसी संस्था अरबों रुपये खर्च करके उस नतीजे पर पहुँच सकी। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इन तथाकथित पत्रकारों ने संसाधनों को पहले कितना बर्बाद किया, कर रहे हैं और शायद आगे भी करेंगे।
अब सोचिये जब ये सब अरबों के माल पर बेहद सामान्य सा आंधी की तरह बहता हुआ जनमत तक नहीं पकड़ सकते तो बेहद जटिल सामाजिक आर्थिक, शैक्षणिक आदि विषयों और मुद्दों का इनके हाथों कैसे कबाड़ा होता है किसी छुपा हुआ नहीं है। भारतीय समाज मूलतः जातिवादी नहीं हाँ मुगलों और फिर अंग्रजों के आने के बाद स्थिति बदतर हुई क्योकि इन्होने ही जातीय भेद को बढ़ावा दिया और बहुत बडी मात्रा में अनुसूचित जातियों का निर्माण किया क्योकि उनलोगों इन म्लेच्छों से जमकर लोहा लिया था लेकिन पराजित हो जाने के बाद इन्ही मुगलों और अंग्रेजों ने प्रतिशोधवश इनसे शौचालय साफ़ करवाए और भी गंदे काम करवाए जिससे सामाजिक विकृति पनपी। लेकिन फिर अब अब वो जातीय भेद तेजी से अपने पराभव की ओर है।
प्रशांत कनौजिया प्रकरण साबित करता है भारतीय पत्रकारिता जगत उन बंदरों की जामात है जो अब हिंसक भी हो चुके हैं। इन मीडिया संस्थानों में क्या पढ़ाया जाता है पाता नहीं लेकिन जो भी इन संस्थानों का उत्पाद है वो समाज के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। इन संस्थानों के समाज में सामाजिक अवसाद और सामाजिक मनोग्रस्ति में तेज़ी से बढ़ोत्तरी होती जा रही है, जिसे बडी आसानी से सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में दिखाई दे रहा है। अज्ञानता और मूर्खता जब ज्ञान का मुलम्मा चढ़ा कर नंगा नाच करती है तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है। भारतीय पत्रकारिता बिरादरी ठीक यही कर रही है। वैसे भी भरतीय समाज इतना सशक्त है कि भरत में तीन विषय पढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है, आदमी को ये समाज ही बहुत शानदार तरीके से सिखा देता है। वो तीन विषय हैं -
1 पत्रकारिता (IIMC etc)
2 प्रबंधन (IIM etc)
3 मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान (Psychiatry & Psychology)
ये तीनो क्षेत्र समाज को विकृत ही नहीं कर रहे हैं बल्कि नष्ट भी कर रहे हैं।

Thursday, 11 April 2019

2019 का तूफान

2019 का तूफान..
2019 लोकसभा चुनाव की स्थिति करीब-करीब एकदम स्पष्ट हो चुकी है जिसमें एनडीए 400 के निकट पहुँचने जा रहा है और भाजपा अकेले 350 के आंकड़े को या तो छू सकती है या फिर उसी के आस-पास रहने की उम्मीद है। पिछले लोकसभा चुनावों में तो कांग्रेस और अन्य दलों ने तो संघर्ष भी किया था लेकिन इस बार तो जैसे हथियार ही डाल दिये हैं। कांग्रेस की हालत ये है कि उसके पास कोई स्टार प्रचारक ही नहीं हैं राहुल गांधी क्या कर रहे हैं और क्या कह रहे हैं खुद उन्हीं को पता नहीं। बाकी दलों की भी स्थिति कमोबेश यही है।
2014 के लोकसभा चुनावों की तुलना इस बार स्थिति थोड़ी देर से स्पष्ट हुई है इसके पीछे कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध जो गठबंधन बना उसमे बहुत अधिक अस्थिरता का होना है जो खुद गठबंधन के लिए बहुत घातक साबित होने जा रहा है। वैसे ये स्थिति न सिर्फ राजनीतिक वातावरण को धूमिल करती है राजनीतिक उग्रता को भी बढ़ाती है जो कि साफ-साफ दिख भी रहा है।
2014 में ऐसा नहीं था। उस समय भाजपा विरोधी चुपचाप एक कोने में जा कर बैठ गए थे। इसीलिए राजनीतिक स्थिति शुरू से स्पष्ट थी और पत्थर पर लिखी इबारत की तरह पढ़ा जा सकता था कि मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा था। ये इबारत 2013 से ही साफ हो गई थी और मैंने 29 मई 2013 को ही बता दिया था कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने जा है। हालांकि उस समय कोई भी मीडिया वाला किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं दे रहा। सिर्फ मैं अकेला था जिसने बताया था कि भाजपा को 280 से 320 सीटें मिल सकती हैं और मिली 282। लेकिन कांग्रेज़ को मैंने 33 सीटें दीं थीं लेकिन 44 मिल गईं थीं। 2015 दिल्ली विधान सभा चुनाव और 2016 के बिहार विधान सभा चुनाव में भी मैंने सटीकता से कहा था नतीजे चौकाने वाले होंगे और हुआ भी वही।
2017 में कोई मीडिया वाला भाजपा को बहुमत नहीं दे रहा था लेकिन मैंने जनवरी 17 में ही बता दिया था की भाजपा को 320 सीटें मिलने जा रही है जो किसी भी मीडिया के सर्वेक्षण की तुलना में सबसे सटीक था। लेकिन गुजरात,कर्नाटक, मणिपुर, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मैंने अपना विश्लेषण के आधार पर कोई भी आकलन प्रस्तुत नहीं कर सका था।
2019 के लोकसभा चुनाव के मतदान का पहला चरण प्रारम्भ हो चुका है और पूरे देश की स्थिति लगभग स्पष्ट हो चुकी है। जैसा माहौल है उसके हिसाब से तो ये बिलकुल स्पष्ट दिख रहा है कि हवा पूरी तरह मोदीमय है। हिन्दी क्षेत्र गुजरात, महाराष्ट्र जिसमे लोकसभा की 289 सीटें हैं, में पूरा मोदी लहर है जिसे साफ-साफ महसूस भी किया जा सकता है यहाँ से एनडीए को 235 से 255 सीटें मिलने जा रही हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमांचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से एनडीए को 23 से 28 मिलती दिख रही हैं। दक्षिण तेलगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल से एनडीए को 45 से 52 सीटें मिल सकती हैं। अब बात करते हैं पूरब और पूर्वोत्तर की तो यहा एनडीए 42 से 48 सीटें जीतता दिख रहा है।
तो राष्ट्रीय परिदृश्य पर एनडीए की संख्या 333 से 387 के बीच रह सकती है । वही कांग्रेस और यूपीए के लिए स्थिति बाद से बदतर होती दिख रही है मतलब अकेले कांग्रेस के लिए 44 के आंकड़े को पार कर पाना बहुत मुश्किल दिख रहा है। कांग्रेस के इसी संख्या के आस पास रहने की उम्मीद है।

Sunday, 7 April 2019

F-16 का मार गिरना, अमेरिकी जान की सांसत...

अजेय माने जाने वाले अमेरिका के 7 पैंटन टैंकों को मामूली से जीप माऊण्टेड रिकॉइललेस गन से आसल उत्ताड में अब्दुल हमीद ने 10 सितंबर 1965 को खिलौनो की तरह फोड़ के रख दिया...उसके बाद अमरीका से किसी भी देश ने आज तक कोई टैंक नहीं खरीदा...अमेरिकी टैंक बाजार हमेशा के लिए खत्म ही हो गया...
अमेरिका के लिए रक्षा उपकरणों में मुख्य रूप से आज जहाज, हेलीकाप्टर और अन्तरिक्ष के सामान ही निर्यात कर पाता है। थल सेना के रक्षा उपकरणों का उसका बाजार तभी से लगभग खत्म ही है। आज अमेरिका की अर्थव्यवस्था दुनियाँ में सबसे बड़ी लगभग 19.5 ट्रिलियन डालर की है जिसमे रक्षा उपकरण निर्यात की हिस्सेदारी अकेले लगभग आधा ट्रिलियन बचा है जो उसकी अर्थव्यवस्था के 2.5% से कुछ ज्यादा है।
अब बात आती है आखिर क्यों अमेरिका को एफ़-16 का गिरना अखर रहा है? इसके पीछे दो कारण हैं पहला रूस से प्रतिस्पर्धा में अमेरिका का बहुत पीछे हो जाना क्योकि ये कोई मामूली बात नहीं है कि 60 के दशक का बाजार से पूरी तरह बाहर हो चुके एक जहाज से अत्याधुनिक और उच्च तकनीक से लैस जहाज को ऐसे मार गिराया जाए जैसे एक कबूतर बाज का शिकार करता है। दूसरा - जब 1965 अमेरिकी पैंटन टैंक भारत के खेमकरण में नष्ट हुए थे तब अमेरिका का पूरा निर्यात जो लगभग 24 अरब डालर का था घट कर लगभग 20 अरब डालर पर आ गया था जो बहुत बड़ा नुकसान था। इसके पीछे कारण ये है रक्षा उपकरणों की तकनीकी बहुत उच्चकोटि की होती है जिसपर पूरा उद्योग निर्भर करता है ।
आज के बाजार में अमेरिका के रक्षा बाजार में सिर्फ एक ही प्रतिद्वंदी नहीं है बल्कि भारत सहित एक दर्जन से अधिक देश हैं। उसके ग्राहक लगातार कम होते जा रहे हैं और तो और सबसे बड़ा खरीदार भारत भी रक्षा निर्यात के बाजार में बड़ा निर्यातक बनने की बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आप शायद आश्चर्य करेंगे कि खुद अमेरिका, ब्रिटेन और इसराईल जैसे देश भी भारत से रक्षा उपकरण खरेदने लगे हैं बावजूद इसके कि अभी इस क्षेत्र में 28 वें पायदान पर है जो चीन से बहुत पीछे है। चीन टॉप 10 के अंदर है।
तो अमेरिका अपनी साख और बाजार बचाने के लिए ही प्रोपागंदा चलाना पड़ा कि पाकिस्तान में सभी 45 F-16 सुरक्षित हैं। याद कीजिये सारे F-16 अमेरिकी सैटेलाईट से इस तरह जुड़े हुए हैं कि इसके इंजनों को वही अमेरिका से ही लॉक किया जा सकता है। सबकुछ ऑनलाइन फिरभी 045 की संख्या गिनने में 34 दिन लग गए ? बात कुछ हजम नहीं हो रही है...गिनती वाला काम में तो 35 सेकेंड भी नहीं लगेंगे जो 24 घंटे अमेरिका की नजर रहते
...जिस तरह अभिनंदन ने बाईसन वाले गुरदेल से F-16 का शिकार किया उससे अमेरिका की न सिर्फ लाक हीड मोर्टिन ही नहीं बल्कि फोकर और बोइंग कंपनियों की साख पर जबर्दस्त बट्टा लगा है। हालांकि इस समय F-21 चल रहा है लिहाजा F-16 पुराना हो चुका है फिर भी इतना भी नहीं कि जितना मिग 21। ये अमेरिका के लिए "कंगाली मेंआंटा गीला" जैसी स्थिति है जिससे उबर पाना अमेरिका के लिए बहुत कठिन है पैंटन टैंक के डरावने अनुभव को देखते हुए।

Wednesday, 27 March 2019


स्वाहाविक प्रवृत्ति और आरोप
'इमोशनल इंजीनियरिंग" के सैद्धान्तिक पक्ष व व्यवहारवाद के कुछ शाश्वत तथ्यों पर एक दृष्टिपात करते हैं -

1 एक आदमी जो जीवन में कभी भी गाली नहीं सुना होगा वो कभी भी किसी को गाली नहीं देगा,
2 व्यक्ति दूसरों को सिर्फ अपने मस्तिष्क और नेत्रों से देखता है लिहाजा उसकी दृष्टि वही होगी जो उसका मस्तिष्क विश्लेषण करके बताएगा,
3 सामान्य अवस्था में आदमी वही उल्टी करता है जो वो उसने खाया होता है,
4 गंदा आदमी दूसरे साफ सुथरे आदमी के बारे में यही सोचता है कि वो आदमी गंदा क्यों नहीं है, वो ये भी नहीं सोच पाता कि वो आदमी इतना साफ-सुथरा कैसे है। वहीं अच्छा आदमी गंदे आदमी के बारे में यही सोचता है आखिर वो साफ-सुथरा क्यों नहीं है, क्या कारण है कि वो इतना गंदा है।

राहुल गांधी मोदी जी पर आरोप लगाते हैं -
1 विजय माल्या, ललित मोदी, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी को भगा दिया गया
क्योकि राजीव गांधी ने भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी एंडरसन को उस समय के भोपाल के तत्कालीन जिलाधिकारी नजीब जंग की मदद से भगाया, कांग्रेस ने बोफोर्स मामले में कुत्ता रोची को सिर्फ भगाया बल्कि उसका खाता भी खुलवा दिया, बहुत लोगों को ये भी पता है कि आतंकवादी दाऊद इब्राहीम भी कांग्रेस के सहयोग से भागा था ऐसे दर्जनों अपराधियों को भगाने के दर्जनों मामले हैं।
2 कि वो विदेश घूमते हैं, 10 लाख का सूट पहनते हैं, उद्योगपतियों के लोन माफ करते हैं आदि आदि
नरेंद्र मोदी सरकारी यात्रा पर होते हैं और वो अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं वो भी इन कांग्रेसियों और उसके पिद्दियों को नहीं पचा कारण एक तो कांग्रेसी युवराज विदेश यात्रा किस लिए करते हैं स्पष्ट है वो किसी सरकारी यात्रा पर नहीं होते, इसके पहले जैसी करतूतें कांग्रेसी प्रधानमंत्री कर चुके हैं वो जगजाहिर है..वैसे भी ये मुद्दे सेकुलर मीडिया की ओर से अधिक उछाले जाते हैं क्योकि हराम की विदेश यात्राएं अब नहीं होतीं...सेकुलर इतने गिर चुके हैं कि प्रधानमंत्री के खाने और कपड़े पर भी बेहूदे आरोप लगाते हुए भी शर्म नहीं आई।
3 जिस तरह से जनेऊ धरण करते हैं तो उन्हें लगता है मामला बन गया लेकिन पता नहीं किस के दिमाग से कांग्रेसी ऐसा सोच भी लेते हैं। श्रीमती बढेरा के लखनऊ प्रदर्शन में भीड़ 100-150 लोगों की भी नहीं थी कुछ तो बता रहे हैं कि उसमे उचकके बहुत अधिक थे और करीब 70 लोगों के मोबाइल चोरी हो गए। ऐसा इसलिए लगता है इनके पूर्वज ऐसी धोखेबाजी करके ही सत्ता पर काबिज हुए। वो गायसुद्दीन गाजी इसका प्रमाण है। गुजरात विधान सभा चुनाव में जो कुछ भी घटा वो जनेऊ के कारण नहीं था।
4 कांग्रेस के सिर्फ लालबहादुर शास्त्री ही इमानदारी की प्रतिमूर्ति थे बाकी सब भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए तो वही सोच रहे हैं।
जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कोई भी ईमानदार कांग्रेसी प्रधानमंत्री नहीं हुआ लिहाजा ईमानदारी में भी इनको भ्रष्टाचार दिखना स्वाभाविक है। एक चोर किसी को भी इममानदार मान ही नहीं सकता। हर जगह से मात खाने के बाद भी यदि राफेल में भ्रष्टाचार कांग्रेस सूंघ रही है तो भ्रष्टाचार उसकी प्रवृत्ति है यहाँ कांग्रेस वही उल्टी कर रही है जो उसने खाया है।
राफेल मामले में चोर को चोरी करने का मौका चौकीदार चोर है का नारा लगवाते हैं मतलब "मैं चोर तो तू भी चोर" वाली कहावत राहुल गांधी अक्षरशः चरितार्थ करते हुए सिर्फ "चोर मचाए शोर" की तर्ज पर शोर मचा रहे हैं। एक गंदा आदमी दूसरे साफ आदमी साफ नहीं कह सकता और यदि वो साफ है तो मौका मिलते ही उसके ऊपर वो कीचड़ जरूर उछालेगा।
अब तो खैर चुनाव का समय शुरू हो चुका है कांग्रेस का "चौकीदार चोर है" "मैं भी चौकीदार" से भोथरा हो गया और राहुल गांधी व श्रेमती बढेरा के भ्रष्टाचार उजागर होने लगे तो ठीक उसके दो दिन बाद 72000 रुपये सालाना देने का शिगूफ़ा छोड़ दिया गया। ये सब कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के बजाय उसका बहुत भारी नुकसान कर सकते हैं ... ।

Tuesday, 12 March 2019

क्या पाकिस्तान के परमाणु बम हैं ? 2

क्या पाकिस्तान के परमाणु बम हैं - 2

 
 

गतांक से आगे
जब 30 मई 1998 के बाद PTV पर डॉ समर मुबारिक ने होस्ट तनवीर इकबाल द्वारा लिए गए साक्षात्कार में कहा “…हमने तो एक बम फोड़े थे लेकिन अल्लाह ने दो के होने के सुबूत दिये…” एक नभकीय वैज्ञानिक द्वारा ऐसा बयान वो भी टीवी पर आश्चर्य होता है। मतलब साफ है डॉ समर मुबारीक को न तो परमाणु बम के बारे में गहराई से पता था और न ही उसके परीक्षण के बारे में। पूरे साक्षात्कार देखने से ये भी लगता है कि जिसने भी वो तथ्य डॉ समीर को दिये शायद उसे भी वो समझ नहीं पाया।
 इसके उलट भारत ने पोखरण 2 में जो भी परीक्षण किए उसका लगभग पूरा आवश्यक विवरण जनसंज्ञान में उपलब्ध है। लेकिन पाकिस्तान कोई विवरण नहीं इसका कारण उस समय पाकिस्तान सरकार द्वारा जनता की संवेदनशीलता बताया गया था। याद कीजिये उस समय भी इसी सुबूत गैंग ने वाजपेयी सरकार द्वारा किए गए परीक्षण को ‘पटाखा फोड़ने” की संज्ञा देते हुए परीक्षण के सुबूत मांग लिए थे।
 पाकिस्तान और भारत का सेकुलर गैंग दोनों भारत के उस शक्तिशाली वर्ग से मनोग्रस्त हैं जिसे किसी भी कीमत पर आत्मसम्मान और शक्ति से भरपूर नहीं देखना चाहते। दरअसल सेकुलर गैंग को इसके लिए कहाँ से और कैसे फायदा होता है ये जानना बहुत मुश्किल नहीं लेकिन 1971 के समय जुल्फ़ीकार आली भुट्टो भारत के नभकीय कार्यक्रम और शक्ति दोनों मनोग्रस्त थे। इसीलिए उन्होने भारत 1000 साल तक लड़ाई लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी थी जो अभी भी अनवरत चल रहा है।
 पाकिस्तान ने भरसक कोशिश की कि परमाणु परीक्षण का पाकिस्तानी मूल के भौतिकी के नोबल पुरस्कार विजेता ‘अब्दुस सलाम’ को समर्पित किया जाए और उसने करने की कोशिश भी की जिससे ये स्थापित हो सके कि पाकिस्तान ने वास्तव अपना पमनु बम विकसित किया है। हालांकि प्रो॰ सलाम की मृत्यु 1996 में ही हो गई थी हालांकि उनका बहुत बड़ा योगदान पाकिस्तानी अन्तरिक्ष कार्यक्रम और पीएईसी की स्थापना में भी था लेकिन कभी भी प्रो॰ सलाम परमणु बम के बारे में स्पष्ट बयान नहीं दिया जिससे ये लगे पाकिस्तान परमाणु बनाने की क्षमता रखता है, यदि ऐसा होता तो कम से कम स्पष्टता तो जरूर होती जैसा कि भारतीय वैज्ञानिक हमेशा रखते रहे हैं।
 मात्र 15 दिन में एक पहाड़ पर 700 से 1000 फीट का गड्ढा खोदना ही असंभव है। अगर पाकिस्तान पहले से ऐसी तैयारी करता तो पकड़ में आ जाता जिससे बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ताजमहल, कुंभकर्ण पृथ्वीराज नाम आदि तक रखने पड़े।
 एक तथ्य को यहाँ बल मिलता है कि चीनी परमाणु परीक्षण साईट “लोप नॉर” जो मंगोलिया और रूस की सीमा के पास है, एक तरफ ठीक वैसी ही है जैसी कि पाकिस्तान की चगाई की पहाड़ियाँ हैं। बहुत मुमकिन है पाकिस्तान के लोग फोटो सेशन के लिए लोप नॉर गए हों। चीन ने परीक्षण संबंधी कुछ तथ्य दे दिये हों जिसे प्रकाशित कर दिया गया। अगर पाकिस्तान के पास परमाणु बम है तो तो बहुत हद तक मुमकिन है चीन से खरीदा गया हो। वैसे चीन ऐसा सिर्फ भारत पर धौंस जमाने के लिए कर सकता है..क्योकि डर तो उसे भी है कहीं उसे खिलाफ न इस्तेमाल हो जाए

Saturday, 9 March 2019

पाकिस्तान के परमाणु बम है ?


जरा याद कीजिये भारत ने जब पाकिस्तान पर 26 फरवरी को बालाकोट शिविर भेदा था उसके पहले पकिस्तानी हुक्मरान प्रतिदिन भारत को धमकी देते थे कि वो परमाणु शक्ति देश हैं उन्होने परमाणु बम ड्राईङ्ग रूम में सजाने के लिए नहीं बनाए हैं बल्कि भारत के खिलाफ इस्तेमाल के लिए बनाए हैं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बालाकोट ध्वस्त होने के बाद अभी तक एक भी ऐसी कोई धमकी पाकिस्तानी हुकमरानों की ओर से नहीं आयी है।
ये ऐसी घटना है जब संदेह विश्वास जैसा होने लगता है कि आखिर पाकिस्तान के पास कौन सी ऐसी जादुई छड़ी आ गई कि 1972 के पोखरण 1 के चार साल बाद ही पाकिस्तान में परमाणु इंजीनियर पैदा हो गए और 1976 में पाकिस्तान एटामिक एनर्जी कमीशन (PAEC) का गठन हो जाता है और नाभिकीय कार्यक्रम शुरू हो जाता है। फिर पाकिस्तान के नाभिकीय कार्यक्रम की क्या प्रगति है इसकी लेशमात्र की भी कोई जानकारी 1998 तक न तो पाकिस्तान में आती है और न ही CIA, FBI, पेंटागन आदि के माध्यम से पाकिस्तान और दुनिया के सामने आती है जैसाकि आजकल अक्सर देखा और पढ़ा जाता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ तो परमाणु युद्ध हो सकता है, इतने-उतने फलाने-ढेकाने का नुकसान हो जाएगा आदि आदि।
पोखरण-2 11 और 13 मई 1998 को हुआ था जिसके लिए भारत के महान वैज्ञानिकों ने वर्षों परिश्रम किया था और समय-समय पर BARC की प्रगति और उपलब्धियां भी मीडिया के माध्यम जनसंज्ञान में आती रहती थीं, आज भी आती रहती हैं। लेकिन पाकिस्तान के संदर्भ में ऐसा कुछ भी नहीं है मिसाल के तौर 1995 में बेनज़ीर भुट्टो ने कहा था कि पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम 1971 के पहले शांति के लिए था। फिर भी आश्चर्यजनक रूप से जादू की छड़ी से महज 15 दिनो बाद ही 28 और 30 मई 1998 को परमाणु परीक्षण कर लेता है। ध्यान देने वाली बात ये है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चश्मा शहर में कहुटा में चीन के सहयोग से  न्यूक्लियर पवार प्लांट है तो आप समझ सकते हैं सारा खेल। वैसे जहां भी सूचना उपलब्ध है कहीं भी इसका विशिष्ट उल्लेख नहीं है आखिर उस बम में क्या इस्तेमाल किया गया था युरेनियम था, थोरीयम था, प्लूटोनियम था क्या था आखिर। वैसे कहीं मैंने पढ़ा था कि पाकिस्तान का दावा है कि उसने प्लुटोनियम का इस्तेमाल किया था जो कि संभव नहीं लगता। उपलब्ध सूचना के मुताबिक ये भी स्पष्ट नहीं है कि उसका परीक्षण फ्यूजन था फिशन था। इसमे से एक परमाणु बम है और दूसरा हाईड्रोजन बम है। पाकिस्तान का दावा है कि बलूचिस्तान के डेरा गाजी खान में वो स्थानीय पिचब्लेन्ड से 10,000 पाउंड यूरेनियम का प्रतिदिन उत्पादन करता है। मजा देखिये पूरी दुनियाँ में ये तत्व सिर्फ 3 देश कजाखस्तान, कनाडा और आस्ट्रेलिया मिलकर मात्र 1000 टन प्रतवर्ष उत्पादन करते हैं और दुनियाँ को बेचते हैं।
NPT (Non Proliferation Treaty) 1968 में जेनेवा में पेश हुआ जिसे अमेरिका व अन्य परमाणु सम्पन्न देश भी काफी आग्रही रहे हैं। उसी दौरान PAEC के डॉ अब्दुल कादिर खान परमाणु टेक्नोलोजी और मैगनेट की चोरी यूरोप और अमेरिका के प्रिंसटन व अन्य जगहों से कर रहे हैं तो फिर डॉ खान सुरक्षित कैसे बने रहे और तब तक चोरी करते रहे जब तक पाकिस्तान परमाणु परीक्षण नहीं कर लिया? बात गले से नीचे उतर नहीं रही। ये तब है जब अमेरिका व अन्य देश अपने वादे के प्रति इमानदार हों तब। नहीं तो आप समझ ही सकते हैं।
वैसे भी पहाड़ पर परमाणु विस्फोट के लायक मात्र 15 दिनो में गड्ढा खोद लेना भी संभव नहीं जिसके लिए भारत के अनुभवी वैज्ञानिकों को भी 3 महीने से ज्यादा परिश्रम करना पड़ा था वो भी रेतीले रेगिस्तान में। भारत ने अमेरिकी निगरानी उपग्रहों से बचने के लिए कितने जतन किए थे ये बाद में जारी तसवीरों में स्पष्ट दिखा लेकिन पाकिस्तान ने सीना तान कर खुले में किया था फिर भी उसकी तैयारी की तस्वीरें आज तक जारी नहीं हुईं।
बहुत हद तक ये कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का परमाणु परीक्षण पूरा नाटक था एक डर उत्पन्न करने के लिए जिसमे चीन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी, सीपीआई(एम) के साथ  अमेरिका भी शामिल है। क्रमशः 

Sunday, 30 December 2018

पाकत कटहर बीच बजार...
अब फिर उन्हें डर लगने लगा और गुस्सा भी आने लगा जिन्हें बीबी और अपनी बीवी में फर्क नहीं पता..जब फर्क करने की मजबूरी हो तो ये लोग सर नीचे करके और कमर कुछ ज्यादा ही उठा कर अपने आका से पूछते हैं..ऐसे ही आकाई कुकुड़ूद्दीन शाह से पूछा "...असली मुंह से पूछने के बजाय आप नकली मुंह का उपयोग क्यों करते हैं..." मेरी आवाज सुनते ही कुकुड़ूद्दीन शाह चौंक गए फिर सीधा होते हुए सबकुछ ठीक ठाक करते हुए बोले "...हा आप भी क्या बात करते हैं जनाब हा...?" मैंने कहा "..अपनी शराफत के कपड़े उतार कर कमर ऊंची करने की क्या जरूरत थी .?" कुकुड़ूद्दीन शाह बड़े बदतमीजी से तमीज दिखाते हुए बोले "..आपको पता है अपनी बेहूदगी साबित करने के लिए ही शराफत के कपड़े ओढ़ते हैं..." मैंने मज़ाक करते हुए पूछा "...गनीमत है लेकिन फिर भी कमर उठा के मुंह खोलने की क्या जरूरत...?" कुकुड़ूद्दीन शाह बोले "...हा हा मियां आप भी समझदार मालूम होते हैं..." "...लेकिन आप की तरह नहीं..." मैंने तपाक से बात काटते हुए कहा। कुकुड़ूद्दीन शाह बोले "...ये मुल्क मेरा भी है और मुझे भी जीने का हक है समझे आप..!" मैंने उसे टोन में उससे पूछ "...लेकिन अभी से धूल फाँकने क्या जरूरत है...?कुकुड़ूद्दीन शाह असहज हो गए और पूछे "...आपको क्या लगता है हम आत्महत्या करने जा रहे थे क्या..." मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा "...धूल अपनी कब्र खोदने के लिए ही फांक रहे हैं आप...क्यों ? कुकुड़ूद्दीन शाह भड़क गए और भड़के अंदाज में पूछने लगे "...अरे आप चाहते हैं हम खत्म हो जाएँ और आप राज करें..." मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा "...घबराईए मत आपका एक्सीडेंटल डेथ नहीं होगा..." कुकुड़ूद्दीन शाह को समझ में नहीं आया तो पूछ बैठे "...आपके कहने का मतलब मैं समझा नहीं..." मैंने उन्हें उत्तर देते हुए कहा "...कांग्रेस को हौले-हौले मारा जा रहा है..." ये सुनते ही कुकुड़ूद्दीन शाह फिर भड़क गए और उसी अंदाज में पूछे "...हम आपको कांग्रेसी लगते हैं क्या..." मैंने उसी टोन में जवाब दिया "...इसीलिए आपके बहुत जरूरी है बीबी और बीवी में फर्क करना..." कुकुड़ूद्दीन शाह का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ "...नहीं तो क्या कर लेंगे आप...?" मैंने फिस्स से हँसते हुए कहा "...एक्सीडेंट..अब वास्तव में आपको डरना होगा...." कहते हुए मैंने नमस्कार किया